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SP2/3/1 हम वो नन्हें फूल हैं, जिनसे महके बाग़ - कल्पना रामानी

नमस्कार

घोषणा के बाद हफ़्ते दस दिन का समय ज़ियादा नहीं बल्कि सामान्य है। इस बार के ‘शब्द’ दिखने में अवश्य ही आसान हैं, परन्तु ये शब्द हमारी मेधा को परखेंगे इस बार। जहाँ न पहुँचे कवि, वहाँ पहुँचे रवि और जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे अनुभवी – इस बार के आयोजन में इस उक्ति को चरितार्थ होते देखने का मौक़ा मिल भी सकता है। हमारे समाज की महिलाएँ बढ़ चढ़ कर साहित्य सेवार्थ स्वयं को उद्यत करर्ती रही हैं। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता के सिद्धान्त की गरिमा को बनाये रखते हुये इस बार के आयोजन का श्री गणेश भी आदरणीया कल्पना रामानी जी [7498842072] के छंदों के साथ करते हैं।

मैं नारी अबला नहीं, बल्कि लचकती डाल।
बोलो तो नर-जूथ से, पूछूँ एक सवाल?
पूछूँ एक सवाल, उसे क्यूँ समझा कमतर।
जिस के उर में व्योम और क़दमों में सागर।
परिजन प्रेम-ममत्व-मोह की मारी हूँ मैं।
मेरा बल परिवार, न अबला नारी हूँ मैं॥

तुम हो इस ब्रह्माण्ड के, सर्व-श्रेष्ठ इन्सान।
पर, तब तक ही, जब तलक, ग्रसे नहीं शैतान॥
ग्रसे नहीं शैतान, समझिये इस का आशय।
घोर गर्त की ओर अन्यथा जाना है तय।
भ्रष्ट-भोग के चक्र - व्यूह में क्यूँ होना गुम?
सर्व-श्रेष्ठ इंसान, जब कि बन कर जनमे तुम॥

हम वो नन्हें फूल हैं, जिनसे महके बाग़।
इस कलुषित संसार में, अब तक हैं बेदाग़॥
अब तक हैं बेदाग़, गन्ध का ध्वज फहराएँ।
यत्र-तत्र सर्वत्र, ऐक्य का अलख जगाएँ।
प्राणिमात्र को जो कि बाँटते रहते हैं ग़म।
उन शूलों के साथ, बाग़ में रहते हैं हम॥

आदरणीया कल्पना जी आप की भावनाओं ने मुझे अभिभूत कर दिया है। आप ने इन तीन शब्द ‘मैं – हम – तुम’ के साथ वाक़ई पूरा-पूरा न्याय किया है। एक अनुभवी माँ की उक्तियाँ मानव समाज के लिये बहुत ही उपयोगी साबित होंगी इस मनोकामना के साथ मञ्च आप को सादर प्रणाम करता है।

जिस विद्वान को अपने छंदों पर सम्पादन नहीं चाहिये, वह मेल में लिख दे। पिछले अनुभवों के आधार पर एक बार फिर लिखना पड़ रहा है कि यह मञ्च ख़बरों में बने रहने के लिये ऊल-जुलूल बातों की बजाय अच्छी रचनाओं को प्रस्तुत करने का पक्षधर है। इस बार भी यदि किसी ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की तो उस की “अच्छी वाली टिप्पणियों को भी” फ़ौरन से पेश्तर हटा दिया जायेगा। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का पूर्ण सम्मान एवं स्वागत है परन्तु इस की आड़ में धींगामुश्ती हरगिज़ अलाउड नहीं।

सरसुति के भण्डार की बड़ी अपूरब बात।
ज्यों ज्यों खरचौ त्यों बढ़ै, बिन खरचें घट जात।

