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चार नवगीत

नवगीत - १ - यमुना कहे पुकार

यमुना कहे पुकार
तुमरे बिन हे नटवर नागर
कौन करे उद्धार

छोटे-मध्यम उद्यम, सबका -
दूषण यमुना में बहता
बाँध बना है जब से, तब से
पानी भी थम के रहता
पंक पटा है
तट से तल तक
दूषित है जल धार
तुमरे बिन ...................

पल-छिन दूभर होता जाता
जल के जीवों का जीवन
मन में श्रद्धा अतिशय, लेकिन-
पान करें ना वैष्णव जन
अरबों खरबों के आबंटन
नेता गए डकार
तुमरे बिन .....................

नवगीत - २- मजदूरी का मोल

मजदूरी का मोल
यहाँ अधिक, पर
वहाँ लगे कम
ये कैसा है झोल
ओ भैया ये कैसा है झोल

कस्बों में रिक्शे वाले
पाँवों से रिक्शे हाँक रहे
सर पे तपती धूप
बदन के हर हिस्से से
स्वेद बहे

ढो कर हम को एक मील
दस-बीस रुपल्ली मात्र गहे
गमछे से फिर पौंछ पसीना
मुँह से मीठे बोल कहे

उस पर हम
तन कर उस से
बोलें बस कड़वे बोल
ओ भैया ये कैसा है झोल.............

शहरों के ऑटो - टेक्सी वालों के
नखरे क्या बोलें
मन में हो तो आवें
मन में ना हो तो - फट ना बोलें

लें समान की अलग मजूरी
जो चाहें जैसा बोलें
उस पर हम डरते डरते
उनको ड्राईवर भैया बोलें

जो मांगें
खामोशी से
दे देते हैं दिल खोल
ओ भैया ये कैसा है झोल


नवगीत - ३ - छंदों के मतवाले हम

छंदों के मतवाले हम
है प्यार हमें भाषाओं से
प्रारूपों के रखवाले हम

कहना सुनना
चिंतन सुमिरन
पढ़ना लिखना
अपना जीवन

तुलसी की धरती पर जन्मे
कबिरा के घरवाले हम
छंदों के मतवाले हम ..................

बिम्ब हमारी
ख़ास धरोहर
जोर हमारा
परिवर्तन पर

साहित की सेवा करने को
बैठे - लंगर डाले हम
छंदों के मतवाले हम ....................

नवगीत - ४ - चल चलें इक राह नूतन
चल चलें इक राह नूतन

भय न किंचित
हो जहाँ पर
पल्लवित सुख
हो निरंतर
अब लगाएं
हम वहीँ पर
बन्धु - निज आसन

द्वेष - ईर्ष्या
को न प्रश्रय
दुर्गुणों की
हो पराजय
हो जहाँ बस
प्रेम की जय
खिल उठे तन मन

यमुना

SHRI YAMUNA JI

आज यमुना छठ है यानि यमुना जी का जन्म दिवस| हम मथुरास्थ माथुर चतुर्वेदी यमुना पुत्र कहे जाते हैं| तो अपनी माँ यमुना महारानी के चरण कमलों में श्रद्धा सुमन स्वरूप कुछ छन्द अर्पित करता हूँ:-


सूरज की तनया हौ, जम की बहन आप
माथुर मुनीसन की मातु हौ सुहासिनी

ब्रज की बसुन्धरा कों, आपनें कृतार्थ कियौ
स्याम जू की स्यामा, प्रेम पुञ्ज की प्रकासिनी

चौदह भुवन माँहि आपको प्रताप, तीनों -
लोकन में आप भक्ति भाव की बिकासिनी

छूटें जम-फन्द, मिटें द्वन्द औ अनन्द रहें
आप की कृपा सों श्री जमने कलि-नासिनी



मोहन की मुरली की मधुरता सी मधुर,
स्याम-बर्न सान्त-चित्त बारी श्री जमुना जी

रसिक सिरोमनि के रङ्ग रँगी सहचरी,
सदा स्याम ज़ू कों सुभकारी श्री जमुना जी

नटखट कन्हैया के पाँइन पखारिबे कों,
गिरिबर कलिन्द सों पधारीं श्री यमुना जी

सर्ब-सुखकारी, दुख-दर्द-कष्ट हारी, नँद-
नन्द जू कों प्यारी हैं हमारी श्री यमुना जी



कूड़ा करकट नहीं मैला तलछट नहीं
साफ़-सुथरा चमकदार तल चाहिये

यमुना को मुद्दा नहीं जमना-मैया जो कहें
सुनवाई में नवीन ऐसे दल चाहिये

किसी से भी पूछ लीजै सारे ही कहेंगे यही
अब और वादे नहीं बस हल चाहिये

मोहन की मुरली की मीठी-मीठी तान जैसा
मधुर-मधुर यमुना में जल चाहिये


नम: कृष्ण तुर्य प्रियाम