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वरना हमें ग़रीब कौन मानेगा - आदित्य चौधरी

भारत कोश वाले आदित्य चौधरी जी को पहले भी पढ़ा, मगर उन का यह आलेख बहुत ही मार्मिक और प्रासंगिक भी है, अपनी यादों में सँजोये रखने की ख़ातिर इसे वातायन का हिस्सा बना रहा हूँ।

ग़रीबी का दिमाग़ -आदित्य चौधरी


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       शास्त्रों में तीन हठ गिनाए गए हैं। बाल हठ, त्रिया हठ और राज हठ।
एक राजपुत्र ने राज हठ किया-
"मिश्रा जी! पंद्रह अगस्त आने वाला है। कुछ नया होना चाहिए..."
"यस सर! आप पोलो मॅच के लिए कह रहे थे... उसका अरेंजमेन्ट करवा दें..."
"नहीं!... हमें देश के लिए कुछ करना है... हमको अपने देश से, उसके सिटीज़न से, बहुत इंटीमेसी है... हम हमारे देश के ग़रीब देखना चाहते हैं, हमें ग़रीब दिखाइये।"
"यस सर! मैं अभी आपको गूगल इमेज में और नेशनल ज्योग्राफ़िक मैगज़ीन में ग़रीब दिखाता हूँ।"
"ओ... नो! हमें रीयल ग़रीब देखने हैं, ये वाले ग़रीब तो हम रोज़ाना देखते हैं।... एकदम नॅचुरल ग़रीब।"
"सॉरी सर! मैं समझा नहीं?"
"इसमें समझने की कौन सी बात है... हमको सचमुच के ग़रीब देखने हैं... उनको टच करना है... उनसे बात करनी है... आई वान्ट टू नो द रीयल फ़ील ऑफ़ पूअर... गॉट इट? आया समझ में?"
"ओके सर! मैं समझ गया... अभी दो-चार ग़रीब बुलवाता हूँ... एक तो हमारा चपरासी ही काफ़ी ग़रीब है..."
"नो नो नो हमको उनके पास जाना है। हमें गावों में जाना है।" यू फ़िक्स द टूर। हम जाएँगे।"
        एक गाँव तुरंत छांटा गया लेकिन ये गाँव राजपुत्र ने नकार दिया, कारण था कि ये गाँव काफ़ी विकसित था। राजपुत्र को एक बेहद पिछड़ा गाँव देखना था। आख़िर झक मार कर अधिकारियों ने एक पिछड़ा गाँव छांट लिया। यात्रा शुरू हो गई। पहले चार्टर प्लेन फिर हॅलीकॉप्टर और उसके बाद कारों का क़ाफ़िला उस 'पिछड़े' गाँव में जा पहुँचा जहाँ 'ग़रीब' रहते थे। राजपुत्र के स्वागत के लिए दूर-दूर से लोग आए हुए थे। अफ़रातफ़री का माहौल था। भीड़-भाड़ देखकर राजपुत्र का 'मूड' ख़राब हो गया।
"इनमें से जो ग़रीब हैं उन्हें मेरे कॅम्प में बुलवाइए।" राजपुत्र ने सचिव को आदेश दिया। चार ग़रीब कॅम्प में बुलाए गए जिनमें दो पुरुष ग़रीब और दो महिला ग़रीब हैं। कॅम्प में ग़रीबों को ज़मीन पर बिछी दरी पर बिठाकर बातचीत शुरू हो गई। राजपुत्र भी कुर्सी छोड़कर नीचे ही बैठ गया।
Blockquote-open.gif "इनको मालूम है सरकार कि हम कितने ग़रीब हैं... एकदम प्योर ग़रीब हैं सरकार!... क्यों सरकार हैं ना हम ग़रीब?" Blockquote-close.gif
        एक ग़रीब ने दूसरे से फ़ुसफ़ुसा कर कहा-
"देख ले बेटा! मैंने कहा था चुनाव आ रहे हैं, इसीलिए तो ये नीचे बैठ गए..."
"सब चुप हो जाओ! जो पूछें उसका जवाब दो!" अधिकारी ने डांटा।
राजपुत्र- "तोऽऽऽ... आप लोग ग़रीब हैं?" राजपुत्र ने अपने चेहरे से मंदबुद्धि दर्शाने वाली मासूमियत को छुपाने के प्रयास में, अपने चेहरे पर गम्भीरता ओढ़ते हुए सवाल किया। ये सवाल ऐसा ही होता है जैसा कि अदालत में गवाह या अपराधी का नाम पता अच्छी तरह जानते हुए भी वकील उस व्यक्ति का नाम वग़ैरा पूछते हैं।
पहला ग़रीब- "हाँ सरकार! बहुत ग़रीब हैं।" इस ग़रीब ने अति उत्साह में काफ़ी तेज़ आवाज़ में 'हाँ सरकार' कहा लेकिन जब पास खड़े अधिकारी ने उसे अर्थ सहित घूरा तो फिर 'बहुत ग़रीब हैं' को बहुत धीमी आवाज़ में कहा जो कि लगभग फुसफुसाहट में बदल गई।
राजपुत्र- "अच्छाऽऽऽ! लेकिन कितने ग़रीब?" राजपुत्र ने जैसे कोई रहस्य जानने की कोशिश की।
दूसरा ग़रीब- "बहुत ज़्यादा सरकार!... मतलब कि एकदम से पूरे के पूरे ग़रीब।" दूसरे ग़रीब ने पास खड़े अधिकारी की तरफ़ इशारा किया और ज़रा रुककर कहा-
"इनको मालूम है सरकार कि हम कितने ग़रीब हैं... एकदम प्योर ग़रीब हैं सरकार!... क्यों सरकार हैं ना हम ग़रीब?" इस पर अधिकारी ने खिसाहट भरे आश्चर्य से राजपुत्र की तरफ़ देखकर अपने अनुभवी अधिकारी होने का फ़र्ज अदा किया।
राजपुत्र- "क्या खाते हैं आप लोग? मतलब कि ब्रेकफ़ास्ट... लंच... डिनर में क्या लेते हैं?" राजपुत्र ने बड़े घरेलू अंदाज़ में पूछताछ आगे बढ़ाई।
अधिकारी- "सर पूछ रहे हैं कि सुबह, दोपहर और रात के खाने में क्या खाते हो?"
पहला ग़रीब- "आप जो खिलाएँगे खा लेंगे सरकार!..." बेचारे ने सोचा कि शायद कुछ खिलाने-पिलाने की बात चल रही है तो फ़ौरन मेहमान वाले अंदाज़ में शरमा कर कहा।
राजपुत्र- "वो तो ठीक है... आप लोगों के खाने का इंतज़ाम भी है... लेकिन मैं ये जानना चाहता हूँ कि आप खाते क्या हैं मतलब कि आपका रोज़ाना का खाना क्या होता है?"
