26 August 2013

अगर अपना समझते हो तो फिर नखरे दिखाओ मत - नवीन

अगर अपना समझते हो तो फिर नखरे दिखाओ मत
ये कलियुग है, इसे द्वापर समझ कर भाव खाओ मत

हम इनसाँ हैं, मुसीबत में - बहुत कुछ भूल जाते हैं
अगर इस दिल में रहना है तो फिर ये दिल दुखाओ मत

न ख़ुद मिलते हो, ना मिलने की सूरत ही बनाते हो
जो इन आँखों में रहना है तो फिर आँखें चुराओ मत

भला किसने दिया है आप को ये नाम 'दुःखभंजन'
सलामत रखना है ये नाम तो दुखड़े बढ़ाओ मत

मुआफ़ी चाहता हूँ, पर मुझे ये बात कहने दो
तुम अपने भक्तों के दिल को दुखा कर मुस्कुराओ मत

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

बहरे हजज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

1222 1222 1222 1222 

22 August 2013

सनसनीखेज़ हुआ चाहती है - नवीन

सनसनीखेज़ हुआ चाहती है 
तिश्नगी तेज़ हुआ चाहती है 
तिश्नगी - प्यास 

हैरत-अंगेज़ हुआ चाहती है 
आह - ज़रखेज़ हुआ चाहती है 
ज़रखेज़ - उपजाऊ [ज़मीन]

अपनी थोड़ी सी धनक दे भी दे 
रात रँगरेज़ हुआ चाहती है 

आबजू देख तेरे होते हुये 
आग - आमेज़ हुआ चाहती है 
आबजू - झरना-नदी-नहर आदि, आमेज़ - मिलाने वाला 

बस पियाला ही तलबगार नहीं 
मय भी लबरेज़ हुआ चाहती है 
लबरेज़ - लबालब भरा हुआ, लबालब भरना  

रौशनी तुझ से भला क्या परहेज़ 
तू ही परहेज़ हुआ चाहती है 

हम फ़क़ीरी के 'इशक' में पागल 
जीस्त - पर्वेज़ हुआ चाहती है 
जीस्त - ज़िन्दगी, परवेज़ - प्रतिष्ठित, विजेता के सन्दर्भ में 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

बहरे रमल मुसद्दस मखबून मुसक्कन 
फ़ाएलातुन फ़एलातुन फ़ालुन 

2122 1122 22

21 August 2013

सच आँखों में झाँक कर, करता है ऐलान - रामबाबू रस्तोगी

विज्ञापन के देश में, आँखों पर प्रतिबन्ध 
"गरमी से नुकसान" पर, सूरज लिखे निबन्ध 

हारेगा अभिमन्यु ही, लाख सीख ले दाँव 
क़दम-क़दम पर बस गये, चक्रव्यूह के गाँव 

अम्मा की साड़ी घिसे, बाबूजी के पाँव 
पेड़ पुराने हैं मगर, देते ठण्डी छाँव 

बहुएँ - बेटे - बेटियाँ, बहन और दामाद 
शब्द-कोश अम्मा हुई,  रखती याद 

जब से पण्डों को मिला, लहरों का अधिकार 
एक-एक मछली हुई, मरने को लाचार 

कौवों को शाबाशियाँ, गिद्धों को जागीर 
उल्लू ज़िन्दाबाद हैं, जंगल की तक़दीर 

मुकुट बिकें बाज़ार में, अलग-अलग हैं दाम 
रावण के लाखों टके, बिना मोल श्री राम 

शाख-शाख पर तान दीं, पहले तो बन्दूक 
फिर कोयल से यूँ कहा, "चल मृदुबैनी कूक"

अन्तराल के बाद जब, लौटे मन का मीत 
गर्मी लगे गुलाब सी, बेले जैसी शीत 

मन में चौमासा घिरे, भर-भर आएँ नैन 
दिन तोला-तोला कटे, माशा-माशा रैन 

बादल आये दे गये, आश्वासन के थाल 
सावन भी कंगाल था, भादौं भी कंगाल 

सच आँखों में झाँक कर, करता है ऐलान 
मैं भी ख़ुशबू की तरह, बेघर बिना मकान 
:- रामबाबू रस्तोगी

16 August 2013

घोंचू कहीं का - सौरभ पाण्डेय

आज लगते ही तू लगता है चीखने
"आ ज़ाऽऽऽ दीऽऽऽऽऽऽऽऽ...."
घोंचू कहीं का.
मुट्ठियाँ भींच
भावावेष के अतिरेक में
चीखना कोई तुझसे सीखे .. मतिमूढ़ !

