28 May 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी छन्द - घोषणा

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

पिछले दिनों ‘गौना भला शीत का’ पर काफी ज्ञान वर्धक व उपयोगी चर्चा हुई| पोस्ट से ज्यादा जानकारियाँ टिप्पणियों के माध्यम से प्राप्त हुईं, जिस से साबित हुआ कि इस आयोजन से जुड़े सरस्वती उपासक छंदों के प्रति वाकई गंभीर हैं|


घनाक्षरी का शाब्दिक अर्थ

बात शुरू हुई घनाक्षरी से| हंसराज ‘सुज्ञ’ भाई की जिज्ञासा “घनाक्षरी का शाब्दिक अर्थ क्या है?” पर आदरणीय संजीव वर्मा आचार्य ‘सलिल’ जी ने जो उत्तर दिया, यहाँ एक बार फिर दोहराते हैं:-

  • घनाक्षरी के सस्वर गायन से मेघ-गर्जन की सी अनुभूति होती है|
  • घनाक्षरी में शब्दों का सघन संगुफन (बुनाव) होता है जिससे सकल छंद एक इकाई प्रतीत होता है|
  • घन जिस पर पड़े उसका दमन कर देता है, घनाक्षरी भी श्रोता/पाठक के मन पर छा कर उसे अपने अनुकूल बना लेती है|
  • घनाक्षरी यानि वर्णों / अक्षरों की बारम्बारता| यथा, हर चरण में १६+१५=३१ या कि ८+८+८+७=३१ वर्ण / अक्षर|
मनहर कवित्त और घनाक्षरी

राजेन्द्र भाई ‘स्वर्णकार’ जी ने मनहर कवित्त के बारे में ध्यानाकर्षित किया| हमने भी बचपन में इसे ‘कवित्त’ के रूप में ही सुना, जाना और पहिचाना| बाद में ‘देव’ और ‘रूप’ वाले भेद भी सामने आए| कालांतर में हमने देखा कि लोग इसे घनाक्षरी के रूप में न सिर्फ स्वीकार कर चुके हैं, बल्कि इस पर बड़ी तादाद में रचनाएँ भी आ रही हैं| सोम ठाकुर व कविता किरण जैसे तमाम साहित्य प्रेमियों ने इस छंद पर लिखा है, और लिख रहे हैं|

इस तरह के छंदों के कई प्रकार हैं, उन्हें भविष्य के लिए आरक्षित रख कर, फिलहाल हम सर्व ज्ञात प्रारूप को ही लेते हैं|

आवृत्ति

सभी तरह के उदाहरण मिलते हैं| और जैसा कि सलिल जी ने भी इंगित किया, रचनाधर्मी अपनी सुविधा के अनुसार ‘घन’ का चुनाव करते हैं| शुद्ध रूप ८+८+८+७ = ३१ अक्षर वाला ही है, परन्तु नए पुराने रचनाधर्मियों ने इसे १६+१५=३१ वाले प्रारूप में भी लिखा है| कहीं कहीं १६+१५=३१ अक्षर वाले विधान में ऊपर की पंक्ति को नीचे की पंक्ति से जोड़ने के उदाहरण भी मिलते हैं| पर अग्रजों का मत है कि इस से बचना ही श्रेयस्कर है| उदाहरण ‘ग्वाल’ कवि जी के एक छंद से:-

जिस का जितेक साल भर में ख़रच, तिस्से-
चाहिए तौ दूना, पै, सवाया तौ कमा रहै|

हूरिया परी सी नूर नाजनी सहूर वारी,
हाजिर हमेश होंय, तौ दिल थमा रहै|

‘ग्वाल’ कवि साहब कमाल इल्म सो’बत हो
याद में ग़ुसैंया की हमेश बिरमा रहै|

खाने को हमा रहै, ना काहू की तमा रहै, जो –
गाँठ में जमा रहै, तौ हाजिर जमा रहै||

उपरोक्त छंद के पहले और आखिरी चरण में ऊपर की पंक्ति को नीचे की पंक्ति से जोड़ा गया है, अंडरलाइन वाले हिस्सों पर ध्यान दीजिएगा| इसी से बचने की सलाह देते हैं विद्वतजन| हालांकि, साथ में यह भी कहा जाता है कि कथ्य निर्वाह के लिए इसे बस अपवाद स्वरूप ही लिया जाना चाहिए|