दूसरा ग़रीब- "जो मिल जाय सो खा लेते हैं सरकार... वैसे रोटी-चटनी ज़्यादा खाते हैं सरकार!... अब तीन टाइम तो नहीं खाते हैं... कभी दो बार तो कभी एक बार... खेत में से भी कुछ साग-सब्ज़ी मिल जाती है तो पका लेते हैं।"
Blockquote-open.gif "ठीक कह रहे हैं बाबू जी, ग़रीबी हमारे दिमाग़ में है... आप लोगों के दिमाग़ में नहीं... अगर हमारी ग़रीबी आपके दिमाग़ में भी होती तो हम ग़रीब नहीं होते..." Blockquote-close.gif
राजपुत्र- "डाइरेक्ट खेत से तो ऑरगेनिक फ़ूड मिलता होगा आपको?"
दूसरा ग़रीब- "सरकार बथुआ, चौलाई, कुल्फा मिल जाता है, या फिर कभी मूली... और जब आलू की खुदाई चलती है तो आलू ख़ूब मिलते हैं वो भी बिल्कुल फिरी में..."
राजपुत्र, अधिकारी से- "आप सब कुछ नोट कर रहे हैं ना? मुझे पूरा डेटाबेस चाहिए..."
अधिकारी- "यस सर! मैं नोट कर रहा हूँ।"
राजपुत्र- "फल कौन-कौन से खाते हैं आप लोग?"
पहला ग़रीब- "बेर खा लेते हैं सरकार!... और भी बहुत सी चीज़ें हैं सरकार आप नहीं जानते होंगे"
राजपुत्र- "जैसे?"
पहला ग़रीब- "जैसे सेंद, फूट, ककड़ी..."
राजपुत्र- "ये क्या हैं?"
अधिकारी "सर वाइल्ड फ़्रूट हैं, एक तरह से स्वीट मिलोन और ककुम्बर की तरह..."
राजपुत्र- "ओ.के. ... ये आपके साथ जो लेडीज़ हैं...?"
पहला ग़रीब- "ये हमारी घरवाली है सरकार और ये इसकी घरवाली है। वाइफ़ है सरकार वाइफ़। मेरी घरवाली पढ़ी लिक्खी है सरकार हाईस्कूल पास..."
राजपुत्र- "अच्छा! वॅरी गुड! आप लोगों का ख़र्चा कितना होता है खाने के ऊपर?"
दोनों 'ग़रीबों' ने एक दूसरे की तरफ़ देखा... अधिकारी की तरफ़ देखा... अपनी बीवियों से कानाफूसी की और फिर बड़े सोच-समझ कर पहले ग़रीब ने जवाब दिया-
पहला ग़रीब- "सरकार एक बार का खाना पौने पाँच रुपये में हो जाता है और दिन भर का पूरा ख़र्चा आता है छब्बीस रुपये!..."
राजपुत्र- "बस इतना ही...? इससे ज़्यादा नहीं?
दूसरा ग़रीब- "हाँ सरकार! इतने में ही खाना पड़ता है वरना हमको ग़रीब कौन मानेगा... अगर पाँच रुपये से ज़्यादा का खाएँगे तो ग़रीबी की रेखा से ऊपर चले जाएँगे... फिर तो राशन भी नहीं मिलेगा... मिट्टी का तेल वगैरा कुछ भी नहीं मिलेगा... बीपीऐल कार्ड भी छिन जाएगा सरकार! ..."
राजपुत्र ने अधिकारी से पूछा-
राजपुत्र- "क्या बस स्टॅन्ड पर खाना पाँच रुपए में मिल जाता है?"
अधिकारी- "नो सर!, नहीं मिलता।"
राजपुत्र- "रेलवे स्टेशन पर मिलता होगा?"
अधिकारी- "नो सर!, नहीं मिलता।"
Blockquote-open.gif सभी राजनीतिक दल, सार्वजनिक समस्याओं को हाशिए पर रखकर, जनता की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने की सोचते रहते हैं। Blockquote-close.gif
राजपुत्र- "पाँच रुपए में खाना तो बांग्ला देश और श्रीलंका में भी नहीं मिलता फिर ये चक्कर क्या है?"
पहला ग़रीब- "नहीं सरकार! दिल्ली और बम्बई में पाँच-दस रुपये में खाना मिल जाता है, बड़े-बड़े नेता यही बता रहे हैं, वहाँ इतना सस्ता खाना है तो हमको भी वहीं ले चलिए सरकार..."
राजपुत्र- "देखिए आपके दिल्ली या बॉम्बे जाने से कुछ नहीं होगा... ग़रीबी आपके दिमाग़ में है... इट्स इन योर माइंड... जस्ट अ स्टेट ऑफ़ माइंड... आप सोचते हैं कि आप ग़रीब हैं तो आप ग़रीब हो जाते हैं... आप सोचो मत कि आप ग़रीब हैं... यही सीक्रेट है... मैंने आपको सबसे अच्छा तरीक़ा बता दिया है... कुछ आया समझ में?"
तम्बू में सन्नाटा हो गया, सब एक दूसरे की तरफ़ देखने लगे। जब कोई कुछ नहीं बोला तो पहले ग़रीब की हाईस्कूल पास पत्नी अचानक बोल पड़ी-
"ठीक कह रहे हैं बाबू जी, ग़रीबी हमारे दिमाग़ में है... आप लोगों के दिमाग़ में नहीं... अगर हमारी ग़रीबी आपके दिमाग़ में भी होती तो हम ग़रीब नहीं होते..."
ये तो पता नहीं कि राजपुत्र पर इन बातों का कितना प्रभाव पड़ा और उसने क्या किया... तो आइए भारतकोश पर वापस चलते हैं।-
        देश में, बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक मुद्दे हुआ करते थे। इन्हीं मुद्दों का बोलबाला चुनावों में भी होता था। धीरे-धीरे नेता (और शायद जनता भी) इन मुद्दों से 'बोर' हो गयी। मुद्दे बदलते चले गए और जनता भी अपनी मुख्य ज़रूरत को भूल कर टीवी, लॅपटॉप, इंटरनेट जैसे आकर्षक मुद्दों के प्रति अधिक गंभीर हो गई। कारण था कि ये सार्वजनिक न होकर व्यक्तिगत मुद्दे थे। राजनीतिक दल भी मनुष्य की इस कमज़ोरी का फ़ायदा उठाना सीख गए। नेताओं को समझ में आने लगा कि भाषणों में, सड़क बनवाने की बात करने से ज़्यादा लाभकारी है कर्ज़ा माफ़ करने की बात करना। जनता को भी लगने लगा कि सड़क तो 'सबके' लिए बनेगी लेकिन कर्ज़ा तो 'मेरा' माफ़ होगा। यहीं से व्यक्तिगत लाभ देने की राजनीति शुरू हो गई और सार्वजनिक समस्याएँ पिछड़ती चली गईं।
