19 October 2012

SP/2/1/4 कितने स्याने हो गये, सारस और सियार - साधना वैद

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन


जहाँ एक ओर अच्छे-अच्छे दोहे पढ़ने को मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मंच के सहभागियों तथा अन्य पाठकों द्वारा विचार-विमर्श के माध्यम से एक अद्भुत कार्यशाला का दृश्य भी उपस्थित हो रहा है। पिछली पोस्ट में हमने कुंतल-कुंडल के बहाने से कुछ और बारीकियों को समझा। यदि सुधार के सुझाव [मसलन ये दोहा यूँ नहीं यूँ कहा जाये] भी सामने आ सकें तो और भी अच्छा हो। विविध रंगों में रँगे भावना-प्रधान दोहों को पढ़ कर मन बहुत प्रसन्न हो रहा है। ताज़्ज़ुब भी हो रहा है कि अल्प-ज्ञात / अज्ञात रचनाधर्मियों की तरफ़ से आ रहे हैं ऐसे उत्कृष्ट और नये दोहे। ख़ुशी का यह मौक़ा देने के लिये सभी सहयोगियों / सहभागियों का बहुत-बहुत आभार। आइये आज की पोस्ट में पढ़ते हैं आ. साधना वैद जी के दोहे:-

साधना वैद

ठेस
पहले तो छीने झपट, दूध - फूल - फल - साग
अब रोटी भी ले उड़े, सर पर बैठे काग

उम्मीद
अन्ना - 'गाँधी' बन गये, 'भगतसिंह' - अरविंद
बिगुल बज उठा युद्ध का, जागेगा अब हिंद

सौन्दर्य
जिस की महफ़िल में सदा, कुदरत करती रक्स
बादल, झरना, चाँदनी, सब में उस का अक्स

आश्चर्य
साँठ-गाँठ कर खा रहे, हलुआ-खीर, लबार
कितने स्याने हो गये, सारस और सियार

हास्य-व्यंग्य
पत्ते झाड़े पेड़ से, दे पत्थर की चोट
गद्दे-तकियों में भरे, मंत्री जी ने नोट

विरोधाभास
बेल विदेशी मूल की, ज्यों-ज्यों बढ़ती जाय
जड़ें छोड़ निज पेड़ सब, उस पर लटकें धाय

सीख
जिसने श्रम अरु धैर्य की, पी ली घुट्टी छान
दिग्दिगंत में गूँजता, उस का गौरव गान

मैं समझता हूँ मंच के सहभागी अब प्रस्तुत हो रहे दोहों का आकलन अच्छी तरह कर रहे हैं। विभिन्न पहलुओं पर अच्छी चर्चाएँ भी गति पकड़ रही हैं। साधना दीदी ने विदेशी मूल के माध्यम से एक अच्छा बल्कि नवल दोहा हम तक पहुँचा दिया है। सारस-सियार वाली कहानी को दोहा बद्ध करना भी उन्हें विशेष-बधाई का हक़दार बनाता है। इन दोहों का मोल समझने के लिये हमें इन दोहों के सर्जक को समझने का यत्न भी करना चाहिए।

दीदी तुस्सी ग्रेट हो:)। अच्छे दोहे पढ़वाये हैं।

समस्या पूर्ति के लिये आने वाले दोहों पर छन्द अनुपालन और सम्प्रेषण को ले कर ही अधिकतर बातें हो पा रही है।विषय और अर्थ विस्फोट को ले कर अधिक काम करना मुश्किल साबित हो रहा है। अपने-अपने दोहे लिखने के क्रम में इस प्रक्रिया की दुरूहता से आप लोगों का साक्षात्कार हो चुका होगा। अत: मंच अधिकतम अच्छे दोहों के लिये प्रोत्साहित करने के बाद एक सीमा आने पर रुक जाता है। बहुत से दोहे एक्जेक्ट भाव तक नहीं पहुँच पा रहे हैं, फिर भी निकटतम या मिले-जुले भाव तक तो पहुँच ही पा रहे हैं और चौंकाने के लिये पर्याप्त भी हैं।

दोहों की सघन कुंज में विचरण करने का अवसर प्रदान करने के लिये आप सभी सहयोगियों का पुन:-पुन: आभार। 

जय माँ शारदे!

53 comments:

  1. बहुत ही शानदार दोहे हैं। पहले ही दोहे से बाँध कर रख लिया है। हार्दिक बधाई साधना जी को। एक बार फिर कह रहा हूँ कि इस बार का आयोजन कुछ कर के जाएगा।

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  2. ---वाह! क्या ही सुन्दर भाव-सम्प्रेषण युक्त दोहे हैं...
    १- हे राम ! अब रोटी भी गयी...निश्चित ही ठेस लगेगी
    २- बहुत सटीक उम्मीद है .. जागेगा अब हिंद ..
    ३- सब में उसका अक्स--सौंदर्य का गज़ब का प्रतिमान है...
    ४-सत्य बचन -- हाय राम! दुशमन भी आपस में मिल बाँट कर !
    ५- बहुत सुन्दर व सटीक व्यंग्य है
    ६- क्या सुन्दर व्यंजनात्मक विरोधाभास है...
    ७- शाश्वत सीख....

