21 March 2013

ब्रज की होली के रसिया

ब्रज की होली के रसिया

कान्हा पिचकारी मत मार
मेरे घर सास लडेगी रे।
सास लडेगी रे मेरे घर ननद लडेगी रे।

सास डुकरिया मेरी बडी खोटी,
गारी दे ने देगी मोहे रोटी,
दोरानी जेठानी मेरी जनम की बेरन,
सुबहा करेगी रे।
कान्हा पिचकारी मत मार… ॥१॥

जा जा झूठ पिया सों बोले,
एक की चार चार की सोलह,
ननद बडी बदमास,
पिया के कान भरेगी रे।
कान्हा पिचकारी मत मार… ॥२॥

कछु न बिगरे श्याम तिहारो,
मोको होयगो देस निकारो,
ब्रज की नारी दे दे कर
मेरी हँसी करेगी रे।
कान्हा पिचकारी मत मार… ॥३॥

हा हा खाऊं पडू तेरे पैयां,
डारो श्याम मती गलबैया,
घासीराम मोतिन की माला
टूट पडेगी रे ।
कान्हा पिचकारी मत मार… ॥४॥

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श्यामा श्याम सलोनी सूरत को सिंगार बसंती है।
सिंगार बसंती है …हो सिंगार बसंती है।

मोर मुकुट की लटक बसंती, चन्द्र कला की चटक बसंती,
मुख मुरली की मटक बंसती, सिर पे पेंच श्रवण कुंडल छबि लाल बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत…॥१॥

माथे चन्दन लग्यो बसंती, कटि पीतांबर कस्यो बसंती,
मेरे मन मोहन बस्यो बसंती, गुंजा माल गले सोहे फूलन हार बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत..॥२॥

कनक कडुला हस्त बसंती, चले चाल अलमस्त बसंती,
पहर रहे सब वस्त्र बसंती, रुनक झुनक पग नूपुर की झनकार बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत…॥३॥

संग ग्वालन को टोल बसंती, बजे चंग ढफ ढोल बसंती,
बोल रहे है बोल बसंती, सब सखियन में राधे की सरकार बसंती है ।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत…॥४॥

परम प्रेम परसाद बसंती, लगे चसीलो स्वाद बसंती,
ह्वे रही सब मरजाद बसंती, घासीराम नाम की झलमल झार बसंती है।
श्यामा श्याम सलोनी सूरत..॥५॥

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आज बिरज में होरी रे रसिया।
होरी रे होरी रे बरजोरी रे रसिया।

घर घर से ब्रज बनिता आई,
कोई श्यामल कोई गोरी रे रसिया।
आज बिरज में…॥१॥

इत तें आये कुंवर कन्हाई,
उत तें आईं राधा गोरी रे रसिया।
आज बिरज में…॥२॥

कोई लावे चोवा कोई लावे चंदन,
कोई मले मुख रोरी रे रसिया ।
आज बिरज में ॥३॥

उडत गुलाल लाल भये बदरा,
मारत भर भर झोरी रे रसिया ।
आज बिरज में ॥४॥

चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण प्रभु,
चिर जीवो यह जोडी रे रसिया ।
आज बिरज में ॥५॥


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नैनन में पिचकारी दई,
मोहे गारी दई,
होरी खेली न जाय।

क्यों रे लंगर लंगराई मोसे कीनी,
केसर कीच कपोलन दीनी
लिये गुलाल ठाडो ठाडो मुसकाय,
होरी खेली न जाय ॥१॥

नेक न कान करत काहू की,
नजर बचावे भैया बलदाऊ की
पनघट से घर लों बतराय,
होरी खेली ने जाय ॥२॥

ओचक कुचन कुमकुमा मारे,
रंग सुरंग सीस पे डारे
यह ऊधम सुन सास रिसाय.
होरी खेली न जाय॥३॥

होरी के दिनन मोसे दूनो दूनो अटके,
सालीगराम कौन जाय हटके
अंग चुपट हँसी हा हा खाय,
होरी खेली न जाय ॥४॥

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होली खेलन आयो श्याम, आज याय रंग में बोरौ री।
कोरे कोरे कलस मंगाय रंग केसर घोरौ री।
रंग बिरंगौ करौ आज याय कारे ते गोरौ री॥
पार परोसिन बोलि याय आंगन में घेरौ री ।
पीताम्बर लेउ छीन याय पहराय देउ चोरौ री॥
हरे बांस की बांसुरिया जाहे तोरौ मरोरौ री ।
तारी दे दे याहि नचावो अपनी ओरौ री ॥
‘चन्द्र सखी’ की यही बीनती करो निहोरौ री।
हा हा खाय परे जब पैया तब याय छोरौ री॥
होली खेलन आयो श्याम, आज याय रंग में बोरौ री।

जनहितार्थ संग्रहित

7 comments:

  1. ब्रज की होली का मधुमय आनन्द..

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  2. ब्रज की होली अपना एक अलग ही आनंद मिलता है

    RecentPOST: रंगों के दोहे ,

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  3. जनहितार्थ संग्रहित...वाह !!

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  4. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 23/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  5. इस होरी रंग दे रे रसिया.. .
    मन झूमता रहा.

    भाईजी, होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  6. आनंद ही आनंद है

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  7. नमस्कार !
    बहुत दिनों बाद आज ही नेट पर आया हूं आदरणीय नवीन जी
    ब्रज की होली के रसिया पढ़ कर आनंद आ गया ...
    लेकिन इनको कैसे गाते हैं इसकी जरा-सी बानगी का रसास्वादन तो करवाते ...

    होली की हार्दिक शुभकामनाओं मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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