14 November 2016

मोदी वाला विमुद्रीकरण

हालाँकि बैंकों का राष्ट्रीयकरण राष्ट्र के हित में था मगर एक मिनट के लिये सोचिये कि आप एक चाय की टपरी खोलते हैं  फिर उसे छोटा-मोटा होटल बनाते हैं। जोख़िम उठाते हैं। फिर उसे रेस्त्राँ में तब्दील करते हैं। फिर जोख़िम उठाते हैं और क़दम दर क़दम बढते हुये अपनी चाय की टपरी को एक आलीशान पञ्चतारा होटल बना देते हैं। तक़रीबन एक उम्र लग जाती है यह सब करते हुये। यह सब होने के बाद आप का हक़ बनता है कि शेष जीवन अपने लगाये हुये पेड़ों के फलों का स्वाद लेते हुये गुज़ारें। मगर तभी अचानक एक आधी रात को प्रधानमंत्री का आदेश निकलता है और आप का  पञ्चतारा होटल अब आप का नहीं रहा, सरकार का हो गया है - ---------- ज़रा सोचिये कैसा लगेगा आप को? रातों रात अनेक निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था - राष्ट्रीय हित में!!!!!  उक्त राष्ट्रीयकरण के बाद की कथा-व्यथाएँ सर्वज्ञात हैं।

एक और दृश्य - सन २०१६, जो कि पिछले पैंतीस-चालीस बरसों में पर्याप्त आधुनिक हो चुका है, में स्कूल से आप का बच्चा लौटता है - हाथ में एक declaration form होता है। आप से पूछा जाता है कि आप की पत्नी या आप की नसबन्दी हो चुकी है या नहीं? यदि नहीं तो कब तक करवा ली जायेगी? आज सन दो हज़ार सोलह में यह बहुत मामूली बात लगती है मगर चालीस साल पहले के समय में जा कर सोचो और बताओ कैसा लगता है? विशेष कर तब जब आप वह बच्चे हैं जो स्कूल से declaration form ले कर लौटा है और दुर्भाग्यवश उस बच्चे के पिता जी के देहावसान के कारण उस बच्चे की माँ विधवा हो चुकी है! परन्तु declaration form देने वाले मूर्खों को तो बस declaration चाहिये!!! साधु-सन्तों को, बुड्ढे-बुड्ढियों को भी ज़बर्दस्ती अस्पताल में लिटा-लिटा कर नसबन्दियाँ कर दी गयी थीं। यह कड़वा है परन्तु सत्य है।

दिन का अधिकांश हिस्सा व्हौट्सप / फ़ेसबुक पर गुज़ारने वालों को तो यह भी इल्म नहीं था कि अपने हिन्दुस्तान में demonetization यानि विमुद्रीकरण पहले भी सो चुका है। वह निर्णय भी अचानक ही लिया गया था। और तब भी बहुत अफ़रातफ़री मची थी। उक्त विमुद्रीकरण के चलते लोगों को समय पर वेतन नहीं मिल पाया था। वह समय सामञ्जस्य के साथ जीवन जीने वालों का समय था इसलिये चर्चाएँ बहुत अधिक नहीं हुईं।

बात विमुद्रीकरण की हो या भारत-पाकिस्तान बँटवारे की - कष्ट सामान्य जनता ही उठाती है। भाग मिल्खा भाग में कुछ झलकियाँ देख कर अन्दाज़ा आ चुका होगा कि भारत-पाकिस्तान बँटवारे में हम लोगों ने क्या पाया क्या खोया? काश कोई मुनव्वर राणा मुज़ाहिरनामा हिन्दुस्तान के दृष्टिकोण से लिख पाता। ज़मीन दी, पैसा दिया, शरणार्थियों को क़ुबूल किया, रक्तपात झेला और आज भी आतंकवाद का दंश झेलने के बावुजूद विश्व-बिरादरी के सामने कश्मीर पर बार बार सफ़ाई देने के लिये मजबूर हैं।

ग़रीबों के उत्थान के लिये आवाज़ उठाना क़तई ग़लत नहीं है परन्तु चक्काजाम वाले दत्ता सामन्त, जोर्ज-फर्नाण्डिस आदि के आन्दोलन के बाद मुम्बई के मिल मजदूरों की जो दुर्दशा हुई है - किसी से छुपी नहीं है। आन्दोलन के बाद मिल मजदूरों के और उन के नेताओं के जीवन स्तर में आने वाले परिवर्तन का अध्ययन कितने समाजवादियों या वामपंथियों ने किया है अब तक?

