10 December 2011

ज़ियादा हों अगर उम्मीद बच्चे टूट जाते हैं - 'लफ़्ज़' का छत्तीसवाँ अंक

भारतीय गद्य साहित्य और खास कर व्यंग्य में अपने जीवन काल में ही अपना लोहा मनवा चुके, पद्म-भूषण तथा साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों को सुशोभित करते, 'राग दरबारी' जैसे कालजयी उपन्यास के शिल्पकार श्रीलाल शुक्ल जी को समर्पित है 'लफ़्ज़' का छत्तीसवाँ अंक। इस बार के अंक में ज़ारी किश्तों के अतिरिक्त श्रीलाल शुक्ल जी ही छाये हुये हैं, और क्यों न हों - बक़ौल सम्पादकीय - "साहित्य की सामान्य परम्परा के अनुसार, उत्पाती लेखन या उपद्रवी बयानों के कारण चर्चित हुये लेखक-लेखिकाओं से अधिक चर्चित तथा सम्मानित श्रीलालजी किंवदन्ती बन चुके थे।"

हर बार की तरह इस बार भी 'लफ़्ज़' में भरत भूषण पंत जी की नज़्मों के अलावा चार शायरों के कलाम पढ़ने को मिले। मेरे स्वभाव और रुचि के अनुसार मैंने जो छाँटा है, आप लोगों के साथ साझा करना चाहूँगा।


भरत भूषण पंत जी की नज़्मों से


मैं वो मिट्टी हूँ, पड़ी धूप में जो सूख गयी
चाक पर रख के मुझे भूल गया कूजागर
[कूजागर - कुम्हार]

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एक दरिया सा मिरे जिस्म में बहता है कहीं
उस के वीरान से साहिल पे कोई मंदिर है...............
..................बस यहाँ मेरे सिवा कोई नहीं, कोई नहीं
अय ख़ुदा जब भी मुझे तेरा ख़याल आया है 
मैंने आ कर इसी मंदिर में इबादत की है 

फ़ारूक़ इंजीनियर जी की ग़ज़लों से 

गुलो-गुलज़ार, गुहर, चाँद-सितारे बच्चे
रंगो-बू, नूर के पैकर हैं, ये सारे बच्चे
आने वालों को बता देते हैं घर की बातें
कब समझते हैं ये आँखों के इशारे बच्चे

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फ़ैसले वो न जाने कैसे थे
रात की रात घर से निकले थे 
क्या ज़माना था वो कि हम दोनों
एक दूजे का दुख समझते थे 

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आया था वो सैर-सपाटे को लेकिन
खौफ़ परिंदों में सैलानी छोड़ गया 

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बज़ाहिर नम फ़क़त मिट्टी हुई है 
मगर सहरा में गुम नद्दी हुई है 
तुम्हारी याद है महफ़ूज दिल में
तिजोरी में रक़म रक्खी हुई है 

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आदिल रज़ा मंसूरी जी की ग़ज़लों से 

 नाम ने काम कर दिखाया है 
सब ने देखा है तैरता पत्थर

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कुछ सितारे बना के कागज़ पर 
खुश हुये घर सजा के कागज़ पर
बस्तियाँ क्यूँ तलाश करते हैं 
लोग जंगल उगा के कागज़ पर 

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सोचती हुई आँखें, बोलता हुआ चेहरा
ख़्वाब में नज़र आया, एक ख़्वाब सा चेहरा
तेरी और मेरी तो एक ही कहानी है 
क्यूँ उदास होता है सुन के तीसरा चेहरा 

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चलो तो ज़रा चाँद-तारों से आगे 
मुहब्बत के झूठे सहारों से आगे 
यक़ीनन तुम्हें रोशनी भी मिलेगी 
मगर जुगनुओं की क़तारों से आगे 


पवन कुमार जी की ग़ज़लों से  

ज़रा सी चोट को महसूस कर के टूट जाते हैं 
सलामत आइने रहते हैं, चेहरे टूट जाते हैं 
नसीहत अब बुज़ुर्गों को यही देना मुनासिब है 
ज़ियादा हों अगर उम्मीद बच्चे टूट जाते हैं 

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बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है 
बच्चों को चुपचाप बिठा कर देख लिया 

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लहरों को भेजता है तक़ाज़े  के वास्ते
साहिल है कर्ज़दार, समंदर मुनीम है 

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हर इक उम्मीद कल पर टल रही है 
हमारी ज़िंदगी बस चल रही है 
जिसे कहते हैं जन्नत इस ज़मीं की
उसी वादी में बर्फ़ अब जल रही है

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जहाँ हमेशा समंदर ने मेहरबानी की 
उसी ज़मीन पे क़िल्लत है आज पानी की