पता है ?........
तेरी इस चीखमचिल्ली को
आज अपने-अपने हिसाब से सभी
अपना-अपना रंग दिया करते हैं.. .

हरी आज़ादी.. .सफ़ेद आज़ादी.. . केसरिया आज़ादी...
लाल आज़ादीऽऽऽ..
नीली आज़ादी भी.

कुछ के पास कैंची है
कइयों के पास तीलियाँ हैं.. .
ये सभी उन्हीं के वंशज हैं
जिन्होंने तब लाशों का खुद
या तो व्यापार किया था, या
इस तिज़ारत की दलाली की थी
तबभी सिर गिनते थे, आज भी सिर गिनते हैं..
और तू.. .
इन शातिर ठगों की ज़मात को
आबादी कहता है
आबादी जिससे कोई देश बनता है
निर्बुद्धि .... !

जानता भी है कुछ ? इस घिनौने व्यापार में

तेरी निर्बीज भावनाओं की मुद्रा चलती है.. ?
:- सौरभ पाण्डेय 

15 August 2013

न तो अनपढ़ ही रहा और न ही क़ाबिल हुआ मैं - नवीन

न तो अनपढ़ ही रहा और न ही क़ाबिल हुआ मैं
ख़ामखा धुन्ध तेरे स्कूल में दाख़िल हुआ मैं

मेरे मरते ही ज़माने का लहू खौल उठ्ठा
ख़ामुशी ओढ़ के आवाज़ में शामिल हुआ मैं

ओस की बूँदें मेरे चारों तरफ़ जम्अ हुईं
देखते-देखते दरिया के मुक़ाबिल हुआ मैं

अब भी तक़दीर की जद में है मेरा मुस्तक़बिल
कौन से मुँह से कहूँ कब्ल से क़ाबिल हुआ मैं

अपने अन्दर से उबरते ही मिला सन्नाटा
घर से निकला तो बियाबान में दाख़िल हुआ मैं

:- नवीन सी. चतुर्वेदी
फाएलातुन फ़एलातुन फ़एलातुन फालुन
बहरे रमल मुसम्मन मखबून मुसक्कन
2122 1122 1122 22

9 August 2013

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगर्मियाँ मिलीं - नवीन

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगर्मियाँ मिलीं
तब जा के इस दयार को ख़ुशफ़हमियाँ मिलीं