        अनेक योजनाओं के चलते गांवों में पानी की टंकियां बनीं लेकिन जनता का सारा ध्यान अपने घर के दरवाज़े पर हैण्ड पम्प लगवाने में रहा। टंकियों की हालत ख़राब होने लगी और ज़्यादातर टंकियां अब बेकार पड़ी हैं। ग्राम पंचायत, ज़िला पंचायत और विधायकों को मिलने वाले वोटों के पीछे जनता की व्यक्तिगत मांगों का दवाब बना रहता है।
        जन प्रतिनिधि होने का अर्थ, काफ़ी हद तक यह हो चुका है कि प्रतिनिधि हर समय, जनता की व्यक्तिगत आवश्यकता के लिए भागदौड़ करे। थाने, तहसील, डी.ऍम., ऍस.पी. के पास सच्चे झूठे मुद्दे और मुक़दमों की सिफ़ारिश करे। इस प्रक्रिया में जन प्रतिनिधि में अपना-पराया की भावना बहुत प्रबल हो जाती है। किसने वोट दिया और किसने नहीं, इस बात को लेकर जनता के कार्यों की वरीयता निश्चित की जाती है।
        हमको यह सोचना और जानना ही होगा कि इन सारी असमानता बढ़ाने वाली नीतियों के पीछे कौन सी सोच काम कर रही है। क्यों सभी राजनीतिक दल, सार्वजनिक समस्याओं को हाशिए पर रखकर, जनता की व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने की सोचते रहते हैं।
        इसके लिए केवल एक ही कारण है। हमारे देश में राजनीतिक दलों की संख्या का अनियंत्रित होना। किसी भी देश के प्रजातांत्रिक ढांचे में देश के समग्र विकास के लिए विचारधाराओं के आधार पर ही राजनीतिक दलों का गठन होना चाहिए। ये विचारधाराएं दो या अधिकतम तीन ही हो सकती हैं, इससे अधिक होने का सीधा अर्थ है कि नए राजनीतिक दल के गठन के पीछे कोई न कोई धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र का मुद्दा है।
        सामान्यत: जनता के मन में तीन प्रकार की सोच ही समायी रहती हैं; दक्षिणपंथी, वामपंथी और मध्यमार्गी। इन तीन विचारधाराओं से दीगर कोई और सोच कभी भी समग्र समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती। दक्षिणपंथी विचारधारा में; परम्परा, धर्म, पूंजीवाद आदि समाहित रहते हैं। वामपंथी विचारधारा में प्रगति, धर्म निरपेक्षता और समाजवाद समाहित होते हैं। मध्यमार्गी विचारधारा इन दोनों के बीच की सोच है जिसमें विकास, सर्व धर्म समभाव और पूंजीवाद-समाजवाद का सम्मिश्रण समाहित होते हैं।
        भारत में राजनीतिक दल बनाना कोई फ़र्म या कम्पनी बनाने जितना आसान है। 2-4 विधायक या सांसदों को लेकर किसी सरकार में शामिल हो जाना एक खेल बन गया है। जब किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो अनेक राजनीतिक दल मिलकर एक गुट बनाते हैं। ज़ाहिर है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी ऐसे व्यक्ति को चुना जाता है जो अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली हो क्योंकि राजनीतिक प्रभाव वाले व्यक्ति से सभी दल डरते हैं कि 'कहीं ये हमारे विधायकों या सांसदों को अपनी ओर 'तोड़' न ले'।
        इस प्रक्रिया के चलते भारत ने कई कठपुतली प्रधानमंत्रियों को झेला है। इसी तरह परिवारवाद भी राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है और अनेक बार हमारे देश और राज्यों का शासन ऐसे ही अयोग्य उत्तराधिकारियों के हाथों में रहा है। इस प्रक्रिया के बचाव में एक सामान्य सा उदाहरण दिया जाता है कि व्यापारी का वंशज व्यापारी, अभिनेता का वंशज अभिनेता, खिलाड़ी का वंशज खिलाड़ी तो फिर नेता का वंशज नेता क्यों नहीं? सीधी-साधी जनता इस मूर्खतापूर्ण तर्क को सहज ही मान लेती है। जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। व्यापार, खेल और फ़िल्मी दुनिया की उपलब्धियाँ, व्यक्तिगत हितों को आधार बना कर ही की जातीं हैं, जिसमें जनता का कोई लेना-देना या भागीदारी सामान्यत: नहीं होती। राजनीति की सीढ़ियाँ तो स्पष्ट रूप से जनता की भागीदारी से ही निर्मित होती हैं, जिन पर किसी का व्यक्तिगत अधिकार जमाना पूर्णत: अनैतिक है। यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे कि कोई सेनाधिकारी अपने वंशज को अपना पद बिना किसी प्रतियोगिता के देना चाहे। जिस प्रकार देश की सेना देश के लिए जवाबदेह है उसी प्रकार राजनीतिक नेता भी। ज़रा सोचिए जिन गुणों, संघर्षों, बलिदानों को ध्यान में रखते हुए जनता ने किसी को नेता माना हो और वह नेता अपने वंशज को अपना पद देना चाहे तो क्या समझदार जनता को इसे स्वीकारना चाहिए?
        भारत में यही होता आया है। इस वंशवाद के कारण राजनीति में सबसे अधिक ठेस गुरु-शिष्य परंपरा को लगी है। आज के समय में राजनीति में कर्तव्यनिष्ठ शिष्य होना असंभव जैसा हो गया है। यदि हमारे देश में दो या तीन राजनीतिक दलों का नियम लागू नहीं किया गया और वंशवाद पर लगाम न कसी गई तो देश का विकास होना असंभव ही है।

