24 November 2011

निष्काम कर्मयोग की प्रासंगिकता –गीता - मयंक अवस्थी

गीता मनोविज्ञान की पहली (और अंतिम भी) पुस्तक है। यह मनुष्य के  रुग्ण जीवन के लिये वरदान स्वरूप दी गयी विचार-चिकित्सा प्रणाली है । इसका उदगम महाकाव्य महाभारत है । 

यहाँ हमें यह शोध नहीं करना कि घोर आँगिरस ने कृष्ण को साँख्ययोग सिखाया कि नहीं , न यह कि उपनिषदों की  सार गीता वास्तव में व्यास परम्परा ने युगपुरुष कृष्ण के माध्यम से एक घटना का आलम्बन ले कर महाभारत में आरोपित कर दी और न ये कि आज के जटिल जीवन में धर्म की औचित्यपरता अप्रासंगिक हो चली है । वस्तुत: कर्मयोग के माध्यम से दिया गया  जीवन का समाधान देश, काल और परिस्थिति के बन्धनों से सर्वथा मुक्त है और सबसे कीमती है ।

मनुष्य पृकृति  की  शेष प्राणियो की तुलना में अधिक परिष्कृत निर्मिति है । अन्य प्राणियो के एकल और समूह्गत व्यवहार लगभग परिभाषित होते हैं , भोजन , अनुकूलन , प्रतिक्रिया और व्यवहार के संदर्भ में शेष प्राणिजगत की परिधि और विस्तार को मनुष्य ने सही सही परिभाषित किया है, परंतु मनुष्य स्वयं को परिभाषित करें इसके लिये वही मनुष्य अधिकृत हो सकता है जो मनुष्यों  में निर्विवाद श्रेष्ठतम हो । गीता भी किसी और के मुँह से सर्वस्वीकार्य नहीं हो सकती थी सिवाय कृष्ण के और न ही उसके लिये कोई और समय इससे अधिक अनुकूल हो सकता था सिवाय उस क्षण के जब महाभारत युद्ध आरम्भ् होने के पहले अर्जुन की अनुशासित और विरक्त चेतना पर उनका मोह अधिकार करने लगा था ।
कहानी तो एक माध्यम है वस्तुत: गीता हमारे लिये एक अनुपमेय औषधि है । क्योंकि हमारा जीवन अनेक अर्थहीन और निस्सार विश्वासों  की रस्सियों से बाँधा गया है जिनका जीवन के विकास से कोई सम्बन्ध ही नहीं है और बहुधा ये विश्वास प्रणालियाँ  जीवन के सह्ज प्रवाह की गति में बाधा का कार्य करती  हैं । और आवश्यकता है विचार तंत्र में आरोपित इस अर्थहीन अज्ञान को निकलने की । जैसे कम्प्यूटर की यांत्रिक संचरना और प्रोग्रामिंग में बाधा उत्पन्न होने पर हम यांत्रिक और प्रोग्रामिंग के ही समाधान नियोजित करते हैं । वायरस होने पर एंटी वायरस द्वारा समाधन करते है। प्रोग्रामिग खराब होने पर रीफार्मेटिंग द्वारा और कोई पुर्ज़ा खराब होने पर उसके विकल्प द्वारा हम इसे पुन: सुचारु करते हैं वैसे ही मनुष्य जो कि पृकति की बनाई हुयी सबसे सशक्त जैविक चेतना है इसके विश्वास-तंत्र की पुनर्निर्मिति (रीफार्मेटिग )  की कीमिया गीता में लिखी है । पृकृति के सभी प्राणी समष्टि के साथ समस्वरता में जीते हैं । मनुष्य का निर्माण भी पृकृति ने जीवन के विकास की श्रंखला में एक विशेष कड़ी के रूप में किया है । प्रत्येक मनुष्य पृक़्रति द्वारा प्रद्त्त गुणो के वशीभूत अपने कर्म करता है और जब वह अपने श्रेय कर्म से गिरता है तो जीवन के साथ पुन: समस्वरता स्थापित करने के लिये मनुष्य जाति को भी उसके अनुकूल  औषिधीय समाधान ईश्वरप्रद्दत्त व्यवस्था गीता  के रूप में उपलब्ध कराया गया है। इसमें मनुष्यमात्र का अधिकार है ।        
गीता का सूत्र है  निष्काम कर्मयोग य़ह सुनने में इतना सरल है कि सहज विश्वास ही  नहीं होता कि यह जीवन के अनंतिम समाधान का अपराजेय सूत्र है । परंतु है ।

