2 September 2016

निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला - सालिम शुजा अन्सारी

निशाँ पाया,.....न कोई छोर निकला

मुसाफ़िर क्या पता किस ओर निकला


अपाहिज लोग थे सब कारवाँ में

सितम ये राहबर भी कोर निकला


जिसे समझा था मैं दिल की बग़ावत

महज़..वो धड़कनों का शोर निकला


निवाला बन गया मैं.... ज़िन्दगी का

तुम्हारा ग़म तो आदमख़ोर निकला


दिये भी....लड़ते लड़ते थक चुके हैं

अँधेरा इस ...क़दर घनघोर निकला


हुआ पहले क़दम पर ही शिकस्ता

करूँ क्या हौसला कमज़ोर निकला


सुना ये था, है दुनिया गोल "सालिम"

मगर नक़्शा तो ये चौकोर निकला


सालिम शुजा अन्सारी
9837659083



बहरे हज़ज  मुसद्दस महजूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन ,

1222 1222 122

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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