4 July 2013

SP2/2/10 तू मुझमें बहती रही, लिये धरा-नभ-रंग - सौरभ पाण्डेय


नमस्कार

पिछले एक हफ़्ते में दो बार यह ब्लॉग अन्तरिक्ष के हवाले हो गया यानि अन्तरर्ध्यान हो गया यानि ‘Blog not found’ जैसा मेसेज आया। मेरे साथ यह पहली बार हुआ है इस लिए समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह एक सामान्य तकनीकी समस्या है या कोई असामान्य करतूत। ब्लॉग पर तीन सालों में जो सामग्रियाँ इकट्ठा की हैं उन्हें ले कर चिन्तित होना स्वाभाविक भी है। आप में से जिन के लिये सम्भव हो, इस विषय पर मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

साथियो, सौरभ पाण्डेय जी से हम में से अधिकतर लोग परिचित हैं। तत्व आधारित चिन्तन इन की विशेषता है। मञ्च के निवेदन पर इन्होंने चिन्तन-परक दोहे भेजे हैं। बेशक़ साहित्य का सहज व सरस पक्ष ही  अधिक चर्चा में रहता है, परन्तु किसी को तो गूढ बातें बतियाने के लिये आगे आना होता है। सौरभ जी ने हमारे निवेदन पर यह ज़वाबदारी ख़ुद उठाई है। आइये पढ़ते हैं सौरभ पाण्डेय जी के दोहे

तू  मुझमें  बहती  रही, लिये धरा-नभ-रंग
मैं    उन्मादी   मूढ़वत,   रहा  ढूँढता  संग

सहज हुआ अद्वैत पललहर  पाट  आबद्ध
एकाकीपन साँझ का, नभ-तन-घन पर मुग्ध

होंठ पुलक जब छू रहे,   रतनारे   दृग-कोर
उसको उससे ले गयीहाथ पकड़ कर भोर

अंग-अंग  मोती  सजलमेरे तन पुखराज
आभूषण बन छेड़ देंमिल रुनगुन के साज

संयम त्यागा स्वार्थवशअब  दीखे  लाचार
उग्र  हुई  चेतावनीबूझ  नियति  व्यवहार

जैसा कि मैं ने कहा कि किसी को तो कठिन कार्य को हाथ में लेना होता है सो यह दायित्व भाई सौरभ जी ने वहन किया जिस के लिये उन का बहुत-बहुत आभार। पहले दोहे में कस्तुरी कुण्डल बसे से जो चिन्तन शुरू हुआ है वह अन्तिम दोहे के सामयिक चिन्तन तक पुरअसर है। सौरभ जी को बहुत-बहुत बधाई। तो साथियो प्रयास कीजिये इन दोहों की सघनता तक पहुँचने का, अपने सुविचार व्यक्त कीजिएगा और मैं बढ़ता हूँ अगली पोस्ट की तरफ़। 


इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें   
 
**** शेखर चतुर्वेदी जी अपरिहार्य कारणों से पोस्ट अटेण्ड नहीं कर पा रहे हैं, स्वाथ्य लाभ होते ही पोस्ट्स पर हाज़िर होंगे।

12 comments:

  1. वाह ... सौरभ जी का जवाब नहीं ...

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  2. वाह ... सौरभ जी का जवाब नहीं ...

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  3. तू मुझमें बहती रही, लिये धरा-नभ-रंग
    मैं उन्मादी मूढ़वत, रहा ढूँढता संग

    सहज हुआ अद्वैत पल, लहर पाट आबद्ध
    एकाकीपन साँझ का, नभ-तन-घन पर मुग्ध

    होंठ पुलक जब छू रहे, रतनारे दृग-कोर
    उसको उससे ले गयी, हाथ पकड़ कर भोर
    एक एक दोहा गूढ अर्थ लिए हुए है। इतने सुंदर दोहे कि बार बार पढ़ती रही। मन मुग्ध हो गया। एकाकी पन को कितनी सुंदरता से उभारा गया है! आहा

    आदरणीय सौरभ जी को हार्दिक बधाई...

