26 अक्तूबर 2012

व्यड़्ग्य - ढाई मन सब्जी में एक जोड़ा लोंग - नवीन सी. चतुर्वेदी

Disclaimer : इस काल्पनिक व्यड़्ग्यात्मक संस्मरण का किसी से भी  किसी भी तरह का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है 

आज के आधुनिक भारत की प्रौढ़ होती पीढ़ी अपने अन्तर्मन में प्राचीन भारत के बहुत सारे मीठे-चुलबुले संस्मरण सँजोये हुये है। ऐसा ही कुछ आज अचानक याद आ गया है। प्राचीन भारत में buffet system से पहले ज़मीन पर पत्तल डाल कर जिमाने का रिवाज़ हुआ करता था। खाना बनाने का काम भी किसी केटरर को ठेके पर न दे कर घर-परिवार-समाज के कुछ वरिष्ठ-स्पेश्यलिस्ट लोगों के हाथों में रहता था। हलवाई को बुलवा कर उससे बाक़ायदा अपने निर्देशन में अधिकतर पूड़ी-कचौड़ी तथा कुछ मिठाई नमकीन वग़ैरह बनावाई जाती थीं। परन्तु कुछ स्पेशल मिठाई और ख़ास कर पतली सब्जी [जिसे कुछ हलक़ों में आलू का झोल भी कहा जाता है] घर-परिवार-समाज के उक्त स्पेश्यलिस्ट के ज़िम्मे ही रहता था। काफ़ी सारे लोग आलू छिलवाने जैसे कामों में भी जुटे रहते थे।

हमारे बगीची-मुहल्लों में ऐसे कार्यक्रम अमूमन होते ही रहते थे। हम भी अपने बाप-काका के साथ हाथ बँटाने जाया करते थे। उन दिनों ही एक विशेष व्यक्तित्व से साक्षात्कार हुआ था। क़द ऊँट के आधे से अधिक परन्तु पौने से पक्का कम, गर्दन कमर से तक़रीबन साढ़े तीन चार इंच आगे, कंधे तराजू को हराने पर आमादा, बाजुएँ पानीपत के गर्व को ढ़ोती हुईं और वाणी ने तो जैसे सदियों का अनुभव संसार को देने का टेण्डर अपने नाम करवा रखा हो। हर बात की जानकारी, उन से अधिक हुशियार कोई भी नहीं। आप श्री तो आप श्री ही थे।

पड़ौस में शादी थी। दोपहर का खाना खा कर हम आलू छिलवाने के लिए पहुँचे। हलवाई पूड़ियाँ तल रहा था। बेलनहारियाँ लोकगीत की धुनों को गुनगुनाते हुये पूड़ियाँ बेल रही थीं। आप श्री एक बेलनहारी के पीछे कुछ देर तक खड़े-खड़े उस के आगे पड़े चकले पर बिलती पूड़ियों को निहारते रहे, जैसे कि अंकेक्षण [Audit] कर रहे हों। तपाक से बोल पड़े 

"ये क्या छोटी-छोटी पूड़ियाँ बेल रही हो? ज़रा बड़ी-बड़ी बेलो, पत्तल पर पूड़ी रखें तो पत्तल भरी हुई दिखनी चाहिये"। 

बेलनहारी ने धुन को अर्ध-विराम देते हुये स्वीकारोक्ति में गर्दन हिलाई और पूड़ी को बड़ा आकार देने लगी। क़रीब पाँच मिनट बाद आप श्री दूसरी बेलनहारी की ऑडिट करने लगे - बोले - 

 "ये क्या हपाड़ा-हपाड़ा पूड़ियाँ बेल रही हो, पूरी पत्तल पर पूड़ियाँ ही रखनी हैं क्या, ज़रा छोटी-छोटी बेलो"। 

क्या करती बेचारी - गर्दन हिला दी, मगर वो पहली वाली सोचने लगी कि अब उसे बड़ी पूड़ियाँ बेलनी हैं या छोटी!!!!!!!!