    "भाषा,कथ्य, व अर्थ का,संयोजन स्पष्ट |
    सम्प्रेषण के हेतु सब, भाव हो रहे पुष्ट |"

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  3. सारे दोहे बहुत बढ़िया .... विषय को बखूबी कहा है .... मुझे तो यह बहुत बढ़िया लगा

    विरोधाभास
    बेल विदेशी मूल की, ज्यों-ज्यों बढ़ती जाय
    जड़ें छोड़ निज पेड़ सब, उस पर लटकें धाय

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  4. प्रियवर श्याम जी ने शायद अपने दोहे में दो जगह उन्नीसपना जान बूझ कर छोड़ा लगता है, ताकि उस पर भी चर्चा हो सके

    श्याम जी का दोहा है

    "भाषा,कथ्य, व अर्थ का,संयोजन स्पष्ट |
    सम्प्रेषण के हेतु सब, भाव हो रहे पुष्ट |"

    पहली बात

    'स्पष्ट'शब्द को 5 मात्रा वाले शब्द [इसपष्ट]की तरह भी काफ़ी बरता गया है परन्तु फ़ाइन ट्यूनिंग को वरीयता देने वाले रचनाकार इस से बचते हैं और इसे 3 मात्रा वाले शब्द [स्पष्ट] की तरह ही बरतना पसंद करते हैं। लिहाज़ा उक्त दोहे में सिर्फ़ एक शब्द 'है' जोड़ देने से इस कमी की भरपाई हो जाती है।


    दूसरी बात

    ऊपर की पंक्ति के अंत में आ रहा है 'स्पष्ट' और दूसरी पंक्ति के अंत में आ रहा है 'पुष्ट'। यह सर्वथा अग्राह्य है। तुकांत / क़ाफ़िया / अंत्यनुप्रास में गंभीर चूक है। अतएव विमर्श हेतु एक दोहा लगभग उसी तरह की बात करता हुआ प्रस्तुत करता हूँ, श्याम जी सही / ग़लत के बारे में मार्गदर्शन करें


    इसे शायद यूँ होना चाहिये

    "भाषा,कथ्य, व अर्थ का,संयोजन है स्पष्ट |
    सम्प्रेषण ऐसा सहज, तनिक न होता कष्ट |"

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  5. अन्ना - 'गाँधी' बन गये, 'भगतसिंह' - अरविंद
    भगत सिंह का अरविन्द बनना समझ में नहीं आया।
    ऐसा क्यों हुआ? क्या सिर्फ़ तुक मिलाने के लिए?

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति |
    आशा

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  8. साधना जी के दोहों में सभी कोणों से साहित्यिकता स्पष्ट परिलक्षित हो रही है। उन्हें हार्दिक बधाई।

    @‘कष्ट‘ में 3 मात्राएं हैं। ‘स्पष्ट‘ में एक अर्धाक्षर अधिक है अतः इसकी मात्राएं 4 होनी चाहिए, 5 नहीं। बोलते समय अशुद्ध उच्चारण ‘इस्पष्ट‘ या ‘इसपष्ट‘ बोलने से 5 मात्राएं हो जाएंगी।

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  9. जनविजय जी ! आपकी प्रतिक्रिया के लिये आभारी हूँ ! आ. अन्ना की तुलना गाँधी जी से और अरविन्द जी की तुलना भगत सिंह से करने के पीछे मेरी नीयत मात्र तुक मिलाने भर की ही नहीं थी ! इन दोनों महानुभावों की कार्यशैली में जो मूलभूत अंतर है उसीके आधार पर यह दोहा आकार में आया है ! जहाँ अन्ना शांत एवँ अहिंसात्मक आन्दोलन में विश्वास रखते हैं वहीं अरविन्द ज़रा गरम मिजाज़ के लगते हैं और अन्ना से अलग होते ही उन्होंने बहरों को जगाने के लिये भगत सिंह की तर्ज़ पर भ्रष्टाचारी नेताओं पर आक्रामक हमले शुरू कर दिए हैं ! यह मेरी सोच है और इसी सोच को केन्द्र में रख मैंने यह दोहा रचा है ! आवश्यक नहीं है कि सभी पाठक इससे सहमत हों ! आपकी प्रतिक्रिया के लिये शुक्रिया !

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  10. साधना जी संभवत: अनिल जनविजय जी मत नहीं, शब्द क्रम के बारे में संकेत दे रहे हैं।

    पूर्वार्ध को पढ़ने पर 'अन्ना' - गाँधी जी को फॉलो कर रहे हैं, तो इस क्रम के अनुसार उत्तरार्ध में भगतसिंह - अरविंद को फॉलो करते प्रतीत होते हैं, जबकि आप कहना चाहती थीं अरविंद - भगतसिंह को फॉलो कर रहे हैं। यह एक काव्य-दोष है। आप के दोहे के माध्यम से इस पर अच्छा विचार-विमर्श हो सकता है।

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  11. दोहे सभी भाव पर सटीक बैठ रहे हैं|

    जिस की महफ़िल में सदा, कुदरत करती रक्स
    बादल, झरना, चाँदनी, सब में उस का अक्स


    वाह !! बहुत ही सुंदर!

    साधना जी को बहुत2 बधाई !!

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  12. आदरणीय महेंद्र जी

    मुझे लगता है एक्जेक्ट मात्रा गणना के लिए स्थान - स्कूल - स्पष्ट - स्तर - स्याह आदि शब्दों के आरंभ में आने वाले अर्धाक्षर 'स' का उच्चारण के वक़्त अगले अक्षर के साथ युग्म हो जाता है, भाई तकनीकी शब्दावली के साथ तो प्रतुल जी या श्याम जी या फिर कोई और ही बता पायेगा, तथा उन शब्दों का वज़्न [मात्रा-पाद भार] क्रमश: 21 / 21 / 21 / 2 / 21 होना चाहिये

    फिर भी हम लोग मिल कर इन शब्दों के कुछ उदाहरण बना कर देख सकते हैं। स्पष्ट शब्द के चार मात्रा भार वाले चरण बना कर एक बार ट्राई भी कर लेते हैं।

    यहाँ उच्चारण पर भी ध्यान देना होगा मसलन - स्पष्ट को यदि चार मात्रा वाला शब्द समझा जाये तो फिर उसे बोलना क्या होगा?