विमुद्रीकरण जैसे और जब मोदी ने किया है यदि वह ग़लत है तो कैसे और कब किया जाना चाहिये था? ऐसे निर्णय कोई भी ले, कभी भी ले; ऐसे निर्णयों से कष्ट होता ही है। हम सामान्य मानवी ही कष्ट उठाते हों ऐसा भी नहीं है! छोटे लोगों की परेशानियाँ छोटी होती हैं और बड़े लोगों की बड़ी। पैसे की तंगी यदि हम आप सामान्य लोगों को है तो टाटा-बिड़ला जैसों को भी है। परेशान कमोबेश हम सब हैं। मैं स्वयं प्रवास में होने के कारण पल-पल इस कष्ट का अनुभव कर रहा हूँ।

मज़े की बात यह है कि इस निर्णय का विरोध करने वालों में अधिकांश मोदी विरोधी मिल रहे हैं। मैं सोच रहा हूँ कि यदि भारत-पाकिस्तान बँटवारा सही था! ज़बरन करायी जाने वाली नसबन्दियाँ सही थीं, बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी सही था, "BIFR सिस्टम" भी सही है तो बेचारे मोदी को कब तक दोष दिया जाय?

मोदी को गरियाने से छुट्टी ले कर ज़रा BIFR का निष्पक्ष और सूक्ष्म अध्ययन करने का प्रयास करें। मेरा दावा है कि आप यदि वास्तव में BIFR का निष्पक्ष और सूक्ष्म अध्ययन कर सके तो स्वयं मोदी से इस BIFR के बारे में भी कुछ करने को कहेंगे। यदि आप नौकरी पेशा हैं, कुछ महीने आप नौकरी पर नहीं हैं तो क्या सरकार आप का घर चलायेगी? नहीं न!!!!! तो फिर आमआदमी के टैक्स का पैसा रूप बदल-बदल कर BIFR तक क्यों पहुँचे????

मेरे प्यारे साथियो! जागना है तो सच में जागो। प्रणाम।


2 September 2016

निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला - सालिम शुजा अन्सारी

निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला

मुसाफ़िर क्या पता किस ओर निकला


अपाहिज लोग थे सब कारवाँ में

सितम ये राहबर भी कोर निकला


जिसे समझा था मैं दिल की बग़ावत

महज़..वो धड़कनों का शोर निकला


निवाला बन गया मैं.... ज़िन्दगी का

तुम्हारा ग़म तो आदमख़ोर निकला


दिये भी....लड़ते लड़ते थक चुके हैं

अँधेरा इस ...क़दर घनघोर निकला


हुआ पहले क़दम पर ही शिकस्ता

करूँ क्या हौसला कमज़ोर निकला


सुना ये था, है दुनिया गोल "सालिम"

मगर नक़्शा तो ये चौकोर निकला


सालिम शुजा अन्सारी
9837659083



बहरे हज़ज  मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन ,

1222 1222 122

हरिशंकर परसाई जी के कुछ चुटीले उद्धरण - अनूप शुक्ल

हरिशंकर परसाई जी
अनूप शुक्ल

परसाईजी के जन्मदिन [22.08.16] के अवसर पर परसाई जी की स्मृति को नमन करते हुये उनके कुछ महत्वपूर्ण उद्धरण भाई अनूप शुक्ल जी ने अपनी फेसबुक वाल पर शेयर किये थे, उन के हवाले से साभार :

