25 September 2013

दीवार काफ़िये पर मुक्तलिफ़ अशआर

काव्य की विधा कोई भी हो, महत्वपूर्ण होता है कि हम किस तरह से ख़याल को नज़्म करते हैं। विभिन्न रचनधर्मी किसी एक ही ख़याल या शब्द या बन्दिश को अलग-अलग किस तरह से नज़्म करते हैं, यह बानगी भी देखने लायक होती है। इस की शुरुआत हुई थी पिङ्गल आधारित समस्या-पूर्ति आयोजनों से। कालान्तर में जब पिङ्गल से बढ़ कर अरूज़ का जन्म हुआ तो वहाँ भी तरही जैसे कार्यक्रम चलन में आये। कोई भी देश-काल-वातावरण-व्यक्ति-वस्तु-स्थिति वग़ैरह होमनुष्य को दरकार रहती है एक अदद एक्टिविटी की – जिस के ज़रिये वह अपनी कलाकारी [क्षमता] का प्रदर्शन कर सके। ग़ज़ल के तरही आयोजनों में इस तरह के नज़्ज़ारे भरपूर देखने को मिलते हैं। लफ़्ज़ की वेबसाइट पर ज़ारी 12 वीं तरही में तमाम शायरों ने एक ही क़ाफ़िये ‘दीवार’ को किस-किस तरह से नज़्म किया है, उस की झलकियाँ देखियेगा। स्थापित रचनाधर्मियों के लिये जहाँ एक ओर यह सबबे-लुत्फ़ है वहीं मेरे जैसे अनाड़ियों के लिये सीखने का ज़रीया। तरही में आई हुई ग़ज़लों के क्रम में ही उन के शेर लिये जा रहे हैं  :-

हवा आयेगी आग पहने हुए
समा जायेगी घर की दीवार में – स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

स्वप्निल बेसिकली गीत के व्यक्ति हैं इसलिए इन की ग़ज़लों में गीतात्मकता प्रचुर मात्रा में मिलती है। हवा का आग पहन कर आना उस का एक अच्छा उदाहरण है।

पता तो चले कम से कम दिन तो है
झरोखा ये रहने दो दीवार में – याक़ूब आज़म

याक़ूब आज़म साहब बंधनों के साथ-साथ कुछ-कुछ आज़ादी की पैरवी भी कर रहे हैं। बहुत ख़ूब।

न परदा ही सरका, न खिड़की खुली
ठनी थी गली और दीवार में – गौतम राजरिशी

मिलिट्री वाले गौतम राजरिशी ग़ज़ल को बसन्ती चोला पहनाते रहते हैं, यहाँ भी उन का वही रूप मुखरित हुआ है ।  फ़ौजी भाई कमाल किया है आपने, जीते रहिये।

पहाड़ों में खोजूँगा झरना कोई
मैं खिड़की तलाशूँगा दीवार में – सौरभ शेखर

सौरभ, बातों को गहराई में उतर कर पकड़ते हैं और बहुत बार संकोच तो बहुत बार आवेश के साथ पटल पर रख देते हैं। निराशापूर्ण वातावरण में आशा की किरण ढूँढता उन का किरदार यहाँ मुख़ातिब है हमसे।

पसे-दर मकां में सभी अंधे हैं
दरीचे हज़ारों हैं दीवार में – खुर्शीद खैराड़ी
पसेदर – दरवाज़े के पीछे, दरीचा – खिड़की

खुर्शीद साहब को पहली बार पढ़ने का मौक़ा मिला और सभी ने मुक्त कण्ठ से आप की प्रशंसा की है। बड़ी ही मँझी हुई ग़ज़ल पेश की है आप ने। हमारे समय के विरोधाभास को बड़े ही सलीक़े से लपेटा है आप ने दीवार क़ाफ़िये के ज़रीए। अलबत्ता आप का ऊला मिसरा थोड़ी मेहनत ज़रूर माँग रहा है। आय मीन मिसरे के अन्त में बोलने में लड़खड़ाहट उत्पन्न हो रही है। लेकिन भरपूर ग़ज़ल के भरपूर शेर के लिये आप मुबारकबाद के मुस्तहक़ हैं।

