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SP2/2/14 दूध पिलाती मातु से, पति ने माँगा प्यार - धर्मेन्द्र कुमार सज्जन



नमस्कार

वर्तमान आयोजन की समापन पोस्ट में आप सभी का सहृदय स्वागत है। जिन लोगों ने मञ्च की मर्यादा को बनाये रखते हुये रचनाधर्मियों का निरन्तर उत्साह-वर्धन किया उन सभी का विशेष आभार। 

दरअसल हमारे घर जब कोई पहलेपहल आता है तो हमारा फर्ज़ बनता है कि न सिर्फ़ हम उस का तहेदिल से ख़ैरमक़्दम करें बल्कि उस पहली भेंट में हम उस आगन्तुक यानि अपने गेस्ट को ही वरीयता दें, उस पर अपने आप को या अपनी पोजीशन को या अपनी विद्वत्ता [?] को न थोपें। यही बात मञ्च के सन्दर्भ में भी लागू होती है, परन्तु सच्चे गुणी लोग ही इस बात को जानते हैं। तो दोस्तो पिछली पोस्ट से इस समापन पोस्ट के बीच के गेप के दो कारण रहे – पहला तो यह कि हमारे धर्मेन्द्र भाई के घर कुछ समय पूर्व पुत्र-रत्न का आगमन हुआ है सो वह दोहों के लिये कम समय निकाल पाये ठीक वैसे ही जैसे साल भर न पढ़ने वाला विद्यार्थी एक्जाम आने पर एक दम से हड़बड़ा कर उठ बैठता है और पढ़ाई करने जुट जाता है, वैसे ही; और दूसरा पिछले दिनों मेरी व्यस्तता। ख़ैर अब हम दौनों समापन पोस्ट के साथ आप के दरबार में उपस्थित हैं। पहले दोहों को पढ़ते हैं :-

हर लो सारे पुण्य पर, यह ‘वर’ दो भगवान
“बिटिया के मुख पे रहे, जीवन भर मुस्कान”

नयन, अधर से चल रहे, दृष्टि-शब्द के तीर
संयम थर-थर काँपता, भली करें रघुवीर

आँखों से आँखें लड़ीं, हुआ जिगर का खून
मन मूरख बन्दी बना, अजब प्रेम-कानून

कार्यालय में आ गई, जबसे गोरी एक
सज धज कर आने लगे, “सन-सत्तावन मेक”

याँ बादल-पर्वत भिड़े, वाँ पानी-चट्टान
शक्ति प्रदर्शन में गई, मजलूमों की जान

उथल-पुथल करता रहा, दुष्ट-कुकर्मी ताप
दोषी कहलाते रहे, पानी, हिम अरु भाप

विशेष दोहा:

दूध पिलाती मातु से, पति ने माँगा प्यार
गुस्से में बोली - "तनिक, संयम रख भरतार"


बिटिया वाले पहले दोहे से ताप वाले आख़िरी दोहे तक धर्मेन्द्र भाई जी ने कमाल किया है भाई कमाल। पर सन-सत्तावन मेक’ वाले दोहे को पढ़ कर लगता है कि अब इन्हें अपना तख़ल्लुस ‘सज्जन’ से बदल कर कुछ और कर लेना चाहिये। धरम प्रा जी मुझे इस आयोजन में राजेन्द्र स्वर्णकार जी की कमी बहुत खलती है, आप ने थोड़ा सा ही सही पर उस कमी को पूरा करने का प्रयास किया इस 'सन सत्तावन मेक' के माध्यम से। राजेन्द्र भाई आप की शिकायत पूरी तरह से दूर नहीं कर पाया हूँ, पर उस रास्ते पर चल तो पड़ा हूँ। हम लोग एक बार फिर से मञ्च के पुराने दिनों को वापस ले आयेंगे, पर यह सब आप सभी के बग़ैर न हो सकेगा।