    सपषट
    या
    सिपष्ट

    इस विषय पर विमर्श की आवश्यकता है। मेरा सोचना भी ग़लत हो सकता है, इसलिए आप सभी से विनम्र निवेदन है कि उचित राय अवश्य सामने रखें।

    इसी प्रकार अन्ना-अरविन्द वाले दोहे में शब्द क्रम को ले कर भी विमर्श की आवश्यकता है - वहाँ हम लोगों को ऐसे उदाहरण देने हैं कि वही बात इसी छंद में कैसे सुधार कर रखी जा सकती है। यानि उसी दोहे को सहज भाव रखते हुये सुधार कर प्रस्तुत करना है।

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  13. आपकी बात से सहमत हूँ नवीन जी ! यदि जनविजय का संकेत शब्दक्रम की ओर है तो मेरे विचार में कौन किसका अनुकरण कर रहा है यह 'इनवर्टेड कौमाज़' से स्पष्ट हो जाता है ! 'गाँधी' तथा 'भगत सिंह' दोनों ही नाम इनवर्टेड कैमाज़ में हैं इसलिए यह स्पष्ट हो जाता है कि इनको ही फोलो किया जा रहा है और जो फोलो कर रहे हैं यानी कि अन्ना तथा अरविन्द उनके नाम बिना किसी विशेष संकेत के दिए गये हैं ! यह गद्य नहीं है ! कविता रचते समय शब्दों को गद्य के क्रम में नहीं रखा जा सकता ! आप सभी विद्वद्जनों की राय की अपेक्षा है !

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  14. दीदी भाई के निवेदन को समझो, कृपया इसे अपने दोहे की मीमांसा मात्र ही न समझो।

    दरअसल, पद्य का गद्यात्मक होना उस की श्रेष्ठता का परिचायक है। मैं ख़ुद इस विषय पर अन्य साथियों के विचारों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा हूँ। पुन: निवेदन करूँगा इस परिचर्चा के माध्यम से पद्य के गद्यात्मक रूप-वर्णन [गद्य-गीत या अगीत नहीं] की प्रतीक्षा करें। मुझे विश्वास है हमारे सहयोगी / सहभागी पद्य के इस विलक्षण रूप से हमारा साक्षात्कार करवाने में समर्थ हैं।

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  15. आदरणीया साधना वैद का हर दोहा मुझे साहित्य की दृष्टि से उचित और समीचीन लगा है.

    यह स्पष्ट है कि हम मात्रा निर्धारण में जोर शब्द की अक्षरी से अधिक अपनी व्यक्तिगत मान्यतओं और असहज (अशुद्ध) उच्चारण पर देते हैं.
    नवीन भाईजी, आपके गणना-निर्धारण को मैं मनस की समझ और अभी तक के प्रयास के आधार पर समर्थन देता हूँ. स्पष्ट एकदम से स्पष्ट है.

    व्यक्ति विशेष की बहस-गुत्थी (या बतकूचन ?) को लेकर मुझे कुछ भी नहीं कहना.

    सादर

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  16. यदि 'स्पष्ट' को मुझे गिनना होता तो मैं स्प=१+ ष्=१+ ट=१(कुल ३) गिनती| यह कहाँ तक सही है यह मैं भी जानना चाहती हूँ|

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  17. - धन्यवाद नवीन जी...
    ---- स्पष्ट में तो पांच मात्राएँ ही गिनी जानी चाहिए एक साथ दो संयोजित वर्ण वाले शब्द में ध्वनि प्रधानता होती है( इस्पष्ट , अस्पष्ट आदि ).... लयात्मक स्वर में पढ़ कर देखिये संयोजन है स्पष्ट ...में लय टूटती है'... इस प्रकार के अन्य शब्दों में भी कुछ कविगण तीन मात्राएँ गिनते हैं परन्तु प्रत्येक स्थान पर यही ध्वनि-लय दोष दिखाई देता है ...
    ---हाँ यह सही है कि भाव स्पष्टता सटीक होते हुए भी पुष्ट शब्द यहाँ तकनीकी रूप में ठीक प्रकार से फिट नहीं बैठता, अतः द्वितीय पंक्ति का संशोधन उचित है...

    ---यद्यपि स्वयं 'कष्ट' का भाव बहुत अच्छा भाव नहीं है इसका अर्थ निकलता है कि यदि कोई कवि कविता में दूरस्थभाव, अन्योक्ति या व्यंजनात्मक या लक्षणात्मक भाव-सौंदर्य प्रस्तुत करता है तो पढने वाले को भाव-सम्प्रेषण का कष्ट होता होगा ...

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  18. "अन्ना-'गाँधी' बन गये,'भगतसिंह' -अरविंद
    बिगुल बज उठा युद्ध का, जागेगा अब हिंद"

    ---मेरे विचार से साधना जी का स्पष्टीकरण सही व सटीक है .. वैसे भी यहाँ सीधा-सीधा रूपक है.. इनवर्टेड कौमा में दिए गए शब्द एवं बाहर के शब्द समानार्थक भाव प्रस्तुत कर रहे हैं ...

    अन्ना, 'गांधी' बन गए (और) 'भगतसिंह' बने हैं अरविंद...

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  19. ---पद्य के गद्यात्मक रूप का क्या अर्थ हुआ ? ----अर्थात काव्य...कविता का गद्यात्मक रूप.. वास्तव में तो यह अतुकांत कविता व मुक्त छंद कविता है नकि पद्य का गद्य-रूप.. .....मानव ने जब बोलना प्रारम्भ किया तो पहले गद्य में कथ्य प्रारम्भ किया तत्पश्चात कथ्य विशिष्टता, कलात्मकता व स्मृति हेतु पद्य( तालवद्ध, छंद व गणवद्धता ) का प्रारम्भ हुआ | वास्तव में तो पद्य स्वयं गद्य-कथन का कविता-मय रूप है|
    -- जब कविता को अधिक बंधनों में जकडा जाने लगा एवं लिपि के आविष्कार के बाद स्मरण रखने की अत्यावश्यकता नहीं रही तो काव्य-कथन व कविता के नए रूप अतुकांत कविता, गद्य-गीत, अगीत आदि का जन्म हुआ|
    --- अतः बात कविता के सभी तथाकथित गद्य-रूपों -- अतुकांत कविता व मुक्त-छंद कविता -की होनी चाहिए ...अच्छा विचार बिंदु है विमर्श हेतु .....