इस बार इतना ही... अगली बार कुछ और...
-आदित्य चौधरी
संस्थापक एवं प्रधान सम्पादक

तुझ से इतने से चमत्कार की दरख़्वास्त है बस - एक चिंतन

न जाने कब से कहा जा रहा था कि 21 दिसंबर 2012 को दुनिया तहस-नहस हो जायेगी। वैसा तो कुछ नहीं हुआ। मगर हाँ, हमारी अस्मिता, हमारी सभ्यता, हमारे संस्कार ज़ुरुर टुकड़ा-टुकड़ा हो गये। दामिनी के प्रसंग को ले कर तमाम हल्कों में अमूमन सब ही अपनी-अपनी राय ज़ाहिर कर रहे हैं। दर्ज़ किए गए मामलात को आधार बनाएँ तो हर 54वें मिनट में एक बलात्कार हो रहा है... इस तरह दर्ज़ न हो पाने वाले केसेस को भी अनुमानित आधार पर यानि दस गुना जोड़ें तो लगभग हर 5 मिनट में एक बलात्कार हो रहा है यानि हर दिन क़रीब-क़रीब 250। आँकड़ों के शोधकर्ता इसे अपने नज़रिये से यानि अरबों की जनसंख्या से जोड़ कर

पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी - अदम गौंडवी

अदम गौंडवी
22 अक्तूबर 1947 - 18 दिसम्बर 2011
काल के गाल ने इस साल एक और माटी के लाल श्री राम नाथ सिंह उर्फ अदम गौंडवी जी को अपना शिकार बना लिया। ठाले-बैठे परिवार इस विलक्षण प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है। 22 अक्तूबर 1947 को आटा ग्राम, परसपुर, गोंडा, उत्तर प्रदेश में जन्मे, 'धरती की सतह पर' तथा ' समय से मुठभेड़' जैसी कृतियों के माध्यम से आम आदमी की बातों को बतियाते इस शायर ने अपने जीवन काल में ही जन-समुदाय के हृदय में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया था। इन के कुछ शेर :- 

आस्माँ होने को था - पुस्तक समीक्षा


आसमाँ  होने को था –अखिलेश तिवारी

लोकायत प्रकाशन
ए-362 , श्री दादू मन्दिर , उदयपुर हाउस
एम डी रोड , जयपुर -302004 ( राजस्थान )
फोन – 0414-2600912                   

बेशतर शायर गज़ल को  तलाश करते हैं लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि ग़ज़ल भी किसी शायर को तलाश करती है । “ आस्मां होने को था”  के प्रकाशन के बाद ग़ज़ल अनिवार्य रूप से शायर अखिलेश तिवारी का और अधिक शिद्दत से इंतज़ार करेगी हर मुशायरे में,  हर अदबी रिसाले में हर परिचर्चा में और जहाँ जहाँ भी ग़ज़ल की बात होगी वहाँ  । 


ज़ियादा हों अगर उम्मीद बच्चे टूट जाते हैं - 'लफ़्ज़' का छत्तीसवाँ अंक

भारतीय गद्य साहित्य और खास कर व्यंग्य में अपने जीवन काल में ही अपना लोहा मनवा चुके, पद्म-भूषण तथा साहित्य अकादमी जैसे पुरस्कारों को सुशोभित करते, 'राग दरबारी' जैसे कालजयी उपन्यास के शिल्पकार श्रीलाल शुक्ल जी को समर्पित है 'लफ़्ज़' का छत्तीसवाँ अंक। इस बार के अंक में ज़ारी किश्तों के अतिरिक्त श्रीलाल शुक्ल जी ही छाये हुये हैं, और क्यों न हों - बक़ौल सम्पादकीय - "साहित्य की सामान्य परम्परा के अनुसार, उत्पाती लेखन या उपद्रवी बयानों के कारण चर्चित हुये लेखक-लेखिकाओं से अधिक चर्चित तथा सम्मानित श्रीलालजी किंवदन्ती बन चुके थे।"

हर बार की तरह इस बार भी 'लफ़्ज़' में भरत भूषण पंत जी की नज़्मों के अलावा चार शायरों के कलाम पढ़ने को मिले। मेरे स्वभाव और रुचि के अनुसार मैंने जो छाँटा है, आप लोगों के साथ साझा करना चाहूँगा।

अति सर्वत्र वर्जयेत

बड़ा ही लुभावना कोटेशन है ये "अति सर्वत्र वर्जयेत"। सच ही तो है, मसलन:-

  • खाते ही चले जाओ तो पेट फट जाएगा, ये बात रिश्वत खाने वाले नेताओं पर लागू नहीं होती।
  • रोते ही चले जाओगे तो आँसू सूख जाएँगे - टी वी. सेरियल्स के मामलों में एप्लीकेबल नहीं, वहाँ तो आज सिर्फ़ आँसू ही बिक रहे हैं।
  • बैठे ही रहोगे तो निष्क्रिय हो जाओगे, ये कॉंग्रेस पर लागू नहीं, वो तो मंहगाई झेलती जनता को बिलखता देख कर भी हाथ पर हाथ धरे ही बैठी हुई है कब की।

और भी कई सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं। 'अति' किसी भी बात की अच्छी नहीं। आज कल एक और 'अति' दीखने में आ रही है - हँसने की अति। तमाम टी. वी. चेनल्स पर जात जात के कॉमेडी शो परोसे जा रहे हैं। कॉमेडी करने के नये नये नुस्खे ईज़ाद किए जा रहे हैं। हँसना एक अच्छी बात है - निस्संदेह - पर कब, कहाँ, कैसे, क्यूँ और कितना जैसे प्रशनवाचक शब्द इस के साथ भी जुड़े हुए हैं।



विगत कुछ महीनों के कॉमेडी शो के एपिसोडस पर अगर हम सरसरी नज़र डालें तो स्पष्ट रूप से वल्गरिटी का बोलबाला दिखाई पड़ता है। यही होता है जब हम 'अति' वाली सीमा का उल्लंघन कर देते हैं। 'अति' से पहले की अवस्था होती ही है पूर्णता वाली अवस्था। मानव इतिहास गवाह है, जब जब मनुष्य ने 'अति' को नज़र अंदाज़ किया है - जन साधारण ने देर सबेर दूसरी राह चुनना ही मुनासिब समझा है। मसलन:-

  • हिन्दी फिल्मों में गोविंदा टाइप फिल्म्स
  • मंचीय कविता में भावनाओं को उछालती कविताएँ
  • इंदिरा गाँधी वाली इमरजेंसी
  • भाजपा का शाइन इंडिया
  • जनता दल की दलदल
  • अन्नू कपूर का तथाकथित नया संगीत, वग़ैरह वग़ैरह

तो वापस लौटते हैं कॉमेडी वालों की 'अति' पर। हँसने के बहाने और कितना भटाकाओंगे लोगों को? खास कर वो लोग जो परिवार के साथ रात का खाना खाते हुए इस तरह के शो देखते हैं, उन के सामने ख़ासी दिक़्क़त आने लगी है। भोंडे दृश्यों वाले गीत और फिल्मों तथा खिचड़ी टाइप टी. वी. सीरियल्स से ऊब कर ये लोग कॉमेडी की तरफ मुड़े थे, पर अब तो उन्हें यहाँ भी....................। हालाँकि 'सब टीवी' के शो'ज़् कुछ हद तक साफ सुथरे नज़र आते हैं, खास कर उन का लापता ग़ंज़ वाला सीरियल।