वैसे   हमारे यहाँ देवताओ के पूजन की अनेक विधियाँ हैं । जैसे श्री गणेश पूजा- गौरा पार्वती यानी शैव-शक्ति की पृकृति शक्ति अर्थात आस्था ने अपने मेल  से अपनी रक्षा के लिये एक पुतला बनाया जो बुद्धि  है अर्थात बुद्धि आस्था का मैल है और इसका काम उसकी रक्षा है । यह बुद्धि स्वयं आस्था को शिव से मिलने में बाधा बनती है तो शिव इसका सर काट देते है । परंतु आस्था इसके न होने से दुखी होती है तो शिव इस बुद्धि के ऊपर हाथी का सर लगा देते हैं । हाथी का सर- यानी अपार सूचना बुद्धि के पास है परंतु सवारी चूहे की?! यानी बुद्धि की गति उसकी  तर्क क्षमता पर निर्भर है चूहे का काम हर चीज़ को कुतरना है बुद्धि भी तर्क द्वारा हर बात को कुतरती है । परंतु जब देवताओं में प्रथम पूज्य की स्पर्धा हुयी तो गणेश ने आस्था और शिव की एक परक्रिमा कर के प्रथम पूज्य का दर्जा हासिल कर लिया । तर्क या चूहे की सवारी पर आप बहुत दूर नही जा सकते इसलिये आपकी प्रतिष्ठा है अपनी आस्थाओं और अपने शिव के इर्द गिर्द रहने में । फिर हाथी के दो दाँत दिखाने के ही होते  है इसलिये जब जीवन का महाकाव्य महाभारत श्रीगणेश ने लिखा तो अपना एक दाँत तोड- कर लेखनी बना ली । एक्दंत संकेत देते है कि बुद्धि चेतना के विकास के महाकाव्य लिखे और शहादत दे, न कि दिखाने के दाँत बचाये । इस बुद्धि के देवता की प्रतिमा के संकेतों को आप जब समझ लेते है तो प्रतिमा की प्रासंगिकता सम्पूर्ण हो जाने के बाद इसे विसर्जित कर देते है ।

सावित्री हमारी चेतना की एक अहर्निश शक्ति है । हमारे अन्दर का सत्य ( सत्यवान) अपने अन्धे माता पिता के साथ अपना राज्य ( जीवन का सौन्दर्य ) खो कर रह रहा है ( मन अन्धा होता है इसको पिता मानने पर सत्य अज्ञान के जंगल में भटकता है)। काल की गति अहर्निश है इसलिये कि सत्य मरता नही परंतु उसे भ्रम है कि वह मरने जा रहा है । चेतना की प्रच्छन्न शक्ति सावित्री मृत्युबोध के क्षणों में सत्य को काल (समय-बन्धन ) से मुक्त कर लेती है । यह सावित्री की कथा है जो मनवीय चेतना की अपरमित सम्भाव्य  शक्तियों की ओर संकेत करती है ।

हम ज्ञान के धरातल पर त्रिदेव को जानते है । अनंत अंतरिक्ष ब्रह्मा है यह  अचल , स्थिर सर्वव्यापी , अक्षर , गुणहीन और निर्विकार है । समय के दो अवश्यंभावी प्रभाव इसकी क्षरण शक्ति और इसकी निर्माण शक्ति यानी शिव और विष्णु अद्यांत , अगम अगोचर और सर्वव्यापी है । तो  समय और स्थान अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश से ये संसार बना हुआ है और गतिशील है ।
सवाल उठता है कि जीवन में इन सारी अलौकिक कथाओ को जानने  और समझने का क्या प्रयोजन है । यम नचिकेता की कहानी, ध्रुव की कहानी, श्वेतुकेतु की कहानी इतने उपनिषद पढ कर क्या होना है ?! सच यह है कि पसमंज़र मे हमारी चेतना मुक्ति और विराम खोज रही है । तो आइये गीता का पाठ कीजिये  आपको इसके बाद वेदों को  पढने की अथवा  किसी कर्मकाण्ड की कोई आवश्यकता नही है।

