17 February 2011

छन्‍द - अमृत ध्वनि - बैरी संशय

संशय मन का मीत ना, जानत चतुर सुजान|
इस में कोई गुण नहीं, ये है अवगुण ख़ान||
ये है अवगुण ख़ान, करे नुकसान भयानक|
मान मिटावत, शान गिरावत, द्वेष प्रचारक|
द्वंद बढ़ावत, चैन नसावत, शांति करे क्षय|
मन भटकावत, जिय झुलसावत, बैरी संशय||

11 comments:

  1. संशय मन का मीत ना, जानत चतुर सुजान|
    इस में कोई गुण नहीं, ये है अवगुण ख़ान||
    ...बहुत बढ़िया प्रेरक पंक्तियाँ ..

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  2. बहुत सुन्दर प्रेरक रचना..

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  3. सुन्दर प्रेरक रचना ..कल आपके ब्लॉग से तीन चार पोस्ट ली है चर्चामंच के लिए .. आप मंच में आ कर अपने विचारों से अनुग्रहित करें ...धन्यवाद

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  4. उम्दा कुण्डली..

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  5. भाई समीर लाल जी
    ये कुण्डली की तरह दिखता ज़रूर है
    परन्तु
    ये एक दुर्लभ छन्‍द है
    जिसका नाम है


    @अमृत ध्वनि छन्‍द@
    सराहना के लिए आभार बन्धुवर

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  6. शुक्रिया अतुल जी|

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  7. सही कहा आपने प्रवीण भाई, सही में 'संशय' अग्नि सम ही होता है| धन्यवाद बन्धुवर|

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