छन्द अचानक ही व्यवहार से बिलगने लगे तो हम ने इस का अध्ययन किया। उसी प्रक्रिया में ग़ज़ल को सीखने की कोशिश भी की। विभिन्न पुस्तकों तथा विद्वानों से जो सीखने को मिल सका तथा जो कुछ थोड़ा-बहुत अपने भेजे में आ सका; उसे छन्द-साहित्य के हित में जिज्ञासुओं से शेयर करना ज़रूरी लग रहा है। हमने  अभी तक कोई पुस्तक नहीं लिखी / छपवाई है। हमें लगता है कि पुस्तक अगर एक व्यक्ति को कवर करती है तो शायद अन्तर्जाल क़रीब सौ लोगों को कवर करता है। हमने अपने ब्लॉग को ही एक पुस्तक समझ रखा है। आप लोगों को पसन्द आया तो हम भविष्य में भी इन बातों को बतियाते रहेंगे। हमारे अनुसार छन्द लिखते वक़्त इन बातों को ध्यान में रखना अच्छा रहता है:- 

1.      सब से पहले अंतिम पंक्ति / चरण को लिखिएगा
2.   ध्यान रहे यह अंतिम पंक्ति / चरण सारे छन्द का सार स्वरूप हो और उस में PUNCH ज़रूर होना चाहिये। PUNCH यानि जिसे पढ़ते /सुनते ही बंदे के मुँह से वाह निकले बिना रह न सके। इस पोस्ट के तीसरे छन्द की अंतिम दो पंक्तियों को एकाधिक बार पढ़ कर देखियेगा। जिज्ञासुओं के हितार्थ आदरणीय कलपना रामानी जी के कहने पर इन छंदों में किंचित बदलाव भी किये गये हैं और यह बात कल्पना जी के कहने पर लिखी जा रही है ताकि किसी को भ्रम न हो। 
3.      कोई भी बात कहें तो उस बात के पहले और बाद में उन बातों को अवश्य रखें [या ऐसी बातें सामान्य व्यवहार के कारण सर्व-ज्ञात भी हो सकती हैं] जिन से एक भरपूर कथानक बन कर उभरता हो।
4.      अगर आप अपनी तरफ़ से कोई नई बात कहना चाहते हैं तो उस के पक्ष में आवश्यक तर्क छन्द में ही अवश्य रखें। या तो ‘May Be’ टाइप बातें भी कर सकते हैं। आय मीन Judgemental होने की बजाय ‘शायद ऐसा हो’, ‘ऐसा लगता है’, ‘क्या ऐसा है’ टाइप बातें भी कह सकते हैं।
5.      बुद्धि के बिना तो कुछ भी मुमकिन नहीं मगर पद्य में हृदय का प्रभाव दूरगामी सिद्ध होता है।
                        ग़म-ए-दौराँ [दौर / समय का दुख] की हम सारे हिमायत करते हैं लेकिन।
                        ग़म-ए-जानाँ [महबूब का दुख] ज़ियादातर सभी के हाफिज़े [Memory] में है॥

कहने की आवश्यकता नहीं कि हम लोगों को अपनी टिप्पणियों से रचनाधर्मियों का उत्साह वर्धन तथा मार्गदर्शन करते रहना है। उत्साह वर्धन तथा मार्गदर्शन का व्यापक अर्थ रिसेंटली +प्रवीण पाण्डेय  जी ने अपनी एक पोस्ट में बतियाया है। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद J आप चाहें तो उस पोस्ट को भी पढ़ सकते हैं।

तो आप अपनी राय दीजिये इस पोस्ट के बारे में और मैं आज्ञा लेता हूँ अगली पोस्ट के लिये।


नमस्कार

SP/2/2/7 लतिकाएँ बन बावली, चलीं बुर्ज की ओर - कल्पना रामानी

नमस्कार

तीन साल पहले सन 2010 में जब मैं ने समस्या-पूर्ति आयोजन की शुरुआत की थी तो यक़ीन जानिये काफ़ी दिनों तक मुझे प्रतिसाद की प्रतीक्षा करनी पड़ी। फिर बहुत दिनों बाद कंचन बनारसी [उमा शंकर चतुर्वेदी] जी की चौपाइयाँ आईं और आयोजन का श्री गणेश हो सका। वहाँ से आगे का सफ़र देखें तो आयोजन दर आयोजन पोस्ट दर पोस्ट ज़बर्दस्त इम्प्रूव्मेण्ट हुआ है। यह कुछ ऐसा ही है कि के. जी. / नर्सरी के आगे की कक्षाओं में / का अध्ययन। “इस ज़माने को कौन समझाये!! अब का तब से मुक़ाबला क्या है?“ वर्तमान-भूत-भविष्य सन्दर्भ की विषय-वस्तु हैं न कि प्रतिस्पर्धा की।

