22 February 2011

यकीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा के देखो तुम - नवीन

सूने जङ्गल देख के अक्सर ऐसा लगता है
उतना ही लिखना था जितना अच्छा लगता है

आप ही कहिये आप का दरिया किस को पेश करूँ
ये प्यासा, वो जल बिन मछली जैसा लगता है

रब ही जाने उस पर क्यों गुस्सा आता है मुझे
जबकि सलीक़ा उस का मेरे जैसा लगता है

मत पूछें मुझसे मेरी ख़ामोशी की वज़्हें
ख़ुद को चूँटी काट के बोलें – कैसा लगता है

यक़ीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा कर देख लें ख़ुद
अपना मुम्बै खेत-खिलौनों जैसा लगता है

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सभी दिखें नाखुश, सबका दिल टूटा लगता है
तमाम दुनिया का इक जैसा किस्सा लगता है

तुम्हीं कहो किसको दूँ अपने हिस्से का पानी
झुलस रहा ये, वो जल बिन मछली-सा लगता है

रिवायती ग़ज़लें चिलमन पे कह तो दूँ लेकिन
नये जमाने का कपड़ों से झगड़ा लगता है

यकीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा के देखो तुम
बड़ा शहर भी खेत खिलोनों जैसा लगता है

नहीं किताबें पढ़ के होता जन-धन संचालन
भले भलों को इसमें खास तजुर्बा लगता है

16 comments:

  1. तुम्हीं कहो किसको दूँ अपने हिस्से का पानी
    झुलस रहा ये, वो जल बिन मछली-सा लगता है

    बहुत ख़ूबसूरत गज़ल..

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  2. यकीं न हो तो गूगल अर्थ पे जा के देखो तुम
    बड़ा शहर भी खेत खिलोनों जैसा लगता है
    नए प्रतीक से नयी बात निकालने का सफल प्रयास....वाह!

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  3. तुम्हीं कहो किसको दूँ अपने हिस्से का पानी
    झुलस रहा ये, वो जल बिन मछली-सा लगता है

    बहुत ख़ूबसूरत गज़ल..

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  4. सराहना के लिए आभार कैलाश भाई साब

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  5. गौतम भाई आपको मेरा प्रयोग अच्छा लगा, ये मेरी खुशनसीबी है| बहुत बहुत आभार भाई साब|

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  6. अरुण चंद्र रॉय भाई तारीफ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया

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  7. आदरणीय शास्त्री जी आपका आशीर्वाद पा कर ये गजल मुकम्मल हो गयी

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  8. तुम्हीं कहो किसको दूँ अपने हिस्से का पानी
    झुलस रहा ये, वो जल बिन मछली-सा लगता है

    Navin ji, waah ! kya baat hai ! Bahut khoob !

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  9. विश्व गाथा जी,अपने ब्लॉग पर आप के दर्शन करना मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता की बात है भाई जी | इस सराहना के लिए सहृदय आभार|

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  10. आदरणीया संगीत स्वरूप जी उत्साह वर्धन के लिए आभार

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  11. बहुत खूब...बहुत खूब....बहुत खूब....
    इरशाद ...

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  12. बहुत बहुत शुक्रिया शरद सिंह जी

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  13. शुक्रिया प्रवीण भाई

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