19 February 2011

छंद शास्त्र: एक संक्षिप्त परिचय - रविकान्त पाण्डेय

छंद शास्त्र: एक संक्षिप्त परिचय


रविकान्त पाण्डेय

वेद, जो कि सनातन माने गये हैं और जिनका भारतीय जनमानस पर गहरा प्रभाव है उनका ही एक अंग है छंद शास्त्र- "छंदः पादौ तु वेदस्य"। वैसे वेदों को समस्त विद्याओं का आदिस्रोत माना जाता है। यहां ये स्पष्ट कर देना उचित प्रतीत होता है कि कविता बिना छंदों के भी लिखी जा सकती है, लोग लिखते भी हैं, पर छंद रचना को आयु प्रदान करता है और "कवि" को "सुकवि" बनाने में सहायक होता है।

छंद की प्रेरणा कहां से मिली ?

मनुष्य की प्रेरणा का आदिस्रोत सदैव प्रकृति रही है। प्रक्रुति के साम्राज्य में चीजें एक निश्चित विधान के अनुसार घटित होती हैं- रात फ़िर दिन फ़िर रात, वसंत फ़िर ग्रीष्म फ़िर वर्षा आदि। प्रक्रुति के सान्निध्य में मनुष्य ने ब्रह्मांड में व्याप्त इस नियम को, इस क्रमिक व्यवस्था को पहचाना। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जब तमसा नदी के तट पर संसार का सबसे पहला काव्य सृजित हुआ तो उसका रचयिता जनमानस से दूर प्रकृति के ही सान्निध्य में रहनेवाला एक ऋषि था जिससे उसके ह्रुदय की संवेदना ने श्लोक कहलवा दिया-

मा निषाद प्रतिष्टां त्वमगमः शाश्वतीसमाः
यत्क्रौंच मिथुनात्मेकमवधीः काममोहितम

इस तरह से प्रारंभ हुआ संसार का सर्वप्रथम काव्य रामायण और वाल्मीकि आदिकवि हुये।

छंद शास्त्र के आचार्य

इस संबंध में संस्कृत में काफ़ी काम हुआ है और इस सिलसिले में सबसे पहला नाम आचार्य पिंगल का आता है। इनकी पुस्तक "छंदःसूत्रम" को आज भी विषय की सर्वाधिक प्रामाणिक रचना होने का गौरव प्राप्त है। अन्य परवर्ती आचार्यों में नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत, ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर, अग्निपुराण, श्रुतबोध के रचयिता कालिदास, सुवृत्ततिलक के रचयिता आचार्य क्षेमेंद्र, छंदोsनुशासन के रचयिता हेमचंद्र, वृत्तरत्नाकर के रचयिता केदारभट्ट, छंदोमंजरी के रचयिता गंगादास तथा वाणीभूषण के रचयिता दामोदर आदि का नाम मुख्य रूप से उल्लेखनीय है जिन्होनें अपनी इन पुस्तकों में इस विधा पर प्रकाश डाला है। हिंदी की प्रमुख पुस्तकों में भूषण चंद्रिका, छंदोऽर्णव एवं छंद प्रभाकर आदि का नाम लिया जा सकता है।

छंदों के प्रकार

प्रयोग के हिसाब से छंदों के दो भेद हैं- वैदिक और लौकिक। वैदिक छंद सात हैं- गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप और जगती। लैकिक छंद कई हैं जैसे- मंदाक्रांता, घनाक्षरी, दोहा, चौपाई आदि। अब छंदों की नियम व्यवस्था पर आते हैं। इस हिसाब से मोटे तौर पर दो विभाजन हैं (कुछ विद्वान तीन भी मानते है, विस्तार भय से इस पर फ़िलहाल चर्चा नहीं करेंगे)- मात्रिक छंद और वार्णिक छंद। मात्रिक में सिर्फ़ मात्राओं का बंधन होता है साथ ही कहीं कहीं पर लगु, गुरु का क्रम होता है जबकि वार्णिक वृत्तों में वर्णों का एक विशिष्ट क्रम होता है। आगे इस संबंध में विस्तार से चर्चा की जायेगी। एक छंद में सामान्यतया चार पाद होते हैं और अगर इन चारों पादों में समान योजना हो तो इन्हे सम, सम और विषम पादों में एक सी योजना हो तो अर्द्धसम और सभी पादों में अलग योजना हो तो इन्हे विषम कहा जाता है। नीचे के चित्र में देखें-