हवा, रौशनी, धूप आने लगें
खुले इक दरीचा जो दीवार में – अदील जाफ़री

अदील जाफ़री साहब ने भी निराशा में आशा को ढूँढने का अच्छा प्रयास किया है।

हरिक संग शीशे सा है इन दिनों
नज़र आता है मुँह भी दीवार में – मयंक अवस्थी
संग – पत्थर

मयंक जी लीक से हट कर चलने वाले शायर हैं। आप का उक्त शेर मेरी बात की तसदीक़ करता है। दीवार में शीशे का तसव्वुर  बरबस ही मुँह से वाह कहलवा देता है । इसी शेर का एक फ्लेवर यह भी है कि अब विरोधाभास, समस्याएँ, अवरोध वग़ैरह सेल्फ़-एक्सप्लनेटरी हो चुके हैं – यानि ग़ालिब की तरह अब “दिले-नादाँ तुझे हुआ क्या है? आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?” टाइप सवालात की दरकार नहीं है। बच्चे भी बता सकते हैं – वॉट्स रूट लेवल कॉज़ ऑफ द प्रोब्लेम।

फिर इक रोज़ दिल का खँडर ढह गया
नमी थी लगातार दीवार में – नवनीत शर्मा

दीवार में नमी होने के कारण दिल के खण्डहर का ढह जाना! भाई वाह!! क्या बात है!!! शायर ने कमाल किया है यहाँ।

नदी सर पटकती रही बाँध पर
नहीं राह मिल पाई दीवार में – दिनेश नायडू

दिनेश नायडू इंजीनियरिंग से जुड़े व्यक्ति हैं और देखिये अभियन्ता ने बाँध से क्या मंज़र चुराया है। बहुत ख़ूब। इस तरह की अभियांत्रिकीय कल्पनाएँ धर्मेन्द्र कुमार सज्जन की रचनाओं में देखने का आदी रहा हूँ मैं अब दिनेश भी इन इमकानात से लबरेज़ दिखाई पड़ रहे हैं। जीते रहिये। 

खुला भेद पहली ही बौछार में
कई दर निकल आये दीवार में – इरशाद ख़ान सिकन्दर

इरशाद अपनी सहज और सरस बेबाक़ी के लिये मक़बूल हैं और आप का उपरोक्त शेर इस बात की पुष्टि करता है। यानि शायर ने अपनी बात कह दी – अब सोचना शुरू करें लोगबाग........

उदासी भी उसने वहीं पर रखी
ख़ुशी का जो आला था दीवार में – शबाब मेरठी

शबाब साहब देशज प्रतीकों को बड़ी ही सुंदरता के साथ नज़्म करते हैं, यहाँ भी आप ने ‘आला’ शब्द / प्रतीक के ज़रीए अपनी उसी कारीगरी का भरपूर प्रदर्शन किया है। क्या बात है।

ये छत को सहारा न दे पायेगी
अगर इतने दर होंगे दीवार में – आदिक भारती

ग़ज़ल में ख़याल पर ख़याल निकल कर आते हैं। इरशाद भाई के बाद आदिक साहब की ग़ज़ल आई थी। मुमकिन है आप ने इरशाद के ख़याल पर ख़याल बाँधा हो या यह भी हो सकता है कि ख़यालों का टकराना महज़ एक इत्तेफ़ाक़ हो। जो भी हो, तरही की पहली 14 ग़ज़लों में ‘दीवार’ क़ाफ़िया की इतनी अच्छी गिरह आप के हिस्से आयी, आप को भरपूर बधाइयाँ।

फ़क़त एक दस्तक ही बारिश ने दी
दरारें उभर आईं दीवार में – विकास शर्मा ‘राज़’

