4 दिसंबर 2011

अनुष्टुप छंद पर ग़ज़ल - जान है तो जहान है

नया काम 
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युग-युगांत से श्रीमन्, इष्ट ये ही विधान है। 
जीविका ही समस्या है, जीविका ही निदान है॥

दूसरों के लिये सोचे, दूसरों के लिये जिये। 
दूसरों की करे चिंता, जीव वो ही महान है॥ 

हम भी एक योद्धा हैं, आत्म-रक्षा करें न क्यों।
सब यही बताते हैं, जान है तो जहान है॥

सच में धर्म*-धारा का, ध्येय है कितना मलिन्। 
धर्म परोक्ष*-रूपेण:, लाभकारी दुकान है॥  

धर् म - क्


पुराना 
काम  
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युग युगां से यारो, सिर्फ ये ही विधान है।
ज़िंदगी ही समस्या है, ज़िंदगी ही निदान है ।१।

दूसरों के लिए सोचे, दूसरों के लिए जिए।
दूसरों की करे चिंता, आदमी वो महान है ।२।

हम भी यार इंसाँ हैं, आत्म रक्षा करें न क्यूँ।
सब यही बताते हैं, जान है तो जहान है।३।

मज़हबी कहानी को, ठीक से समझो ज़रा।
आपसी मामलों की ये, लाभकारी दुकान है।४।

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इस के आगे का पोर्शन छंद शास्त्र में रूचि रखने वालों के लिए है
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संस्कृत में लिखे गए कुछ अनुष्टुप छंदों के उदाहरण :-

श्री मदभगवद्गीता से:- 
धर्म क्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव ।
मामका पांडवाश्चैव   किमि कुर्वत संजय।।

ध/र्म/ क्षे/त्रे/ कु/रु/क्षे/त्रे/ स/म/वे/ता/ यु/युत्/स/व ।
मा/म/का/ पां/ड/वाश्/चै/व/   कि/मि/ कु-र/व/त/ सं/ज/य।।

ऋग्वेदांतर्गत श्री सूक्त से:- 
गंधद्वारां दुराधर्शां  नित्य पुष्टां करीषिणीं ।.
ईश्वरीं सर्व भूतानां तामि होप व्हये श्रि/यं।।

गं/ध/द्वा/रां/ दु/रा/ध-र/शां/ नित्/य/ पुष्/टां/ क/री/षि/णीं ।.
ई/श्व/रीं/ सर्/व/ भू/ता/नां/ ता/मि/ हो/प/ व्ह/ये/श्रि/यं।।

पंचतंत्र / मित्रभेद से:-
लोकानुग्रह कर्तारः, प्रवर्धन्ते नरेश्वराः ।
लोकानां संक्षयाच्चैव, क्षयं यान्ति न संशयः ॥ 

लो/का/नु/ग्र/ह/कर/ता/रः/, प्र/वर/धन्/ते/ न/रे/श्व/राः ।
लो/का/नां/ सं/क्ष/याच्/चै/व/, क्ष/यं/ यान्/ति/ न/ सं/श/यः ॥ 

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अनुष्टुप छंद की व्याख्या करता श्लोक :-

श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
द्विचतुः पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥

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अनुष्टुप छंद की सरल व्याख्या / परिभाषा

अनुष्टुप  छन्द
समवृत्त / वर्णिक छन्द
चार पद / चरण
प्रत्येक चरण में आठ वर्ण / अक्षर
पहले और तीसरे चरण में :-
पाँचवा अक्षर लघु
छठा और सातवाँ अक्षर गुरु
दूसरे और चौथे चरण में :-
पाँचवा अक्षर लघु
छठा अक्षर गुरु
सातवाँ अक्षर लघु

या इसे यूँ भी कह सकते हैं:- 
प्रत्येक चरण का ५ वाँ अक्षर लघु, ६ ठा अक्षर गुरु
पहले और तीसरे चरण का ७ वाँ अक्षर गुरु
दूसरे और चौथे चरण का ७ वाँ अक्षर लघु

पहले और तीसरे चरण के पांचवे, छठे और सातवे अक्षर - ल ला ला 
दुसरे और चौथे चरण के पांचवे, छठे और सातवे अक्षर - ल ला ल