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  20. स्पष्ट =इस्पष्ट ...स्कूल = इस्कूल....स्तर =इस्तर...स्त्री = इस्त्री ... स्नेह = इस्नेह , स्नान = इस्नान या अस्नान |
    ---- ये शब्द ध्वन्यात्मक हैं ...न कि अशुद्ध ...
    अतः मेरे विचार से स्वर के साथ, मात्रा गणना होनी चाहिए ..

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  21. आज कल Sony Television पर एक सीरियल आ रहा है "बड़े अच्छे लगते हैं"

    उस में एक हैं मिस्टर कपूर
    उन की पत्नी हैं प्रिया
    और मिस्टर कपूर के मामा जी भी हैं

    अब ये मिस्टर कपूर के मामा जी 'प्रिया' को 'पिरिया' कहते हैं।

    जब प्रिया कहा जाएगा तो वज़्न होगा 1+2 यानि कुल 3 मात्रा

    और जब पिरिया कहा जायेगा तो वज़्न होगा 1+1+2 = 4 मात्रा

    मिस्टर कपूर उन्हें प्रिया ही कहते हैं, पर साथ ही मिस्टर कपूर जी के मामाजी के मुँह से इसी किरदार का नाम 'पिरिया' सुनना गुदगुदाता भी है।

    जैसा कि मैं पहले भी स्पष्ट कर चुका हूँ [इस्पष्ट नहीं] कि स्पष्ट की 5 मात्रा गणना प्राचीन कवियों के काल से ही चली आ रही है, परंतु फ़ाइन ट्यूनिंग वाले इसे 3 मात्रा के रूप में लेना ही पसंद करते हैं।

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  22. विचार-विमर्श कई बार बड़े फ़ायदेमंद भी साबित होते हैं। सकारात्मक रूप में लें तो! वक्रोक्ति-अन्योक्ति-व्यंग्योक्ति-विरोधाभास का उदाहरण हमारे सामने मौजूद है। इस पोस्ट पर भी कुछ विमर्श शुरू हुये हैं। शब्द मात्रा भार पर हम सभी अपने-अपने मत प्रकट कर चुके हैं। शब्द क्रम वाली बात अभी होनी बाकी है। फिलहाल इस टिप्पणी से में पद्य के गद्यात्मक होने की बाबत थोड़ा और कहने का प्रयास करता हूँ।

    अमूमन समझा जाता है कि पद्य को गद्य जैसा नहीं दिखना चाहिए, बल्कि 99.99% ऐसा है भी। पर ये बाकी का जो 0.01% या उस से भी कम है, वो महज संयोग नहीं बल्कि कठिन तपस्या / साधना का परिणाम होता है। कुछ उदाहरण दे रहा हूँ। यहाँ स्पष्ट कर दूँ, कि ये बात दोहों के बारे में नहीं है, दोहों का गद्यात्मक होना ऑल्मोस्ट इम्पॉसिबल ही है। गद्य जब पद्यात्मक या पद्य जब गद्यात्मक हो जाता है, तो वो सर चढ़ कर बोलता है, आइये कुछ उदाहरण देखते हैं।


    अपनी पुरबा-पछुआ हूँ।
    शाख़ से टूटा पत्ता हूँ।।
    अहक़र काशीपुरी

    अब बताओ ये गद्य है या पद्य? आवश्यकता पड़ने आर दौनों जुमलों के शुरू में 'मैं' जोड़ कर पढ़ सकते हैं।

    सितारों से उलझता जा रहा हूँ ।
    शबेफ़ुरकत बहुत घबरा रहा हूँ ।।
    फ़िराक़ गोरखपुरी

    दिलों पर नक्श होना चाहता हूँ।
    मुकम्मल मौत से घबरा रहा हूँ।।
    शारिक़ कैफ़ी

    कौन ये ले रहा है अँगड़ाई।
    आसमानों को नींद आती है।।
    फ़िराक़ गोरखपुरी
    [यहाँ दूसरी पंक्ति संदर्भित है]

    लंबे बालों वाले आ।
    जलती धूप में बैठा हूँ।।
    तुफ़ैल चतुर्वेदी

    [ग़ज़ल में माशूक़ को पुर्लिंग की तरह से संबोधित किया जाता रहा है]

    इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि जब पद्य और गद्य का अंतर समाप्त हो जाता है, तो किस क़दर आला महल बल्कि ताज़महल शक़्ल अख़्तियार करता है।
    पद्य जितना सरल-सहज और सरस होता है उतनी दूर तक जाने की कुव्वत रखता है। यहाँ टिप्पणियों को सिर्फ़ 'मत' स्वरूप में ही लेने की कृपा करें। एक व्यक्ति के मत से सभी सहमत हों, अनिवार्य नहीं। बस हमें अपनी बातें साहित्यिक भाषा में करनी है।

    अर्थ विस्फोट के उदाहरण के तौर पर कुछ और मिसरे भी आप लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ:-

    एक - दो - तीन - चार - पाँच नहीं।
    मेरी एक एक ख़ता मुआफ़ करो।।

    मैं तरसता ही तरसता ही तरसता ही रहा।
    तुम फलाने से फलाने से फलाने से मिले।।

    अपने मरकज़ की तरफ़ माइलेपरवाज़ का हुस्न।
    भूलता ही नहीं आलम तेरी अंगड़ाई का।।

    और ऐसा नहीं कि ये उदाहरण सिर्फ़ ग़ज़लों में ही हैं, यदि कोई जानकार ढूँढने बैठे तो ऐसे तमाम उदाहरण हिन्दी कविता / छंद /गीत वगैरह में भी भरे पड़े हैं।

