15 February 2011

तमाशेबाज ख़ुद भी इक तमाशा बन के रहता है



वो थोड़ा है मगर काफी ज़ियादा बन के रहता है
तमाशेबाज ख़ुद भी इक तमाशा बन के रहता है

किसी खुर्शीद के इम्कान का ख़टका भी है दिल में
जभी तो चाँद मारे डर के आधा बन के रहता है

कभी मजबूरियाँ इंसाँ को ऐसे दिन दिखाती हैं
वो जिनका हो नहीं सकता हो , उनका बन के रहता है

सियासत के कबीले की अजब शतरंज है यारों
यहाँ सरदार ही अक्सर पियादा बन के रहता है

नकाबें ओढ कर मिलने से उसको ये हुआ हासिल
दयारे-ग़ैर में सबसे शनासा बन के रहता है

सुलगता हूँ तेरे दिल में सुलगने दे अभी मुझको
कि दिल का दाग़ फिर दिल का असासा बन के रहता है

वो मेरी ख़ूबियों पर तंज के परदे लगाता है
रुख़े- कुहसार पर कोई कुहासा बन के रहता है

अगर ढोने की कुव्वत हो तो उससे राबता रखिये
वो जिन काँधों पे रहता है जनाज़ा बन के रहता है –
--- मयंक अवस्थी

3 comments:

  1. बहुत सुंदर ग़ज़ल, मयंक जी को बहुत बहुत बधाई।

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  2. धर्मेन्द्र जी और अश्विनी जी !! आपको ज़र्रानवाज़ी के लिये शत शत नमन !!

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