चरण के अंत में गुरु या लघु

एक और बात घनाक्षरी के अंत में गुरु और लघु के विधान बाबत| साधारणतया देखा गया है कि ३१ अक्षरों वाले छंद के अंत में गुरु आता है और ३२ अक्षरों वाले छंद के अंत में लघु| परंतु, जैसा कि हम पहले भी लिख चुके हैं कि इस वृहद चर्चा को न लेते हुये फिलहाल हम सर्व साधारण में प्रचलित चरणांत गुरु अक्षर के साथ ३१ अक्षर वाले छंद पर ही काम करते हैं|


औडियो क्लिप

औडियो क्लिप को यहाँ अपलोड करना नहीं जम रहा| इसलिए तिलक राज कपूर जी एवं कपिल दत्त की आवाज में रिकॉर्ड किए गए दो घनाक्षरी कवित्तों की लिंक यहाँ नीचे दे रहे हैं| पहले आप को इन पर क्लिक करनी है| फिर ये download होने लगेंगे, यही कोई एक मिनट का मसला समझो| उस के बाद download हो चुकी लिंक पर क्लिक कीजिएगा - हाँ स्पीकर तो on रहेगा ही| यदि उसी समय ब्लॉग पर की "सरस्वती वंदना" भी शुरू हो तो एक बारगी उसे stop कर दीजिएगा, या तो उस के पूरे होने की प्रतीक्षा कर लीजिएगा|



तिलक भाई द्वारा गाई गई रचना श्री चिराग जैन जी की है, और कपिल द्वारा गाई गई - मेरी|

चौथी समस्या पूर्ति की घोषणा

  • छन्द - घनाक्षरी छन्द
  • चरण - चार चरण
  • तुकान्त - हर चरण के अंत में तुकान्त समान
  • चरणान्त - प्रत्येक चरण के अंत में गुरु / दीर्घ अनिवार्य
  • आवृत्ति - १६+१५=३१ अक्षर या ८+८+८+७=३१ अक्षर [एक छन्द में कोई भी एक आवृत्ति]
  • पंक्ति - समस्या पूर्ति की पंक्ति को छन्द के किसी भी चरण के उत्तरार्ध / बाद वाले हिस्से में में ले सकते हैं

अब आती है बारी समस्या पूर्ति की पंक्ति की| पिछली बार की तरह हम इस बार भी तीन पंक्तियाँ ले रहे हैं:-

[१]
राजनीति का आखाडा घर न बनाइये
[तुकांत – बनाइये / आइए / न जाइए इत्यादि| नीतिगत]

[२]
देख तेरी सुन्दरता, चाँद भी लजाया है
[तुकांत – आया है / लिखवाया है इत्यादि| श्रंगार रस]

[३]
बन्ने [बन्नो] का बदन जैसे कुतब मीनार है
[तुकांत – सार है / पुकार है इत्यादि| बन्ने या बन्नो में से कोई एक शब्द ही लें| हास्य रस]

नीतिगत, श्रंगार रस और हास्य रस को केंद्र में रख कर ये तीन पंक्तियाँ ली गई हैं| आप किसी एक पंक्ति को ले कर एक छंद या एक से अधिक पंक्ति लेते हुए एक से अधिक छंद प्रस्तुत कीजिएगा| याद रहे एक पंक्ति पर सिर्फ एक ही छंद देना है|