विशेष दोहा पर धर्मेन्द्र भाई का प्रयास सार्थक और सटीक है। काव्य में दृश्य उपस्थित हो, वह दृशय सहज ग्राह्य हो और मानकों का यथा-सम्भव अनुपालन करता हो; तब उसे सटीक के नज़दीक माना जाता है।  मुझे धर्मेन्द्र जी का यह विशेष दोहा सटीक के काफ़ी क़रीब प्रतीत होता है। 'दूध पिलाती मातु' - वात्सल्य रस, 'से पति ने माँगा प्यार' - शृंगार रस और 'गुस्से से बोली, तनिक संयम रख भरतार' - रौद्र रस। सरल शब्दों में कहें तो कवि ने एक ऐसा आसान दृश्य हमारे सम्मुख रख दिया है जो हम लोगों की रोज़-मर्रा की ज़िन्दगी / स्मृति के हिस्से जैसा है और आसानी से हम उसे ग्रहण भी कर पा रहे हैं। विद्वतजन उपरोक्त तीन बातों को ध्यान में रखते हुये अवश्य ही इस विलक्षण दोहे की तह में जा कर मीमांसा करें, पर हाँ छिद्रान्वेषण नहीं..............चूँकि छिद्रान्वेषणों के चलते ही मञ्च के कई पुराने साथी किनारा कर गये हैं। वह ज्ञान जो हम से हमारा आनन्द छीन ले - हमारे किस काम का?? मञ्च ने अब तक किसी को न तो ब्लॉक किया है और न ही कमेण्ट्स को मोडरेट किया है, आशा करता हूँ आगे भी यह सब करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

भाई सौरभ पाण्डेय जी के सुझाव के अनुसार हम अगली पोस्ट में ‘आलोचना’ और चन्द्र बिन्दु पर चर्चा करेंगे। तब तक आप धरम प्रा जी के दोहों का आनन्द लीजिये और अपने सुविचारों को व्यक्त कीजिये।

प्रणाम

T-2/2/13 सूरज छुपता फिर रहा, ले सागर से कर्ज़ - शरद तैलंग

नमस्कार

बचपन की यादें सभी के साथ जुड़ी होती हैं, और उन के याद आने का कोई नियत समय नहीं होता है; बस कभी भी कहीं भी अचानक ही आ धमकती हैं हमेँ गुदगुदाने के लिये। हमारा एक सहपाठी हुआ करता था [नाम न पूछो यार, मुझे भी याद नहीं आ रहा] उस का मुख्य कार्य था लोगों मेँ कमियाँ ढूँढना, मसलन किसी की शर्ट कितनी मैली है, किसी के जूतों पर पोलिश नहीं है, किसी का बस्ता कहीं से फटा हुआ है और कुछ न मिले तो किसी ने बालों मेँ ढंग से कंघी नहीं की है, और यह भी न मिले तो भाई आप के दो पैर आगे पीछे क्यूँ पड़ रहे हैं – ऐसी ऐसी कमियाँ ढूँढ लेता था वह मेधावी बालक। दूसरी तरफ़ अगर उस की बात करें तो वह अपने आप मेँ ख़ामियों की एक जीती-जागती प्रतिमूर्ति था मगर अन्य लड़के / लड़कियाँ उस के मुँह लगने को समय की बरबादी समझते थे। बचपन की यादें हैं, बस कभी कभार गुदगुदा जाती हैं। मैं तो कभी-कभी सोचता हूँ कि आजकल वह किन-किन को कृतार्थ कर रहा होगा, बड़ा ही बेशर्म टाइप प्राणी था, सोचता हूँ अब भी वैसा ही होगा...... न न भाई मेधावी था तो अब तो और भी उन्नति की होगी, ख़ैर वह जहाँ भी हो परमपिता परमेश्वर उस की आत्मा को तुष्टि प्रदान करें........... अबे हँसो मत........ उस ने सुन लिया तो अपन सब की ख़ैर नहीं :) आप श्री तो आप श्री जो ठहरे :)

साथियो, कौन बनेगा करोड़पति मेँ अमिताभ बच्चन द्वारा पढ़ा गया यह दोहा शायद आप मेँ से कुछ की स्मृतियों मेँ हो :-

तू ताती ता तात ते, ता ते तातौ तात
"याद नहीं है ठीक से", तूत तात तत्तात

आप को जान कर हर्ष होगा कि इस विलक्षण दोहे को अमिताभ जी तक पहुँचाने वाले हमारे समय के ख्याति-लब्ध रचनाधर्मी भाई श्री शरद तैलंग जी आज इस मञ्च पर उपस्थित हो रहे हैं अपने दोहों के साथ। शरद जी के दोहे यानि अपनी ही तरह के स्पेशल दोहे, पहले नम्बर पर जो दोहा है उसे भी अमित जी ने अपनी वाणी प्रदान की थी KBC के किसी एक एपिसोड मेँ। शरद जी पहली बार मञ्च पर पधार रहे हैं तो आइये हम सभी उन का सहृदय स्वागत करते हुये उन के दोहों का रसास्वादन करें :-

