14 February 2012

अगर हम भी मगज़ को द्वेष का दफ़्तर बना लेते - नवीन

नया काम


अगर हम भी मगज़ को द्वेष का दफ़्तर बना लेते
यक़ीनन एक दिन ख़ुद को अजायबघर बना लेते


हमें अपने इलाक़ों से मुहब्बत हो नहीं पायी
वगरना ज़िन्दगी को और भी बेहतर बना लेते

समय से लड़ रहे थे और लमहे कर दिये बरबाद
हमें करना ये था लमहात का लश्कर बना लेते

किसी सहरा में कोई भी बशर प्यासा नहीं रहता
अगर हम ख़्वाहिशों को प्यार का सागर बना लेते

बिना प्रेक्टिस 'नवीन' अशआर कह पाना तो मुश्किल था
भले ही छप-छपा कर ख़ुद को हम शायर बना लेते







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हम इस दिल को अगर ज़ज़्बात का दफ़्तर बना लेते।
मुनाफ़ा छोड़िये जी, खुद को भी पत्थर बना लेते।१।

हवा के साथ पत्ता दूर तक जाता नहीं अक्सर ।
तो फिर वो हमको अपना हमसफ़र क्यूँ कर बना लेते।२।

न यूँ मज़बूर होते शह्र में घुट घुट के मरने को।
जो अपने गाँव या कस्बे में भी इक घर बना लेते।३।

अगर ये फीस दे कर सीखने वाला हुनर होता।
कई शहज़ादे अपने आप को शायर बना लेते ।४।

दिलों में फ़स्ल उगा लेते अगर रोशनख़याली की।
तो मुस्तक़बिल वतन का और भी बेहतर बना लेते ||

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे हजज मुसम्मन सालिम
मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

5 comments:

  1. अगर ये फीस दे कर सीखने वाला हुनर होता।
    कई शहज़ादे अपने आप को शायर बना लेते

    ab shabd nahi bache sirji badaai karne k liye.. :D

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  2. बहुत गहरा सोच |
    आशा

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  3. वाह वाह वाह !! क्या बात है ---
    तुम्हारी गुगलियों पर बोल्ड हो जाना सुहाता है
    बताओ किसलिये हम खुद को तेन्दुलकर बना लेते --मयंक

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  4. न यूँ मज़बूर होते शह्र में घुट घुट के मरने को।
    जो अपने गाँव या कस्बे में भी इक घर बना लेते....वाह !

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