26 February 2011

हिन्दोस्ताँ को जगदगुरु यूँ ही नहीं कहते सभी - नवीन

हर आदमी की होती है अपनी अलग इक एंटिटी|
दुनिया मगर अक्सर समझ पाती न ये रीयेलिटी |१|

हिन्दोस्ताँ को जगदगुरु यूँ ही नहीं कहते सभी|
डायवर्सिटी होते हुए भी है यहाँ पर यूनिटी|२|

गिनती पहाड़ों से भी आगे है गणित का दायरा|
माइनस करे एनीमिटी और प्लस करे ह्यूमेनिटी|३|

ताउम्र जो साहित्य की आराधना करते रहें|
क्यूँ भूल जाती हैं उन्हें सरकार और सोसाइटी|४|

सीखा है जो 'कल' से वही हाजिर किया 'कल' के लिए|
अब आप को करना है तय, कैसी है ये वेराइटी|५|


मुसतफ़इलुन मुसतफ़इलुन मुसतफ़इलुन मुसतफ़इलुन 
2212 2212 2212 2212
बहरे रजज मुसम्मन सालिम

8 comments:

  1. बड़ी सुन्दर पोयेट्री।

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  2. गिनती पहाड़ों से भी आगे है गणित का दायरा|
    माइनस करे एनीमिटी और प्लस करे ह्यूमेनिटी|३|
    नवीन जी बहुत सुन्दर वैराइटी पेश की है। अंग्रेजी शब्दों का दोहों मे पहली बार प्रयोग देखा। बधाई।

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  3. यह भी अच्छा कहा सेंसिबिली विथ सेंस्टिविटी.

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  4. 2122 वज्न पर नयी वेरायटी के साथ पेश की गयी इस गजल को पसंद करते हुए मेरा उत्साह वर्धन करने वाले सभी साहित्यिक शुभ चिंतकों का सहृदय आभार

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  5. नए कलेवर वाली इस ग़ज़ल से बन गई है आपकी नई आइडेंटिटी।

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  6. महेंद्र भाई साब आप की बहुमूल्य टिप्पणी मेरे परिश्रम का पारितोषिक है| बहुत बहुत आभार मान्यवर}

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  7. Badiya hai Sir , Wah wah

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  8. Badiya hai Sir , Wah wah

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