1.इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.
2.जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये ,वह अपने दिन कैसे बदलेगी!
3.अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिये.जरूरत पडी तब फैलाकर बैठ गये,नहीं तो मोडकर कोने से टिका दिया.
4.अद्भुत सहनशीलता और भयावह तटस्थता है इस देश के आदमी में.कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले तो वह दान का मंत्र पढने लगता है.
5.अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.
6.चीनी नेता लडकों के हुल्लड को सांस्कृतिक क्रान्ति कहते हैं,तो पिटने वाला नागरिक सोचता है मैं सुसंस्कृत हो रहा हूं.
7.इस कौम की आधी ताकत लडकियों की शादी करने में जा रही है.
8.अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.
9.जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं .
10.नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं.दो नशे खास हैं--हीनता का नशा और उच्चता का नशा,जो बारी-बारी से चढते रहते हैं.
11.शासन का घूंसा किसी बडी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बडी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड जाता है.
12.मैदान से भागकर शिविर में आ बैठने की सुखद मजबूरी का नाम इज्जत है.इज्जतदार आदमी ऊंचे झाड की ऊंची टहनी पर दूसरे के बनाये घोसले में अंडे देता है.
13.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है.
14.मानवीयता उन पर रम के किक की तरह चढती - उतरती है,उन्हें मानवीयता के फिट आते हैं.
15.कैसी अद्भुत एकता है.पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है.देश एक है.कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है,हिन्दी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है.सब सीमायें टूट गयीं.
16.रेडियो टिप्पणीकार कहता है--'घोर करतल ध्वनि हो रही है.'मैं देख रहा हूं,नहीं हो रही है.हम सब लोग तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं.बाहर निकालने का जी नहीं होत.हाथ अकड जायेंगे.लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं फिर भी तालियां बज रही हैं.मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं ,जिनके पास हाथ गरमाने को कोट नहीं हैं.लगता है गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है.गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की तालियां मिलती हैं,जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा नहीं है.
17.मौसम की मेहरवानी का इन्तजार करेंगे,तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी.मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होता.वसंत अपने आप नहीं आता,उसे लाना पडता है.सहज आने वाला तो पतझड होता है,वसंत नहीं.अपने आप तो पत्ते झडते हैं.नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं.वसंत यों नहीं आता.शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके,निकाल ले.दो पाटों के बीच में फंसा है देश वसंत.पाट और आगे खिसक रहे हैं.वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीचे ढकेलो--इधर शीत को उधर गरमी को .तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.
18.सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं.एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की.उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है.चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है.पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं.वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं.हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है.
19.एक और बडे लोगों के क्लब में भाषण दे रहा था.मैं देश की गिरती हालत,मंहगाई ,गरीबी,बेकारी,भ्रष्टाचारपर बोल रहा था और खूब बोल रहा था.मैं पूरी पीडा से,गहरे आक्रोश से बोल रहा था .पर जब मैं ज्यादा मर्मिक हो जाता ,वे लोग तालियां पीटने लगते थे.मैंने कहा हम बहुत पतित हैं,तो वे लोग तालियां पीटने लगे.और मैं समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसे,उसमे क्या कभी कोई क्रन्तिकारी हो सकता है?होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबडे टूटेंगे .
20.निन्दा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं.निन्दा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है,बल और स्फूर्ति देती है.निन्दा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं.निन्दा पयरिया का तो सफल इलाज है.सन्तों को परनिन्दा की मनाही है,इसलिये वे स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं.
21.मैं बैठा-बैठा सोच रहा हूं कि इस सडक में से किसका बंगला बन जायेगा?...बडी इमारतों के पेट से बंगले पैदा होते मैंने देखे हैं.दशरथ की रानियों को यज्ञ की खीर खाने से पुत्र हो गये थे.पुण्य का प्रताप अपार है.अनाथालय से हवेली पैदा हो जाती है.


हों लाख बरहम हवाएँ लेकिन चिराग़ दिल का बुझा नहीं है - मुमताज़ नाजाँ

हों लाख बरहम हवाएँ लेकिन चिराग़ दिल का बुझा नहीं है

जो तोड़ डाले हमारी हिम्मत जहाँ में ऐसी बला नहीं है
है कौन मक़्तूल कौन मुजरिम, लहू के छींटे बता रहे हैं

ज़माने भर पर है राज़ ज़ाहिर बस एक तुम को पता नहीं है
धरम का लो नाम और उस पर उठाओ फ़ितने कराओ दंगे

अगर ख़ुदा है तुम्हारा वाली तो क्या हमारा ख़ुदा नहीं है?
गुज़र चुके हैं सभी मुसाफ़िर, मकीं कहीं और जा बसे हैं

पड़ी है वीरान दिल की बस्ती कहीं भी कोई सदा नहीं है
ये शाह ए दौरां से जा के कह दो, है हम को मंज़ूर टूट जाना

अना की "मुमताज़" है रिवायत कि सर कहीं भी झुका नहीं है

मुमताज़ नाजाँ
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212


ओलम्पिक, जैशा और पानी की बोतल - ललित कुमार

एक भारतीय अफ़सर की पत्नी अपनी पड़ोसन से:

"मेरे हस्बेंड का ना रियो का टूर लग गया है... सच्ची! दो साल पहले से ही हमने जुगाड़ लगाना शुरु कर दिया था। तब बात बनी। ये तो बड़े ख़ुश हैं --कह रहे हैं कि ओलम्पिक में हो गया है तो पैराल्म्पिक का टूर भी पक्का ही समझो... बच्चों को भी सैर कराने ले जाएँगे। हमनें पिछली बार अर्जेन्टाइना और पेरु निपटा लिया था। इस बार ब्राज़ील देखेगें। मैंने तो इन्हें कह दिया है कि रियो में सब जगह अच्छे से देख आना ताकि पैरालम्प्लिक में हमें सब पहले से ही पता रहे कि कौन-कौन-सी जगह निपटानी है। इन्हें जो अलाउंस मिलते हैं न मिसिज वर्मा... उससे शॉपिंग, रेस्टोरेंट वैगरा सब आराम से हो जाता है। होटल और घूमने-फिरने के लिए तो फ़लां-फ़लां इनके पीछे पड़े रहते हैं कि सेवा का मौका तो दीजिए..."

