28 April 2011

टाइप-राय्‍टर पा गया, यादों में स्थान [ कुण्डलिया]

टकटक की आवाज़ अब, नहीं सुनेंगे कान|
टाइप-राय्‍टर पा गया, यादों में स्थान||
यादों में स्थान, बानगी देखो प्यारे|
कम्‍प्यूटर का दौर, कुलाँचें भर-भर मारे|
गोदरेज-बोयेस, और सहती भी कब तक|
उसने आख़िरकार , बंद करवा दी टकटक|१|

दुनिया का दस्तूर भी, कैसा यार विचित्र|
आज जिसे छूते नहीं, कल हो वही पवित्र||
कल हो वही पवित्र, चित्र उस के लगवाते|
महँगी माला-हार, शान से उसे चढ़ाते|
तारीफों के ढोल, बजाते मुन्ना-मुनिया|
दुर्लभ रत्न समान, देखती उस को दुनिया||

3 comments:

  1. दुनिया का दस्तूर भी, कैसा यार विचित्र|
    आज जिसे छूते नहीं, कल हो वही पवित्र||

    ....यही आज का यथार्थ है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  2. जो गया वो कल था, जो चल रहा है वही आज है ।
    सुन्दर कुण्डलियां. आभार सहित...

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