हास्य के बहाने क्या क्या परोसा जा रहा है आज कल!!! अंग प्रदर्शन ऐसा कि फेशन शो वालों को प्रेरणा लेनी पड़े। डबल मीनिंग वाले डायलोग ऐसे कि कादर खान भी इस नई कक्षा में शामिल होने के बारे में सोचें और ठहाकों की तो पूछो ही मत। आपस में एक दूसरे को खींचने के लिए व्यक्तिगत जीवन में घुसने का तो जैसे लाइसेन्स दे रखा है सभी प्रतियोगियों ने एक दूसरे को। कभी कभी खुद अपने मुंह पर हाथ रख कर शर्माने का उपालंभ भी दिखला जाते हैं ये लोग। वहाँ उपस्थित नारी शक्ति भी इस तथाक्तथित हास्य से अभिभूत दिखाई पड़ती है। दर्शकों का क्या है? टी वी पर आना भाई किसे अच्छा नहीं लगता।



समय रहते यदि ये कॉमेडी शो वाले नहीं चेतते हैं तो बहुत जल्द ही पब्लिक इन से ऊब कर किसी और ज़ानिब रुख कर सकती है।

काश्मीर के प्रति - साहित्य वारिधि डा. शंकर लाल 'सुधाकर' - एक समीक्षा

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काश्मीर के प्रति - साहित्य वारिधि डा. शंकर लाल 'सुधाकर' - एक पाठक समीक्षा
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ओ हिंद वीर के उच्च भाल, किन्नरियों के पावन, सुदेश ।
तेरी महिमा का अमित गान, कर सकते क्या सारद गणेश ।।

सौन्दर्य सलिल सरवर है तू, नर नलिन जहाँ सर्वत्र खिले ।
मधुकरी किन्नरी वार चुकी , मधु -रस लेकर मन मुक्त भले ।।

पर्वत पयस्विनि पादप गन , पुष्पावलि पावन विविध रंग ।
आभूषित कलित मृदुल मधु मय , प्रकृति वनिता के विविध रंग।।

जब मैंने इन पंक्तियों को पढ़ा तो सहसा ही मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर की स्मृतियाँ जाग उठीं| ऐसा सतत प्रवाह, ऐसा शब्द संयोजन और ऐसी भाव प्रवणता अक्सर इन लोगों की रचनाओं में ही पढ़ते रहे हैं हम। फिर आगे पढ़ा:- 

भारत माता का तू ललाट,  साहित्य,शास्त्र का सौख्य सिन्धु|
लहलही हुई है विश्व-बेलि, जिसकी लघु सी पा एक बिंदु ||

जिसका पांडित्य प्रभाकर सा, खर-प्रभा दिगंत दिखाता था |
विद्वता बनारस मागध की, हारी, मुख बंग छिपाता था ||

चाणक्य चतुर नृप नीति-विज्ञ, व्याकरण करण शालातुरीय |
उत्पन्न हुए जिन जननी से, उनका तू प्रांगण दर्शनीय ||

है विश्व विदित तव बौद्ध धर्म, ललितादित का साहस अपार |
नतमस्तक था वह चीन देश, जिसके बल सन्मुख,बन सियार ||

ऐसी विलक्षण भाषा शैली कि चित्त चकित हुए बिना न रहे सके| आप सोच रहे होंगे कि मैं आखिर बात किस बारे में कर रहा हूँ| समस्या पूर्ति मंच पर आपने शेखर को पढ़ा होगा| उनके दादा जी स्व. श्री शंकर लाल चतुर्वेदी 'सुधाकर' जी द्वारा विरचित प्रबंध खण्ड काव्य 'काश्मीर के प्रति' से उद्धृत हैं ये पंक्तियाँ|  

विवेचित काव्य में कवि ने काश्मीर को केंद्र में रख कर एक वृहद अध्ययन प्रस्तुत किया है| यह एक ऐसी काव्य कृति है जो कि शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण विषयवस्तु साबित होती है|  काश्मीर के अतीत को समर्पित पंक्तियाँ:-

क्षत्रिय कुल कमल दिवाकर सा, वह काश्मीर! था सिंह गुलाब
भुज विक्रम अद्रिसुता सुत सा, जननी अवनी प्रति नेह भाव ||

रिपु गर्व रदन के भंजन को, तन मन में साहस था अपार |
तिब्बत गिलकिट तक रेख खींच, पहुँचाई सीमा चीन पार ||

कवि ने काश्मीर संधि को ले कर द्वितीय सर्ग में जो लिखा है वह भी पठनीय है| कवि की कलम पूरे खण्ड काव्य में नि:शंक चलती दिखती है जो कि कवि के काव्य के प्रति समर्पण का अप्रतिम उदाहरण है| जिन्ना के दूत का मेहरचंद से मिलना, मेहरचंद द्वारा उस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर देना, और उस के तुरंत बाद ही मेहर चंद द्वारा भारत की राजधानी दिल्ली आ कर आगे की रणनीति हेतु विचार विमर्श का शब्दांकन कवि की समय चक्र पर पकड़ के साथ साथ कुशल प्रबंधन के अनुभव को भी दिखाता है|

अक्टूबर की छब्बिस दिनांक, तेरा भारत में विलय हुआ |
जिन्ना का, जिससे काश्मीर, पवि ह्रदय टूटकर खंड हुआ ||

काली निशि नीरव अमाख्यात, राका उजियारी के ऊपर |
काली काली घनघोर घटा, छाई आभामय नभ ऊपर ||

'ओ अल्ला ओ अकबर अल्ला’, था तुमुल घोष भू अम्बर पर |
वह्रि-विस्फोटक यन्त्र युक्त, यवनों का दल था तव उर पर ||

गृह-भवन, महल, मंदिर-मस्जिद, हो गए प्रकम्पित एक बार |
घुस गए दस्यु दल दानव से, करने को तुझ पर अना चार ||

एक रुचिकर पाठक की भाँति एक ही साँस में आगे पढ़ता चला गया मैं| काश्मीर के बारे में मैं भी कमोबेश वही सब जानता हूँ जो कि एक आम हिन्दुस्तानी जानता है, इस लिहाज से भी सोचा क्यूँ न एक बार इतिहास के पन्नों को किसी और के नज़रिए से भी पढ़ के देखा जाए| भारत पाक युद्ध बंदी के लिए रूस के हस्तक्षेप का भी वर्णन है इस पुस्तक में:-