सूरज ने चन्द्रमा को उजालों से भर दिया
हासिल ये है कि रात को परछाइयाँ मिलीं

अब्रों ने ज़र्रे-ज़र्रे को पानी से धो दिया 
बाद उस के आसमान को बीनाइयाँ मिलीं 

दैरो-हरम हों या कि बयाबाँ, हरिक जगह 
शेखी बघारती हुई अय्याशियाँ मिलीं
 
उड़ते हुये परिन्द - हमारी 'व्यथा' न पूछ
दरकार शाहराह थी - पगडण्डियाँ मिलीं

क़िस्मत को ये मिला तो मशक़्क़त को वो मिला
इस को मिला ख़ज़ाना उसे चाभियाँ मिलीं 

जब-जब किया है वक़्त से हमने मुक़ाबला
उस को बुलन्दियाँ हमें गहराइयाँ मिलीं

रहमत का राग अपनी जगह ठीक है मगर
जिसने बढाया हाथ उसे रोटियाँ मिलीं

कितने ही नौज़वान ज़मींदोज़ हो गये
वो तन है ख़ुशनसीब जिसे झुर्रियाँ मिलीं

हमने दिलेफ़क़ीर टटोला तो क्या बताएँ
ख़ामोशियों से तंग परेशानियाँ मिलीं

तुम को बता रहा हूँ किसी को बताना मत
ख़ुद को किया ख़राब तभी मस्तियाँ मिलीं

सौ-फ़ीसदी मिठास किसी में नहीं 'नवीन'
जितनी ज़बाँ हैं सब में कई गालियाँ मिलीं

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन 
221 2121 1221 212 

4 August 2013

हुड़दंगी जत्थे और साहित्य - तुफ़ैल चतुर्वेदी

साहित्य समाज से कटता जा रहा है। पाठक और श्रोता कम हो रहे हैं। ये एक तथ्य है और इस के कारण साहित्यकारों में ये विचार आम है कि हम सही काम नहीं कर पा रहे। कुछ अधूरापन, लक्ष्य से भटकाव आ गया है। हमारा काम समाज के हित-अहित को उदघाटित, परिभाषित करना है। हम जिस समाज का अंग हैं उसके संरक्षण,संवर्धन का लक्ष्य ही साहित्य का लक्ष्य होना चाहिये। ऊपरलिखित वाक्यों में ही हिंदी-उर्दू साहित्य की दुर्दशा, समाज से कट जाने, मूलविहीन हो जाने की गाथा छिपी हुई है।

1947 में लगभग दो तिहाई भारत स्वतंत्र हुआ। ये वो समय था जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व भर में मंदी थी। समाज अभावों से घिरा था। करोड़ों लोग मारे गये थे। विस्थापित, बरबाद हुए थे। ये समय आँखों से सपने छिन जाने, जीवन के ताने-बाने के उधड़ जाने,बिखर जाने का था। सृष्टि में निर्वात कहीं नहीं रहता। ज़ाहिर है इस शून्य को भी भरा ही जाना था। मज़ेदार बात ये है कि आँखों में वापस सपने सजाने की घोषणा उन लोगों ने की जिन्होंने अभी-अभी सपने उजाड़े थे। द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्र जर्मनी, इटली का अनन्य सहयोगी रूस था और इस कारण सारी दुनिया के कम्युनिस्ट उसकी ढपली बजा रहे थे। अच्छे-ख़ासे समय तक ये युद्ध के आक्रामक पक्ष में बने रहे। हिटलर की मदद करते रहे। बाद में हिटलर ने रूस पर हमला कर दिया तो रातों-रात धुरी राष्ट्रों के विरोधी हो गये। जिस समय रूस की सीमाओं पर जर्मनी की फ़ौजें करोड़ों रूसियों को मार रही थीं, उसी काल में स्टालिन के नेतृत्व में रुसी कम्युनिस्ट पार्टी भी अपने ही करोड़ों नागरिकों की हत्या कर रही थी।

वो राजनैतिक विचारधारा जिसने अपने ही करोड़ों लोगों को मार डाला मज़दूरों,किसानों, कमज़ोर वर्गों की हितैषी होने का ड्रामा करती थी। नेहरू वामपंथ के प्रति भावुक थे और उनके हिमायतियों के प्रति उदार थे। इस उदारता के कारण पद, प्रतिष्ठा, धन पाने के लिये रोमांटिक मुखौटा लगाये हथौड़ाधारी हत्यारी विचारधारा का पोषण साहित्यकारों का का उद्देश्य बन गया। साहित्य की श्रेष्टता इस बात से तय होने लगी ‘ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ‘ जो इस ख़ेमे में नहीं वो साहित्यकार नहीं। साहित्य की उत्कृष्टता की कसौटी विचारधारा ही हो सकती है। साहित्य से समाज से कटते जाने के लिये ये सोच और इसका क्रियान्वन ज़िम्मेदार है। यहाँ प्रश्न ये है की ये कसौटी ठीक भी है ?

जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पन्त जैसे लोग मुक्तिबोध द्वारा रचित इस कसौटी के कारण कवि नहीं रहते और निराला ‘सुन बे गुलाब’ लिखने के कारण कवि हो जाते हैं। इसी से जुडी है साहित्य को हाशिये पर धकेले जाने की दुखद गाथा। साहित्य मूलतः अपने को व्यक्त करने की प्रक्रिया है। इसी का विस्तार अपने से सम्बंधित अन्यों को उद्घाटित करने में भी होता है। यहाँ उल्टा हुआ प्रक्रिया की जगह लक्ष्य तय कर दिये गये। राष्ट्रवादी विचारधारा किसी भी वैश्विक विचारधारा चाहे वो मार्क्सवाद हो, चाहे इस्लाम हो, के अन्त-पन्त विरोध में जाती है। अतः राष्ट्रवाद की जड़ में मट्ठा डालना रणनीतिक ज़ुरूरत बनी। राष्ट्र की, राष्ट्रवाद की रगड़ाई करनी है ….उग्रवाद, आतंकवाद चूंकि राष्ट्रवाद को नुक़सान पहुंचता है, इसलिये उस पर मौन रहना रणनीतिक हथियार बने। साहित्य स्व के विस्तार की प्रक्रिया की जगह कुछ तयशुदा फ्रेमों में विचार ठूंसने का नाम हो गया।

