नमस्कार।
पिछली पोस्ट में उठी
शंका जो कि पाद-संयोजन से सम्बन्धित है, का समाधान एक अलग पोस्ट के ज़रिये किया गया है। उस पोस्ट को पढ़ने के लिये
यहाँ क्लिक करें।
वर्तमान आयोजन की पहली
पोस्ट को लोगों का अच्छा प्रतिसाद मिला है। दूसरी पोस्ट भी अपने फ्लेवर के साथ आप के
समक्ष आ रही है। इस पोस्ट में हम महावीर भाई उर्फ़ खुर्शीद खैराड़ी के साथ-साथ मुम्बई
निवासी भाई सत्यनारायण सिंह जी के छंदों को भी पढ़ेंगे। इस आयोजन से हम रचनाधर्मियों
के मोबाइल नम्बर देना शुरू कर रहे हैं ताकि उन के प्रशंसक उन से सीधे संवाद कर सकें।
जिन-जिन साथियों को अपने मोबाइल नम्बर छपने में दिक्कत न हो वह अपना-अपना मोबाइल नम्बर
मेल के साथ भेजने की कृपा करें।
तो आइये शुरुआत करते हैं भाई खुर्शीद खैराड़ी
जी [9413408422] के छंदों के साथ
मैं अपनी ही खोज में ,भटक रहा दिन रात।
ख़ुद, ख़ुद
को मिलता नहीं, सुलझे कैसे बात?
सुलझे कैसे बात?
सामने कैसे आऊँ?
ख़ुद अपनी ही ओट लिए ख़ुद से छुप जाऊँ।
युगों-युगों से खेल रहा हूँ खेल अनोखा।
ख़ुद से ही हर बार खा रहा हूँ ख़ुद धोखा॥
हम अपने ही देश में, परदेसी हैं आज।
आयातित हर चीज पर, करते कितना नाज॥
करते कितना नाज सभ्यता बेगानी पर।
भूल गये हैं देश यही था देवों का घर।
भारत माँ के लाल फिरंगी बनकर डोलें।
निज गौरव को भूल विदेशी बानी बोलें॥
तुम चाहो तो देश का ,कर दो खस्ताहाल।
चाहो तो श्रमजल बहा ,ऊँचा करदो भाल॥
ऊँचा करदो भाल, पुरातन यश लौटा दो।
जागो भारत भाग्य विधाता भाग्य जगा दो।
ख़ुद से यूँ अनजान, हाशिए पे रहकर गुम।
कब तक यूँ बेहोश रहोगे औसत जन तुम ?
इस मञ्च के
पाठक सुधि-जन हैं और हर पंक्ति की मीमांसा अच्छी तरह कर सकते हैं। खुर्शीद भाई ने छंदों
के परिमार्जन हेतु सतत प्रयास किया और परिणाम हमारे सामने है। दरअसल जिस तरह हम नर्सरी
से स्नातक या स्नातकोत्तर का सफ़र तय करते हैं उसी तरह छंद-अभ्यास भी नित-नयी बातें
सीखने के लिये प्रेरित करता है। हमें ख़ुशी है कि महावीर जी ने मञ्च के निवेदन पर अपने
छंदों कों बार-बार बदला। सरल भाषा, सफल संवाद और तर्कपूर्ण संदेश इन
छंदों की विशेषताएँ हैं। मञ्च को उम्मीद है कि अगली बार हमें इन से और बेहतर मिलेगा।
‘औसत-जन’ के लिये विशेष
बधाई।
इस पोस्ट के अगले रचनाधर्मी हैं भाई सत्य नारायण
जी [9768336346]
मैं के चिंतन से हुआ, आत्म बोध का ज्ञान।
सहज भाव से ध्यान धरूँ मैं उस अनूप का।।
समझाते शुचि ज्ञान सहज हमको योगेश्वर।
शाश्वत आत्मा किन्तु मनुज का तन है नश्वर।।
हम से उर में जागते, शुभ सहकारी भाव।
अहम भाव जो नष्ट कर, भरते हिय के घाव।।
भरते हिय के घाव अहम का लेश न रहता ।
मिट जाता अभिमान
वहम भी शेष न रहता।।
सदियों से यह बात
सनातन चलते आई ।
‘तुम’ अरु ‘मैं’ का योग सदा ‘हम’ होता भाई।।
तुम कारक है द्वेष का, दर्शाता पार्थक्य ।
होते आँखें चार ही, दूर हुआ पार्थक्य ।।
दूर हुआ पार्थक्य, बात कैसे समझाऊँ।
जित जित जाऊँ परछाईं
सी ‘तुम’ को पाऊँ ।।
दर्शन की मन चाह मिलो
तो आँख चुराऊँ ।
सरसे ‘तुम’ से प्रेम बिना ‘तुम’ मैं अकुलाऊँ।।
पार्थक्य –
पृथकता
या अलगाव का भाव
साहित्य की सफलता इसी में है कि जितने रचनाधर्मी हों उतनी तरह की रचनाएँ पढ़ने को
मिलें। हर व्यक्ति के अपने अनुभव और अनुभूतियाँ होती हैं। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की
विविध अभिव्यक्तियों को पढ़ना ही पाठक या श्रोता का उद्देश्य होता है। गायक किशोर कुमार
की हयात के दौरान तथा बाद में भी बहुतों ने उन की नकल में गाने की कोशिश की मगर क्षणिक
सफलता के बाद असफल हो गये। हमें अपनी मूल अभिव्यक्ति के साथ आगे बढ़ना होता है। परन्तु
मूल अभिव्यक्ति का मतलब मूल धारा से बिलगना नहीं हो सकता। मूल धारा मतलब “सरल भाषा,
सफल संवाद और तर्कपूर्ण संदेश”।
तो साथियो आप आनन्द लीजियेगा इन छंदों का, उत्साह
वर्धन कीजियेगा अपने साथियों का और हम बढ़ते हैं अगली पोस्ट की ओर।
नमस्कार