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  4. सहज हुआ अद्वैत पल, लहर पाट आबद्ध
    एकाकीपन साँझ का, नभ-तन-घन पर मुग्ध

    अहा..आनन्द आ गया रचना का।

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  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  6. सौरभ जी को इन शानदार दोहों के लिए बहुत बहुत बधाई।

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  7. सुंदर सृजन,सौरभ जी को इन उम्दा दोहों के लिए बहुत बहुत बधाई

    RECENT POST: जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें.

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  8. SABHI DOHE EK KALPNA ME LE JATE HAIN AUR HAATH PAKAD KAR BHOOR .......... EK AUR KAMAAL HAI AAP KO DER BADHAI

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  9. सभी दोहों में अर्थ सहजता जनित स्पष्टता है...दार्शनिक भाव को दिखाते सभी दोहे उत्कृष्ट है...सादर बधाई !!

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  10. परम आदरणीय सौरभजी और उनकी लेखनी को मैं ह्रदय से नमन करता हूँ. आप द्वारा सृजित उत्कृष्ट दोहों में ज्ञान की गहनता, परिपक्वता एवं साहित्य की गहरी सोच के दर्शन हो रहे हैं. आदरणीय बधाई स्वीकार करें.

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  11. जिन सुधीपाठकों ने मेरे अकिंचन से प्रयास को स्वीकार कर मेरा उत्साहवर्द्धन किया है उनके लिए मेरे मन-मस्तिष्क में सादर भाव हैं.
    हार्दिक धन्यवाद.

    मैं यह मान कर चल रहा हूँ, कि जिन पाठकों ने मेरी प्रस्तुत छंद-रचनाओं को अनुमोदित किया है वे अवश्य ही इनके शब्दों और इनकी पंक्तियों से ही नहीं, इनमें अंतर्निहित भावार्थ से भी स्वयं को जोड़ पाये होंगे. प्रति छंद संदर्भित भावार्थ की प्रस्तुति यहाँ आवश्यक नहीं. क्योंकि यह मंच इस आयोजन के परिप्रेक्ष्य में ऐसा विस्तार न देता है न ही इसकी यहाँ आवश्यकता ही है.
    दूसरे, ऐसा विषय सभी मनस के लिए नहीं है, यह भी उतना ही सत्य है.

    वैदान्तिक और आध्यात्मिक प्रतीक या इंगित यथोचित अध्ययन की अपेक्षा करते हैं. इस हेतु अध्ययनार्थी हूँ. यही कतिपय पाठकों से भी अपेक्षित है. यह, वह, इस, उस, द्वैत, अद्वैत, विशिष्ट द्वैत या अद्वैत आदि-आदि कुछ शब्द स्थापित इंगित है. बल्कि इस विषय के रूढि-शब्द हैं.
    सर्वोपरि, ’समय’ तथा ’विस्तार’ मनसजन्य होते हैं. अतः इनकी सिद्धांत प्रारूप संज्ञा अवश्य संभव है. ऐसी पार्श्व समझ का न होना किसी पाठक को किंचित वाचाल बना देता है, यह सर्वविदित है. यों, पाठक सदा सम्माननीय हैं, उनकी प्रतिक्रियाएँ शिरोधार्य तो हैं ही, मार्गदर्शक भी हैं.

    पुनः, आदरणीय नवीन भाईजी के प्रति मेरे हृदय में सादर भाव हैं, कि आपने मुझे इसतरह के किसी दायित्व के लायक समझा.
    किन्तु, आपका संचालनत्व एवं सम्पादनत्व किसी की रचनाओं के प्रकाशन के पश्चात भी आग्रही रहे, इसकी अपेक्षा अन्यथा नहीं. वर्ना अनर्थ को असहज प्रश्रय मिलता है

    सादर

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  12. श्रेष्ठ चिंतन-परक दोहे लिखे हैं आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी ने
    बधाई ! आभार !


    सादर...
    राजेन्द्र स्वर्णकार


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