रसिया का रुख तत्क्षण पलटा, कह दिया "करो अब युद्ध बंद" |
परिषद् से होकर साधिकार, भारत आनन को किया बंद ||

भोले शास्त्री को बहलाकर, बुलवाया उसने ताशकंद |
चव्हाण, स्वर्णसिंह गए साथ, लिख दिया पत्र वह मुहर बंद ||

लाल बहादुर शास्त्री के मन की व्यथा भी है इस में| उनके देहावसान पर ये पंक्तिया:-

जनवरी मास छासठ सन था, भारत माता का लाल उठा |
पाते ही दुखद वृत्त को तब, भारत जन-गण बौखला उठा ||

झंडे झुक गए शोक छाया, उजियाले में था अन्धकार |
हा ! लाल बहादुर चला गया, घर घर मातम था चीत्कार ||

हे काश्मीर ! तेरे कारण, खोया उस लाल-बहादुर को |
शक्ति साहस से दबा दिया, जिसने अयूब से दादुर को ||

आगे जा कर इस में बांग्ला देश मुक्ति आन्दोलन पर भी पढ़ने को मिलता है| उस दौरान की कुछ वीभत्स घटनाओं की कल्पना मात्र से ही आज भी दिल काँप उठता है, ये कुछ पंक्तियाँ:-

मार्शल-ला का हुक्म हुआ, सम्पूर्ण पूर्व बंगाले में |
जय बंगलादेश, मुजीबर जय, ये गूंज उठा बंगाले में ||

वह बंग बन्धु, वह बंग सिंह, अपने घर में था नज़र बंद |
जनता ने 'शासन को सोंपो ' की मांग ध्वनि को कर बुलंद||

नृशंस लूट खसोट हुई, लूटा सतीत्व तव अबला का|
बच्चों को लूटा जननी से, सिन्दूर भाल से महिला का ||

धन-धान्य लुटा बाज़ारों में, सुख शांति लुटी थी ग्रामों से |
कुसुमोंकी कलिता कोमलता, लुट गई सफल आरामों से||

घर-घरसे लूटी गई शांति, निर्भयता बच्चों से लूटी | 
वृद्धों से अनुभव लूट लिया, ‘आ बैल मार’ विपदा टूटी ||

कन्या का शील भंग होता, यह देख पिता क्रोधित होता |
परवश था दुष्ट पठानों से, बेचारा सिर धुनकर रोता ||

ओह, कितना वीभत्स था वह सब| इस पुस्तक में शुरू से आखिर तक काश्मीर के प्रति कई सारे तथ्यों को बतियाया गया है| काव्य से जुडी बातों को सम्पादकीय में आदरणीय विष्णु विराट जी ने विस्तार से लिखा है और इस काव्य प्रस्तुति के बारे में श्री उमेश चंद (विंग कमांडर) अध्यक्ष, वायुसेना एवं केंद्रीय विद्यालय फरीदाबाद का भेजा पत्र भी पढ़ने को मिला|

आज के दौर में जहाँ लोग अपने खुद के संसार से ही ऊपर आ नहीं पाते ऐसे में शेखर का अपने दादाजी के इस प्रबंध खंड काव्य को हम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास निस्संदेह प्रशंसनीय और वन्दनीय है| अपने दादाजी की काव्य कृति को ब्लॉग के ज़रिये अमरत्व प्रदान करने के लिए उन्हें शत शत साधुवाद| 

जीवन के दो तिहाई भाग [अमूमन एक तिहाई भाग सार्वजनिक स्थलों पर व्यतीत होता है] को धोती बनियान में गुजारने वाले और समाज में मास्टर साब के नाम से विख्यात श्री सुधाकर जी को तत्कालीन वित्तमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा 'सेवा श्री' सम्मान के अतिरिक्त साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा 'साहित्य वारिधि' सम्मान, ब्रज साहित्य संगम द्वारा 'ब्रज विभूति' सम्मान, ताहत माथुर चतुर्वेद केंद्रीय विद्यालय द्वारा 'कलांकर' सम्मान प्राप्त हुआ| दर्जनों भर पुस्तकों का प्रकाशन अपने जीवन काल में ही करा चुके 'सुधाकर' जी की दर्ज़न भर से अधिक पुस्तकें अब भी अप्रकाशित हैं| 

समय के इस सशक्त हस्ताक्षर से स्वयं साक्षात्कार करने के लिए उन के पोते द्वारा बनाए गये ब्लॉग पर अवश्य पधारें| उस ब्लॉग पर न केवल इन का परिचय, पुस्तकों का विवरण तथा सम्मान पत्रों की प्रतिलिपियाँ देखने को मिलेंगी वरन विवेचित पुस्तक 'काशमीर के प्रति' भी सॉफ्ट फ़ॉर्मेट में आप ऑनलाइन पढ़ सकते हैं|

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दुष्यंत कुमार की शायरी में मुहब्बत और ज़िंदगी

..................पिछली पोस्ट से जारी 

यही बोला और समझा जाता रहा है कि दुष्यंत कुमार एक क्रांन्तिकारी कवि / शायर थे| परन्तु दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल संसार सिर्फ इतना ही नहीं था [एक पाठक के लिए] हाँ ये ज़रूर है कि दुष्यंत कुमार की पहिचान क्रांतिकारी कवि / शायर वाली ही बनी|

कुछ ऐसे शेर छांटे हैं जो उन की क्रांतिकारी छवि से अलग हैं| देखिये ये अशआर और उस शख्सियत की मुहब्बत वाली छवि के दर्शन कीजिए :- 

वो घर में मेज़ पे कोहनी टिकाये बैठी है
थमी हुई है वहीं उम्र आजकल, लोगो

ये पूरी की पूरी ग़ज़ल तो मुहब्बत को ही समर्पित है:-

चांदनी छत पे चल रही होगी 
अब अकेली टहल रही होगी 

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा 
बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी 

कल का सपना बहुत सुहाना था 
ये उदासी न कल रही होगी 

सोचता हूँ कि बंद कमरे में 
एक शम्मा सी जल रही होगी 

तेरे गहनों सी खनखनाती थी 
बाजरे की फ़सल रही होगी 

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया 
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी


'मेज़ पर कोहनी टिकाए बैठे' होने का भाव हो या 'गहनों की खनक' और 'बाजरे की फ़सल' के बीच का तारतम्य - अद्भुत कल्पना का नज़ारा पेश करते हैं| 