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  23. नवीन भाई, सहमत हूँ कि गद्य जब बिना शब्दों के सामान्य क्रम को इधर उधर किए बगैर लिखा जाता है तो कयामत ढा देता है। उदाहरण देखिए।
    --------
    यूँ ही बेसबब न फिरा करो किसी शाम घर भी रहा करो।
    वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो॥
    ----------
    कभी भी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो।
    मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो॥
    -----------
    हम तो दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है।
    जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा॥
    ------------
    मुहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
    अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
    -------------
    घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
    बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
    ---------
    ये सारे शे’र बशीर बद्र के हैं। उनके शे’र इतने ज्यादा इसीलिए दुहराए जाते हैं कि उनमें बनावटी पद्यात्मकता नहीं है।

    मात्रा गिनने में किसी भी शब्द के पहले आए आधे अक्षर को नहीं गिना जाता। अगर आपको गिनवाना है तो स्कूल को इस्कूल लिखिए। अशुद्धता को नियम नहीं बनाया जा सकता। लय में रुकावट आ रही है तो वो उच्चारण का दोष है। ग़ज़लों में बशीर बद्र जैसे शायर ने भी ऐसा किया है स्कूल को इस्कूल लिखा है।

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  24. "अन्ना और अरविन्द" वाले दोहे में जो काव्य दोष है, वह है : 'क्रम-युग्म दोष'



    मैंने इस पर कुछ यूँ अभ्यास किया :



    अन्ना 'गांधी' हो गये, अरविन्द हुए 'नेताजी'।

    दोनों के हैं टार्गेट, मन्नू व माताजी।।



    * आज का पाठक दोहे में दिए गये उपमानों से उपमेयों का अनुमान सहजता से स्वयं लगा लेगा।

    और यहाँ 'नेताजी' शब्द से दो हेतु भी सध रहे हैं :

    — क्रान्ति के पक्षधर 'सुभाष' जी से तुलना करने का, और

    — वर्तमान में उनका 'राजनीति में आकर नेताजी बनना'।



    साधना जी के दोहे ऐसे हैं जैसे उनपर काफी श्रम किया गया है। इसलिए कुछ दोहे ऐसे हैं जो 'दोहे से पूर्व उपजी भाव भूमि को छोड़ते प्रतीत होते हैं।

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  25. शब्द मात्रा के सम्बन्ध में :


    मानक हिन्दी ब्यूरो जिन शब्दों के प्रचलित दोनों रूपों को मान्यता देता है, उनमें से कुछ हैं :


    ग्लास-गिलास, बर्तन-बरतन, दुबारा-दोबारा ... मतलब ये कि जिन शब्दों का उच्चारण दो-तीन रूप में काफी समय से प्रचलन में हैं वे भी विवाद में पड़कर पीछे हट गए हैं। क्या अंतर पड़ता है - कुछ नियमों में ढील लेने में?

    फिर भी भाषा की एकरूपता के लिए उनके किये-गए प्रयास काफी सराहनीय हैं। किन्तु कुछ नियमों में तो कतई ढील बर्दाश्त नहीं होती, यथा रुपये को रूपये या रुपए लिखना सरासर गलत ही माना जाएगा।


    ठीक वैसे ही 'स्पष्ट' को लिखने में 'इस्पष्ट' लिखना स्वीकार नहीं। हाँ, बोलने में 'इस्पष्ट' शब्द की नव-अभ्यासियों के लिए छूट है। :)

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  26. Edit :
    * मतलब ये कि जिन शब्दों का उच्चारण दो-तीन रूप में काफी समय से प्रचलन में हैं - हिन्दी मानक ब्यूरो � �े विद्वान् भी विवाद से बचने के लिए पीछे हट गए हैं।

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  27. प्रचलित नियमानुसार संयुक्ताक्षर से पहले का वर्ण गुरु माना जाता है.संयुक्ताक्षर के पहले गुरु होने पर वह गुरु ही रहता है.
    संयुक्ताक्षर से पहले लघु वर्ण पर जब बोलते समय कोई जोर नहीं पड़ता तब उसे लघु ही माना जाता है. जैसे कुम्हार में 'क'लघु ही माना जाता है.अन्य उदाहरण के अनुसार "मोहि उपदेश दीन्ह गुरु नीका" में 'मो' को लघु माना जाता है.

    स्पष्ट को शब्द के अनुसार गणना करने पर 3 मात्राएँ होती हैं. मेरे विचार में
    'इस्पष्ट' उच्चारण ही 'स्पष्ट' को स्पष्ट करता है.अत: इसमें 5 मात्राएँ ही उचित प्रतीत होती हैं.

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  28. अन्ना और अरविंद वाला दोहा जब मेरे पास आया तो मैंने इसे हर कोण से सुधारने की कोशिश की, बात यूँ की त्यूँ रखते हुये मैं इसे सुधारने का कोई मार्ग नहीं ढूँढ पाया। कुछ मार्ग मिला भी तो न सिर्फ़ दुरूह था बल्कि दोहकार की भावना का लोप भी हो रहा था।

    एक और बात - ऐसा ही एक दोष तुलसी कृत रामचरित मानस के सुंदरकाण्ड के एक दोहे में भी है

    सचिव, बैद, गुरु, तीन जों, प्रिय बोलहिं भय आस।
    राज - धर्म - तन तीन कर, होहि बेगि ही नास।।

    इस दोहे में ध्यान से देखिये

    सचिव - राज
    बैद - धर्म
    गुरु - तन

    शब्द क्रम दोष है। सचिव राज्य से जुड़ा होता है, वैद्य तन यानि शरीर से और गुरु ज्ञान या कि धर्म से जुड़ा होता है। परंतु तुलसीदास इस दोष को हटा नहीं पाये, और तब से अब तक हम सब इस के सही अर्थ को समझने में सक्षम भी हैं।