एक और बात - इस छंद में अनुप्रास अलंकार का बहुत सुंदर प्रयोग होता है| हमारी अपेक्षा रहेगी कि कुछ छंद अनुप्रास अलंकार के साथ भी आयें| हमें नहीं लगता कि आप लोगों को इस बारे में बताने की आवश्यकता है,

फिर भी नए मित्रों के लिए –

जब कई शब्दों में एक जैसे अक्षर बार बार आते हैं तो वहाँ अनुप्रास अलंकार का आभास होता है – उदाहरण के लिए – चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चाँदी की म्म से चाँदनी चौक में टनी टाई| या फिर यूँ भी – चारु चंद्र की चंचल किरणें – या फिर - न रंन मंन दनु, मनु रूप सुर भूप – वगैरह, वगैरह| अनुप्रास अलंकार के ऊपर सलिल जी का साहित्य शिल्पी पर एक विस्तृत आलेख है, जिसे पढ़ने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं|

इस तरह छंदों के साथ साथ रस और अलंकार का भी समावेश होता जाएगा| एक साथ बहुत कुछ करने से बेहतर होगा कि धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा करें, ताकि सुगमता से हम उसे आत्म सात भी कर सकें|

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विशेष पंक्ति की घोषणा

कुछ साथियों का मंतव्य था कि चौथी समस्या पूर्ति से कुछ नए बदलाव आने चाहिए| उसी क्रम में छन्द-रस-अलंकार का संगम करने के साथ साथ हम एक विशेष पंक्ति की घोषणा भी शुरू कर रहे हैं|जिन्हें रुचि हो, वो इस पंक्ति पर भी छंद प्रस्तुत कर सकते हैं : -

"नार बिन चले ना"

ये नारि नहीं नार है|तुकान्त - ‘चले ना”| अलंकार श्लेष| रस - आपकी मर्जी के मुताबिक| यह वाक्यांश छंद के किसी भी चरण के चतुर्थांश में आ सकता है| पुन: निवेदन - पूर्ण छंद श्लेष अलंकार पर आधारित होना चाहिए|
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ये कोई २- ५ हजार या २ – ५ सौ साल पहले की बात नहीं है| चंद दशकों पहले तक छंद हमारे जन-जीवन का अभिन्न अंग थे – कारण तब के समय के अनुसार, तब की भाषा में, तब के विषयों पर छंद रचना होती थी| तो क्यूँ न हम उन्हीं प्रारूपों को प्रयोग में लाते हुए आधुनिक संदर्भों को लक्ष्य में रख कर छंद रचना करें|

तो बस फिर क्या है, उठाइए अपनी अपनी लेखनी, और प्रस्तुत कीजिये अपना अपना सर्वोत्तम| इस आयोजन संबन्धित शंकाएँ तथा आप के छंद भेजिएगा navincchaturvedi@gmail.com पर| हमें विश्वास है इस बार के आयोजन को आप लोग और भी नई ऊँचाइयाँ प्रदान करेंगे|


जय माँ शारदे|

22 May 2011

घनाक्षरी छन्द - षडऋतु वर्णन - गरमी की लू जमाती 'लप्पड़' करारा सा

पावस में नाचता है, तन-मन तक-धिन,
शरद का चंद्र लगे, सबको दुलारा सा|

हेमन्त खिलाये गुड - संग बाजरे की रोटी,
शिशिर में पानी लगे, हिमनद धारा सा|

वसंत की ऋतु है जो, कहें उसे ऋतुराज,
धरती की माँग बीच, लगे ये सितारा सा|

हापुस खिलाने हमें, गरमी आती है पर,
गरमी की लू जमाती - 'लप्पड़' करारा सा||




ऋतु क्रम इस प्रकार होता है:-
वसंत
ग्रीष्म
वर्षा
शरद
शिशिर
हेमन्
छन्द की अंतिम पंक्ति के मद्देनजर, उपरोक्त छन्द में, ऋतु क्रम निर्वाह को प्राथमिकता नहीं दी गई है|