ये अशआर भी मुहब्बत की जागीर ही कहे जाएँगे:- 

मैं तुम्हें छू कर ज़रा—सा छेड़ देता हूँ
और गीली पाँखुरी से ओस झरती है
***

तुम कहीं पर झील हो मैं एक नौका हूँ
इस तरह की कल्पना मन में उभरती है 
***

अगर ख़ुदा न करे सच ये ख़्वाब हो जाए
तेरी सहर हो मेरा आफ़ताब हो जाए
***


दुष्यंत कुमार की शायरी में ज़िंदगी को भी बड़े ही सलीक़े से बतियाया गया है - देखिए कुछ बानगियाँ:-

पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह
पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए 
***

बच्चे छलाँग मार के आगे निकल गये
रेले में फँस के बाप बिचारा बिछुड़ गया
***

दुख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें
सुख तो किसी कपूर की टिकिया-सा उड़ गया
***

लेकर उमंग संग चले थे हँसी—खुशी
पहुँचे नदी के घाट तो मेला उजड़ गया
***

जिन आँसुओं का सीधा तअल्लुक़ था पेट से
उन आँसुओं के साथ तेरा नाम जुड़ गया.
***

जैसे किसी बच्चे को खिलोने न मिले हों
फिरता हूँ कई यादों को सीने से लगाए
***

मुझको ईसा बना दिया तुमने
अब शिकायत भी की नहीं जाती
***

ख़रगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख़्वाब
फिरता है चाँदनी में कोई सच डरा—डरा 
***

तेरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तेरी ज़िन्दगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ
***


बेशक़ शराब पर भी लिखा है दुष्यंत कुमार ने:-

हमने भी पहली बार चखी तो बुरी लगी
कड़वी तुम्हें लगेगी मगर एक जाम और
***

एक आदत-सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती
***

जैसा कि कई गुणी जन बताते हैं कि दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में कई जगह गंभीर खामियाँ हैं, इस बात से बिल्कुल भी असहमति नहीं है, परन्तु साथ ही एक पाठक की हैसियत से इतना ज़रूर आभास होता है कि अगर कुछ खामियों को छोड दें तो उन्होने वाक़ई बहुत अच्छी प्रस्तुतियां दी हैं| उन्होने रमल या हज़ज़ जैसी सीधी सादी बहरों के अलावा कामिल और उस जैसी अन्य कठिन बहरों पर भी काम किया है| ग़ज़ल की बारीक़ जानकारियाँ रखने वाले लोग उन्हें पढ़ चुके हैं, अब तक कई बार|

दुष्यंत कुमार को चंद पोस्ट्स में समेट पाना मुश्क़िल है| फिलहाल उन के ही एक शेर के साथ यहाँ विश्राम लेते हैं, आगे यदि आप लोगों की रज़ामंदी रही तो कुछ और भी ले कर हाज़िर होंगे:-

उनका कहीं जहाँ में ठिकाना नहीं रहा
हमको तो मिल गया है अदब में मुकाम और.

साथियों का आदेश मिल चुका है 'हरिगीतिका' पर काम शुरू करने के लिए तो जल्द ही इस पर काम शुरू किया जाएगा, परन्तु उस के पहले अगले हफ्ते आप लोगों के साथ एक कालजयी कृति साझा करनी है|

एक युग का अंत

मशहूर पुष्टि मार्गीय चित्रकार व पहलवान श्री बंशीधर चतुर्वेदी

ईसवी सन १९७२, सारा देश आज़ादी की पच्चीसवीं सालगिरह मना रहा था। अलग अलग जगहों पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा था। इसी दरम्यान मथुरा नगरपालिका द्वारा भी विक्टोरिया पार्क में विराट कुश्ती दंगल का आयोजन किया गया| छोटे-बड़े पहलवानों की कई रोचक कुश्तियाँ हुई थीं इस दंगल में| पर सबसे ज़्यादा चर्चित रही ये कुश्ती:-


नारायण सिंह उस दौर में मथुरा के थानेदार हुआ करते थे। उन के रिश्ते के जाट पहलवान और काकाजी के बीच कुश्ती होना तय हुआ। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि चींटी और हाथी का मुक़ाबला था। अखाड़े के चारों ओर जनसमूह उमड़ पड़ा था। भीड़ सम्हाले नहीं सँभल पा रही थी। व्यवस्था को नियंत्रण में लेने के लिए खुद थानेदार साहब को अखाड़े के चारों ओर राउंड लगाना पड़ा। इधर थानेदार साहब राउंड लगा रहे थे, उधर दोनों पहलवानों ने हाथ मिलाया - चट - पटाक - धड़ाम - चारों खाने चित्त..................................। 

बस कुछ ऐसे ही अंदाज़ में काकाजी ने उस पहलवान को अखाड़े के बीचोंबीच चित कर दिया। खेल खत्म - दंग हो गए देखने वाले - ज़ोर ज़ोर से तालियाँ बजने लगीं। कब हाथ मिले, कब दांव चला और कब .................... कुछ पता चले उस के पहले तो कुश्ती खत्म।

थानेदार साहब तो भौंचक ही रह गए। तपाक से बोल पड़े, हमने तो देखा ही नहीं, कुश्ती कैसे हो गयी। पीछे से आ कर काकाजी  के कंधे पर हाथ रख कर [पहलवान लोग किसी के द्वारा कंधे या पीठ पर हाथ रखने को बर्दाश्त नहीं करते] कुछ बोलने वाले थे कि उस से पहले ही काकाजी ने अपने आप को उसी मुद्रा में पलटाया और इसी क्रम में थानेदार साहब के मुंह पर .......................... । 

बस फिर क्या था, जैसे कि सारे माहौल को साँप सूंघ गया था। एकदम पिनड्रोप साइलेंस। तभी मियां पाड़े के मशहूर पहलवान 'लाला पहलवान' अखाड़े पर आ कर थानेदार साहब से हाथ जोड़ कर बोले - 'हुजूर कुश्ती तो हो गयी। ये अखाड़ा है, और हम पहलवान इसे बेहतर समझते हैं।' थानेदार साहब ने न केवल स्थिति को स्वीकार किया बल्कि बाद में काकाजी को कोतवाली बुला कर उनका यथोचित सम्मान भी किया। उन के बटुए में जितने भी नोट और सिक्के थे, सारे के सारे काकाजी पर न्यौछावर कर दिये। [उस जमाने में सिक्के भी भरे रहते थे बटुओं में। चवन्नी में बहुत कुछ हो जाया करता था उन दिनों]

