6 June 2013

अच्छा दोहा क्या होता है? - नवीन

नमस्कार..................... भीषण गर्मी के दौरान मुम्बई को हल्की-फुल्की फुहारों के तुहफ़े मिलने शुरू हो गए हैं।

मन मुताबिक़ काम करना और दिये हुये काम को अंज़ाम देना दो अलग बातें हैं, दूसरे काम का महत्व ज़ियादा होता है। यही बात जीवन पर भी लागू होती है। अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ जीना या दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करते हुये जीना, यहाँ भी दूसरी स्थिति ही अधिक महत्वपूर्ण है।  ज़िन्दगी यानि साहित्य और मर्ज़ी यानि छन्द-लय-गति-यति, शब्द, भाव वग़ैरह-वग़ैरह। तो आइये दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

हम आज माइक्रो युग में जी रहे हैं। आप लोगों को याद होगा कि जब मोबाइल आया था तो किसी हथौड़े जैसा लगता था, पर आज देखें तो कैसे-कैसे टिनी एण्ड स्लीक मॉडल्स बाज़ार में आ चुके हैं। छन्द बहुत प्रकार के होते हैं पर दोहे की बात ही अलग है। हम दोहे को माइक्रो छन्द कह सकते हैं। 

प्राकृत पैंगलम में लिखा है कि संस्कृत ने अनुष्टुप छन्द को गुफ़्तगू का औज़ार बनाया और फिर इन्हीं नक़्शेक़दम पर चलते हुए विभिन्न प्रान्तीय भाषाओं / बोलियों ने दोहे को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। दोहे से प्रेरित हो कर बतौर रेप्लिका ग़ज़लें [पहले ग़ैर मुरद्दफ़ और फिर रदीफ़ क़ाफ़िया वाली] आईं और ख़ूब चलीं, बल्कि चल रही हैं। तो मन में विचार आता है क्यूँ न दोहे पर ही अपने-अपने क़लम तराशने का काम ज़ारी रखा जाय। अगर हमारी ज़िन्दगी में हम लोग एक भी दोहा कह पाये, तो जीवन सफल हो जाएगा। नए लोग भ्रम में न पड़ें - दोहा कह पाने का तात्पर्य स्पष्ट करे देते हैं - रहीम-रसखान-बिन्दु-कबीर ने सैंकड़ों दोहे कहे होंगे अपने जीवन काल में - परन्तु जन-मानस ने गिने-चुने दोहों को ही सर-आँखों पर बैठाया। जिन दोहों को जन-मानस ने स्वीकार किया वह दोहे कहे गये, ऐसा अभिप्राय निकलता है।

साथियों का भी मानना है कि दोहा छन्द पर ही काम ज़ारी रखा जाय। पिछली पोस्ट में धर्मेन्द्र जी ने कुछ सुझाव दिये हैं। आप लोग भी सोचिएगा। लास्ट आयोजन की भाँति इस बार भी उपदेश की कन्दराओं से परहेज़ रखते हुये भावनाओं की कुञ्ज गलियों में बिचरने का मन है। 

आप में से अधिकतर इस मंच से लंबे समय से जुड़े हुये हैं और अधिकतम बातों से परिचित भी हैं। आप की शिकायत को सर-माथे चढ़ा कर एक बार फिर से आयोजन की शुरुआत कर दी है, अब आप लोग भी कृपया अपनी-अपनी राय प्रस्तुत कीजिये ताकि आयोजन की विधिवत घोषणा की जा सके।

चलते चलते एक बात और बतिया ली जाये कि अच्छा दोहा क्या होता है? एक दोहे का उदाहरण लेते हैं:-

पोथी पढ़ि-पढ़ि  जग मुआ, पण्डित भया न कोय।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढे सु पण्डित होय।।

बहुत ही फेमस दोहा है। शायद ही कोई साहित्य प्रेमी होगा जिस ने इसे पढ़ा / सुना न हो। आइये देखते हैं वे कौन सी बातें हैं जो इस दोहे को उत्कृष्ट बनाती हैं :-

1. सब से पहली बात है रवानी। आप इस दोहे को एक साँस में बिना किसी अटकाव के पढ़ सकते हैं। भाषा निहायत ही आम-फ़हम है। बिना किसी शब्द-कोश के एक झटके में समझ में आ जाती है।