इस छन्द को आप १६+१५ = ३१ या ८+८+८+७=३१ अक्षर गणना के अनुसार ले सकते हैं|

20 May 2011

घनाक्षरी छन्द - गौना भला शीत का

विद्या वो भली है जो हो क्षमता के अनुसार,
मान व सम्मान भला लगे सद-रीत का|

रिश्ते हों या नाते सभी, सीमा तक लगें भले,
गायन रसीला भला, भव-हित गीत का|

शूरता लगे है भली समय की 'कविदास',
उम्र की जवानी भली, संग सच्चे मीत का|

श्रद्धा वाली भक्ति भली, सम्भव विरक्ति भली,
रोना भला मौके का व गौना भला शीत का||


समस्या पूर्ति मंच पर आगामी समस्या पूर्ति के मद्देनजर, अपने अग्रजों के परामर्श के अनुसार, अपने एक पुराने ब्रज भाषा के छन्द को हिन्दी में परिवर्तित करते हुए - अक्षर गणना विधान के एक और उदाहरण के तौर पर इसे यहाँ प्रस्तुत किया गया है| यह अक्षर गणना घनाक्षरी छन्द के प्रचलित आधुनिक प्रारूप [फॉर्मेट] के मुताबिक है:-


विद्या वो भली है जो हो
११ १ ११ १ १ १ = ८
क्षमता के अनुसार,
१११ १ ११११ = ८
मान व सम्मान भला
११ १ १११ ११ = ८
लगे सद-रीत का|
११ ११ ११ १ = ७
रिश्ते हों या नाते सभी,
११ १ १ ११ ११ = ८
सीमा तक लगें भले,
११ ११ ११ ११ = ८
गायन रसीला भला,
१११ १११ ११ = ८
भव-हित गीत का|
११ ११ ११ १ = ७
शूरता लगे है भली
१११ ११ १ ११ = ८
समय की 'कविदास',
१११ १ ११११ = ८
उम्र की जवानी भली,
११ १ १११ ११ = ८
संग सच्चे मीत का|
११ ११ ११ १ = ७
श्रद्धा वाली भक्ति भली,
११ ११ ११ ११ = ८
सम्भव विरक्ति भली,
१११ १११ ११ = ८
रोना भला मौके का व
११ ११ ११ १ १ = ८
गौना भला शीत का||
११ ११ ११ १ = ७

गौना - गवना -
ज़्यादातर लोगों को पता होगा कि पहले समय में विवाह के बाद कन्या कि विदाई नहीं होती थी| कुछ सालों बाद जब लड़का योग्य हो जाता, तब लड़की को उस के ससुराल गृहस्थ जीवन जीने के लिए भेजा जाता था| उस विदाई को ही हमारे यहाँ मथुरा में गौना यानि कि गवना कहते हैं|
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इस छन्द को वर्तमान दौर में आदरणीय सोम ठाकुर जी ने प्रचुर मात्र में लिखा और बोला / गाया है| आज कल कवि सम्मेलनों में भी इस छन्द की धूम रहती है|
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आचार्य सलिल जी के परामर्श के अनुसार इस छन्द के दूसरे चरण के पहले अर्ध भाग में थोड़ा सुधार किया है:-

पहले यूँ था:-
मान व सम्मान भी भ-
-ला है सद-रीत का

अब यूँ है:-
मान व सम्मान भला
लगे सद-रीत का
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आदरणीय तिलक भाई साब अपनी आवाज़ में इस छन्द की एक ऑडियो क्लिप यहीं इस पोस्ट पर लगाने वाले हैं, जिस से इस छन्द की रचना और गेयता को समझने में हमें और भी सुविधा होगी|