आप पृकृति की निर्मिति है और आपके सभी कार्य समष्टि के अनुशासन में होने के कारण दैवीय ही है । कामना या तृष्णा के कारण जीवन में दु:ख है । आप निश्चित परिणाम चाहते है जबकि आपको कर्मों के चुनाव का अधिकार दिया गया है जो कि पृकृति में किसी अन्य प्राणी को नहीं दिया गया । परिणाम समष्टि स्वयं निर्धारित करती है । विभिन्न प्रकार के आस्तिक विश्वास सुंनने के कारण आपके पास निश्चयात्मक बुद्धि नहीं  है। गीता का सूत्र है कर्मफल ईश्वर को समर्पित करके करने योग्य कर्म करना । क्योंकि हमारे कर्मो के पीछे मूल शक्ति तृष्णा या अभीप्सा की है , हम एक निश्चित परिणाम की प्रत्याशा में बँध कर कर्म करते है परंतु हमारे प्रत्येक प्रायोजित कर्म के साथ साथ अनेक अन्य घटनायें इसी कालखण्ड में समांतर चलती हैं जिनकी गति हमारे कर्म के परिणामो को प्रभावित करती है और हम सभी घट्नायें नहीं गिन सकते । शेष सभी घट्नाये अपनी समग्रता में दैव कही जाती हैं और ये हमारे कर्म के परिणाम को सकारात्मक या नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं । चूँकि  कोई भी कर्म वाच्छित फल देने पर अनुभूति में पहले से संचित तृष्णा को गिरा देता है और आप की चेतना क्षणांश की मुक्ति का अनुभव करती  है इसलिये यदि आप निष्काम कर्म करते हैं तो इस कर्म के मूल में तृष्णा न होने के कारण आपकी भावदशा उस मुक्ति को सतत अनुभव करती रहती है जो अन्यथा क्षणांश के लिये ही मिलता है । सबसे बड़ी बात इसमें कोई उलटा फलरूप  दोष नहीं और फिर आपका अतृष्ण कर्म स्वस्थ और निष्कलुष भी होता है जो कि समष्टि के हित हेतु समष्टि द्वारा नियोजित कर्म होता है । अनंत इच्छायें पूर्ण होने पर आपकी चेतना जो सुख अनुभूत कर सकती  है वह इस निष्काम कर्मयोग द्वारा आपको स्थायी रूप से मिल जाता है ।
सुनने में असान होने के बावज़ूद निष्काम कर्मयोग अपना वर्तुल स्वयं है । यदि कोई यह कहता है कि मैने तो बहुत निष्काम भाव से कर्म किया लेकिन मुझे तो कोई सुख नही मिला तो आप स्वय सोचिये कि सुख पाने की लालसा से किया गया कर्म क्या निष्काम की श्रेणी में आता है?!

तृष्णा बहुत कुछ छीन रही है । यह विराट से आपको जुड़ने नहीं देती और हजारो अर्थहीन विश्वास इसने आपकी चेतना में बना रखे है यह आपको या तो भविष्य केन्द्रित रखती है या अतीत केन्द्रित और दोनो ही आपके वर्तमान को नष्ट  कर रहे हैं । आप ईश्वर को पाना चाहते हैं , आप अंतरिक्ष मे जाना चाहते हैं , आप धनवान बनना चाहते हैं आप मृत्यु नही चाहते । परंतु सच यह है कि आप सतत ईश्वरस्वरूप  ही हैं ठीक वैसे ही जैसे आपका एक एक रोम आप ही है वैसे ही आप न्यूनतम और अधिकतम ईश्वर ही है । और कुछ आप हो ही नहीं सकते। यदि कोई मोबाइल काम कर रहा है तो फिर वह  टावर  से जुड़ा है तो आपकी भी मन बुद्धि इन्द्रियाँ यदि कार्यरत है तो ईश्वर आपको प्राप्त ही है । आपकी पृथ्वी अंतरिक्ष में है इसके आगे पीछे ऊपर नीचे सब ओर अंतरिक्ष ही है  इसलिये आप सदा अंतिरक्ष में ही हैं । धन से बिस्तर खरीद सकते हैं नींद नहीं, पुस्तक खरीद सकते है ज्ञान नहीं ,प्रसाधन खरीद सकते हैं सौन्दर्य नही ,धन की सामर्थ्य सीमित है इसलिये बिस्तर नहीं उसका प्रतिफलन नींद, पुस्तक नहीं उसका प्राबल्य ज्ञान, और प्रसाधन नही स्वास्थ्य और मुक्ति की भाव-दशा आपका असली धन है और यदि यह है तो आप धनवान ही हैं । आप मृत्यु नहीं  चाहते परंतु अप्रमेय आत्मा की म्रत्यु नहीं होती क्यो कि इसका जन्म भी नहीं होता । दूसरी बात यदि शरीर की मृत्यु पृकृति ने नहीं बनाई होती तो शायद मनुष्य अमरत्व से अधिक मृत्यु की कामना करता ।

हम मन्दिर जाते है तो अपनी सुविधा यानी अपने जूते उतारते है अपना अहं तिरोहित करते हैं यानी सर झुकाते है । जो प्रसाद मिलता है स्वीकार करते है नहीं देखते कि किसी और को हमसे जियादा मिला या कम । लेकिन बाहर निकलते ही हम इस छोटी सी कार्यशाला से कुछ भी नही सीखते । बाहर भी आसमान की छत वाला ईश्वर का ही मन्दिर है यहाँ हम फिर वही सुविधा ,अहं और सापेक्षता धारण कर लेते है । सारे तीर्थ दुर्गम स्थानो पर बनाये गये क्योकि ये  जीवन सीखने की प्राकृतिक कार्यशालायें है । कुछ दिनों का शरीर का कष्ट आस्था की भावना से समाज के सभी वर्गो के साथ साथ चलना और भोजन भूगोल के साथ अनुकूलन जीवन को ही सिखाने की प्रविधि है जो तीर्थयात्राओ के मूल में छिपी हुयी है परन्तु शायद इस वाणिज्यिक जगत मे हम इसका मूल प्रयोजन भूल गये हैं ।

निष्काम कर्मयोग आपकी रुग्ण चेतना हेतु वह औषधि है कि यह भविष्योन्मुख और अतीतजीवी चित्त को शुद्ध वर्तमानजीवी बना देती है यह आपकी चेतना के  लिये रिफ्रेश और डिलीट कमाण्ड सा है अर्थहीन स्मृति को नष्ट  कर देता है और औचित्यपरक को जगा देता है । योगारूढस्य यानी योग मे आरूढ होने पर आपको जीवन की नैसर्गिक गति पुन: प्राप्त हो जाती है ठीक वैसे ही जैसे अश्वारूढ होने पर अश्व की गति से आप गंतव्य तक शीघ्र पहुँचते है वैसे ही योगारूढ होने पर आप जीवन के श्रेय साधन तक शीघ्र पहुँचते हैं । इसके लिये इतना ही करना है कि कर्मफल ईश्वर को समर्पित कर मर्यादोचित कर्म करने है ।

आपकी मूल स्मृति चैतन्य है इसमे विचार नही हैं । परंतु मूल स्मृति का अभाव होने पर आप किसी न किसी  विचार की सत्ता मे जी रहे होते हैं और  विचार तानाशाह है इसके इख़्तियार में आपका जीवन कैदी जैसा है । विश्वास के तंत्र में जो धार्मिक और सामाजिक शिक्षा आपको बार -बार दी गयी आप पूरा जीवन उसी में बँध  कर जीते हैं जबकि आपका अपना अनुभव सत्य का सबसे बड़ा पैमाना है । फिर भी हममें से कुछ ही सत्य के निर्धारण के लिये अनुभूति के धरातल का सम्यक प्रयोग करते हैं ।गीता में  कर्मयोग के रूप में अप्रतिम और विलक्षण रूप में  जीवन के रहस्य की कुँजी प्रदान की गयी है ।
मयंक अवस्थी
नागपुर                      

19 comments:

  1. पाठक गण परनाम, सुन्दर प्रस्तुति बांचिये ||
    घूमो सुबहो-शाम, उत्तम चर्चा मंच पर ||

    शुक्रवारीय चर्चा-मंच ||

    charchamanch.blogspot.com

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  2. आदरणीय रविकर जी !! इस सन्दर्भ पर चर्चा आयोजित करने हेतु आपका स्वागत भी करता हूँ और क्रतज्ञताज्ञापन भी - नारायण का सन्दर्भ -विचार तंत्र को दैवी सम्पदा से सम्पन्न करता है । शुभाकाँक्षी --मयंक

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  3. ज्ञानवर्धक लेख !

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  4. जितनी बार पढ़ते हैं, समझ और विकसित होती है।

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  5. बहुत सारगर्भित और ज्ञानप्रद आलेख...

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  6. प्रणाम, प्रमाण को!वाह!

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  7. काफ़ी सारी नई बातें जानने को मिलीं।

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  8. Arvind Jangid --अरविन्द जी !! स्वागत और आभार !!!

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  9. प्रवीण पाण्डेय !! प्रवीण जी !! आभार !! इस आलेख की सम्प्रेषणीयता को आपके शब्दों से बल मिला है !!

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  10. Kailash C Sharma !! आदरणीय शर्मा जी !! आपकी सकारात्मक संस्तुति हेतु अतिशय आभारी हूँ !!

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  11. ktheLeo !! बहुत बहुत धन्यवाद आपको !!गीता की सतत पुनरावृत्ति जीवन पर निश्चित रूप से सार्थक अंतर डालती है !!यह sublimation of desire to cosmic energy की कीमिया है !! आभार !!

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  12. गीता में अनेक श्लोक रहस्यमय है...
    ध्यायतो विषयांन्पुंस संगस्तेषूपजायते .... विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है –आसक्तिसे विषयों की कामना और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है – क्रोध समभाव और सम्यक स्मृति से असहजता की स्थिति है ! इससे ही हम मूल स्मृतिसे विमुख हुये और भूल गये कि हम ईश्वर के अंश होने के कारण ईश्वर स्वरूप ही हैं ... क्रोध के मूल में तृष्णा होती है ... तृष्णा या कामना या इच्छा सब एक ही बात है .. प्रसाद जी कमायनी में कहते है .. बुद्धि , मनीषा ., मति आशा /// चिंता तेरे हैं कितने नाम !!! इसलिये यदि आप के कर्म के मूल में तृष्णा है तो यह जीवन अधोमुखी गति को प्राप्त होगा ... वही यज्ञ अर्थात विष्णु को समर्पित किया हुआ कर्म निरपेक्ष ब्रह्मा को प्राप्त होने के कारण ईश्वरीय कर्म होता है और समष्टि द्वारा निर्धारित हुआ हमारा सम्यक कर्म होता है इसीलिये निर्दोष होता है ... इस कर्म को ही करना है ... निष्काम भाव धारण करने के बाद असहज कर्म तिरोहित हो जायेंगे और आपका जीवन भी यज्ञ समान हो जायेगा ।
    सहज कर्म की तलाश में हमारे सभी मूर्धन्य कवियों का जीवन स्मरणीय है ... जिस डाल पर बैठे थे उसको काटने वाले कालिदास में मूढ भाव का अभाव नहीं था ...लेकिन एक बार उन्होंने जो स्वय़ं मे अंतर्यात्रा आरम्भ की .. तो साहित्य को एक युगजयी कवि मिला –इसकी उत्प्रेरक विदुषी विद्योत्तम रहीं लेकिन किसी न किसी को तो निमित्त होना ही था ! आसक्त तुलसीदास दुबे को रत्नावली के उपालम्भ ने ईश्वर भक्ति केलिये समर्पित कर दिया और महर्षि वाल्मीकि पहले जीवन पोषण हेतु डकैती जैसा निक्रष्ट कर्म करते थे ... नारद ने सिर्फ एक प्रश्न से इस व्यक्ति के जीवन की ऊर्जा की दिशा बदल दी और अपनी चेतना के ऊर्ध्वनुखी होने के बाद इनका अपना जीवन तो सफल हुआ ही समस्त युग को बहुत प्रेरणादायी साहित्य मिला जो इतना पवित्र है कि पूज्य की श्रेणी में आता है । ये सभी आसक्त पुरुष थे जिनमें मूढ भाव था –लेकिन इन्होने स्वयं को या कामना को पराजित किया –और sublimation of desire to cosmic energy के जीवंत उदाहरण बन गये ।
    अंतर्यात्रा बहुत कीमती है ---
    ये कायनात है मेरी ही ख़ाक का ज़र्रा
    मैं अपने दश्त से गुज़रा तो भेद पाये बहुत –शिकेब जलाली
    बुझी न प्यास समन्दर तेरे शिनावर की
    जो खुद में डूब गया उसको क़ायनात मिली ..