ऐसे थे हमारे काकाजी श्री बंशीधर चतुर्वेदी। १९३६ में जन्म हुआ और ११ अगस्त २०११ को हरिशरण को प्राप्त हुए। १० अगस्त से मथुरा में था, उस दरम्यान विभिन्न लोगों से उन के कई सारे संस्मरण सुनने को मिले। उन में से कुछ हमारी आने वाली पीढ़ियों के सन्दर्भ हेतु यहाँ लिख रहा हूँ।
  • आगरा, अलीगढ़, हाथरस, गोवर्धन, गोकुल, वृदावन के अलावा बड़ोदा, अहमदाबाद, नाथद्वारा बल्कि मुंबई में भी कई दंगलों में कुश्तियाँ लड़े| खास बात ये कि आजीवन एक भी दंगल में कुश्ती पिटे नहीं| या तो सामने वाले को पछाड़ा या फिर बराबरी पर रहे। 
  • बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि मोहन पहलवान के भूतेश्वर [मथुरा] के नए अखाड़े पर मास्टर चंदगी राम के चेले ने खुला चेलेंज दे दिया था - और उन महाशय को चित होने के लिए एक मिनट से भी कम समय लगा था। 
  • आन्यौर [गोवर्धन, मथुरा] में गोस्वामी बालक सर्व श्री ब्रज रमण लाल जी और सर्व श्री नटवर गोपाल जी  की मौजूदगी में बहु प्रतीक्षित दंगल में कमल पहलवान [अकखो कमल] को पछाड़ा। काकाजी ब्रज रमण लाल जी के और कमल पहलवान नटवर गोपाल जी के प्रिय पहलवान थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुश्ती के बाद लट्ठ युद्ध भी हो गया था।
  • मथुरा के रेडियो स्टेशन के दंगल में उस दौर के जाने माने पहलवान उमर बद्दल को अखाड़े के चारों खानों की यात्रा करा कर बीच में ला कर चित किया।
  • नाथद्वारा के दादू पहलवान को पछाड़ा। बुजुर्गों ने सुनाया कि 'अगड़ी टँगड़ी' के बल पर जीती ये कुश्ती।
  • छावनी के दंगल में दिल्ली के मोती पहलवान के चेले पतराम को पछाड़ा।
  • हर साल तीजन के दंगल में २-३ कुश्तियाँ लड़ते थे।
  • सुनने में तो ये भी आया कि कई सारे स्वनाम धन्य पहलवान - जिस दंगल में काकाजी को देख लेते थे - वहाँ से कुछ न कुछ बहाना बना कर खिसक लेते थे।
  •  बाटी गाम के रामजीत पहलवान और महोली के गोपाल पहलवान काकाजी पर विशेष कृपा रखते थे। उन के अनुसार आगरा रीज़न में और खास कर ब्रज क्षेत्र में उन के जैसा पहलवान / चित्रकार  नहीं था। 
  • रोज २ से ढाई हजार दंड-बैठक लगाते थे। जीवन के अंतिम दिन भी दैनिक ५-११ दंड बैठक लगाई थीं और छोटे बच्चों को पीठ पर बैठा कर कुछ क्षण खेले भी थे।
  • अपने यौवन काल में रोजाना करीब ५०० ग्राम घी और ५ किलो भेंस का कच्चा दूध पीते थे।
  • अखाड़े में कुश्ती की प्रेक्टिस करने को 'ज़ोर करना' कहा जाता है। दैनिक कसरत के बाद काकाजी अखाड़े में उतर कर पहले अपने ३-४ सीनियर्स के साथ और बाद में थकने तक ३ से ५ जूनियर्स के साथ ज़ोर करते थे।
  • सुन कर ताज्जुब हुआ कि हरिशरण को प्राप्त होने के चंद हफ्ते पहले भी कुछ नए लड़कों को उन्होने कुश्ती के दांव पेच सिखाये थे।
  • वडोदरा में अपने निवास के समीप एक आखाडा बनाया और उस पर इच्छुक व्यक्तियों को मल्ल विद्या सिखाते थे।
  • काकाजी ने मथुरा नागटीले पर स्व॰ श्री बलदेव जी के मार्गदर्शन में पहलवानी का शुभारम्भ किया। बाद में सर्व श्री ब्रज रमण लाल जी ने उन्हें प्रायोजित किया और स्व. श्री नेताजी [तिहैया] ने उन के पहलवानी केरियर में चार चाँद लगाए।

पूज्य काकाजी सिर्फ पहलवान ही नहीं थे। वे एक उत्कृष्ट कोटि के पुष्टि मार्गीय चित्रकार भी थे। शायद ही कोई पुष्टि मार्गीय हवेली / गोस्वामी परिवार होगा जिन्होने काकाजी की सेवाएँ न ली हों। वेटिंग लिस्ट बनी रहती थी हमेशा। सिर्फ एक संदर्भ से ही आप समझ सकते हैं। ७६ साल की उम्र में ५ अगस्त २०११ को अपने द्वारा बनाई हुई पिछवायी [सीनरी] डिलीवर की, घर पर दूसरे काम प्रोसेस में थे ही उस के अलावा और भी आगे के काम ले कर घर पर आए थे। किसे पता था कि वह उन के जीवन की अंतिम कृति साबित होगी। हम उस अंतिम कृति के छाया चित्र को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। उन के तेरह दिनों के दरम्यान मैंने खुद उन के लड़के के मोबाइल पर कुछ लोगों के फोन अटेण्ड किए जो काकाजी की सेवाएँ लेना चाह रहे थे।

काकाजी को सन २००६ में कड़ी कालोल वाले गोस्वामी बालक सर्व श्री द्वारकेश जी के कर कमलों द्वारा, अखिल गुजरात पुष्टि मार्गीय वैष्णव परिषद द्वारा घोषित 'उत्कृष्ट चित्रकारी' सम्मान प्राप्त हुआ।

सन १९८३ में 'संदेश' अखबार ने आप के पहलवानी और चित्रकारी के क्षेत्र में हासिल उपलब्धियों पर एक वृहद आलेख भी प्रस्तुत किया था।

बहुत बार कुछ घटित हो रहा होता है, हम उस के अंतर्निहित कारणों से अनभिज्ञ रहते हैं - बाद में पता चलता है कि वैसा क्यूँ हुआ था| संभव है आदरणीय प्राण शर्मा जी द्वारा दिये गए मिसरे पर कहा गया तथा ५ अगस्त को ही इसी ब्लॉग पर प्रकाशित किया गया ये शेर भी शायद इस क्रम की एक कड़ी हो :-

आने वाली पीढ़ी की खातिर मिल जुल कर|
आओ भरें सारा लिटरेचर कम्प्युटर में||

पूज्य काकाजी हमेशा हमारी स्मृतियों में रहेंगे। उन के द्वारा स्थापित किए गए मानकों का एक अंश भी यदि हम हासिल कर सके तो यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन के प्रति|
जय श्री कृष्ण ............................