आप श्री ने तमाकू रगड़ा, फटका लगाया, दो-तीन बार पिच्च किया और अब की मर्तबा हलवाई के कढ़ाव के पास जा कर अंकेक्षण करने लगे। खस्ता कचौड़ियाँ बड़ी ही धीमी-धीमी आँच में सिकती हैं तब जा कर भुरभुरी बनती हैं। हलवाई कचौड़ियों को तल रहा था और बेलनहारियों से हास-परिहास भी कर रहा था। आप श्री को न जाने क्या सूझा - बड़े ही गौर से पूरे कढ़ाव के बीचोंबीच से एक कचौड़ी को ढूँढ कर उसे दिखाते हुये बोले 

"क्यों बे! बातें ही करेगा या खस्ता ढ़ंग से सेकेगा? देख वो कचौड़ी अब तक कच्ची है"। 

कॉलगेट स्माइल को प्रोमोट करते हलवाई के होंठ और दाँत तुरंत ही अधोगति को प्राप्त हुये। "जी बाबूजी अबई करूँ"। आप श्री की बॉडी लेंगवेज़ ओलिम्पिक विजेता का अनुसरण करने लगी।

अंकेक्षण दौरा अब बढ़ा सब्जी [आलू-झोल] के कढ़ाव की तरफ़। पुराने ब्याह-शादियों में पतली सब्जी का ख़ासा महत्व हुआ करता था। हमारे मुहल्ले के सब्जी विशेषज्ञ सब्जी बना रहे थे। आप श्री ने तख़्त [भट्टी के पास तख़्त रख कर उस पर सब्जी बनाने वाला बैठता था] और भट्टी की कुछ परिक्रमाएँ लगाईं, कढ़ाव का विधिवत चार-पाँच बार अवलोकन किया, सब्जी विशेषज्ञ का चेहरा भी हर बार देखते हुये। वो बेचारा सोच रहा था अब उस से क्या कहा जाएगा! थोड़ी देर बाद बोले - 

"कितनी सब्जी बनानी है?" 

उस ने कहा - ढाई मन [100 kg]। 

इस के बाद कितने आलू लिए? कितना पानी डाला? कौन-कौन से और कितने-कितने मसाले डाले? पूछने के बाद ये भी पूछा कि कौन सा मसाला किस मसाले के डालने के बाद डाला और किस तरह डाला। हर बात का संतोषजनक उत्तर मिला। हुंह। पर आप श्री को तसल्ली न हुई। सीधे भण्डार [जहाँ खाना बन रहा होता था वहीं एक जगह सुनिश्चित की जाती थी जहाँ खाने संबन्धित सभी कच्ची सामग्रियाँ रखी जाती थीं] में गए और वहाँ से हाथ में कुछ उठा कर ले आए। फिर खल-मूसल ढूँढा। फिर उस खल मूसल में एक जोड़ा लोंग [दो लोंग] डाल कर कूटीं और उन का बुक्का ढाई मन सब्जी वाले कढ़ाव में डाल दिया !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

सब के सब अवाक,,,,,,,,,,,,,,,,पर क्या कहें।

शादी हो गई, सभी ने सब्जी की तारीफ़ भी की। कुछ दिन बाद हम लोग गली के नुक्कड़ पर बैठे थे, साथ में गली के बड़े-बुजुर्ग भी बैठे थे। हम कुछ लड़कों को आप श्री के इस तरह के क्रिया-कलापों से बड़ी कोफ़्त हुआ करती थी। उस दिन हमने एक बुजुर्ग से "ढाई मन सब्जी में एक जोड़ा लोंग" वाले वाक़ये को छेड़ते हुये पूछा कि आप श्री ऐसा क्यों करते हैं?

बुजुर्ग ने बड़ी ही शांति से उत्तर दिया बेटे ये मेन्यूफ़ेक्चरिंग डिफ़ेक्ट का मामला है, इगनोर करो।
ाात

18 टिप्‍पणियां:

  1. दोने-पत्तलों पर ,पंगत में बैठ कर जीमने की बात ही और होती थी .अब के लोग कैसे समझेंगे !