जैसे एक चालक वकील सच और झूट के चक्कर में नहीं पड़ता। अपने मुक़द्दमे को जीतने के लिये दोनों तरह के दाँव-पेच इकट्ठे करता है, आज़माता है। उसी तरह लक्ष्य तय हुआ साम्यवादी विद्रोह … उपलक्ष्य तय हुआ राष्ट्र की शक्तियों का कमज़ोर किया जाना। राष्ट्र का विरोध करने वाली सभी शक्तियों से हाथ मिलाना।

ये अकस्मात नहीं है कि देश के विभाजन का कारण बनी मुस्लिम लीग को विभाजन का दर्शन और तर्क के तीर-तमंचे कम्युनिस्ट पार्टी के सज्जाद ज़हीर ‘बन्ने भाई’ सप्लाई किये। सज्जाद ज़हीर जिनके साम्प्रदायिकता के विरोधी होने की बातें करते कम्युनिस्ट लोग नहीं थकते, अंततोगत्वा पाकिस्तान चले गये। अली सरदार जाफ़री, कैफ़ी आज़मी जैसे लोग कभी मुस्लिम लीग, जमाते-इस्लामी पर कभी कुछ नहीं बोले, हाँ राष्ट्रवादियों के नाम पर इनके मिर्चें लगती रहीं। ये दो नाम तो समुद्र में तैरते हिम खंड की तरह केवल नोक हैं। ऐसे असंख्य लोग हैं जिनके सतत राष्ट्रवाद के विरोध को देख कर ऐसा लगता है जैसे महमूद गज़नवी ने मूर्ति-भंजन करने के लिये हरे की जगह लाल कपडे पहन लिये हों। ये वही लोग हैं जो उर्दू के सबसे बड़े कहानीकार किशन चंदर के सलमा सिद्दीक़ी से विवाह करने के लिये मुसलमान बनने का दबाव डालते हैं और उसके बाद निकाह कराते हैं। उर्दू की प्रसिद्ध कहानीकार इस्मत चुगताई की अंतिम इच्छा ‘मैं मिट्टी में दब कर अपना जिस्म कीड़ों को नहीं खिलाना चाहती। मुझे इस ख़याल से ही घिन आती है। मुझे मरने के बाद जलाया जाये’ पर इतने बौखला जाते हैं कि मुंबई में उनके जनाज़े में केवल एक मुसलमान उनके पति ही शरीक होते हैं। कैफ़ी आज़मी, शबाना आज़मी, जावेद अख्तर जैसों का साम्यवाद हवा हो जाता है, मुल्लाइयत चढ़ बैठती है।

इस्लाम की अपनी समझ है और वो काफ़िरों, मुशरिकों, मुल्हिदों, मुर्तदों के प्रति भयानक रूप से क्रूर है। इस हद तक कि इस्लामी न्यायशास्त्र के 4 इमामों में से केवल एक काफ़िरों को जज़िया देने और ज़िम्मी बन कर रहने पर ही जीवित छोड़ने का अधिकार देते हैं, बाक़ी को वो भी जिंदा नहीं छोड़ने की व्यवस्था देते हैं। शेष तीन इमाम किसी भी स्थिति में इन सब को जिंदा नहीं रहने देना चाहते। कम्युनिस्ट मुल्हिदों में आते हैं। होना ये चाहिये था कि एक आतताई के दो पीड़ित एक हो जाते मगर हुआ उल्टा कि कम्युनिस्टों और इस्लाम ने राष्ट्रवाद के विरोध में हाथ मिला लिये। देश से सम्बंधित हर बात के विरोध में खड़े हो गये, शत्रुता निभाने लगे। एफ़ एम हुसैन की दुष्ट पेंटिंगों के पक्ष में खड़े होना, सहमत की धूर्तताओं का बचाव करना, रोमिला थापर द्वारा महमूद गज़नवी में गुणों को ढूँढने और उसके बचाव में किताब लिख मरने को आख़िर किस तरह समझा जा सकता है