चूंकि अनुष्टुप छन्द अधिकतर संस्कृत में ही लिखा गया है, इसलिए तुकांत के बारे में विधान स्वरुप कुछ लिखा हुआ नहीं है| हिंदी में लिखते वक़्त तुकांत यथासंभव लेना श्रेयस्कर है| बहुत से लोगों को इस छंद को रबर छंद का नाम देते सुना तो मन में आया क्यूँ न इस का फिर से अध्ययन किया जाए, और तब पता चला कि हलंत / विसर्ग वगैरह की वज़ह से लोग इसे रबर छंद समझ बैठते हैं - जबकि ये बाक़ायदा वर्ण के अनुसार एक विधिवत छंद है| श्री मद्भगवद्गीता, श्री भागवत, वेद, पुराण, वाल्मीकि रामायण के अतिरिक्त बहुत से स्तोत्र / कवच / अष्टक / स्तुति आदि  इस छंद में ही हैं|



छंद शास्त्र के अनुसार उपरोक्त परिभाषा उपलब्ध है। इस के अनुसार जब मैंने इस छंद पर लिखना शुरू किया तो पाया कि एक नियम और भी या तो है, या फिर होना चाहिए। मैंने हिंदी में अनुष्टुप छन्द लिखते वक़्त महसूस किया कि यदि इस के गाते हुए बोलने की मूल धुन को सहज स्वरुप में जीवित रखना है, तो हर पद का आख़िरी अक्षर भी गुरु /  दीर्घ होना चाहिए| जैसे कि ऊपर 'धर्म क्षेत्रे' वाले छन्द के चौथे पद के अंत के शब्द 'संजय' के अंतिम अक्षर 'य' को बोलते हुए इस 'य' को अतिरिक्त भार देना पड़ता है, यथा - संज-य| ठीक ऐसे ही 'युयुत्सव' बोला जाता है - युयुत्स-व| चूँकि हिंदी में हमें इस तरह बोलने / पढने की आदत नहीं होती, इसलिए मैंने अंतिम अक्षर गुरु लेने का निर्णय लिया है| यदि अन्य व्यक्तियों को भी यह सही लगे तो वह भी ऐसा कर सकते हैं| मैं समझता हूँ हलंत, विसर्ग बनाने या द्विकल [लघु] शब्दों को दीर्घ समान बोलने की बजाय गुरु लेना अधिक श्रेयस्कर है। हाँ यदि उस अंतिम अक्षर को लघु ले कर गुरु समान बोला जाये तो भी सही है, ये होता आया है; परंतु भावी संदर्भों को देखते हुए मुझे तो अब उस अंतिम अक्षर को गुरु की तरह लेना ही सही लग रहा है।

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आदरणीय विद्वतजन 
मैंने अपने मन की बात रखी है, यदि आप भी कोई बात साझा करना चाहते हैं, तो ऐसा करने की कृपा अवश्य करें|
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विकिपीडिया से 
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वाल्मीकि रामायण महाकाव्य की रचना करने के पश्चात आदिकवि कहलाए परन्तु वे एक आदिवासी समुदाय के व्यक्ति थे, वे कोई ब्राह्मण नहीं थे, एक बार महर्षि वाल्मीक एक क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। वह जोड़ा प्रेमालाप में लीन था, तभी उन्होंने देखा कि एक बहेलिये ने कामरत क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर महर्षि की करुणा जाग उठी और द्रवित अवस्था में उनके मुख से स्वतः ही यह श्लोक फूट पड़ा।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'
((निषाद)अरे बहेलिये, (यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्) तूने काममोहित मैथुनरत क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं (मा प्रतिष्ठा त्वगमः) हो पायेगी)
उपरोक्त छंद अनुष्टुप छंद है 

29 टिप्‍पणियां:

  1. गद्य से दिखने वाले छन्दों में एक व्यवस्थित क्रम छिपा है।

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  2. धन्य हुआ,

    आपके माध्यम से एक और जानकारी प्राप्त हुई |||

    आभार ||

    सुन्दर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकारें ||

    chitrayepanne.blogspot.com

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  3. बहुत ही ज्ञानवर्धक श्रृंख्ला चल रही है इस पोस्ट। नई-नई बातों की जानकारी मिलती है। यह ब्लॉग तो हमारे लिए रेफ़ेरेन्स बुक के समान होता जा रहा है।

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  4. ज़िंदगी ही समस्या है, ज़िंदगी ही निदान है ।
    सत्य वचन!
    यह पंक्ति अर्थसहित अंकित हो गयी मन मस्तिष्क पर! आभार आपकी लेखनी का!!!