    या निशां सर्वभूतानाम तस्यामि जागर्ति संयमी.. ... बहुत स्पष्ट रूप से जीवन के चरम बिन्दु का संकेत देने वाला श्लोक है ,,, स्वप्न से बाहर आने पर हम स्वप्न की निरर्थकता का बोध करते हैं .. उस स्वप्न में चाहे आप महल में रह रहे हैं या नर्क में स्वप्न तो स्वप्न है खण्डित हो जाना उसकी नियति है । जीवन भी एक विशाल स्वप्न है और यहाँ भी सब कुछ नाशवान है ... जीवन की ऊर्जा ईश्वरोन्मुखी हो जाने के बाद आप की अनुभूतिका धरातल किसी समय ऐसे ही बदल जायेगा जैसे स्वप्न से आप जाग्रत होने पर अनुभव करते हैं .. एक अधिक सारथक और स्थिर संसार में स्वयं को पाते है .... पूर्ण स्थिर चेतना की स्थिति .. वायुरहित स्थान में जलते हुये दीपक की लौ समान है ... उज्ज्वल स्थिर सार्थक और सम्पूर्ण .... यह स्थायी मन:स्थिति और यह मुक्त चैतन्य का जीवन निष्काम कर्मयोग से कैसे पाया जाता है इसकी निरंतर पुष्टि गीता करती है सभी अध्यायों और सभी श्लोकों मे .... इससे कीमती कोई पुस्तक नहीं है ... संसार समुद्र है इसमें मोक्ष एक खजाना है और इसका नक्शा और चाबी सभी तलाश रहे हैं .. छोटे छोटे कर्मों और छोटी छोटी सांसारिक उपलब्धियाँ छल से अधिक कुछ नहीं लेकिन धन्य हैं वासुदेव जो ये चाबी श्रीमद्भग्वद्गीता के रूप्में हमें दे गये ... हम अनुपालन नहीं करते यह हमारी कमी है ..

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  13. अद्भुत अखंड महाकाव्य गीता को आधार बना कर शास्वत बिम्बों के सहारे अत्यंत गहन, गंभीर सार्थक चर्चा/आलेख के लिये सादर बधाई स्वीकारे आदरणीय मयंक जी...
    सादर आभार....

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  14. S.M.HABIB ( Sanjay Mishra Habib ) - हबीब साहब !! मैं आपका अत्यन्त आभारी हूँ कि आपने इस आलेख को पसन्द किया !! वैराग्य अपनी विशाल अर्थवत्ता के बावज़ूद एक ऐसा विषय है जिसमें रुचि वही लेता है जिसका शऊर बालिग हो गया हो !! आलेख भेजने से पहले मैने नवीन जी से यह कहा भी था कि शायद पढने वाले इस पर प्रतिक्रिया के नाम पर तटस्थ रहें लेकिन अब आपकी और मित्रों की संस्तुति के बाद बहुत प्रसन्न्नता हुई कि इसके कथ्य और आशय को ब्लाग पर स्वीकृति मिली है --बहुत बहुत आभार !!!

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  15. लेख और लेखन कला बहुत अच्छी लगी |जानकारी के लिए आभार |
    आशा

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  16. आशा दीदी !! आपका आशीष बहुत कीमती है मेरे लिये !! मेरा प्रणाम स्वीकार केजिये !!

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  17. ---गीता ग्यान का सुन्दर वर्णन है... परन्तु वास्तव में गीता में कर्म-योग इतनी सपूर्णता से वर्णित है कि किसी के भी द्वारा अति-व्याख्या , अत्यन्त लम्बा विवरण व विवेचना भ्रान्तियां उत्पन्न करता है एवं मूलभाव से उद्देश्य भटक जाता है ...यही इस आलेख में हुआ है....

    ----"तो आइये गीता का पाठ कीजिये आपको इसके बाद वेदों को पढने की अथवा किसी कर्मकाण्ड की कोई आवश्यकता नही है।"

    ---क्या यह उपरोक्त कथन उचित है..? ...क्या यह वेदों की अनावश्यकता की स्थापना है ...या गीता स्वयं वेदों का सार है यह स्थापना है ...दोनों ही स्थिति में..उपरोक्त वाक्यान्श अनावश्यक व अनर्गल है ...वेदों के ग्यान व पाठ की आवश्यकता तो किसी भी स्थिति मे सन्देहास्पद, विवास्पद व अनावश्यक नहीं है...