17 May 2011

छंदों में तो जैसे राजभोग है घनाक्षरी

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

आप सभी के सहयोग से कुण्डलिया छन्द पर आधारित तीसरी समस्या पूर्ति ने नई मंजिलें तय कीं| कई पुराने रचनाकार व्यस्तता की वजह से शिरकत नहीं कर पाए तो अनेक नए सदस्यों ने आयोजन की गरिमा को बढाने में बढ़ चढ़ कर अपना अमूल्य योगदान दिया|

अब बारी है अगले छन्द के बारे में बात करने की| अब तक हमने जिन छन्दों [चौपाई, दोहा, रोला और कुण्डलिया] पर काम किया वो सभी के सभी मात्रिक छन्द थे| इस बार सोच रहे हैं कि वर्णिक छन्द पर काम किया जाये| सब से ज्यादा मशहूर छन्द है 'घनाक्षरी छन्द'|

इस छन्द का एक उदाहरण :-

आठ आठ तीन बार, और सात एक बार,
इकतीस अक्षरों का योग है घनाक्षरी|
सोलह-पंद्रह पर, यति का विधान मान
शान जो बढाए वो सु-योग है घनाक्षरी|
वर्ण इकतीसवां सदा ही दीर्घ लीजिएगा
काव्य का सुहावना प्रयोग है घनाक्षरी|
आदि काल से लिखा है लगभग सब ने ही
छंदों में तो जैसे राजभोग है घनाक्षरी||


अक्षरों / वर्णों की गणना :-

आठ आठ तीन बार,
११ ११ ११ ११ = ८
और सात एक बार,
११ ११ ११ ११ = ८
इकतीस अक्षरों का
११११ १११ १ = ८
योग है घनाक्षरी|
११ १ ११११ = ७
सोलह-पंद्रह पर,
१११ १११ ११ = ८
यति का विधान मान
११ १ १११ ११ = ८
शान जो बढाए वो सु-
११ १ १११ १ १ = ८
योग है घनाक्षरी|
११ १ ११११ = ७
वर्ण इकतीसवां स-
११ १११११ १ = ८
-दा ही दीर्घ लीजिएगा
१ १ ११ ११११ = ८
काव्य का सुहावना प्र-
११ १ ११११ १ = ८
योग है घनाक्षरी|
११ १ ११११ = ७
आदि काल से लिखा है
११ ११ १ ११ १ = ८
लगभग सब ने ही
११११ ११ १ १ = ८
छंदों में तो जैसे राज-
११ १ १ ११ ११ = ८
भोग है घनाक्षरी|
a११ १ n११११ = ७

उचित समय पर इस समस्या पूर्ति की पंक्ति भी घोषित की जाएगी| तब तक नए रचनाकार [मेरा मतलब जिन्होंने पहले कभी घनाक्षरी नहीं लिखा] कलम आजमाइश करना शुरू कर सकते हैं|

नए पुराने सभी साथियों से फिर से विनम्र निवेदन है कि साहित्य की सेवा स्वरूप शुरू किये गए इस आयोजन में अपनी उपस्थिति को अनिवार्य मानें|

आप की अमूल्य राय की भी प्रतीक्षा रहेगी|

जय माँ शारदे ...............

कहीं बच्चे पिता के प्यार, माँ के दूध को तरसें - नवीन

नया काम

कहो तो कौन है जिस को यहाँ वुसअत नहीं मिलती
जिसे फुर्सत नहीं मिलती उसे सुहबत नहीं मिलती

तेरा ग़म यूँ है जैसे ख़ुद को चूँटी काटता हूँ मैं
बदन को टीस मिलती है फ़क़त, हरकत नहीं मिलती

मैं इस मौक़े को अपने हाथ से कैसे फिसलने दूँ
मुहब्बत में रक़ीबों को बहुत मुहलत नहीं मिलती

वफ़ा के आशियाने में सभी के सर सलामत हैं
भले इस आशियाने की ज़मीं को छत नहीं मिलती

कलेज़ा चीर कर उस के लहू से रौशनी करना
हमारे दौर में उस तौर की वहशत नहीं मिलती

न जाने कब का ये सारा ज़माना मिट चुका होता
अगर इन्सान को इन्सान से इज्ज़त नहीं मिलती