2. दोहे के चारों हिस्से देखिये, स्वतंत्र हैं। एक दूसरे से सम्बद्ध होने के साथ ही साथ स्वतंत्र भी हैं। एक चरण दूसरे चरण पर आश्रित नहीं है। अलबत्ता एक चरण दूसरे चरण से मिल कर बात में चमत्कृति अवश्य पैदा कर रहा है।

3. दोहा जैसे जैसे आगे बढ़ता है कथानक भी उसी क्रम में बड़ी ही सहजता के साथ आगे बढ़ता है, यानि मानव मन को अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता दोहे को समझने के लिए।

4. कथानक ऐसा है जो हर युग में प्रासंगिक है। यानि ऐसी ताज़गी जो हर युग में ताज़ा ही लगती है।

5. निष्कर्ष न सिर्फ़ सर्वग्राह्य है बल्कि बड़े ही साधारण तरीक़े से प्रस्तुत कर दिया गया है और वह भी दोहे के अंत में।

एक अच्छा दोहा 1001 दोहों पर भारी पड़ता है। अच्छे शायर पाँच शेर की ग़ज़ल कहने के लिए कम से पचास शेर कागज़ पर या दिमाग़ में कहते हैं। इन पचास में से पैंतालीस केंसल होते हैं तब कहीं जा कर पाँच ठीक-ठाक शेर हमारे सामने आते हैं। यहाँ पचास की संख्या को उदाहरण माना जाय। यदि कुबूल हो तो हम भी 10 दोहे लिख कर उन में से एक या दो छाँट सकते हैं। क्वान्टिटी की बजाय क्वालिटी को ही अहमीयत मिलती है। हम सभी के इर्द-गिर्द दर्जन भर किताबों के स्वामी, दसियों पुरस्कारों के ख़ालिक़, अनेक समितियों-प्रभागों के अध्यक्ष / फध्यक्ष भरे पड़े हैं, पर ख़ुद देखिये उन की कितनी पंक्तियाँ चर्चित हैं...... तो कुल बात को लब्बोलुआब ये निकलता है कि कम मगर उत्कृष्ट लेखन ही बेहतर विकल्प है।

इन शॉर्ट यदि उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुये दोहे कहे जाएँ तो हम अच्छे दोहे क्यूँ नहीं कह सकते? और हमें किसी से लिखवा के लेने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी ............. हाँ! परिश्रम यानि साधना अपरिहार्य है। फिर भी कोई दिक़्क़त हो तो कमेण्ट या मेल के ज़रीये बात की जा सकती है।

तो प्रतीक्षा है आप के सुझावों की ताकि आयोजन की विधिवत घोषणा की जा सके।

10 comments:

  1. दोहों के संदर्भ में सुंदर और सार्थक जानकारी
    उत्कृष्ट प्रस्तुति

    आग्रह है
    गुलमोहर------

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  2. अच्छा लिखने के लिए साधना और परिश्रम की जरूरत होती है तभी निखार आता है,,,,

    शानदार,उम्दा प्रस्तुति,,,

    RECENT POST: हमने गजल पढी, (150 वीं पोस्ट )

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  3. सच है, ऐसी सरलता अनुभव से ही आती है।