    बस, तुलसीदास के इसी दोहे को ध्यान में रख कर मैंने साधना दीदी के उक्त दोहे को आगे बढ़ाया।

    अनिल जनविजय जी ने हमें क्रम-दोष के बारे में चर्चा करने का अवसर प्रदान किया तो हमने उस अवसर का सदुपयोग करते हुये इस विषय पर विमर्श भी कर लिया। सुझाव के लिये निवेदन भी किया हुआ है, यदि इसी छंद में इसी बात को दोहकार के मन्तव्य को डिस्टर्ब किये बगैर नज़्म किया जा सके, तो कृपया आगे बढ़ कर सुझाव प्रस्तुत करें। हम सभी का मार्ग प्रशस्त होगा।

    बहरहाल, साधना दीदी को इन सुंदर, भाव-प्रवण और पुरअसर दोहों के लिये एक बार फिर से बधाइयाँ.......

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  29. बड़े ही शानदार और जानदार दोहे।

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  30. छंद लिखने में परिपक्व नहीं, सिर्फ एक कोशिश है आ० साधना जी के दोहे का मूल भाव रखते हुए दूसरे रूप में लिखने की-

    अन्ना जी 'गांधी' बने, अरविंदो 'भगतसिंह'
    बिगुल बज उठा युद्ध का, जगा अशोक का सिंह

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  31. इस आयोजन के माध्यम से काफी कुहासा छँट सा रहा है ! सभी विद्वद् जनों की आभारी हूँ जिन्होंने मेरे द्वारा रचे दोहे पढ़े, उनके मंतव्य को समझने का प्रयास किया व मुझे प्रोत्साहित करने के लिये सराहना के चंद शब्द भी कहे ! आप सभीका हृदय से धन्यवाद !

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  32. ऋता जी हम पॉण्डिचेरी वाले अरविंदो नहीं अन्ना टीम वाले अरविंद केजरीवाल की बात कर रहे हैं

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  33. बहुत ही शानदार दोहे. चलो अन्ना और अरविन्द दोहों में भी.

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  34. उम्मीद
    अन्ना 'गाँधी' बन गये,'भगतसिंह'अरविंद
    बिगुल बज उठा युद्ध का, जागेगा अब हिंद

    सुंदर सामयिक दोहे में इंवर्टेड कमाज़ अर्थ को स्पष्ट का रहे हैं. क्या इन्हीं भावों को ऐसे भी कहा जा सकता है ---

    भगत सिंह जैसे हुये,आक्रामक अरविंद
    अन्ना गाँधी बन गये,जागेगा अब हिंद |

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  35. अरे वाह अरुण जी आप तो ढूँढ लाये तिजोरी की चाबी, बहुत ख़ूब।

    दोहाकार के श्रम का सम्मान करने हेतु भी निवेदन करता हूँ :)

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  36. पहले तो छीने झपट, दूध - फूल - फल - साग
    अब रोटी भी ले उड़े, सर पर बैठे काग

    नकली कागा सर चढ़े,काज करें नित गुप्त
    ठेस लगी यह देख कर,असली कागा लुप्त |

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  37. --पिरिया ..अशुद्ध संभाषण है(वह भी जानबूझकर) ... , तुतलाना..हकलाना भी हो सकता है ...
    जबकि अस्नान स्नान का, पूर्व रूप है ...स्पष्ट ..सुस्पष्ट या इसप्रकार या इस्पष्ट का पश्च रूप है ..अतः तुलना समीचीन नहीं है...अतः अरुण जी ने सही कहा स्पष्ट में ५ मात्राएँ ही होनी चाहिए ..
    -----इसी प्रकार सभी अपनी-अपनी भांति काव्य रचना कर सकते हैं--परन्तु कवि की मूल रचना का विस्थापन नहीं किया जा सकता.... समझने का एक और नियम है जो मीमांसा में वर्णित है अनुमान-प्रमाण ( अनुभव-अनुमान )---किसी भी हालत में भगत सिंह ..अरविंद नहीं बन सकते अतः अरविन्द ही भगत सिंह बन सकते हैं | यही काव्य व गद्य में अंतर है ...

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  38. लय में रुकावट आ रही है तो वो उच्चारण का दोष है।

    ---इसका क्या अर्थ?-- उच्चारण तो लिखे शब्द/ वाक्य का ही होता है ..यदि लिखित शव्द/वाक्य अशुद्ध होगा तभी उच्चारण अशुद्ध होगा, जब तक कि उच्चारक हकलाता/ तुतलाता नहीं होगा या अन्य भाषा-भाषी ...यह लिपिवद्धता हेतु स्वर-लोप/ विसर्ग-लोप की बात है जो संस्कृत व अंग्रेज़ी में काफी देखा जाता है ..
    ---- पद्य-गद्य विमर्श में सभी उदहारण स्पष्ट पद्यों के दिए गए हैं..
    ---गद्य जब पद्यात्मक ...तो मानी हुई बात है ही..
    ----पद्य जब गद्यात्मक हो जाता है, तो वो सर चढ़ कर बोलता है...
    ---अर्थात स्पष्ट, शीघ्र सभी जन में तीब्र भाव-सम्प्रेषण हेतु अतुकांत कविता का जन्म हुआ जैसा निराला ने कहा...उससे और आगे दोहे/ शेर की भांति तीब्रता हेतु अगीत कविता का...

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  39. गल्ती से अरविंदो हो गया था, मैंने भी अरविंद केजरीवाल ही समझा था.अरुण सर ने बहुत सुंदर दोहा लिखा|

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  40. अपनी पुरबा-पछुआ हूँ।
    शाख़ से टूटा पत्ता हूँ।। ---यह स्पष्टतः ही पद्य है जो अभिधात्मक कथन है और अर्थ काफी दूरस्थ एवं फैलाव का भाव....