------

हरिक बीमार को उपचार की नेमत नहीं मिलती|
ये दुनिया है, यहाँ सर पे सभी के छत नहीं मिलती|१|

कहीं बच्चे पिता के प्यार, माँ के दूध को तरसें|
कहीं माँ-बाप को, औलाद से इज्ज़त नहीं मिलती|२|

शरीफ़ों की सियासत की विरासत की ये हालत है|
रियायत मिलती है, लेकिन, कभी राहत नहीं मिलती|३|

हमें तो ज़िन्दगी में दोस्त का चेहरा दिखा हरदम|
सिवा इस के, कोई भी दूसरी सूरत नहीं मिलती|४|

तुम्हीं बतलाइये साहब, उसे महफिल कहें कैसे|
जहाँ हर एक आदम जात को इज्ज़त नहीं मिलती|५|

तरक्की किस तरह आये हमारे मुल्क़ में कहिये।
यहाँ मेहनत मशक्क़त को सही क़ीमत नहीं मिलती|६|

जिसे देखो वही मसरूफ़ियत के गीत गाता है|
हमें भी दीन दुनिया से बहुत फुर्सत नहीं मिलती|७|


मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 
1222 1222 1222 1222
बहरे हजज मुसम्मन सालिम 

13 May 2011

चार नवगीत

नवगीत - १ - यमुना कहे पुकार

यमुना कहे पुकार
तुमरे बिन हे नटवर नागर
कौन करे उद्धार

छोटे-मध्यम उद्यम, सबका -
दूषण यमुना में बहता
बाँध बना है जब से, तब से
पानी भी थम के रहता
पंक पटा है
तट से तल तक
दूषित है जल धार
तुमरे बिन ...................

पल-छिन दूभर होता जाता
जल के जीवों का जीवन
मन में श्रद्धा अतिशय, लेकिन-
पान करें ना वैष्णव जन
अरबों खरबों के आबंटन
नेता गए डकार
तुमरे बिन .....................

नवगीत - २- मजदूरी का मोल

मजदूरी का मोल
यहाँ अधिक, पर
वहाँ लगे कम
ये कैसा है झोल
ओ भैया ये कैसा है झोल

कस्बों में रिक्शे वाले
पाँवों से रिक्शे हाँक रहे
सर पे तपती धूप
बदन के हर हिस्से से
स्वेद बहे

ढो कर हम को एक मील
दस-बीस रुपल्ली मात्र गहे
गमछे से फिर पौंछ पसीना
मुँह से मीठे बोल कहे

उस पर हम
तन कर उस से
बोलें बस कड़वे बोल
ओ भैया ये कैसा है झोल.............

शहरों के ऑटो - टेक्सी वालों के
नखरे क्या बोलें
मन में हो तो आवें
मन में ना हो तो - फट ना बोलें

लें समान की अलग मजूरी
जो चाहें जैसा बोलें
उस पर हम डरते डरते
उनको ड्राईवर भैया बोलें

जो मांगें
खामोशी से
दे देते हैं दिल खोल
ओ भैया ये कैसा है झोल


नवगीत - ३ - छंदों के मतवाले हम

छंदों के मतवाले हम
है प्यार हमें भाषाओं से
प्रारूपों के रखवाले हम

कहना सुनना
चिंतन सुमिरन
पढ़ना लिखना
अपना जीवन

तुलसी की धरती पर जन्मे
कबिरा के घरवाले हम
छंदों के मतवाले हम ..................

बिम्ब हमारी
ख़ास धरोहर
जोर हमारा
परिवर्तन पर

साहित की सेवा करने को
बैठे - लंगर डाले हम
छंदों के मतवाले हम ....................

