20 April 2011

तीसरी समस्या पूर्ति - कुण्डलिया - चौथी किश्त

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

दरअसल, पिछले कुछ दिनों से अपनी पहली पहली किताब को ले कर उलझा हुआ था| कई सारे छोटे छोटे काम पेंडिंग थे| अब कुछ राहत की साँस लेने के क्षण आए तो हाजिरी लगाने आ गया आप के दरबार में| योजना के मुताबिक इस ई बुक की मुँह दिखाई इस सप्ताह के अंत तक हो जानी चाहिए|

भारतीय छन्द साहित्य की सेवा स्वरूप शुरू किए गए इस आयोजन की तीसरी समस्या पूर्ति की चौथी किश्त हाजिर है आप सभी के सामने| इस बार हम पढ़ते हैं अंतर्जाल पर हिन्दी साहित्य के लिए पूर्ण रूप से समर्पित आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी को| आचार्य जी की आज्ञा के मुताबिक उनकी रचनाएँ [संदेश सहित] तद्स्वरूप प्रकाशित की जा रही हैं|






छंद पहचानिए:
इस छंद की कुछ रचनाएँ आप पूर्व में भी पढ़ चुके हैं. इसे पहचानिए.

भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल.
फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल..
तज भेदों के, शूल अनवरत, रहें सृजनरत.
मिलें अंगुलिका, बनें मुष्टिका, दुश्मन गारत..
तरसें लेनें. जन्म देवता, विमल विनयरत.
'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत..
*
कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान.
इसका लोहा मानते, कोटि-कोटि विद्वान..
कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर.
तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर..
जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर.
'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर..
*
सुंदरियाँ घातक; सलिल' पल में लें दिल जीत.
घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत.
जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर.
बिछुड़ें तो अवढरदानी भी हों प्रलयंकर.
असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ.
नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ..

आप सभी आनद लें आचार्य जी के छंदों का और मुझे आशीर्वाद सहित आज्ञा दें ई बुक के बाकी काम काज निपटाने के लिए| जय माँ शारदे|

18 comments:

  1. सुन्दर और प्रभावशाली कुण्डलियाँ !

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  2. तज भेदों के, शूल अनवरत, रहें सृजनरत.
    मिलें अंगुलिका, बनें मुष्टिका, दुश्मन गारत..
    Aapko Naman hai Acharya!!!

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  3. आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी की रचनाएँ तो वाकई प्रभावशाली और श्रेष्ठ है।

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  4. काव्य के समस्त गुणों से सुसज्जित ये कुंडलियां श्रेष्ठ हैं। आदरणीय सलिल जी को बधाई।

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  5. बेहतरीन कुण्डलियाँ ! तीनों एक से बढ़ के एक हैं ! बधाई स्वीकार करें !

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  6. सुंदर कुण्डलियाँ बड़ी सामयिक विषयों पर

    "नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ.."

    सलिल जी को ओर आपको बहुत धन्यबाद.

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  7. आचार्य जी को सुंदर कुंडलियों के लिए बहुत बहुत बधाई।

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  8. बहुत गहरे भाव लिए प्रासंगिक कुंडलियाँ ...... आपका आभार सलिल जी का उत्कृष्ट लेखन को साझा करने के लिए....

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  9. अचार्य जी की कुन्डलियाँ क्या हर विधा ही लाजवाब होती है। धन्यवाद।

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  10. शेखर चतुर्वेदीThu Apr 21, 10:36:00 am 2011

    आचार्य जी !! आपको पढ़ के बहुत आनंद की प्राप्ति होती है ! एक से बढ़कर एक ! वाह! आपको नमन है !

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  11. अग्रज आचार्य श्री सलिल जी की इच्छा थी कि आप लोग इन छंदों को पहिचानते और इन में अंतर्निहित ग़लतियों के बारे में भी के बारे में भी बात करते|

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  12. Aachaary ji ke likhe mein galtiyaan ... bhool kar bhi koi nahi nikaal sakta Naveen ji .. bas sab aanand le sakte ahin ..

