16 June 2013

SP/2/2/2 चल सजनी चूल्हा जला, बहुत हो चुकी प्रीत - मनोज कौशिक


क्रिकेट में रुचि लेने वाले बख़ूबी जानते हैं कि जब हम टिपिकल शॉट्स वाले गेम को देखते-देखते कुछ नए शॉट्स देखने के लिए लालायित होते हैं तो कभी सचिन, कभी सहवाग, कभी विराट कोहली तो कभी शिखर धवन सामने आ जाते हैं। दोहों में भी नए सुर की तलाश महसूस की जा रही है। परम्परा का सम्मान रखते हुये थोड़ी सी ताज़गी का एहसास लाज़िमी है। पिछले कुछ हफ़्तों से भाई मनोज कौशिक सम्पर्क में आए हैं। यह भी वरच्युअल रिलेशन है, शब्दों और वाक्यों से एक दूसरे के समीप आये हैं हम लोग। बक़ौल मनोज कौशिक - उन्होंने जीवन में पहली बार दोहे कहे हैं, और भाई पहली बार का यह प्रयास न सिर्फ़ ज़बर्दस्त बल्कि बड़ा ही धमाकेदार है। समस्या-पूर्ति मंच के इकतालीसवें [४१] सहभागी के रूप में अपने दोहे ले कर मनोज जी हाज़िर हो रहे हैं। आइये हम अपने परिवार के इस नये सदस्य का सहृदय स्वागत व उत्साह वर्धन करें 

भोर हुई तो बज उठा, कुदरत का संगीत
चल सजनी चूल्हा जला, बहुत हो चुकी प्रीत

फुरसत के लमहे मिलें, गिन-चुन कर दो-चार
रूप निहारूँ आप का, या देखूँ घर-बार

सूरज की कंदील ने, दिखलाया संसार
तरह-तरह के जीव और तरह-तरह के प्यार

आखिर दम सब ने कहा -  था ये बंदा नेक
साँसें गिनती रह गई, घड़ी पुरानी एक

भैया जी इस दौर में वही मूढ़ कहलाय
जो ख़ुद पी कर धूप को, पानी बाँटन जाय

आप भी संशय में होंगे चूँकि मैं भी चौंक गया था पहली बार लिखने बैठे बंदे के ऐसे दोहे पढ़ कर। पर मेधा के उदाहरण ऐसे ही होते हैं। इन दोहों की तारीफ़ में मैं सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि मनोज जी ने दोहा-साहित्य के मंच पर उपस्थिति दर्ज़ करवाने के लिये इस मंच को चुन कर मुझे अनुग्रहीत किया है।

तो साथियो आनन्द लीजिये इन दोहों का, आप के सुविचारों का लाभ मनोज जी तक अवश्य पहुँचने दें, तब तक मैं तैयारी करता हूँ अगली पोस्ट की।

प्रणाम...... 


इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें 

16 comments:

  1. अगर सच में पहली बार है तो यस धमाकेदार है ... सभी दोहे लाजवाब ... कमाल के ...

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  2. दूसरा दोहा विशेष रूप से प्रभावी बन पड़ा है। इसके लिये विशेष बधाई।

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  3. वाह! प्रथम लाजवाब प्रस्तुति अत्यंत सुन्दर दोहों के साथ, मन मुग्ध हो गया. हार्दिक बधाई ढेरों हार्दिक शुभकामनाएँ.. आदरणीय.

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  4. बहुत ही शानदार एवँ धमाकेदार दोहे ! मनोज जी को बहुत सारी बधाइयाँ व शुभकामनायें !

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  5. लाजवाब ... कमाल

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  6. अच्छे लगे दोहे . मनोज भाई को बंधाई !!

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  7. आप के ही अंदाज में कहूँगा कि ये तो पहली ही बाल पर छक्का और पहले ही मैच में दोहरा शतक है। बहुत बहुत बधाई मनोज जी को।

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  8. बहुत शानदार दोहे...बहुत बहुत बधाई मनोज जी को|

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  9. AAP SABHI USTAADON KA MAI AABHARI HUON KI AAPNE MERA HOUSLA BADAYA VARNA ABHI KOI KAABLIYT NAHIN HAI AAP LOGON KO PAD KAR SEEKH RAHA HUON AAP SABHI KA HAATH SAR PE BANA RAHE DUA KARIN MERI LYKHNI KE LIYE......

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  10. बहुत सुन्दर दोहे...

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  11. भोर हुई तो बज उठा, कुदरत का संगीत
    चल सजनी चूल्हा जला, बहुत हो चुकी प्रीत

    गलती किसकी छोड़िये,अब गलती ना दाल
    फूँक-फूँक कर फूँकनी,लाल गाल कंगाल

    फुरसत के लमहे मिलें, गिन-चुन कर दो-चार
    रूप निहारूँ आप का, या देखूँ घर-बार

    फुरसत फुर से उड़ गई, जीवन भागमभाग
    कितने ही सम्भाग में, बँटा आज अनुराग

    सूरज की कंदील ने, दिखलाया संसार
    तरह-तरह के जीव और तरह-तरह के प्यार

    जीवन के कंदील का, चटक गया है काँच
    बाती बाकी ना रही,देखा जब से साँच

    आखिर दम सब ने कहा - “था ये बंदा नेक”
    साँसें गिनती रह गई, घड़ी पुरानी एक

    टिक टिक टिकती कब तलक,रुकना था इक रोज
    अंत समझना मत इसे, शुरू यहीं से खोज

    भैया जी इस दौर में वही मूढ़ कहलाय
    जो ख़ुद पी कर धूप को, पानी बाँटन जाय

    जो पीता है धूप को, चढ़ता उसे सुरूर
    मूढ़ कहाना जगत में, है उसको मंजूर

    भाई मनोज कौशिक जी, आपके पहली बार कहे दोहों में पहले-पहले प्यार का नशा समाया है, हमारा बहकना भी स्वाभाविक है. प्रतिक्रिया के लिये शब्द ही नहीं मिले, कुछ लिखना चाहा तो बस दोहे ही निकल पड़े. आपके प्रथम प्रयास को ह्र्दय से बधाई....,..

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  12. भाई मनोज कौशिकजी की पहली कोशिश है ? सही ?
    भाई इन तीन छंदों के भीतर गया कौन-कौन ?

    भोर हुई तो बज उठा, कुदरत का संगीत
    चल सजनी चूल्हा जला, बहुत हो चुकी प्रीत

    फुरसत के लमहे मिलें, गिन-चुन कर दो-चार
    रूप निहारूँ आप का, या देखूँ घर-बार

    आखिर दम सब ने कहा - “था ये बंदा नेक”
    साँसें गिनती रह गई, घड़ी पुरानी एक


    दिल से बधाई भाई .. .

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  13. आदरणीय, मधुरिम सरस दोहों के प्रस्तुति हेतु बधाई एवं ढेरो शुभकामनायें

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  14. कभी पढ़ा नहीं था भाई मनोज कौशिकजी को
    अच्छे दोहे लिखे हैं प्रथम प्रयास में ही...
    हृदय से बधाई !


    शुभकामनाओं सहित
    सादर...
    राजेन्द्र स्वर्णकार


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