नवगीत - ४ - चल चलें इक राह नूतन
चल चलें इक राह नूतन

भय न किंचित
हो जहाँ पर
पल्लवित सुख
हो निरंतर
अब लगाएं
हम वहीँ पर
बन्धु - निज आसन

द्वेष - ईर्ष्या
को न प्रश्रय
दुर्गुणों की
हो पराजय
हो जहाँ बस
प्रेम की जय
खिल उठे तन मन

4 May 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - सातवीं किश्त - खट-खट किट-किट कीजिये, खुले अजायब द्वार

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

इस चिलचिलाती गर्मी में मथुरा जाने से पहले -

कुण्डलिया छन्द पर आमंत्रित इस तीसरी समस्या पूर्ति के सातवें सत्र में आज ग्यारहवें और बारहवें कवियों की कुण्डलिया पढ़ते हैं हम लोग| इन छंदों के साथ इस आयोजन में प्रकाशित कुंडलियों की संख्या हो जाती है अब ३१| समस्या पूर्ति मंच को शुरू से ही अपना आशीर्वाद प्रदान करने वाले आदरणीय रूप चन्द्र शास्त्री जी के छंदों को पढ़ते हैं पहले:-



सुन्दरियाँ इठला रहीं, रन वर्षा के साथ।
अंग प्रदर्शन कर रहीं, हिला-हिला कर हाथ।।
हिला-हिला कर हाथ, खूब मटकाती कन्धे।
खुलेआम मैदान, इशारे करतीं गन्दे।।
कह मयंक कविराय, हुई नंगी बन्दरियाँ।
लाज-हया को छोड़, नाचती हैं सुन्दरियाँ।।
[अरे भाई ........कोई तो लिखो.... पुणे वाली टीम की नुत्यांगनाओं के बारे में]

भारत में आतंक की, आई कैसी बाढ़।
भाई अपने भाई से, ठान रहा है राड़।।
ठान रहा है राड़, चाल है बदली-बदली।
क्यों है कण्टक-ग्रस्त, सलोना पादप कदली।
कह मयंक कविराय, हुए सज्जन हैं आरत।
कैसे निज सम्मान, पुनः पायेगा भारत??
[सचमुच भद्र जन आरत हैं]

कम्प्यूटर अब बन गया, जन-जीवन का अंग।
कलियुग ने बदले सभी, दिनचर्या के ढंग।।
दिनचर्या के ढंग, हो गयी दुनिया छोटी।
देता है यह यन्त्र, आजकल रोजी-रोटी।।
कह मयंक कविराय, यही नवयुग का ट्यूटर।
बाल-वृद्ध औ’ तरुण, सीख लो अब कम्प्यूटर।
[सीख रहे हैं सर, सभी]

:- रूपचंद्र शास्त्री मयंक




भारत भूमि सुहावनी, बसती अपनी जान|
जीवन में सबसे बड़ा, माता का सम्मान||
माता का सम्मान, मातु या धरती माता|
हमको इनके हेतु, प्राण देना है आता|
कह 'झंझट' झन्नाय, रहो हर पल सेवारत|
बने विश्वशिरमौर, हमारा प्यारा भारत|१|
[आपकी झन्नाहट सही है बन्धु]

कम्पूटर की क्रांति ने, बदल दिया संसार|
खट-खट किट-किट कीजिये, खुले अजायब द्वार||
खुले अजायब द्वार, खबर दुनिया की लीजै|
कई दिनों के काम, पलक झपकाते कीजै|
सुन 'झंझट', झंकार - गीत - संगीत भी सुन्दर|
बड़े काम की चीज़ - हुई, भैया! कम्प्यूटर|२|
[अजायब घर तो सुना था, पर ये अजायब द्वार का प्रयोग वाकई जबरदस्त रहा]