नोट: विस्तारभय से कई बातें छोड़ दी गई हैं एवं जनसामान्य को छंदों से परिचय कराने के उद्देश्य से यह संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध कराई गई है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, विषय विस्तार पाता जायेगा।
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छंद: कुछ और बातें

अब तक आपके सम्मुख स्पष्ट हो चुका होगा कि जब रचना में मात्रा, वर्ण, यति, गति आदि का ध्यान रखा जाये तो रचना छंदबद्ध कहलायेगी जिसे पद्य कहते हैं। जो बिना छंद के हो तो गद्य और जहां दोनों हों वहां चंपू समझना चाहिये।

आइये अब गणित की तरफ़ बढ़ते हैं-

गुरुलघु वर्णों की पहचान

छंद सीखने वालों को सर्वप्रथम गुरुलघु विचार पर ध्यान देना चाहिये। इस संबंध में निम्न बातें ध्यातव्य हैं-

१. ह्रस्व अक्षर को लघु माना जाता है। इसे "।" चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरण- अ, इ, उ, र, रि, तु आदि लघु हैं।

२. अर्द्धचंद्रबिंदु वाले वर्ण भी लघु माने जाते हैं जैसे "हँसी" में हँ" लघु है।

३. दीर्घ अक्षर को गुरु कहते है। इसे "ऽ" चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरण- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, रा, रे, री आदि।

४. संयुक्ताक्षर के पूर्व के लघु को दीर्घ माना जाता है। उदाहरण- सत्य, धर्म इनमें स और ध को गुरु माना जायेगा।

५. कभी-कभी संयुक्ताक्षर के पूर्व के लघु पर उच्चारणकाल में भार नहीं पडता। ऐसी स्थिति में उन्हे लघु ही माना जाता है। उदाहरण- तुम्हें, यहां तु लघु है।

६. कभी-कभी चरणांत के लघु को गुरु मान लिया जाता है। पढ़ते वक्त इसे दीर्घवत पढ़ा जाता है।

मात्रा और उसकी गणना

वर्णों के उच्चारण में लगनेवाले समय को मात्रा कहते हैं। इस हिसाब से अर्द्धमात्रा, एकमात्रा, द्विमात्रा और त्रिमात्रा का विधान है जो इस प्रकार हैं-

एक मात्रो भवेद ह्रस्वः द्विमात्रो दीर्घ उच्यते
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यंजनंचार्द्ध मात्रकम

अर्थात ह्रस्व की एक मात्रा, दीर्घ की दो मात्रा, प्लुत की तीन और व्यंजन की आधी मात्रा मानी जाती है। पूर्व में हम कह आये हैं कि मनुष्य मूलतः प्रकृति से प्रेरणा लेता है अतः यहां बताना उचित होगा कि इन मात्राओं के प्राकृतिक उदाहरण क्या हैं-

चाषश्चैकांवदेन्मात्रां द्विमात्रं वायसो वदेत
त्रिमात्रंतु शिखी ब्रूते नकुलश्चार्द्धमात्रकम

अर्थात नीलकंठ की बोली एकमात्रा, कौआ दो मात्रा, मोर तीन मात्रा और नेवला आधीमात्रा वाला होता है। इनमें से छंदशास्त्र में सिर्फ़ एक और दो मात्राओं का ही प्रयोग होता है जो कि क्रमशः लगु और गुरु के लिये निर्धारित है।



गण विधान

तीन वर्णों को मिलाकर एक वर्णिक गण बनता है जिनकी कुल संख्या आठ है। इसे निम्न रूप में याद रखें-

यमाताराजभानसलगा:

१. यमाता = यगण = ।ऽऽ
२. मातारा = मगण = ऽऽऽ
३. ताराज = तगण = ऽऽ।
४. राजभा = रगण = ऽ।ऽ
५. जभान = जगण = ।ऽ।
६. भानस = भगण = ऽ॥
७. नसल = नगण = ॥।
८. सलगाः = सगण = ॥ऽ

इन आधारभूत नियमों को आत्मसात कर लेने पर आगे की राह आपके लिये आसान हो जायेगी।
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दोहा और उसका छंद विधान

परिचय: हममे से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने दोहे का नाम न सुना होगा। लोक में कबीर, तुलसी आदि के कतिपय दोहे मुहावरों की तरह प्रचलित हैं-

अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम
दास मलूका कहि गये सबके दाता राम