    --यदि गद्य में कहन होगी तो ऐसे होगी..
    " मैं तो स्वयं अपनी ही पुरवा और पछुआ हूँ और किसी शाख से टूटा हुआ एक पत्ता हूँ ( तो क्या हुआ)|"

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  41. अमिय पियावै मान बिनु, रहिमन मोहि न सुहाय

    उच्चारण काल के अनुसार 'मोहि' में मात्राओं की गणना दो की गई है.

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  42. विरोधाभास
    बेल विदेशी मूल की, ज्यों-ज्यों बढ़ती जाय
    जड़ें छोड़ निज पेड़ सब, उस पर लटकें धाय

    वाह !!!
    दृश्य विरोधाभास का , खींचा बड़ा सटीक
    सहज भाव से कह गये, बात बड़ी बारीक |

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  43. साधना जी के सभी दोहे बहुत अच्छे लगे हैं अरुण जी ने जो दोहे की समस्या का हल निकाला है काबिले तारीफ है साधना जी को हार्दिक बधाई

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  44. Virendra Kumar SharmaOctober 21, 2012 7:31 AM
    छा गए भाव अभिव्यंजना और रागात्मक अभिव्यक्ति में अरुण भाई निगम

    ठेस
    दर्शकदीर्घा में खड़े, वृद्ध पिता अरु मात
    बेटा मंचासीन हो , बाँट रहा सौगात

    वक्रोक्ति / विरोधाभास
    बाँटे से बढ़ता गया ,प्रेम विलक्षण तत्व |
    दुख बाँटे से घट गया,रहा शेष अपनत्व ||

    हास्य-व्यंग्य
    छेड़ा था इस दौर में , प्रेम भरा मधु राग
    कोयलिया दण्डित हुई , निर्णायक हैं काग

    विलक्षण व्यंग्य आज की खान्ग्रेस पर हम तो कहते ही काग रेस हैं जहां काग भगोड़ा प्रधान है .

    सौंदर्य
    कुंतल कुण्डल छू रहे , गोरे - गोरे गाल
    लज्जा खंजन नैन में,सींचे अरुण गुलाल

    कान्हा(काना ) ने कुंडल ल्यावो रंग रसिया ,

    म्हार हसली रत्न जड़ावो सा ओ बालमा .

    नायिका का तो नख शिख वर्रण और श्रृंगार ही होगा ......


    "--- श्रीमती जी हिन्दी में एम् ए हैं -हाँ सामान्य घरेलू महिला हैं---यूँही उनकी नज़र एक दोहे पर पडी ..अनायास ही बोल पड़ीं ..
    " हैं! ये क्या दोहा है...-- कुंतल तो कुंडल छूएंगे ही यह क्या बात हुई |"ख़ुशी की बात हैं हम तो कहतें हैं डी .लिट होवें भाभी श्री .पर डिग्री का साहित्य से क्या सम्बन्ध हैं

    ?पारखी दृष्टि से क्या सम्बन्ध है है तो कोई बताये और प्रत्येक सम्बन्ध सौ रुपया पावे .

    सौन्दर्य देखने वाले की निगाह में है ,और महिलायें कब खुलकर दूसरी की तारीफ़ करतीं हैं वह तो कहतीं हैं साड़ी बहत स्मार्ट लग रही है यह कभी नहीं

    कहेंगी यह साड़ी आप पर बहुत फब रहीं हैं साड़ी को भी आप अपना सौन्दर्य प्रदान कर रहीं हैं मोहतरमा ..तो साहब घुंघराले बाल ,गोर गाल ,लातों में

    उलझा मेरा लाल -

    घुंघराले बाल ,

    गोर गाल ,

    गोरी कर गई कमाल ,

    गली मचा धमाल ,

    मुफ्त में लुटा ज़माल .


    दोहे भाव जगत की रचना है जहां कम शब्दों में पूरी बात कहनी होती है एक बिम्ब एक चित्र बनता है ,ओपरेशन टेबिल पर लिटा कर स्केल्पल चलाने की

    चीज़ नहीं हैं .

    पढ़ो ! अरुण जी के दोहे और भाव गंगा, शब्द गंगा में डुबकी लगाओ .
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  45. लिखा आपने तदानुभूति हमें भी हुई .जन मन का आवेग अभिव्यक्त हुआ है इन दोहों में .हमारे वक्त का परिवेश समेटें हैं ये दोहे .

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  46. इस दोहे को ऐसा कर दें तो। थोड़ा अर्थांतर हो जाएगा पर.......

    'गाँधी' अन्ना बन गये, 'भगतसिंह' अरविंद
    बिगुल बज उठा युद्ध का, जागेगा फिर हिंद
    ----------------------------
    चर्चा जारी रहे। जो मैंने कहा वो सब गलत भी हो सकता है। जरूरी नहीं कि जो मैं जानता हूँ वही नियम हो या वही सच हो। चर्चा चलती रहेगी तो नई नई बातें निकल कर आती रहेंगी।

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  47. चर्चा में विलम्ब से आने का खेद है।



    धर्मेन्द्र जी ने तो सब किये कराये पर पानी फेर दिया ... इतनी मेहनत करके 'गांधी-भगतसिंह' के पर्वत पर चढ़ाई कर रहे थे ... लेकिन धर्मेन्द्र जी ने उस पत्थर को ही पीछे लगाकर मार्ग प्रशस्त किया जो परेशान किये था।

    सच है ... कई बार समाधान पास में होकर भी नहीं दिखायी देता।



    अरुण कुमार निगम जी का तो कहना ही क्या ... वे बात को छंद में बाँधकर कहने में दक्ष हैं ... 'दोहे' के विषय में उनकी ही राय को अंतिम मानना चाहिए ... ऐसा मेरा विचार है।


    आ . नवीन जी बहुत सुन्दर संयोजन कर रहे हैं। साथ ही चर्चा की गर्माहट के लिए गुणों और दोषों पर पक्षपात रहित जानकारी भी दे रहे हैं। वाह .... अद्भुत है साहित्यिक आनंद!!!