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  13. कुण्डलियाँ अच्छी हैं.

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  14. Mobile se com de raha hun, isliye roman men hai.

    Kai sare chhand sudhar ki bat joh rahe hain.

    Kaka hatharasi pranit vidha ka chhand is aayojan ki ghoshna ke anurup nahin hai.

    Isliye agli post men sabse pahle main meri pahle ki likhi hui kaka type rachanaon ko lete hue unhen kyun aur kaise sudhara gaya, aisa ek udaharan dena chahunga.

    Asha karta hun us ke bad pending chhandon men sudhar ka rasta khul sakega.

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  15. भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल।
    फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल।।
    तज भेदों के, शूल / अनवरत, रहें सृजनरत।
    मिलें अँगुलिका, बनें / मुष्टिका, दुश्मन गारत।।
    तरसें लेनें. जन्म / देवता, विमल विनयरत।
    'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत।।
    (यहाँ अंतिम पंक्ति में ११ -१३ का विभाजन 'नित' ले मध्य में है अर्थात 'सलिल' पखारे पग नि/त पूजे, माता भारत में यति एक शब्द के मध्य में है यह एक काव्य दोष है और इसे नहीं होना चाहिए। 'सलिल' पखारे चरण करने पर यति और शब्द एक स्थान पर होते हैं, अंतिम चरण 'पूज नित माता भारत' करने से दोष का परिमार्जन होता है।)

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  16. कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान।
    इसका लोहा मानते, कोटि-कोटि विद्वान।।
    कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर।
    तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर।।
    जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर।
    'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर।।
    ('सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर' यहाँ 'बेहतर' पढ़ने पर अंतिम पंक्ति में २४ के स्थान पर २५ मात्राएँ हो रही हैं। उर्दूवाले 'बेहतर' या 'बिहतर' पढ़कर यह दोष दूर हुआ मानते हैं किन्तु हिंदी में इसकी अनुमति नहीं है। यहाँ एक दोष और है, ११ वीं-१२ वीं मात्रा है 'बे' है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता। 'सलिल' न बेहतर मानव से' करने पर अक्षर-विभाजन से बच सकते हैं पर 'मानव' को 'मा' और 'नव' में तोड़ना होगा, यह भी निर्दोष नहीं है। 'मानव से अच्छा न, 'सलिल' कोई कंप्यूटर' करने पर पंक्ति दोषमुक्त होती है।)

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  17. ०५. सुंदरियाँ घातक 'सलिल', पल में लें दिल जीत।
    घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत।।
    जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर।
    बिछुड़ें तो अवढरदानी भी हों प्रलयंकर।।
    असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ।
    नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ।।
    (इस कुण्डलिनी की हर पंक्ति में २४ मात्राएँ हैं। इसलिए पढ़ने पर यह निर्दोष प्रतीत हो सकती है। किंतु यति स्थान की शुद्धता के लिये अंतिम ३ पंक्तियों को सुधारना होगा।
    'अवढरदानी बिछुड़ / हो गये थे प्रलयंकर', 'रीझें सुर पर असुर / ससुर तजकर किन्नरियाँ', 'नीर-क्षीर बन करें / पूर्ण जीवन सुंदरियाँ' करने पर छंद दोष मुक्त हो सकता है।)

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  18. कुण्डलिनी छंद का सर्वाधिक और निपुणता से प्रयोग करनेवाले गिरधर कवि ने यहाँ आरम्भ के अक्षर, शब्द या शब्द समूह का प्रयोग अंत में ज्यों का त्यों न कर, प्रथम चरण के शब्दों को आगे-पीछे कर प्रयोग किया है। ऐसा करने के लिये भाषा और छंद पर अधिकार चाहिए। अधिक जानकारी के लिए देखिए फेसबुक पर कुण्डलिनी सलिला या ब्लॉग दिव्य नर्मदा।

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