इरशाद ख़ान सिकंदर जी की ग़ज़लों से  

पढ़-पढ़ के सोचता हूँ क़िताबों की शक़्ल में
कितने अज़ीम लोग मिरे घर में बस गये

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उसे पहचानना बेहद है मुश्किल
वो सबसे मिल रहा है सादगी से 

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हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं सारे लोग 
मुश्किल से इस घर से कड़की निकलेगी

बहुत शराफ़त से बुज़दिल बन जाओगे
आम अधिक खाने से फुंसी निकलेगी

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ज़मीनें आसमाँ छूने  लगी हैं 
हमारी क़ीमतें अब भी वही हैं 
शराफ़त इंतिहा तक दब गयी तब 
सिमट कर उँगलियाँ मुट्ठी बनी हैं

उम्मीद करता हूँ, उपरोक्त पंक्तियाँ आप को पसंद आई होंगी। अपने विचार ज़रूर लिखियेगा। और चलते चलते एक ख़ास ख़बर और, लफ़्ज़ के अगले अंक में तुफ़ैल जी की ग़ज़लें आ रही हैं, एक साथ ६५ ग़ज़लें तुफ़ैल जी की लफ़्ज़ में पहली बार।

14 comments:

  1. मैं वो मिट्टी हूँ, पड़ी धूप में जो सूख गयी
    चाक पर रख के मुझे भूल गया कूजागर
    वाह नवीन जी,
    आप एक से बढ़कर एक मोती चुनकर लाये हैं !कई बार पढने से भी मन नहीं भरता !
    आपका आभार !

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  2. "हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं लोग ------आम अधिक खाने से फुंसी निकलेगी |
    बहुत रोचक उदाहरण लगा |
    अच्छी पंक्तियाँ |
    आशा

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  3. मैं वो मिट्टी हूँ, पड़ी धूप में जो सूख गयी
    चाक पर रख के मुझे भूल गया कूजागर
    बहुत अच्छी पंक्तियाँ .

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  4. क्या चुन चुन कर मोती निकाले हैं नवीन भाई, बहुत बहुत धन्यवाद।

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  5. बड़ा ही संवेदनशील विषय उतनी ही सुन्दर प्रस्तुतियाँ।

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  6. बहुत उम्दा चीजें खोज के लाते है आप नवीन जी. अगले अंक के लिए तो उत्साह अभी से ही जगा दिया है आपने.

    बहुत धन्यबाद हम सब से साझा करने के लिए.

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  7. NAVEEN JI , AAPKEE PASAND AUR AAPKA CHAYAN
    SRAAHNIY V ULLEKHNIY HAI .

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  8. भारत भूषण साहब का नाम !! उस्ताद वालीआसी साह्ब ( मरहूम )के उन 3-4 शागिर्दों में शुमार हैं जिनकी शाइरी की हिन्दुस्तान में धाक है --अन्य शागिर्दों में मुनव्वर राअना जी खुशबीर सिंह शाद जैसे नाम हैं -- आदिल रज़ा मंसूरी साहब ने इस बरस की सबसे खूबसूरत किताब निकाली है -जिसमें पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के 15 शाइर हैं -- फारूख़ इंजीनियर साहब का अदब की दुनिया में नाम भरपूर सम्मान से लिया जाता है और पवन कुमार और इरशाद खान सिकन्दर जी की सुखनगोई का खासा चरचा है --- खुद तुफैल साहब प्रकाश पण्डित - अयोध्या प्रसद गोयलीय और नरेन्द्र नाथ जैसे नामो से आगे हैं कि उन्होंने शाइरी को देवनागरी लिपि मे लोकप्रियता और सम्मान दिलाया लेकिन आज से 20-25 बरस पहले निकले उनके संकलन --सारे वरक तुम्हारे के बाद उनका अधिकाँश समय सम्पादन और इस्लाह में बीता है --इसलिये अगला अंक स्वागत योग्य है और विशेष भी -- इंतज़ार रहेगा ।

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  9. आ. मयंक जी

    यदि मैं आप को शायरी का चलता फिरता एन्साइक्लोपीडिया कहूँ तो अतिशयोक्ति न होगी :)

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  10. सोचती हुई आँखें, बोलता हुआ चेहरा
    ख़्वाब में नज़र आया, एक ख़्वाब सा चेहरा
    तेरी और मेरी तो एक ही कहानी है
    क्यूँ उदास होता है सुन के तीसरा चेहरा

    ....हरेक प्रस्तुति बेहतरीन...बहुत खुबसूरत चयन..आभार

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  11. इसी शनिवार यानी १०/१२/२०११ को पवन कुमार जी के घर जाना हुआ था वही इस अंक को पढ़ा ... सच में बेहद उम्दा रचनाओ का समावेश किया गया है इस अंक में ...बहुत खुबसूरत चयन..आभार !

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  12. pawan ji apke intekhab ki main daad deta hu,bahut umda selection hai ,,,god bless,,

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  13. बहुत सुंदर परिचय।

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