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  48. साधना दीदी !! सभी दोहो मोहित कर रहे हैं लेकिन सारस सियार ने समाँ बाँध दिया !! यह मेरे देखे एक ऐसा ब्लाग है जिसमें ब्लागर नवीन भाई की भूमिका मुझे एक सिद्धहस्त कंवीनर की लगती है !! इतनी मेहनत वो कैसे करते हैं !! उपलब्धि यह है कि हमें एक सम्पूर्ण साहित्यकार मिल गया है नवीन भाई के रूप में एक मुकम्मल गज़लकार , एक माहिर गीतकार दोहाकार और इन सबसे ऊपर एक सम्पादक भी -- नवीन भाई इन ठाले बैठे की कीमती पोस्टो6 को पुस्तक के रूप में छपवाने का क्या विचार है ?!! यदि नही है तो इस विचार को गति देजिये -- मैं आपके साथ हूँ --मयंक

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  49. -'कुमार' और 'कुम्हार' के में मात्रा-निर्धारण उच्चारण पर आधारित है। दोनों शब्दों को बोलें 'कु' तथा तथा 'र' के उच्चारण स्वतंत्र हैं। 'मा' की तरह 'म्हा' का उच्चारण हो रहा है। कु+म्हा+र = 1+2+1 = 4, कुम+हा+र नहीं बोला जाता।

    दो शब्द देखें नन्हा और कन्हैया- नन्हा = 'न+न' का उच्चारण एक साथ है तथा 'हा' का अलग मात्राएँ 2 + 2 = 4, कन्हैया में क+न का उच्चारण एक साथ नहीं है, क+न्है+या = +2+2 = 5।

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  50. सौन्दर्य
    जिस की महफ़िल में सदा, कुदरत करती रक्स
    बादल, झरना, चाँदनी, सब में उस का अक्स

    प्रकृति के सौंदर्य संग,उस महफिल की बात
    सफल हो गई साधना , झरे पुष्प परिजात |

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  51. अति सुंदर दोहोँ के प्रस्तुति के लिए साधना जी आपको हार्दिक बधाई, आपके हर दोहों के उत्कृष्ट भाव मन को छू गये. इस सन्दर्भ में विद्वतजनों का विचार-विमर्श भी निश्चित ही फ़ायदेमंद साबित हुआ है . अंत में, माँ भारती की असीम कृपा आप पर बनी रहे. इसी सुभकामना के साथ,सरस और पठनीय काव्य के लिए मंच उपलब्ध कराने हेतु नवीन जी आपको भी ढेरो हार्दिक बधाई।

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  52. Sanjiv verma 'Salil'Thu Oct 25, 12:45:00 pm 2012

    ‘कष्ट‘ में 3 मात्राएं हैं। ‘स्पष्ट‘ में एक अर्धाक्षर अधिक है अतः इसकी मात्राएं 4 होनी चाहिए, 5 नहीं। बोलते समय अशुद्ध उच्चारण ‘इस्पष्ट‘ या ‘इसपष्ट‘ बोलने से 5 मात्राएं हो जाएंगी।

    इस सन्दर्भ में अपनी ओर से कुछ न कहकर कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

    1. थोडा वाद विवाद नहीं हो / नमक बिना ज्यों स्वाद नहीं हो / थोडा भ्रम उन्माद नहीं हो / जिसमें कुछ अवसाद नहीं हो
    -हर एक में 16 मात्राएँ . स्वाद = 2 + 1. इस्वाद = 2 + 2 + 1 = 5 लेने से 18 मात्राएँ।

    2. अक्षत चन्दन कौन करेगा / युग का स्यन्दन कौन करेगा / सोना कुंदन कौन करेगा
    -हर एक में 16 मात्राएँ . स्यन्दन = 2 + 1+ 1 = 4. इस्यन्दन = 2 + 2 + 2 = 6 लेने से 18 मात्राएँ।

    3. भौतिकता की स्पर्धाओं में / स्थाई भाव अभाव हो गया / यों अवसन्न बुझा सा रहना / तेरा सहज स्वभाव हो गया
    -हर एक में 16 मात्राएँ . स्थाई = 2 + 2 = 4. इस्थाई = 2 + 2 + 2 = 6 लेने से 18 मात्राएँ। स्वभाव = 1 + 2 + 1 = 4, इस्वभाव = 2 + 1 + 2 + 1 = 6 लेने से 18 मात्राएँ।

    4. आखिर कहो स्वयं को, कब तक निराश करते / दो चार जुगनुओं से, कितना प्रकाश करते
    हर पद = 12 . स्वयं = 2 + 1 = 3, इस्वयं = 2 + 1 + 2 = 5 लेने से 14 मात्राएँ।

    5. हम वे वाद-विवाद हो गए / मुंह के कडवे स्वाद हो गए
    हर पद = 16 . स्वाद = 2 + 1 = 3, इस्वाद = 2 + 2 + 1 = 5 लेने से 18मात्राएँ।

    6. वातावरण हुआ है / शुभ शकुन-क्षण हुआ है / मन में स्फुरण हुआ है / पहला चरण हुआ है
    हर पद = 12 . स्फुरण = 1 + 1 + 1 = 3, इस्फुरण = 2 + 1 + 1 + 1 = 5 लेने से 14मात्राएँ।

    7. स्पष्ट कह रहा हूँ / घात सह रहा हूँ / आस तह रहा हूँ / हास गह रहा हूँ
    हर पद = 10 . स्पष्ट = 2 + 1 = 3, इस्पष्ट = 2 + 2 + 1 = 5 लेने से 12मात्राएँ।

    सुधिजन स्वयं देखकर सही-गलत का निर्णय कर लें।

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