आछे दिन पाछे गयो हरि सों रखा न हेत
अब पछताये होत क्या चिड़िया चुग गइ खेत

सतसइया के दोहरे अरु नावक के तीर
देखन में छोटन लगें घाव करें गंभीर

आवत ही जो हर्ष नहिं नैनन नहीं सनेह
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेंह

दोहे इस तरह हमारे जीवन में प्रविष्ट हो चुके हैं कि सुख-दुख, दर्शन, उपदेश आदि कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है। वास्तव में दोहा साहित्य की प्राचीन तथापि संपन्न विधा है।

दोहे का छंद शास्त्र

दोहा मात्रिक अर्द्धसम छंद है। अर्द्धसम की परिभाषा के मुताबिक इसके समचरणों में एक योजना तथा विषम चरणों में अन्य पदयोजना पाई जायेगी। विष चरण यानि पहले और तीसरे चरण में १३ मात्रायें एवं सम चरण यानि दूसरे तथा चौथे चरण में ११ मात्रायें रहेंगी।

विषम चरणों की बनावट: आदि में जगण न हो।

बनावट दो तरह की प्रचलित है- पहली- ३+३+२+३+२ = १३ (यहां चौथे त्रिकल में ।ऽ वर्जित है)
जैसे- राम नाम सुमिरा करो (सही)
राम नाम लो सदा तुम (गलत)

दूसरा प्रकार यूं है- ४+४+३+२ = १३ (यहां भी त्रिकल ।ऽ के रूप में नहीं आ सकता)

सम चरणों की बनावट: पहला प्रकार, ३+३+२+३ = ११
दोसरा प्रकार, ४+४+३ = ११ दोनों ही स्थितियों में अंत का त्रिकल हमेंशा ऽ। के रूप में आयेगा।

उपर्युक्त नियमों पर यदि सूक्ष्म दृष्टि दौड़ायें तो आप पायेंगे कि यहां सम के पीछे सम (४+४) और विषम के पीछे विषम (३+३) यानि एक ही चीज को दुहराया गया है इसी कारण इसे दोहा या दोहरा के नाम से जाना जाता है। साथ ही आप पायेंगे कि विषम चरणों के अंत में सगण, रगण अथवा नगण आयेगा और सम चरणों के अंत में जगण या तगण आयेगा।

विशेष: विषम चरण के प्रारंभ में जगण का निषेध सिर्फ़ नरकाव्य के लिये है। देवकाव्य या मंगलवाची शब्द होने की स्थिति में कोई दोष नहीं है। साथ ही जगण एक शब्द के तीन वर्णों में नहीं आना चाहिये, यदि दो शब्दों से मिलकर जगण बने तो वहां दोष नहीं है जैसे- " महान" एक शब्द के तीन वर्ण जगण बना रहे हैं अतः वर्जित है। जहां जहां = जहांज हां (जगण दो शब्दों से बन रहा है अतः दोष नहीं है।)
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दोहों में विषम पद के बारे में कुछ अन्य उदाहरण

कबीर यहु घर प्रेम का
जाति न पूछो साधु की
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वर्तमान / सामयिक संदर्भों में आप जैसे नौजवान की छंदों में अभिरुचि काफी प्रभावित करती है| आभार रविकान्त पाण्डेय जी|
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4 comments:

  1. बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी है एवं इसे बहुत ही रोचक तरीके से पेश किया गया है इसके लिए रविकान्त जी को बहुत बहुत बधाई।

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  2. यहाँ तो ग्यान का भंडार भरा पडा है। मुझे तो आज पता चला। रविकान्त जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आगे भी जारी रहे। शुभकामनायें।

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  3. (1)

    सोना अब सोना हुआ, खाना हुआ खराब

    पेशानी पर बल पड़े, गोबर दिखे कबाब---

    (2)

    चिक-चिक जब आदत बने, टेढ़े होत सवाल

    तीन-पाँच हर-रोज की, बोली करे बवाल

    (3)

    रब की रहमत का उड़े, हर पल जहाँ मजाक

    आँख कान मुँह से बंधा, बांधे कुटिल दिमाग

    (4)

    जिस घर में नित क्लेश हो, बाढ़े वाद-विवाद

    सुख-शान्ति सामृद्धि तनु, नाशे नाद-निनाद

    (5)

    जग सारा अपनाय के, घर के दीन बराय

    उलटी माला फेर के, जियरा बड़ा जुडाय

    विवरण पढने से पहले लिखा है कृपया गड़बड़ी बताएं |

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