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  2. और उन दोने पत्तल में जो खाना परोसा जाता था

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  3. बैठाकर खिलाने में जो आनन्द आता है, वह और किसी भी विधि में नहीं आता है।

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  4. पूछ- पूछ कर खिलाने का आनन्द ही कुछ और था..
    एक जोड़ी लौंग से ही ढाई मन सब्जी स्वादिष्ट बनी...ऐसा आपश्री ने कहा होगा... अच्छे कामों की सारी क्रेडिट खुद ले लेने वाले आपश्री आसपास मिल ही जातै हैं|

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  5. sahee--- paalathi mar kar khane aur khilane men jo Anand aata tha vo ab ' kookar-bhoj' men kahaan

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  6. बहुत खूब,,,,जो मजा बैठकर खाने में आता है वो खाने का आनंद दूसरे विधि में नही मिलता,,,,,

    RECENT POST...: विजयादशमी,,,

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  7. बड़ा ही सुन्दर संस्मरण लिख भेजा आपने नवीन जी ! अब ऐसी दावतें सामाजिक समारोहों से विलुप्त होती जा रही हैं ! बैठा कर जिमाने की व्यवस्था में मेजबान और मेहमान दोनों ही परम प्रसन्न होते हैं ! आमंत्रित अतिथियों की भोज के समय जैसी व्यक्तिगत आवभगत होती है वह आज के प्रचलित बफे सिस्टम में कहाँ संभव हो सकती है ! स्वयं कुछ लेकर खा लिया तो ठीक और भीड़ भाड़ के मारे ना खा पाए तो किसे परवाह है ! मेजबान तो द्वार पर लोगों के स्वागत करने के लिये ही बुक रहता है खाने पीने की व्यवस्था देखने के लिये हर स्टॉल पर सपाट चहरे वाले केटरर के कर्मचारी तैनात रहते हैं ! उनके स्टॉल पर जितने कम लोग आयें उतना ही अच्छा ! मेहनत बची ! खैर ! बहुत आनंद आया इस संस्मरण को पढ़ कर ! सुन्दर आलेख के लिये आपको बधाई !

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  8. ‘आप श्री‘ का मजेदार व्यक्ति चित्र उकेरा है आपने।
    हास्य-व्यंग्य का पुट इस संस्मरण को आदि से अंत तक बिना ब्रेक पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
    मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट ने हंसने को मजबूर किया।

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  9. सादर अभिवादन!
    --
    बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  10. .


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    आदरणीय नवीन चतुर्वेदी जी
    परम स्नेही नवीन चतुर्वेदी जी
    सस्नेहाभिवादन !

    *जन्मदिन की हार्दिक बधाई !*
    **हार्दिक शुभकामनाएं !**
    ***मंगलकामनाएं !***


    राजेन्द्र स्वर्णकार
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  11. जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ सर!
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    कल 28/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  12. **जन्मदिन की हार्दिक बधाई !**
    **हार्दिक शुभकामनाएं !**
    **मंगलकामनाएं !**

    **बुजुर्ग ने बड़ी ही शांति से उत्तर दिया बेटे ये मेन्यूफ़ेक्चरिंग डिफ़ेक्ट का मामला है, इगनोर करो।**
    लाजबाब अभिव्यक्ति है !!

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  13. ज़मीन पर पत्तल डाल कर जिमाने का रिवाज़ हुआ करता था।....kitna achcha lagta tha vo khana.....

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  14. सही कहा साधना जी --- इसे .कूकर भोज। कहा जाता है ....

    --- जन्म दिन की बधाई नवीन जी

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  15. बहुत कमाल के रहे आप श्री ! अपने समाज में इनकी कमी नहीं ! ऐसी दावत और आलू के साग को बहुत मिस करता हूँ. बचपन में हम सब दोस्त भाई बंधू मिलकर समाज भोज ( गाँव) में जीमने जरूर जाते थे.
    मेरा लक्ष्य सिर्फ आलू की सब्जी सूतना ही था | ऐसे ही पीना | सारे सूर खुल जाते थे |

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  16. नवीन जी!
    सरस संस्मरण पढ़वाने हेतु आभार।

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