रियो में जब मैराथन रनर ओ पी जैशा देश के लिए मीलों दौड़ते हुए पानी की बोतल ढूँढ रही थीं... तब मिस्टर हस्बेंड रियो के एक अप-मार्केट मॉल में अपनी मिसिज के लिए रिस्ट-वॉच ढूँढ रहे थे...

ओ पी जैशा के करीब से तीर की तरह निकली दूसरे देश की धाविका ने देखा कि भारतीय स्टॉल खाली पड़ा था और जैशा को पानी नहीं मिला... तो उस धाविका के होंठो पर मुस्कान दौड़ गई... वह समझ गई कि जो देश जैशा को पानी की बोतल तक नहीं दे सकता उ(स)से जीतना कोई मुश्किल नहीं...
==
इस कटाक्ष से मेरा इरादा किसी ईमानदार और अपने काम के प्रति निष्ठावान अफ़सर को दु:ख पहुँचाना नहीं है... लेकिन ओ पी जैशा का खुलासा पढ़ने के बाद मन में इस टिपिकल अफ़सरी माइंडसेट को लेकर बहुत ज़्यादा गुस्सा है... शर्म आनी चाहिए कि साक्षी/सिंधु को लेकर इतना हो-हल्ला करने वाला देश जैशा को पानी की बोतल तक नहीं दे सका। जिन लोगों को भारतीय स्टालों पर होना चाहिए था... वे लोग उसी पानी में डूब मरें जो उन्होनें हांफ़ती जैशा को नहीं दिया... हम इसी लायक हैं कि ओलम्पिक में एक कांसा और एक चांदी लाएँ (और वो भी खिलाड़ियों की ख़ुद की मेहनत की वजह से)...

इसी ख़ातिर तो उसकी आरती हमने उतारी है - मयंक अवस्थी

इसी ख़ातिर तो उसकी आरती हमने उतारी है
ग़ज़ल भी माँ है और उसकी भी शेरों की सवारी है


मुहब्बत धर्म है, हम शायरों का दिल पुजारी है
अभी फ़िरकापरस्तों पर हमारी नस्ल भारी है


सितारे, फूल, जुगनू, चाँद, सूरज हैं हमारे सँग

कोई सरहद नहीं ऐसी अजब दुनिया हमारी है


वो दिल के दर्द की खुश्बू का आलम है कि मत पूछो 

तुम्हारी राह में ये उम्र जन्नत में गुज़ारी है

ये दुनिया क्या सुधारेगी हमें, हम तो हैं दीवाने

हमीं लोगों ने अबतक अक्ल दुनिया की सुधारी है


मयंक अवस्थी

ब्रज-गजल - अबू उभरै तौ है हिय में, गिरा के रूठवे कौ डर - नवीन

ब्रज-गजल - रूठवे कौ डर 
================== 
अबू उभरै तौ है हिय में - गिरा1 के रूठवे कौ डर। 
मगर अब कम भयौ है - शारदा के रूठवे कौ डर॥

सलौने-साँवरे नटखट बिरज में जब सों तू आयौ। 
न जानें काँ गयौ - परमातमा के रूठवे कौ डर॥

सुदामा और कनुआ की कथा सों हम तौ यै सीखे। 
विनय के पद पढावै है - सखा के रूठवे कौ डर॥

कोऊ मानें न मानें वा की मरजी, हम तौ मानें हैं। 
हमें झुकवौ सिखावै है - सभा के रूठवे कौ डर॥

हहा अब तौ ठिठोली सों जमानौ रूठ जावें है। 
कहूँ गायब न कर डारै - ठहाके - रूठवे कौ डर॥

निरे सत्कर्म ही थोड़ें करावै माइ-बाप'न सों। 
कबू छल हू करावै है – सुता2 के रूठवे कौ डर॥

हमें तौ नाँय काऊ 'और' कों तकलीफ है तुम सों। 
डरावै है तुम्हें वा ही 'तथा' के रूठवे कौ डर॥