पहन हवाई चप्पलेँ, जाओगे जब मित्र
बरसातोँ मेँ पीठ पर, बन जायेगा चित्र

वर्षा के ही साथ मेँ, तेज़ हवा जब आय,
डर रहता इस बात का, छाता पलट न जाय

सडकोँ पर निकलो अगर, पहन साफ परिधान,
गाडी निकले पास से, रखना उनका ध्यान

सूरज छुपता फिर रहा, ले सागर से कर्ज़,,
मेघोँ ने चुकता किया और निभाया फर्ज़

वर्षा ॠतु मेँ कर रहे, तेज़ कलम की धार,
रचना रचने के लिए, सारे रचनाकार

मिलकर मेघोँ ने किया, सूरज का घेराव,
वो बेचारा क्या करे, भूल गया सब ताव

सावन मेँ जब झूम के, आई ये बरसात,
नदियाँ नाले खुश हुए, पाकर ये सौगात

ज़ोर दिखा कर मेघ ने, किए गाँव कुछ नष्ट,
फिर आगे को चल दिया, दे कर सबको कष्ट

छाते वाले सब कहेँ, मेघोँ से - 'सरकार'
"अब के बरसो झूम के, चल निकले व्यापार"

पानी जब चूने लगे, करके बिस्तर गोल
शक्कर और सिमेण्ट का, डालो छ्त पर घोल

भैँसेँ गोबर कर गईं, आज सडक के बीच
पहियोँ मेँ लग आ गईं, घर मेँ माटी-कीच

सावन मेँ जाने लगे , साजन यदि परदेस
रस्से से बाँधो उसे , लगे न मन मेँ ठेस

सावन मेँ आयें न जो, साजन अपने द्वार
बीमारी का झूठ ही, भेजो उनको तार

इस मौसम मेँ यदि मिलें, गर्म पकौडे-चाय
सच मानो बरसात का, बहुत मज़ा आ जाय

धो डाले कपडे सभी, दिन था जब इतवार,
अब तक वे सूखे नहीँ , दिवस हो गये चार

ज्योँ ही निकली धूप तो, रखा सूखने माल
वानर टोली आ गई, चट कर डाली दाल

वर्षा मेँ जाना पडा, था आवश्यक काम,
वापस आये तो हुआ, नजला और जुकाम

छत से पानी चू रहा, कमरे मेँ चहुँ ओर
सो न सके हम रात भर, जब तक हुई न भोर

बाढ बहा लाई कई , सायकिल, बाइक कार
नदिया देने चल पडी, सागर को उपहार

सही कहा था न – शरद तैलंग जी के दोहे यानि अपनी तरह के स्पेशल दोहे, एक भरा-पूरा शब्द-चित्र नहीं बल्कि एक मुकम्मल पिछवाई बना कर पेश कर दी है आपने। गाँव से ले कर महानगर तक को समेट लिया है इन दोहों मेँ। एकाधा ठीक-ठाक दोहा लिख कर ख़ुद को साठ मार खाँ [तीस मार खाँ का दुगुना :) ] समझने वालों को शरद जी की सहजता से कुछ सीखना चाहिये। एक और बात भी शायद आप सभी ने नोट की होगी और वह यह कि शरद जी ने चन्द्र बिन्दी और अनुस्वार का बड़ा ही सुन्दर प्रयोग किया है। कुछ समय से हम कोशिश कर रहे हैं कि यथा सम्भव लिपि के शुद्ध प्रारूप को प्रयोग करें, शरद जी का यह इनीशियेटिव बहुतों के लिये प्रेरणा बनेगा ऐसा विश्वास है। इस पोस्ट में हम सभी जगह चन्द्र बिन्दी / अनुस्वार को अमल में नहीं ला सके हैं, पर भविष्य में ऐसा करने का प्रयास अवश्य करेंगे।