यहाँ भी ख़याल की रिपीटेशन है और यक़ीनन यह संयोग वश ही होगा। हालाँकि इस से बचा भी जा सकता है, परन्तु अधिकतर लोग तरही ग़ज़लों को उतनी गम्भीरता से नहीं लेते। अन्तर सिर्फ़ दरवाज़ा और दरार का है। चूँकि इरशाद और विकास दौनों ही मेरे गुरूभाई हैं, इसलिए थोड़ा अधिकार समझते हुये इस बात को रेखांकित किया है ताकि अगर बात उचित लगे तो भावी आयोजनों में इस तरह के दुहराव को अवॉइड किया जा सके।

कोई मौज बेचैन है उस तरफ़
लगाये कोई नक़्ब दीवार में – पवन कुमार
मौज – लहर, नक़्ब – सेंध

प्रशासनिक सेवा से जुड़े पवन जी की फ़िक्र हमें यह सोचने पर मज़बूर कर देती है कि साहित्य के लिये क्या वाक़ई पूर्ण-कालिक इबादत ज़रूरी है? न सिर्फ़ इन की फ़िक्र में इन की छाप स्पष्ट रूप से द्रष्टव्य होती है, बल्कि उस में निरन्तरता का पुट भी विद्यमान रहता है। दीवार के उस पार की लहर को इस पार लाने के लिये दीवार में सेंध.............. , अद्भुत सोच और विलक्षण सम्प्रेषण। यदि आप को मेरा कहा अतिशयोक्ति लगे तो इस बयान को किसी प्रशासनिक अधिकारी के अनुभव / सरोकार / राय वग़ैरह से सम्बन्धित सांकेतिक-अनुदेश के सन्दर्भ के साथ देखिये और इस की गहराइयों की थाह लेने की कोशिश कीजिये।

मुहब्बत को चुनवा के दीवार में
कहां ख़ुश था अकबर भी दरबार में – शफ़ीक़ रायपुरी

शफ़ीक़ साहब ने भी क्या ख़ूब निभाया है ‘दीवार’ क़ाफ़िये को। इस शेर की एक और ख़ूबी है कि इस के ऊला और सानी मिसरे को अदल-बदल करने पर लुत्फ़ बढ़ जा रहा है। उस्तादों वाला काम।

फिराती रही वहशते-दिल मुझे
न दर में रहा और न दीवार में – असलम इलाहाबादी

वहशतेदिल का भटकाव बख़ूबी नज़्म किया गया है अलबत्ता ‘दर / दीवार - में’ थोड़ा-थोड़ा ‘दर / दीवार - पर’ जैसा दृश्य दिखला रहे हैं, पर चल जाने लायक है। तुफ़ैल साहब से भी बात हुई थी इस शेर पर।

दबाया था आहों को मैंने बहुत
दरार आ गयी दिल की दीवार में – तुफ़ैल चतुर्वेदी

शुरुआत की अमूमन सभी ग़ज़लों में ‘दीवार’ क़ाफ़िये को नज़्म किया गया फिर यक-ब-यक  अनेक ऐसी ग़ज़लें आईं जिन में यह क़ाफ़िया नज़्म नहीं किया गया। अब फिर से इस की आमद शुरू हुई है। आदिक साहब का नज़्म किया हुआ ‘दीवार’ क़ाफ़िया अभी भी हमें अपने सुरूर में जकड़े हुये है पर यहाँ जनाब तुफ़ैल चतुर्वेदी साहब ने भी दावेदारी पेश कर दी है। एक्यूरेटली डिजाइन्ड लिटरली परफेक्ट पिक्चर पोर्ट्रेट है यह शेर। तर्क पर कसें तो भी कुछ कमी नहीं है और 99.99% ख़याल भी नया है।