घनेरे लोग बीस'न बेर कुनबा कों डला कह'तें। 
डरावै है सब'न कों या डला के रूठवे कौ डर॥

'नवीन' इतिहास में हम जाहु नायक सों मिले, वा के। 
मगज में साफ देख्यौ - नायिका के रूठवे कौ डर॥

गिरह कौ शेर:- 
बड़ी मुस्किल सों रसिया रास कों राजी भयौ, लेकिन। 
"लली कौ जीउ धसकावै लला के रूठवे कौ डर"॥

1 वाणी, सरस्वती 2 बेटी


नवीन सी. चतुर्वेदी 

अजाने प्रदेश में - हृदयेश मयंक

अजाने प्रदेश में
एक अनजान जगह में
बड़े सबेरे उठकर
ढूंढता हूं अपनापन
न भाषा साथ देती है
नलोग, न वातावरण

खिड़की से निहारता हूं
पेड़ पौधे, तितलियां उछलते कूदते बच्चे
सबके सब वैसे ही निश्चल
जैसे कि मेरे अपने प्रदेश में

देर तक विचारता हूं 
अजनबीपन के कारकों को
भाषा और जगह तो समझ में आती हैं
पर रंग तो हमने नहीं बनाये
हमने दुनिया भी तो नहीं बनाई

हां प्रदेश हमने बनाये
बोली और भाषाएँ रचीं
दीवार भी हमने ही खड़ी कीं 
और बंद कर लीं दिलों दिमाग की खिड़कियां

अब जब खोलना चाहता हूँ खिड़कियाँ
तब अपनी ही बनाई चीजें
बाधा बन कर खड़ी हो गईं हैं।

हृदयेश मयंक
9869118707


ब्रज-गजल - बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर - उर्मिला माधव

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर
कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घट'न के रूठबे कौ डर
खड़े हैं मोर्चा पै रात दिन सैनिक हमारे तईं,
रहै हर दम करेजे में,वतन के रूठबे कौ डर
जमाने भर की चिंता में बिगारैं काम सब अपने,
ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सब'न के रूठबे कौ डर
कब'उ बेटा कौ मुंडन है,कब'उ है ब्याह लाली कौ,
कहूँ नैक'उ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर,
अजब दुनिया कौ ढर्रा ऐ,सम्हर कें, सोच कें चलियो.
तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर...
उर्मिला माधव...

बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं - नवीन

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं। 
दिल-नशीं के दिल को कमतर आँकना अच्छा नहीं॥ 

जिस की आँखों में हमारे ही हमारे ख़ाब हों। 
उस की पलकों पर उदासी टाँकना अच्छा नहीं॥ 

उस की ख़ामोशी को भी सुनना, समझना चाहिये। 
हर घड़ी बस अपनी-अपनी हाँकना अच्छा नहीं॥ 

एक दिन दिल ने कहा जा ढाँक ले अपने गुनाह। 
हम ने सोचा आईनों को ढाँकना अच्छा नहीं॥ 

प्यार तो अमरित है उस के रस का रस लीजै 'नवीन' 
बैद की बूटी समझ कर फाँकना अच्छा नहीं॥

नवीन सी. चतुर्वेदी 

लपेट कर रखे हैं मुख,चढ़ा रखे हैं आवरण - राजकुमार कोरी "राज़"

लपेट कर रखे हैं मुख,चढ़ा रखे हैं आवरण
कमाल कर रहा है लोकतंत्र का वशीकरण
लपेट कर रखे हैं मुख,चढ़ा रखे हैं आवरण
कमाल कर रहा है लोकतंत्र का वशीकरण
दिखावटों में जी रहा है, आजकल का आदमी
लगाव है, न प्रेम है , हृदय में हैं ,समीकरण
बिरादरी के नाम पर, लुटे सभी हैं देख लो
रुला रहा है देश को, ये वोट का ध्रुवीकरण
शहीद हो, लड़े वही, सुधार सब वही करे
हरेक चाहता है बस, महापुरुष का अवतरण
लिखे पढ़े सुजान ये , नशे में डूबते युवा
दशा बड़ी विचित्र है , न सूझता निराकरण
मनोदशा को भाँप कर , लड़े चिराग़ आस में
डरे तिमिर जहाँ उठे ये सूर्य की प्रथम किरण
उजाड़ गुलशनों को भूल आ नई पहल करें
खिले हुए ये पुष्प हैं बहार के उदाहरण।
लहूलुहान वर्दियों ने, वो कहा कि "राज़"बस
ये भाव अब निःशब्द हैं कि रो पड़ी है व्याकरण
राजकुमार कोरी "राज़"

बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212 1212 1212 1212