मार्क्स के मनमाने सिद्धांत ‘समाज का विकास द्वंद से होता है’ के आधार पर साहित्य में भी सदैव द्वंद खड़े किये गए,रोपे गये। कविता की छंद से मुक्ति, फिर विचार से मुक्ति, फिर एब्सर्ड लेखन जैसे बेसिरपैर के वाद चलाये ही इस लिये गये। कविता का आधार छंद मार्क्सवाद की नारेबाज़ी पालकी ढो ही नहीं सकता था। उसे परोसने के लिये कविता के मानकों में तोड़फोड़ करनी ज़ुरूरी थी। नयी कविता के नाम पर मुक्तिबोध से प्रारंभ कर राजेश जोशी , अनुज लुगुन तक जो परोसते हैं वो कल्पित ब्योरों, अपठनीयता से भरा हुआ है। वो सब रौशनाई से दूर केवल सियाही का अंकन है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यकों पर प्रलाप जानबूझ कर किये जा रहे ऐसे ही विलाप हैं जिनके कारण पाठक भाग खड़ा हुआ है। आख़िर राग दरबारी के पचीसों संस्करण क्यों निकलते हैं और विष्णु खरे की किताब खोटी क्यों साबित होती है ? उबाऊ होने की सीमा का अतिक्रमण करती, आत्महत्या या हत्या पर उकसाने वाली रचनायें या किताबें किसी को कोई पढ़वा तो नहीं सकता। अकादमी के पुरस्कार पाठक तो नहीं दिला सकते।

इस देश की मिट्टी से जुड़े, अपने समाज के पक्ष में खड़े लोगों पर आरोप चस्पां करने के लिये उन्हें फ़ासीवादी, संस्कृतिवादी, राष्ट्रवादी, सांस्कृतिक राष्ट्रवादी, प्रतिक्रियावादी, शुद्धतावादी, आदर्शवादी और न जाने कैसे-कैसे शब्द गढ़ डालने वाले इन साम्यवादियों की छन-फटक की जाये तो ये स्वयं इसी परिभाषा में आते हैं। आइये इनके सबसे प्रिय आरोप फ़ासीवाद को ही लेते हैं। फ़ासीवाद मोटे तौर पर उस विचारधारा को कहते हैं जो अपने से असहमत हर विचार को ग़लत मानती है, नष्ट का देने योग्य समझती है। जिस विचारधारा के हाथ में शासन सूत्र आने पर प्रत्येक दूसरी विचारधारा को नष्ट किया जाता है। जिसके समय में कोई स्वतंत्र प्रेस नहीं होता। स्वतंत्र न्याय-पालिका नहीं होती … लगभग तानाशाही होती है। इस परिभाषा पर सारे साम्यवादी देश और इस्लामिक शासन-प्रणाली ही खरे उतरते हैं। यही विचारधारायें अपने अलावा किसी को भी वर्ग-शत्रु या काफ़िर घोषित करके उसको समूल नष्ट करने के तर्क गढ़ती हैं / वाजिबुल-क़त्ल ठहरती हैं। कोई वकील, कोई दलील, कोई अपील कुछ नहीं।
भारत का वैशिष्ट्य ही यही है कि हम एक दूसरे की धुर विरोधी विचारधाराओं का सहजीवन संभव बनाते हैं। हम इस माफियागर्दी को भी अपनी बात कहने का अवसर देते हैं। इसी कारण हम लोकतंत्र हैं।

हँस पत्रिका के वार्षिक कार्यक्रम में ‘अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में स्वीकृति देने के बाद भी वरवरा कवि और अरुंधती रॉय का न दिल्ली आ कर भी अंतिम क्षण में न आना इसी बात की पुष्टि करता है। वरवरा कवि का स्पष्टीकरण आया है कि उन्होंने ऐसा इस लिये किया कि उन्हें इस मंच पर अशोक बाजपेयी और गोविन्दाचार्य के साथ बैठना था। ये दोनों नाम देश के प्रतिष्ठित नाम हैं। कोई भी श्री अशोक बाजपेयी और श्री गोविन्दाचार्य से असहमत हो सकता है मगर उन्हें अस्पृश्य समझना ? अपनी मनमानी सोच को इस हद तक सही समझना कि अपने से इतर किसी की बात को सुने बिना रद कर देना, फ़ासीवाद है। साम्यवादी हमेशा यही करते आ रहे हैं और आरोप दूसरों पर लगाते हैं।

