नमस्कार
दोहा शब्द कानों में पड़ते ही जो दोहे हमारी स्मृतियों से झाँकते हैं वो अमूमन ये या इस प्रकार के होते हैं
कबिरा खड़ा बजार में, माँगे सब की ख़ैर
नहिं काहू सों दोसती, ना काहू सों बैर
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ पर जाय
दोहा शब्द कानों में पड़ते ही जो दोहे हमारी स्मृतियों से झाँकते हैं वो अमूमन ये या इस प्रकार के होते हैं
कबिरा खड़ा बजार में, माँगे सब की ख़ैर
नहिं काहू सों दोसती, ना काहू सों बैर
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ पर जाय