अपने दोहों के साथ मञ्च पर पहली बार पधार रही हैं आदरणीया कल्पना रामानी जी, और इस तरह मञ्च पर प्रस्तुति देने वाले रचनाधर्मियों की संख्या हो गयी 43। इस आयोजन में अभी कुछ और नये साथियों के जुड़ने की सम्भावना है, अगर मेरी रिक्वेस्ट उन के हृदय की गहराइयों तक पहुँच पाये तो........... आइये पहले पढ़ते हैं मिसरा-दर-मिसरा एक ब्यूटीफुल  पोर्ट्रेट बनाते हुये कल्पना जी के दोहे :-
 
आँख मिचौनी सूर्य की, देख बादलों संग
खेल रचाकर हो रही, कुदरत खुद ही दंग

शिखरों को छूने बढ़े, बादल बाँह पसार
स्वागत करने वादियाँ, कर आईं शृंगार

सुन सुखदाई सावनी, जल-बूँदों का शोर
लतिकाएँ बन बावली, चलीं बुर्ज की ओर

भीगी-भीगी शाम से, हर्षित तन-मन-रोम
इन्द्र धनुष सहसा दिखा, सजा रंग से व्योम

पहली बरखा ज्यों गिरी, मुदित हुआ संसार
जन-जन मन की तल्खियाँ, बहा ले गई धार

अमृत वर्षा से मिले, जड़ चेतन को प्राण
अंकुर फूटे भूमि से, खिले खेत, उद्यान
 
बौछारों की बाढ़ से, जल-थल हुए समान
जल स्रोतों ने झूमके, छुए नए सोपान

छेड़ी ऋतु ने रागिनी, उमड़े भाव अपार
कलम-कलम देने लगी, गीतों को आकार

चाह यही, न कहीं रहें, सूखे के अवशेष
उर्वर सालों साल हो, यह माटी, यह देश

भाषा-प्रवाह, वाक्य-विन्यास तथा भाव-प्रकटन सत्यापित कर रहे हैं कि इन दोहों पर चरण-बद्ध परिश्रम हुआ है, हालाँकि समीक्षकों को सार्थक समीक्षा अवश्य करनी चाहिये। बहुत अच्छे दोहे हैं। पहले दोहे से अन्तिम दोहे तक हम एक भरे-पूरे दृश्य का अवलोकन कर पा रहे हैं। लतिकाएँ बन बावली वाला दोहा कल्पना [imagination] का अनूठा और बड़ा ही प्यारा उदाहरण है, जिस के लिये आदरणीया कल्पना रामानी जी को दिल की गहराइयों से बधाइयाँ और सादर अभिवादन। दीदी ऋता शेखर मधु जी इस दोहे पर आप छन्द-चित्र बनाने की कृपा करें, और ध्यान रहे बूँदें, लतिकाएँ तथा बुर्ज चित्र में आने हैं, सम्भव हुआ तो अगली पोस्ट में उस चित्र को भी शामिल करेंगे।

आ. कल्पना जी, आप का प्राण- उद्यान वाला दोहा मैं ने जान बूझ कर लिया है। कुछ दिनों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मेरे सामने कुछ ऐसे उदाहरण आ रहे हैं और मेरी राय पूछी जा रही है। प्राण के साथ  उद्यान का अन्त्यनुप्रास लेने से कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता, परन्तु यह सहज ग्राह्य जैसा नहीं लगता – मुझे। अन्य व्यक्ति अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ इस का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसी तरह संस्कार का पदभार सही अर्थों में 221 है न कि 2121। कुछ कवि सुविधा के अनुसार पदभार का प्रयोग कर लेते हैं, परन्तु उन रचनाधर्मियों को ऐसे प्रयोगों को नियम की तरह से पेश नहीं करना चाहिये। कलपना जी आप के दोहे को मैं ने उदाहरण के साथ अपनी राय ज़ाहिर करने के लिये इस्तेमाल किया है, कृपया अन्यथा न लें।

तो साथियो आप आनंद लीजिये इन दोहों का, अपने सुविचार भी व्यक्त कीजियेगा और मैं बढ़ता हूँ अगली पोस्ट की तरफ़।

इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें