सत्यनारायण सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सत्यनारायण सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

SP2/3/2 खुर्शीद खैराड़ी + सत्य नारायण सिंह

नमस्कार।

पिछली पोस्ट में उठी शंका जो कि पाद-संयोजन से सम्बन्धित है, का समाधान एक अलग पोस्ट के ज़रिये किया गया है। उस पोस्ट को पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें।

वर्तमान आयोजन की पहली पोस्ट को लोगों का अच्छा प्रतिसाद मिला है। दूसरी पोस्ट भी अपने फ्लेवर के साथ आप के समक्ष आ रही है। इस पोस्ट में हम महावीर भाई उर्फ़ खुर्शीद खैराड़ी के साथ-साथ मुम्बई निवासी भाई सत्यनारायण सिंह जी के छंदों को भी पढ़ेंगे। इस आयोजन से हम रचनाधर्मियों के मोबाइल नम्बर देना शुरू कर रहे हैं ताकि उन के प्रशंसक उन से सीधे संवाद कर सकें। जिन-जिन साथियों को अपने मोबाइल नम्बर छपने में दिक्कत न हो वह अपना-अपना मोबाइल नम्बर मेल के साथ भेजने की कृपा करें।  

तो आइये शुरुआत करते हैं भाई खुर्शीद खैराड़ी जी [9413408422] के छंदों के साथ

मैं अपनी ही खोज में ,भटक रहा दिन रात।
ख़ुद, ख़ुद को मिलता नहीं, सुलझे कैसे बात?
सुलझे कैसे बात? सामने कैसे आऊँ?
ख़ुद अपनी ही ओट लिए ख़ुद से छुप जाऊँ।
युगों-युगों से खेल रहा हूँ खेल अनोखा।
ख़ुद से ही हर बार खा रहा हूँ ख़ुद धोखा॥   
   
हम अपने ही देश में, परदेसी हैं आज।
आयातित हर चीज पर, करते कितना नाज॥
करते कितना नाज सभ्यता बेगानी पर।
भूल गये हैं देश यही था देवों का घर।
भारत माँ के लाल फिरंगी बनकर डोलें।
निज गौरव को भूल विदेशी बानी बोलें॥

तुम चाहो तो देश का ,कर दो खस्ताहाल।
चाहो तो श्रमजल बहा ,ऊँचा करदो भाल॥
ऊँचा करदो भाल, पुरातन यश लौटा दो।
जागो भारत भाग्य विधाता भाग्य जगा दो।
ख़ुद से यूँ अनजान, हाशिए पे रहकर गुम।
कब तक यूँ बेहोश रहोगे औसत जन तुम  ? 

इस मञ्च के पाठक सुधि-जन हैं और हर पंक्ति की मीमांसा अच्छी तरह कर सकते हैं। खुर्शीद भाई ने छंदों के परिमार्जन हेतु सतत प्रयास किया और परिणाम हमारे सामने है। दरअसल जिस तरह हम नर्सरी से स्नातक या स्नातकोत्तर का सफ़र तय करते हैं उसी तरह छंद-अभ्यास भी नित-नयी बातें सीखने के लिये प्रेरित करता है। हमें ख़ुशी है कि महावीर जी ने मञ्च के निवेदन पर अपने छंदों कों बार-बार बदला। सरल भाषा, सफल संवाद और तर्कपूर्ण संदेश इन छंदों की विशेषताएँ हैं। मञ्च को उम्मीद है कि अगली बार हमें इन से और बेहतर मिलेगा। ‘औसत-जन’ के लिये विशेष बधाई।  

इस पोस्ट के अगले रचनाधर्मी हैं भाई सत्य नारायण जी [9768336346]

मैं  के चिंतन से हुआ, आत्म बोध का ज्ञान।
उस अविनाशी ब्रम्ह की, मैं  चेतन संतान।।
मैं चेतन संतान अंश उस मूल रूप का ।
सहज भाव से ध्यान धरूँ मैं  उस अनूप का।।
समझाते शुचि ज्ञान सहज  हमको योगेश्वर।
शाश्वत आत्मा किन्तु मनुज का तन है नश्वर।।

चेतन = आत्मा

हम से उर में जागते, शुभ सहकारी भाव।
अहम भाव जो नष्ट कर, भरते हिय के घाव।।
भरते हिय के घाव अहम का लेश न रहता ।
मिट जाता अभिमान  वहम भी शेष न रहता।।
सदियों से यह बात सनातन चलते आई ।
‘तुम’ अरु ‘मैं’ का योग सदा ‘हम’ होता भाई।। 

तुम कारक है द्वेष का, दर्शाता पार्थक्य ।
होते आँखें  चार  ही,  दूर हुआ पार्थक्य ।।
दूर हुआ पार्थक्य, बात कैसे समझाऊँ।
जित जित जाऊँ परछाईं सी ‘तुम’ को पाऊँ ।।
दर्शन की मन चाह मिलो तो आँख चुराऊँ ।
सरसे ‘तुम’  से प्रेम बिना ‘तुम’  मैं अकुलाऊँ।।

पार्थक्य – पृथकता या अलगाव का भाव

साहित्य की सफलता इसी में है कि जितने रचनाधर्मी हों उतनी तरह की रचनाएँ पढ़ने को मिलें। हर व्यक्ति के अपने अनुभव और अनुभूतियाँ होती हैं। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की विविध अभिव्यक्तियों को पढ़ना ही पाठक या श्रोता का उद्देश्य होता है। गायक किशोर कुमार की हयात के दौरान तथा बाद में भी बहुतों ने उन की नकल में गाने की कोशिश की मगर क्षणिक सफलता के बाद असफल हो गये। हमें अपनी मूल अभिव्यक्ति के साथ आगे बढ़ना होता है। परन्तु मूल अभिव्यक्ति का मतलब मूल धारा से बिलगना नहीं हो सकता। मूल धारा मतलब “सरल भाषा, सफल संवाद और तर्कपूर्ण संदेश”।

तो साथियो आप आनन्द लीजियेगा इन छंदों का, उत्साह वर्धन कीजियेगा अपने साथियों का और हम बढ़ते हैं अगली पोस्ट की ओर।


नमस्कार 

SP/2/2/5 साजन तेरे बिन मुझे, कजरी लगे मल्हार - सत्यनारायण सिंह


नमस्कार 

वक़्त भी इन्सान को एक आँख हँसाता है तो एक आँख रुलाता है। एक तरफ़ चेम्पियन्स ट्रॉफी जीतने की ख़ुशी है तो दूसरी ओर उत्तराखण्ड की त्रासदी। उत्तराखण्ड की त्रासदी को कुदरत का प्रतिकार कहें या मानवीय हवस का दुष्परिणाम, अधिक अन्तर नहीं है। सब से ख़राब पहलू है ऐसी त्रासदी पर होने वाली राजनीति। ख़ैर हमारे नेतागण व उन का चमचा-समुदाय सुधरने से रहा। चेम्पियन्स ट्रॉफी की जीत ने क्षणिक आनन्द अवश्य दिया, परन्तु फिक्सिंग के ग्रहण से ग्रसित हमारी क्रिकेट अब कितने भरोसे के क़ाबिल रह गई है, यह अपने आप में एक यक्ष-प्रश्न है। फिर भी आईसीसी के तीनों प्रारूपों का विजेता होने का आनन्द मिला तो है ही। गांगुली ने जिस सफ़र का आगाज़ किया था, धोनी ने उसे बेहतर अंज़ाम तक पहुँचाया है। भविष्य में देखना होगा कहीं धोनी भी...... 

हम लौटते हैं आयोजन की तरफ़। भाई सत्यनारायण जी पहले भी मञ्च के आयोजनों में शिरकत करते रहे हैं। इन्हें पढ़ चुके साथियों को याद होगा कि इन की रचनाओं में सादगी के साथ ही साथ समय की पीड़ा भी होती है। इस बार आप ने मौसम के आनन्द में डूब कर दोहे लिखे हैं। आइये पढ़ते हैं सत्यनारायण जी के दोहे 

बरसा पानी झूम के, भीगा सब संसार
गोरी भीगे आँगना, कर सोलह सिंगार

रिम-झिम बरसे बादरी, मादक सुखद बहार
साजन तेरे बिन मुझे, कजरी लगे मल्हार

मादक मोहक रूप है, केश श्याम लट ब्याल
गोरी के सौंदर्य का, रखते निश दिन ख्याल

काजल भी देने लगे, अब कटार सी पीर
बिरह पीर को मैं सहूँ, बनकर तेरी हीर

भाल लाल बिंदी सजी, मन को रही जलाय
सुन सजना तेरे बिना, अब तो जिया न जाय

सत्यनारायण जी क्या बात है। पहले दोहे से ले कर अन्तिम दोहे तक बाँध कर रखते हैं आप। 

इन दोहों का रसास्वादन एक बार पढ़ कर शायद न हो पाये, एकाधिक बार पढ़ के देखियेगा तब मज़ा आयेगा, और यही इन दोहों की विशिष्टता भी है। 'कजरी लगे मल्हार'......... 'केश श्याम लट ब्याल' इन जुमलों के लिये सत्यनारायण जी को स्पेशल बधाई। काव्य में जुमलों का ही तो मज़ा है भाई। साथियो आनन्द लीजिये इन दोहों का, कवि तक अपने सुविचार भी अवश्य पहुँचाइयेगा, और मैं चलता हूँ अगली पोस्ट की तरफ़। सम्भवत: अगली पोस्ट में हास्य रस के छींटे..... सोचो कवि कौन होगा ?

इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें

SP/2/1/9 हित-चिन्तक बन कर हमें, लूट रही सरकार - सत्यनारायण सिंह

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

शायद आप सभी ने भी नोट किया होगा कि समस्या पूर्ति के दूसरे चक्र से पहले इस मंच के सहभागियों की संख्या थी 33, इस पोस्ट तथा आने वाली दो पोस्ट्स को जोड़ लें तो कुल सहभागी हो जाएँगे 40। इस आयोजन की आ चुकीं प्लस ये वाली तथा आने वाली दो पोस्ट्स के साथ टोटल पोस्ट्स होंगी 11 जिन में 7 नए सहभागी हैं - यानि पुराने 33 में से 4 ही लौट पाये...................... ख़ैर...................  

आयोजन के अगले तथा मंच के 38 वें सहभागी हैं भाई सत्यनारायण सिंह जी। तो आइये पढ़ते हैं सत्यनारायण जी के दोहे।


सत्य नारायण सिंह

ठेस-टीस
मुँह पर ताला, मन व्यथित, नयनन अँसुअन धार
हित-चिन्तक बन कर हमें, लूट रही सरकार