सुन्दरियाँ संसार में , खोलें सुख के द्वार|
जीवन भरतीं प्रेम से , पल-पल उपजे प्यार||
पल-पल उपजे प्यार , सुमन सी सुन्दर सोहैं|
चन्दन जैसा अंग-अंग महके मन मोहैं|
कह 'झंझट' हरषाय, वाह धरती की परियाँ|
करतीं जीवन धन्य , धन्य सुन्दर सुन्दरियाँ|३|
['झंझट' हर्ष के साथ!!!! पहली बार देखा..........भई वाह| और 'चंदन जैसा अंग' वाली पंक्ति तो जबरदस्त रही बन्धु]

:-सुरेंद्र सिंह झंझट

एक बात आप लोगों को जो अब तक नहीं बताई, वो अब बता देता हूँ| इस समस्या पूर्ति में जो कंप्यूटर शब्द लिया गया है - उसे प्रस्तावित किया था आदरणीया पूर्णिमा बर्मन जी ने| और शायद ये ही पहले 'कंप्यूटर कवियत्री' के नाम से भी लिखती थीं| योगराज प्रभाकर, शास्त्री जी के अलावा 'भारत' शब्दका समर्थन किया था पंकज सुबीर जी ने भी| सुन्दरियाँ शब्द लेने का सारा इलज़ाम में अपने सर पे लेता हूँ.................नहीं नहीं मैं उन का नाम यहाँ नहीं बता सकता भाई ............................उन्होंने मना किया है|

भारत शब्द पर एक से बढ़ कर एक कुंडली छन्द पढ़ने को मिले हैं अब तक इस आयोजन में और आशा है कि कुछ और भी विलक्षण छन्द पढ़ने को मिलें| कंप्यूटर शब्द पर एक ही जगह इतने सारे छन्द होना भी एक उपलब्धि रहेगी इस आयोजन की|

एक हफ्ते मथुरा-दिल्ली रहूँगा| मौजूदा दौर के एक प्रतिष्ठित सरस्वती पुत्र के चरण स्पर्श करने के मोह का संवरण नहीं हो पा रहा अब| लौटने पर उन के बारे में भी आप से बतियाऊंगा| वहाँ साइबरालयों की उपलब्धता, बिजली देवी की मेहरबानी और इन्टरनेट देवता की अनुकम्पा रही तो आप लोगों से जुड़े रहने की लालसा जरुर रहेगी| तब तक के लिए ............जय माँ शारदे|

1 May 2011

मैं

मैं


मैं
मैं
मैं
ये बकरी वाली 'में-में' नहीं है

ये वो 'मैं' है
जो आदमी को
शेर से
बकरी बनाता है..............

मैं,
हर बार आदमी को,
शेर से बकरी नहीं बनाता...........

कभी कभी
बकरी को भी,
शेर बना देता है................

और कभी कभी,
उस का,
स्वयँ से,
साक्षात्कार भी करा देता है..............

'मैं'
किस के अंदर नहीं है?
बोलो-बोलो!!!

हैं ना सबके अंदर?
कम या ज़्यादा!!!!!!

और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है
इस 'मैं' के बारे में............

पर डरता हूँ मैं भी
उस कड़वे सत्य को
सार्वजनिक रूप से
कहते हुए.................

इसलिए
सिर्फ़ इतना ही कहूँगा
कि मैं
इस 'मैं' का दीवाना तो बनूँ
पर, उतना नहीं-
कि ये 'मैं' तो परवान चढ़ जाए
और खुद मैं-
उलझ के रह जाऊँ,
इस परवान चढ़े हुए,
'मैं' के द्वारा बुनी गयी-
ज़ालियों में............

आप क्या कहते हैं?


मेरी इच्छा थी कि सब से ज्वलंत पर अक्सर ही दरकिनार कर दिए जाने वाले इस विषय 'मैं' पर एक बहुत ही साधारण भाषा में ऐसी कविता लिखूं, जिसे समझने के लिए शब्द कोष या दिमागी घोड़े दौडाने की जरुरत न पड़े| मैं अपने प्रयास में कितना सफल हो पाया हूँ, आप लोग ही बता पायेंगे|