1 June 2013

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ-कहाँ बरसे - शकेब जलाली

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है
मेरी तरह से अकेला दिखाई देता है
सहरा - रेगिस्तान

न इतनी तेज़ चले, सरफिरी हवा से कहो
शजर पे एक ही पत्ता दिखाई देता है
शजर - पेड़ 

ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ-कहाँ बरसे
तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
अब्र - बादल, दश्त - जंगल / कानन

वहीं पहुँच के गिराएँगे बादबाँ अपने
वो दूर कोई जज़ीरा दिखाई देता है
 बादबाँ - पाल, जज़ीरा - टापू

वो अलविदाअ का मंज़र, वो भीगती आँखें
पसेगुबार भी क्या-क्या दिखाई देता है
 अलविदाअ - विदाई, मंज़र - दृश्य, पसेगुबार - धूल के पीछे 

मेरी निगाह से छुप कर कहाँ रहेगा कोई
कि अब तो संग भी शीशा दिखाई देता है
संग - पत्थर

:- शकेब जलाली 
बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
1212 1122 1212 22

2 comments:

  1. वाह ॥बहुत खूबसूरत गज़ल पढ़वाई ...आभार

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  2. क्या देखे दिल्ली और क्या मीनारों-बाज़ार..,
    चौफेर शहेमात का तमाशा दिखाई देता है.....

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