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  5. ज़िंदगी ही समस्या है, ज़िंदगी ही निदान है
    सब यही बताते हैं, ज़ान है तो ज़हान है।
    सुन्दर पंक्तियाँ...

    छंद-पाठशाला बहुत अच्छी चल रही है,ज्ञानवर्धक!!!

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  6. सम्यक. आज सारा कुछ बेहतर ढंग से निखर आया है, नवीन भाई जी.

    करीब 20-25 दिनों पूर्व इन्हीं अनुष्टुप छंदों पर जब आपसे बातचीत हो रही थी तो अपने कुल जमा तथ्य शैशवावस्था में ही थे और साधना चल रही थी. आज बहुत कुछ निखर आया है. साझा करूँ तो, उसी प्रयास के क्रम में हमने भी उत्साहवश कुछ द्विपदियाँ लिख डाली थीं. खैर, प्रयास के क्रम में बहुत कुछ उठाना, मिटाना चलता रहता है.

    भाई, आपने कहा है -
    //चूँकि हिंदी में हमें इस तरह बोलने / पढने की आदत नहीं होती, इसलिए मैंने अंतिम अक्षर गुरु लेने का निर्णय लिया है| //

    लेकिन आप द्वारा छंद विधा पर उद्धृत श्लोक इस तथ्य को ही रेखांकित करता दीख रहा है.

    श्लोक की दूसरी पंक्ति कहती है -
    //द्विचतुः पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः //
    दूसरे और चौथे दोनों (के) सप्तम् हर्स्व (होंगे) अन्य (यानि अगला) दोनों दीर्घ.

    नवीन भाई, वर्णिक छंदों में वर्ण की गणना के क्रम में दीर्घ या लघु कभी constraint नहीं होते. सभी वर्णों का एकाकी वज़ूद बराबरी का हुआ करता है. इस स्थिति में, हिन्दी भाषा में संस्कृत की तरह दूसरे और चौथे पद के आठवें वर्ण को एक अक्षर का अथवा हलंतकारी अक्षर का रखने से भ्रम की स्थिति बन जायेगी. क्योंकि, हिन्दी भाषा में एक ’अक्षर’ को लघु की तरह लिये जाने की परिपाटी है. तो उस हिसाब से छंद रचनाकार के लिये सहज ही असुविधा होने लगेगी.

    श्री मद्भग्वद्गीता के पाठ के क्रम में, जो कि अनुष्टुप छंद के श्लोकों की अद्भुत गागर है, अपना स्वर-प्रहार दूसरे और चौथे पद के आठवें वर्ण पर दीर्घ का ही होता है, अतः हिन्दी भाषा में इन छंदों पर काम करने के क्रम में दूसरे और चौथे पद का आठवाँ वर्ण लघु या एक मात्रिक हो ही नहीं सकता. होना भी नहीं चाहिये.

    यानि, यह बात किसी मान्यता पर न हो कर तथ्य पर आधारित है, आप ऐसा कहें.

    आपने अनुष्टुप छंद पर विस्तृत चर्चा की. इस पोस्ट हेतु आपका हार्दिक आभार.

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  7. कल 06/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. अनुष्टुप छंद का हिंदी में प्रयोग ...बहुत अच्छी जानकारी मिली

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  9. आपकी रचना भी श्रेष्‍ठ है और छंद की जानकारी भी श्रेष्‍ठ है। बस छंद कुछ कठिन लग रहा है।

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  10. आपने बहुत रोचक ढंग से समझाया है आदरणीय नविन भाई पर लगता है अनुष्टुप छंद को समझने के लिये काफी गहरे डूबना होगा... आदरनीय सौरभ भईया की चर्चा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है...
    इस ज्ञानवर्धक प्रस्तुति के लिये सादर आभार..

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  11. चलो हम जैसे लोग भी आपकी इस ज्ञानवर्धक पोस्ट से कुछ सीख जायेंगे.

    बधाई.

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  12. चलो हम जैसे लोग भी आपकी इस ज्ञानवर्धक पोस्ट से कुछ सीख जायेंगे.

    बधाई.

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  13. बहुत क्षमाप्रार्थी हूँ भाई नवीन जी,
    टिप्पणी में एक लफ्ज "मुझे" छूट जाने से कुछ भ्रम उत्पन्न हो गया है.... और वह अर्थ बिलकुल भी नहीं था जो इस टीप से निकल आया....
    मैं दरअसल "अनुष्टुप छंद को समझने के लिये मुझे काफी गहरे डूबना होगा..." कहना चाह रहा था, शब्दों के फेर में अनर्थ हो गया....:))
    अनजाने में हुए भूल के लिए विद्वजनों से ह्रदय से क्षमा याचना करता हूँ....
    इस मूढ़ अकिंचन को क्षमा करेंगे...
    सादर...

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  14. संजय भाई हम सब विद्यार्थी हैं, और मिल कर कार्य कर रहे हैं। आप निश्चिंत रहिएगा - यह सामूहिक कार्य का एक हिस्सा मात्र है।

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  15. .



    प्रियात्मन् नवीन जी
    बहुत श्रम और लगन से तैयार एक और प्रविष्टि के लिए आभार ! साधुवाद !

    आपने बहुत अच्छी तरह समझाया है …
    मैं छंद के साथ लय में भी रुचि रखने के लिए जाना जाता हूं …
    कवित्त और सवैये जैसे वार्णिक छंदों की अंतर्लय मां सरस्वती की कृपा से समझ में आ जाने के कारण इन छंदों पर निरंतर काम करता रहता हूं ।

    अनुष्टुप को आपने जिस तरह समझाया है , बहुत शोध के पश्चात् ही बताया है । … लेकिन फलां चरण में यह अक्षर लघु यह अक्षर गुरू होना चाहिए जैसी अनिवार्यताओं के कारण सृजन की सहजता पर तो अंकुश लग ही गया …

    रचनाकार भाव और शिल्प के माध्यम से कुछ दे पाने की जगह जोड़-तोड़ में ही लगा रहेगा …

    अनुष्टुप के हिंदी में सृजित कुछ लोकप्रिय और रंजक-रोचक उदाहरण यहां रख पाते तो और मदद मिलती इस छंद से घनिष्ठता बढ़ाने में :)

    आपकी रचना श्रेष्ठ है , लेकिन अनुष्टुप की आंतरिक लय से अभी मेरी अनभिज्ञता के कारण मैं इसमें प्रवाह नहीं देख-समझ पा रहा …

    शुभकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. दूसरों के लिए सोचे, दूसरों के लिए जिए।
    दूसरों की करे चिंता, आदमी वो महान है ...

    वाह नवीन जी ... आनद आ जाता है आपकी पोस्ट, व्याख्या और छंद पढ़ के .... ये तो गज़ल के शेरो सामान ही है ... लाजवाब ...

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  17. आपका पोस्ट मन को प्रभावित करने में सार्थक रहा । बहुत अच्छी प्रस्तुति । मेर नए पोस्ट ' आरसी प्रसाद सिंह ' पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं । धन्यवाद ।

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. परमादरणीय हरिहर जी,

    आप द्वारा हुए इस व्यंग्य-प्रयास से ही मन मुग्ध है.

    चकित हूँ, कि आपने अनुष्टुप छंदों पर तब काम किया था जब संभवतः हिन्दी भाषा में इन पर शायद ही काम हुआ हो.

    बानगी -

    देख भारत की सेना, जोश से बढ़ती हुई।
    चीन की फौज में भारी, खलबली मची हुई॥


    वर्णित नियमों के अनुरूप उपरोक्त बंद विशुद्ध है. प्रथम और तृतीय चरण में पंचम्, षष्ठम् एवं सप्तम् वर्ण क्रमशः ’लघु’ ’गुरु’ ’गुरु ही हैं तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में वही वार्णिक क्रम क्रमशः ’लघु’ ’गुरु’ ’लघु’ है. अष्टम् वर्ण अपने आप ’गुरु’ बन गया है. ... . सम्यक !

    आदरणीय, आप अवश्य ही अनुष्टुप छंदों का सस्वर पाठ करते होंगे. चाहे मद्भगवद्गीता या श्री सुक्तम् या गायत्री कवचम् ही क्यों न हो.

    उस काल में उस घटना पर, जिसकी भारतीय जन-मानस पर अमिट रेख पड़ चुकी है, हुआ आपका व्यंग्य-प्रयास सादर श्लाघनीय व अनुकरणीय है.

    सादर

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. आ. हरिहर जी, आप का छंदों में रुझान सहज ही प्रभावित करता है। हरिगीतिका वाले आयोजन में आप शायद काफी देर से शामिल हुए थे। आप की मेल पर भी मेरी नजर बहुत देर से पड़ी, जो आप ने होटमेल पर भेजी थीं। खैर अगले आयोजन में आप की सहभागिता के लिए मैं भी उत्सुक रहूँगा।

    आपने अनुष्टुप छंद पर पहले ही काम किया हुआ है, यह जान कर बहुत प्रसन्नता हुई। आ. सौरभ जी ने आवश्यक संकेत दे दिया है, उम्मीद करता हूँ इस से आप के साथ अन्य साथी भी लाभान्वित होंगे। मंच पर पधारते रहिएगा।

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  23. नवीन जी , सौरभ जी, जानकारी के लिये धन्यवाद । यह वह समय था जब भारत पर चीन ने आक्रमण कर दिया था। तब अनुष्टुप-छन्द के बारे में मेरा कुल ज्ञान इतना ही था कि इसके प्रत्येक पद में आठ वर्ण होते हैं। इस आधार पर मैंने अपनी ’चीनी गीता’ लिखी थी। सौरभ जी का ’अंतिम वर्ण गुरु” वाला नियम इसमें अपने आप लागू हो जाता है। अंतिम छंद में “यत्र अन्याय द्वेष च” में तो संस्कृत का सहारा लेने से लघु में काम चल गया है।
    मुझे नहीं पता ’लघु, गुरु, गुरु’ व ’लघु, गुरु, लघु’ वाला नियम हिन्दी में आवश्यक समझा जाना चाहिये या नहीं। आपकी राय को मान्य रखते हुये भविष्य में छन्द लिखूंगा।


    चीनी जनता उवाच:

    लद्दाख च नेफा क्षेत्रे, दोनो सेना इकठ्ठी हैं।
    चीनी फौजों की हालत, कहें पेकिंग रेडियो॥

    पेकिंग रेडियो उवाच:

    देख भारत की सेना, जोश से बढ़ती हुई।
    चीन की फौज में भारी, खलबली मची हुई॥
    निर्भई हिन्द सैनिक, वीरता से लड़ रहा ।
    चीन की फौज ने डर, चाऊ से तब यों कहा॥

    चीनी फौज उवाच :

    ’हिन्द चीनी भाई भाई’ व्यर्थ इनसे क्यों लड़ें।
    सिंहो से युद्ध करके , खून खच्चर क्यों करें॥
    मित्र देश भारत से द्वेष लेकर क्यों मरें ।
    बुद्ध् शरणं गच्छामि युद्ध इनसे क्यों करें ।।

    क्षुधा-पीड़ा बढ़ रही रोटी हमको दीजिये॥
    कुटुम्बी चाहते रोजी, ख्याल उनका कीजिये॥


    चाऊ उवाच:

    हे सियारों के अग्रज , सर्प-चाल चला करो।
    हिटलर चंगेज़खाँ, रावण के आदर्श हो॥

    आज का युग है ऐसा, आप हैं युद्ध-क्षेत्र में।
    आपका सारथी चाऊ, बैठा है लाल चीन में॥

    खून धोखाघड़ी में ही, चीन का इतिहास है।
    धूर्तता चालबाजी में, कन्फ्यूशस् अपवाद है॥

    यदा यदा जनसंख्या, बढ़ती है चीन देश में।
    आबादी रोकने हेतु चाऊ माऊ सृजाम्यहम् ॥
    परित्राणाय दुष्टानाम् विनाशाय च सभ्यताम् ।
    प्रलय स्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

    नहीं मिले भोजन तो पशु हत्या ही कीजिये।
    चाहते हो दौलत तो नेफा भी लूट लीजिये॥
    लूट लो भारत तो क्या पाक बचने पायगा ।
    झूठ बोलो चिल्ला कर झूठ सच हो जायगा ॥

    धूर्तता, झूठ, अन्याय स्वर्ग के तीन द्वार हैं।
    एशिया को जीत लो तो, फिर तो मालामाल हैं॥

    जब हों रोटी के लाले, शस्त्र धारण कीजिये।
    अपने देश बन्धु को फौज में भर लीजिये॥

    रेडियो पेकिंग उवाच:

    यत्र चाऊ धुर्तराजो यत्र अन्याय द्वेष च।
    वहाँ श्रीविजय होगी मेरे मतानुसार तो॥

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  24. नवीन जी आपके छंद शास्त्र के ज्ञान के समक्ष नत मस्तक हूँ...बहुत जानकारी भरी पोस्ट...बधाई स्वीकारें...
    नीरज

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  25. “बढ़ती है चीन देश में।“ का शुद्ध पाठ है : “बढ़ती चीन देश में।“

    मेरी भूल के लिये क्षमा-प्रार्थना।

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