जब तक साहित्य इन अंगुलिमालों से मुक्त नहीं होता, पठनीय साहित्य नहीं उभर सकता। पाठक, श्रोता इन बेहूदगियों के कारण ही साथ छोड़ गया। भारतीय स्वभाव से ही शांतिप्रिय हैं। वो इस कोलाहल से भरे तांडव को पसंद नहीं करते। समाज में एक बड़ी शक्ति ये भी होती है कि वो किसी भी तीसमारखां की अवहेलना करके आगे बढ़ जाता है। इसे गौर से देखिये …..वो आगे बढ़ गया है। वो मुशायरे, कवि-सम्मेलन में जाता है। वो श्री लाल शुक्ल, शिवानी, ज्ञान चतुर्वेदी को खोज कर पढ़ता है। उसे नरेन्द्र कोहली की राम कथा, महासमर पसंद हैं। वो सुनील लोढा द्वारा संचालित कार्यक्रम सुनता है। अपनी प्यास बुझाने के लिये वो पचासों तरीक़े अपनाता है किन्तु अकादमी पुरस्कार से सम्मानित स्वयंभू महाकवियों, लेखकों की किताबें की 100 प्रतियां भी नहीं ख़रीदता।

साम्यवाद में एक रोमांटिक अपील होती है। साम्यवाद चूँकि दुनिया भर में कूड़ेदान में फेंका जा चूका है इसलिये भारत में ये बिरादरी अब अपने आप को पोलिटिकल एक्टिविस्ट, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता बताने लगी है। यहाँ एक एक कहानी का ज़िक्र करना उपयुक्त होगा जिसमें एक तवायफ़ पुलिस के पकड़ने पर अपने आप को सोशल वर्कर बताती है और अपने काम को समाज सेवा कहती है। उर्दू के प्रसिद्ध लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के अनुसार ‘जो चीज़ अक़्ल के ज़रिये खोपड़ी में नहीं घुसी वो अक़्ल के ज़रिये बाहर कैसे निकलेगी।’ तो साहिबो साहित्य में पाठक अपने आप नहीं लौटेंगे। इसके लिये साहित्य की दिशा तय करने वाले, साहित्य पर क़ब्ज़ा जमाये लोगों की सफ़ाई आवश्यक है। ये कूड़ा विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, पत्रिकाओं में बुहारी लगाये बिना बाहर नहीं जाने वाला।


तुफ़ैल चतुर्वेदी

1 August 2013

अगर ज़िन्दगी काया है तो उपटन हैं त्यौहार - नवीन

अगर ज़िन्दगी काया है तो उपटन हैं त्यौहार 
शाश्वत जीवन दर्शन का अवगाहन हैं त्यौहार 

विकल ह्रदय में सम्बल जागे
थका बदन भी सरपट भागे
कैसा भी हो कोई निठल्ला 
त्यौहारों में 'हिल्ले' लागे
निज रूचि के अनुसार सभी को देते हैं रुजगार 
इसीलिये तो कहते हैं दुःख-भञ्जन हैं त्यौहार 

चौखट पर जब आते उत्सव 
ख़ुशियों को बरसाते उत्सव 
नारी और गृहस्थी का 
औचित्य-सार समझाते उत्सव 
जीवन की ख़ुशहाली का हैं यही सही आधार 
जगतीतल में रिश्तों का अभिनन्दन हैं त्यौहार 

इनसे ही जीवन में रति है
सदाचार-सौहार्द सुमति है 
इनके बिना स्थूल है जीवन 
ये हैं तो जीवन में गति है 
इनकी महिमा अद्भुत, अनुपमअविचल, अपरम्पार
प्रगति-पन्थ-परिवृद्धि हेतु प्रोत्साहन हैं त्यौहार 

धर्मों का सङ्काय हिन्द है 
तत्वों का अभिप्राय हिन्द है  
सुविचारों का प्रथम प्रणेता
पर्वों का पर्याय हिन्द है 
विश्व गुरु का मान  तभी तो देता है सन्सार 
मानव में मौज़ूद ईश का वन्दन हैं त्यौहार

:- नवीन सी. चतुर्वेदी
यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter