24 जनवरी 2012

किस तरह कह दें कि माली थक गया है साहिबान - नवीन

किस तरह कह दें कि माली थक गया है साहिबान। 
हमको अन्देशा खिज़ां का हो रहा है साहिबान।।

पेड़-पौधेफूल-पत्तेगुंचा-ओ-बुलबुल उदास। 
ग़मज़दा हैं सब - चमन सबका लुटा है साहिबान।।

फिर न दीवारें उठेंफिर से न टूटे दिल कोई। 
कुछ बरस पहले ही अपना घर बँटा है साहिबान।।

खुल गये पन्ने तो सारा भेद ही खुल जायेगा। 
अब समझ आया कि सेंसर क्यों लगा है साहिबान।।

ग़म भुलाने के बहाने कुछ न कुछ पीते हैं सब। 
हमने भी साहित्य का अमृत पिया है साहिबान।। 


:- नवीन सी. चतुर्वेदी


बहरे रमल मुसमन महजूफ
फाएलातुन फाएलातुन फाएलातुन फाएलुन

2122 2122 2122 212

15 टिप्‍पणियां:

  1. ग़म भुलाने के बहाने कुछ न कुछ पीते हैं सब
    हमने तो साहित्य का अमृत पिया है साहिबान

    बहुत बढ़िया...साहित्य अमृत तुल्य है.

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  2. साहितय से अच्छा अमृत और कौन सा होगा। इसका नशा ही अलग है। बधाई।

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. साहित्य का अमृत चख लिया फिर क्या बचा है ..खूबसूरत गज़ल

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  5. खुल गये पन्ने तो सारा भेद ही खुल जायेगा
    अब समझ आया कि सेंसर क्यों लगा है साहिबान

    बहुत खूब सर!

    सादर

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  6. खुल गये पन्ने तो सारा भेद ही खुल जायेगा
    अब समझ आया कि सेंसर क्यों लगा है साहिबान ..

    सच बात कहने का निराला अंदाज़ है नवीन जी ... बहुत खूब ... लाजवाब शेर हैं सभी ..

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  7. //खुल गये पन्ने तो सारा भेद ही खुल जायेगा
    अब समझ आया कि सेंसर क्यों लगा है साहिबान

    //फिर न दीवारें उठें, फिर से न टूटे दिल कोई
    कुछ बरस पहले ही अपना घर बँटा है साहिबान

    lajaawaab.. behtareen ghazal.. mazaa aa gaya padhke sir.. :)

    kabhi waqt mile to mere blog par bhi aaiyega.. ummeed karta hun apko pasand aayega..

    palchhin-aditya.blogspot.in

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  8. आपकी सुन्दर अभिव्यक्ति पढकर मन प्रसन्न
    हो गया है नवीन भाई.

    अनुपम लेखन के लिए आभार.
    मेरे ब्लॉग पर आईएगा.
    'हनुमान लीला भाग-३' पर आपके सुविचार आमंत्रित हैं.

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  9. ग़म भुलाने के बहाने कुछ न कुछ पीते हैं सब
    हमने तो साहित्य का अमृत पिया है साहिबान.

    साहित्य का रसास्वादन अमृत से कम नहीं. धन्यबाद इस सुंदर गज़ल का स्वाद चखाने के लिये. बधाई.

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