दरीचों से बोली गुज़रती हवा
कोई दर भी होता था दीवार में – आदिल रज़ा मंसूरी

शेर का मज़ा यही है कि उस के मुक्तलिफ़ मायने निकलें। मैं इस शेर को महँगाई से जोड़ कर पढ़ रहा हूँ और लुत्फ़ भी ले रहा हूँ। बढ़िया शेर है।

मिरे इश्क़ का घर बना जब, जुड़ी
तिरे नाम की ईंट दीवार में – प्रकाश सिंह अर्श

प्रकाश भाई को बधाई इस शेर के लिये।

प्रकाश सिंह अर्श की ग़ज़ल 29वें नम्बर पर आई और 25 सितम्बर बुधवार रात तक कुल जमा 35 ग़ज़लें आ चुकी हैं। शायद यहाँ तरही का समापन भी हो चुका है। अर्श के बाद की ग़ज़लों में भी ‘दीवार’ क़ाफ़िया नज़्म नहीं किया गया।


तो दोस्तो यह एक सफ़र था, मेरा साथ इस सफ़र पर चलने के लिये आप का बहुत-बहुत आभार। आप को यह आलेख कैसा लगा, बताइएगा अवश्य।  

18 comments:

  1. naveen sb shukria itani achhi samikhsa padakar aanad aa gaya

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    1. आप के शेर का कमाल है खुर्शीद साहब, ख़ुश रहिये

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    1. शुक्रिया सक्सेना जी

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    2. नवीन भाई. बड़ा ही सुन्दर विश्लेषण है मुद्दे का. शायर और अन्य अदीब किसी बात के नए-नए पहलुओं को कैसे छूते हैं इसे समझने में बहुत कारगर होगा. मेरा खयाल है इस बार लफ्ज़ में ये या ऎसी एक समीक्षा तरही ग़ज़लों के साथ ज़रूर आनी चाहिए. मेरे एबधाई स्वीकारें.

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    3. भाई कमलेश जी आप का कहना एकदम उचित है। पहले के ज़माने में हम लोगों को बाप-काका की संगत में बहुत कुछ सीखने को मिला जो अब हमारे बच्चों के लिए दूभर है। ऐसे में इस तरह के वार्तालाप बहुत ज़रूरी हैं। आप का बहुत-बहुत आभार।

      आप से विनम्र निवेदन है आप के कुछ व्यंग्य आलेख ठाले-बैठे के पाठकों के लिए भेजने की कृपा करें।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 27/09/2013 को
    विवेकानंद जी का शिकागो संभाषण: भारत का वैश्विक परिचय - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः24 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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    1. शुक्रिया दर्शन भाई

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  4. कहीं अलस्सबाह की शफक कहीं उतरे हैं नीम शब्..,
    दीदे-रु-ओ-दरीचो-दीवार का अब तक खुला दरबार है.....

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  5. बहुत ही तार्किक और आत्मीय विश्लेषण ..... सभी मित्रों की और से आपका साधुवाद इस शेर के साथ कि
    कहाँ सब ज़हीनों को दिखती है खाद,
    जी हाँ! ज़र्द पत्तों के अम्बार में,

    धन्यवाद नवीन भाई आपका !!!

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    1. आपका बहुत बहुत आभार पवन भाई, ख़ुश रहें

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  6. --अच्छी समीक्षा ...

    चिनाये बैठे हैं जाने कब से वो,
    छिद्र कितने हैं किन्तु दीवार में |

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  7. गज़ब का सफरनामा ओर एक से बढ़ के एक अशआर ... तरही तो कमाल होगी ही ...

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  8. मुझे याद आ रही हैं निम्न पंक्तिया:
    दरो-दीवार पे हसरत की नज़र करते हैं
    खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं - शायर का नाम याद नहीं

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  9. सारे शहर में दिख रहीं दीवार ही दीवार
    बंद खिड़कियां हुईं हैं, बंद है हर द्वार
    कैसे रहेगा खुश कोई यह तो बताइये
    दीवार से कैसे करे इसरार या तकरार -sanjiv

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