साथियो अगली पोस्ट धरम प्रा जी की पोस्ट है यानि समापन पोस्ट। तब तक आप सभी तन-मन भिगोते इन दोहों का आनन्द लें और अपने सुविचार भी अवश्य प्रकट करें। चलते-चलते अरुण निगम जी को टिप्पणियों में अपने विलक्षण दोहों को प्रस्तुत करने के पुन: बहुत-बहुत बधाई।

SP2/2/12 शिव के सुंदर रूप में, आँगन एक विचार - दिगम्बर नासवा


नमस्कार

फेसबुक को रात दिन कोसने वाले अक्सर फेसबुक पर ही मिलते हैं। संस्कारों की दुहाई देने वाले ही अक्सर संस्कारों की बंशी बजाते देखे गये हैं और इसी तरह छन्द के नाम पर अपने माथे पे साफ़ा बाँधने वाले भी अक्सर ही छन्द की गन्ध से अनभिज्ञ मिलते हैं। पर छन्द की गन्ध जिस की रगों में प्रवाहित हो वह सात समन्दर पार जा कर भी इसे भूलता नहीं है, बल्कि सही शब्दों में कहें तो सात समन्दर पार बसे हुये हमारे भाई-बहन ही साहित्य से अधिक निकटस्थ जान पड़ते हैं। भाई दिगम्बर नासवा जी ऐसे ही अप्रवासी भारतीय हैं। मेरे कहे की तसदीक़ करने के लिये आप इन के ब्लॉग “स्वप्न मेरे” पर जा कर देख सकते हैं। समस्या-पूर्ति आयोजनों के नियमित पाठक भाई दिगम्बर नासवा जी ने इस बार हमारे निवेदन को स्वीकार करते हुये आयोजन में शिरकत भी की है। आइये पढ़ते हैं सात समन्दर पार से आये सुगन्धित दोहे:-

आँगन में बिखरे रहे, चूड़ी कंचे गीत
आँगन की सोगात ये, सब आँगन के मीत

आँगन आँगन तितलियाँ, उड़ती उड़ती जायँ
इक आँगन का हाल ले, दूजे से कह आयँ

बचपन फ़िर यौवन गया, जैसे कल की बात
आँगन में ही दिन हुआ, आँगन में ही रात

आँगन में रच बस रही, खट्टी मीठी याद
आँगन सब को पालता, ज्यों अपनी औलाद

तुलसी गमला मध्य में, गोबर लीपा द्वार
शिव के सुंदर रूप में, आँगन एक विचार

आँगन से ही प्रेम है आँगन से आधार
आँगन में सिमटा हुवा, छोटा सा संसार

कूँवा जोहड़ सब यहाँ, फ़िर भी बाकी प्यास
बाट पथिक की जोहता, आँगन खड़ा उदास

दुःख सुख छाया धूप में, बिखर गया परिवार
सूना आँगन ताकता, बंजर सा घर-बार
 
रेलगाड़ी – बैलगाड़ी के दोहों से बचते हुये नासवा जी ने आँगन के दोहे भेजे हैं। टीस, आनन्द, अनुभव सब कुछ तो पिरो दिया गया है इन दोहों में। व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहना चाहूँगा कि दिगम्बर भाई अतुकान्त कविता, ग़ज़ल और दोहे सभी में असरदार हैं। मैं इन का fan हूँ। ये अक्सर ही उन पहलुओं को हमारे सामने ला कर रख देते हैं कि बरबस ही मुँह से निकल पड़ता है “अरे..... यही तो मैं कहना चाहता था”........... कहना चाहता था........ कह नहीं पाया .............. और यही एक कोम्प्लिमेण्ट है आप के लिये नासवा जी। ख़ुश रहो, सलामत रहो और ख़ूब तरक़्क़ी करो भाई।

हमारे पास अब दो पोस्ट बाकी हैं, इस के बाद शरद तैलंग जी और उस के बाद धरम प्रा जी। धरम जी की पोस्ट के साथ आयोजन का समापन। धरम जी ने एक बड़ा ही स्पेशल दोहा लिखा है जिस के लिये उन की पोस्ट का इंतज़ार करना होगा। तो साथियो आनन्द लीजिये दिगम्बर नासवा जी के दोहों का, अपने सुविचार प्रस्तुत कीजिये और मैं बहुत जल्द हाज़िर होता हूँ अगली पोस्ट के साथ...