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  18. आदरणीय डा श्याम गुप्त जी !! मैं आपका ध्यान गीता के ही अध्याय 2 के 44-45-46 श्लोक की ओर लाना चाहूँगा !! जो मैने लिखा है कि -- "तो आइये गीता का पाठ कीजिये आपको इसके बाद वेदों को पढने की अथवा किसी कर्मकाण्ड की कोई आवश्यकता नही है।" --इसकी पुष्टि इन श्लोकों में स्वये वासुदेव ने की है -- त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन !! -(2) -45 और यावनर्थ उदपाने सर्वत: स्म्लितोदके //तावंसर्वेषु वेदेषु ब्राहमणस्य विजायत:(2)46 --स्वयं भगवान ने ही तो कहा है कि वेद तीनो गुणो के कार्यरूप समस्त भोगों और उनके साधनो का प्रतिपादन करने वाले हैं !!! ???और सब ओर से परिपूर्ण जलाशय को प्राप्त करने वाले का छोटे जलाशय में जितना में जितना प्रयोजन रह जाता है ब्रह्मा को तत्व से जानने वाले का वेदो में उतना ही प्रयोजन रह जाता है !!यह वाक्याँश स्वय गीता के कथन की ही तो निष्पत्ति है और आप इसे अनर्गल और अनवश्यक कह रहे हैं -- जबकि पहले आपने सवयं कहा है कि गीता में कर्मयोग सम्पूर्णता से वर्णित है -मै आपको यह भी बता दूँ कि इस आलेख को " लोकमत गीता समिति ने 200 से अधिक आलेखों मे से सर्वश्रेष्ठ चुना था और यह 2 से अधिक पत्रो में प्रकाशित हो चुका है और सैकड़ॉ लोगों ने इसे बहुत पसन्द् किया है अगर मूलभाव उद्देश्य से भटका होता या कुछ अनर्गल होता तो इस आलेख को यह सम्मान नहीं मिलता !! बाकी यह सार्वजनिक मंच है और आप कोई भी टिप्पणी करने केलिये स्वतंत्र हैं !! मैने यह आलेख दिन में नहीं लिखा --यह पुस्तक मैं अनवरत पिछले 25 बरस से निरंतर पढ रहा हूँ और इसकी गरिमा और सार को जितना ग्रहण किया है उसे एक लेखक होने के नाते कहना और लिखना मेरा नैतिक दायित्व भी है !!!

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  19. मयंक जी --किसी कारणवश मैं आपका उत्तर अत्यंत देर से पढ़ पाया----अस्तु--आप २५ वर्षों से गीता पढ़ा रहे हैं अच्छी बात है --वैसे २५ वर्षों तक गीता पढ़ने का कोइ अर्थ नहीं है ...यदि आप वेदों व उपनिषदों के साहित्य का अनुशीलन कर लेते हैं तो गीता समझाने में २५ वर्ष लगाने की कोइ आवश्यकता नहीं है --गीता उन्हीं का सार है --और सार को पढ़ने के बाद उसके मूल को पढ़े बिना कोइ ज्ञानी व जिज्ञासु नहीं रह सकता ...-उस पर चलने में अवश्य पूरा जीवन लगाया जा सकता है.....

    ---- आपके द्वारा दिए गए श्लोक का अर्थ नहीं समझे हैं --यहाँ वेदा का अर्थ वेद नहीं है अपितु --जान लेना है ..अर्थात त्रिगुणों के बारे में जन लेने पर मनुष्य निस्त्रैगुन्य होजाता है ....अगले श्लोक---उस (त्रिगुण ज्ञान ) के अर्थ जान लेने पर विद्वान् लोग सब कुछ जान लेते हैं...---यहाँ आपके द्वारा कहे गए कथन का कोइ उल्लेख या संकेत नहीं है . श्री कृष्ण जैसे वेदों के महाज्ञाता एसी त्रुटिपूर्ण बात कभी नहीं कह सकते .....

    जहाँ तक----ब्रह्मा को तत्व से जानने वाले का वेदो में उतना ही प्रयोजन रह जाता है !!---यह ब्रह्मा नहीं ब्रह्म है ...ब्रह्म को जान लेने पर ( जो वेदों से ही जाना जाता है --फिर वेदों से क्या प्रयोजन ...अर्थात यहाँ वेदों की महिमा का प्रतिपादन है गीता की नहीं ...ब्रह्म सम्पूर्ण जलाशय है वेद उसका उपादान जलाशय ---जब आत्म व ब्रह्म का मिलन होगया तो किसी भी वास्तु की कोइ महत्ता नहीं रह जाती --वेदों की भी नहीं --- श्री कृष्ण कहना चाहते हैं कि वेदों के वाचन-पठन ज्ञान में ही उलझ कर नहीं रह जाना है --

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