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  4. नवीन जी!
    दोहा-लेखन के विस्तार और निखर की दिशा में आपके सार्थक प्रयासों का वंदन. दोहा की विशेषता संक्षिप्तता, सम्प्रेषणीयता, बेधकता, सहजता तथा लयबद्धता है. इनके कारण कथ्य प्रभावी होलर दोहा मर्मस्पर्शी होता है. इनमें चूक होने पर आम पाठक या श्रोता भी अभाव अनुभव करता है. अन्य शिल्पगत नियम आम पाठक या श्रोता नहीं समझता, केवल दोहा-विधान की जानकारी रखनेवाले समझते हैं, इन्हें परंपरा से स्वीकारा जाता रहा है. ये निरर्थक न होने पर भी कम महत्वपूर्ण हैं ऐसा मेरा मत है. शिल्प के सभी नियमों पर खरा होने पर भी दोहा उक्त तथ्यों के अभाव में प्रभावहीन होता है जबकि उक्त पञ्च तत्वों से परिपूर्ण दोहा शिल्पगत त्रुटि के बाद भी असरकारक होता है.
    आपके द्वारा उद्धृत दोहा भी शिल्प के आधार पर त्रुटि होने पर भी कालजयी दोहा है.
    पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोय।
    ढ़ाई आखर प्रेम का, पढे सु पण्डित होय।।
    यहाँ 'सो' का उच्चारण लघु है जिसे 'सु' लिखकर मात्रा-संतुलन स्थापित किया गया है. 'सो पंडित होय' अर्थात जो पढ़ेगा वह वास्तविक विद्वान् होगा. 'सु पंडित' अर्थात अच्छा पंडित. सुगंध, सुरभि, सुनियोजित, सुजान में 'सु' का जो अर्थ है वही सु पंडित में ग्राह्य है. अस्तु इस बिंदु पर भिन्न-भिन्न दोहाकार भिन्न-भिन्न मत रख सकते हैं.
    आपने आयोजन के विषय संबंधी जो चर्च की है. उस सन्दर्भ में निवेदन है की विविध रसों पर केन्द्रित दोहे आमंत्रित कर सकें तो दोहकारों को नव आयाम में चिंतन-मनन-लेखन का अवसर मिलेगा. सभी रसों पर दो-दो प्रतिनिधि दोहे अथवा दो या ३ रसों पर ३-३ दोहे आमंत्रित करें. किसी पूर्व निर्धारित विषय, समस्या या दोहे के एक चरण पर आधारित दोहे भी बुलाये जा सकते हैं. पावस, ग्रीष्म, रक्षाबंधन आदि पर रचनाओं की बाढ़ देखते हुए इन पर न ही बुलाएँ तो बेहतर.

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  5. आ. सलिल जी सादर प्रणाम

    कोई कोई कमेण्ट ऐसा होता है जो पोस्ट को ढँक देता है, आप के कमेण्ट ने कुछ ऐसा ही किया है। रस आधारित दोहे अवश्य ही हमें उपदेश की कन्दराओं से बाहर निकाल कर भावनाओं की कुञ्ज गलियों में विचरण करने को प्रेरित करेंगे।

    अन्य साथियों की राय की भी प्रतीक्षा है, उस के बाद निर्णय लेते हैं।

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  6. नवीन जी...दूसरा बिंदु...पर ..मेरा विचार है कि..

    --- उपरोक्त दोहे में चारों हिस्से किस प्रकार स्वतंत्र हैं ?....कोई भी चरण स्वतंत्र अर्थ नहीं देता .... अतः यह बिंदु अनावश्यक ही है..
    ---वस्तुतः अच्छे दोहे की विशेषता यही है कि प्रथम व तृतीय चरण में तथ्य रखा जाता है एवं द्वितीय व चतुर्थ में निष्कर्ष जैसे ग़ज़ल के पहले मिसरे में ऐसा तथ्य हो कि उत्सुकता /प्रश्न उठे व दूसरे मिसरे में ..उत्तर समाधान |....यथा
    १.पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ ..एक वक्तव्य है परन्तु अधूरा...तुरंत प्रश्न होगा.. तो फिर ?..उत्तर होगा -पंडित भया न कोय |
    २. ढाई आखर प्रेम का ...एक वक्तव्य है परन्तु निरर्थक ..प्रश्न होगा ..तो क्या ?..उत्तर है.. पढ़े सो पंडित होय| --इसीलिये यह श्रेष्ठ दोहों की कोटि में है ...

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  7. मेरे विचार से.....फ्री लांसिंग होने चाहिए ताकि स्वतंत्र व मौलिक चिंतन को उड़ान मिल सके व विषय वैविध्य भी रहे....पिष्ट-पेषणीयता से भी बचा जा सके ...

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  8. जो जनमानस को छुये ,ऐसा दोहा बोल
    दिखने में नन्हा मगर,रत्नों से अनमोल ||

    आदरणीय नवीन जी, बहुत दिनों से मन में ऐसे ही आयोजन की अपेक्षा थी.
    //उपदेश की कन्दराओं से परहेज़ रखते हुये भावनाओं की कुञ्ज गलियों में बिचरने का मन है//

    फिर विलम्ब कैसा ? झटपट, विषयों का चयन कर लीजिये. सादर...

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  9. आदरणीय सलिल जी ... इस दोहे में आपके द्वारा इंगित त्रुटि..त्रुटि नहीं अपितु ...लोक भाषाओं में स्वाभावतः ही गुरु-लघु -ध्वनि उच्चारण के अनुसार होता है .. अतः सो =लघु = १ मात्रा ...लिखने में भी यह 'सो' ही है 'सु' नहीं ....

    ढ़ाई आखर प्रेम का, पढे सो पण्डित होय।।

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