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कोरोना काल और फेसबुक लाइव सेशन - ब्रजभाषा व्यंग्यालेख

जय श्री कृष्ण । राधे राधे ।

 

भैया यै भूतनी कौ करोना जो न दिखावै सो थोरौ है । यानें जीव-जिनावरन पै बड़ी किरपा करी है । कबूतरन कों मुक्तगगन में विचरिवे कौ लाइसेंस दै दियौ है और मनुष्यन कों फ्लैटन में यानि कबूतरन के दड़वन में कैद कर दियौ है । दारू-गुटखा भलें ही महँगे कर दिये हैं मगर पेट्रोल-डीजल यानि तेलन कौ तेल निकार दीनों है । रोज-रोज लेक्चर पेलिवे वारे नेतन कों भाषणन के लाले परवाय दीने हैं तौ घर-घर बैठे वॉट्सऐप-फेसबुक वीरन के हाथन में माइक पकराय दीने हैं ।

 

फेसबुक सों याद आयौ कि आजकल फेसबुक लाइव की फैसन चल निकसी है । जहाँ देखौ वहीं फेसबुक लाइव । कहुँ फेसबुक-ग्रुपन पै लाइव सेशन चल रहे हैं तौ कहूँ फेसबुक पेजन पै; और भैया जिनकों कोउ भाव नाँय दै रह्यौ वे अपने चेला-चपाटेन के थ्रू अवतरित है रहे हैं । लाइव-सेशनन के कछु प्रेमी विन भँगडिन के जैसे हैं जिन्हें न तौ कोउ बगीची-अखाड़े वारौ बुलाय रह्यौ है और न ही वे बिचारे रोज-रोज चेला-चपाटेन के लिएँ फ्री की छनवाय सकें । तौ भैया ऐसे पीर-फकीर अपने-अपने छज्जे-छजली यानि अपनी-अपनी टाइमलाइनन सों अभिव्यक्त है रहे हैं ।

 

अच्छा, एक बात और देखी कि लाइव सेशन काहु भी ग्रेड कौ होय यानि भलें ही कोऊ नफीरी-बैंड-बाजे वारी बरात होय या कड़ी-कड़क्का वारी या करोना काल की वर्च्युयल वेडिंग टाइप; हाजिरीन पाँच-पच्चीस या भौत सों भौत सौ-पचास ही दिखवे में आय रहे हैं । भैया जैसें सहालगन में सब बराबर ऐसें ही करोना काल में हु सब बराबर । माल मिलै तौ भीर हु जुरै । जैसे जिजमान वैसे प्रावधान ।

 

जा तरियाँ ब्याउ-बरातन में सब जगें रिस्ते निभाने परें ऐसें ही इन फेसबुक लाइवन में हु भैया फोर्मेलिटी निभानी ही परै है । वेडिंग कार्ड की तरह पहिले सों सूचित कर दियौ जावै कि कौन सौ बकरा कब कहाँ शहीद होनों है । फिर सेम डे हु इन्फॉर्म कियौ जावै कि भैया भूल मत जइयौ आप कौ ही कार्यक्रम है आप कों जरूर आनों है ।

 

अब भैया हर दिन चार-चार पाँच-पाँच और कबू-कबू तौ लैन लगाय कें लाइव-सेशन होमें हैं । समय लगभग सबन्ह कौ सेम । अब बराती का करै वाय तौ सब सों रिस्ते निभाने हैं । या तौ वौ शहीद है चुकौ है जा में सब नें रिस्ते निभाये हुते या वा की या वा के घर के काहु की शहादत ड्यू है । यानि हर तरह सों रिस्ते तौ निभाने ही हैं ।

 

अभी कछ दिन पहिले की ही बात है साब हम बड़े बन-ठन कें मतलब मन ही मन में बन-ठन कें निछावर करिवे यानि लाइव-सेशनन में हाजिर हैवे कों निकसे ।

 

सब सों पहिलें झगड़ू झाँसवी के सेशन में गये । शायरी में इनकौ भौत बड़ौ नाम है साब । पचास माँगें और दस ते कम पै तौ ये यवे सहर में हु माइक हाथ में नाँय लेमें। कोरोना जो न करावै सो थोरौ । आजकल बिचारे फ्री में मुसायराय रहे हैं । तौ साब हमनें का देखौ कि झाँसवी साब पसीना-पसीना है रहे हुते । लै-दै कें 18 व्यूअर दिख रहे हुते । भैया कवि-सम्मेलन मुसायरेन में तौ सामनें भलें ही पच्चीस हु न बैठे होंय परंतु विनकी दाद और बीच-बीच में खाज यानि तारी (कबू-कबू सरोता हाथ खुजायवे के लिएँ हु तारी बजायवे के उपक्रम करें हैं) की अवाज सुनि-सुनि कें माइकेश्वर में ऊर्जा कौ संचार होतौ रहै । फेसबुक लाइव में तौ पतौ ही नाँय चलै । हमनें जब झाँसवी साब कों झूला झूलते देखौ तौ वहाँ सों चुपचाप निकस लैवौ ही ठीक समझौ ।

 

फिर हम पहुँचे सुन्दरी संतो सीतापुरी के सेशन में । संतो जी भौत ही मलूक सायरा हैं साब । एकदम शोले की बसंती टाइप । बड़े ही लटके-झटके दिखाय कें काव्य पाठ करें हैं । इन के यहाँ साब पूरे पेंसठ व्युअर अपनी-अपनी बीन बजाते भए जमे भए दिखे । ये बीन बजामें और संतो जी झूम-झूम कें दिखामें सॉरी सॉरी काव्य पाठ करें । जहाँ पहिले सों ही पेंसठ बीन बज रही होंय वहाँ अपनी पींपनी की का बखत सो भैया हम वहाँ सों हु सटक लिये ।

 

अब हम पहुँचे एक नवोदित शायर जौन जयपुरी के सेशन में । हम एंट्री लै कें कछु सुनिवे कौ उपक्रम करते वा सों पहिलें ही जौन साब बोले अरे क्या बात है आज तो हमारी बज्म में नवीन साहब भी तशरीफ लाये हैं । भैया हम भोंचक्के रह गये । पिछली दो बरातन में तौ काहु नें घास हु न डारी और यहाँ तौ आते ही वेलकम । मन प्रसन्न है गयौ साब । एक ही मिनट में हम अपने आप कों मीर-गालिबन की पंगत में बिराजमान महसूसवे लगे । परन्तु भैया हमारी खुसी भौत देर तक टिक न सकी । अब तौ साब जौन जयपुरी साब हर शेर यै ही कह कें पढ़ें नवीन साब ये शेर बतौरे-खास आप की खिदमत में पेश कर रहा हूँ और शेर कैसे-कैसे हुते एक बानगी देखौ

 

तू चौदवीं का चाँद है न आफताब है ।

पर क्या करें गुलाबो तेरा बाप नवाब है ॥

 

अब साब ऐसे शेरन पै का दाद देवें और कब तक दाद देवें । चुप रह जामें तौ पट्ठा टोकिवे लगै नवीन साब एम आय औडिबल? यानि नवीन साब क्या आप मुझे सुन पा रहे हैं? बड़े ही मरे मन सों कहनों परै वा साब वा । अपनी हालत ऐसी है गयी मानों घर सों तीन जगें निछावर करिवे कों निकसे होहु और पहिली अगयौनी (घुड़चढ़ी) में ही दूल्हे राजा के बाप नें आप कौ हाथ पकर लीनों होय । ऐसे में और करौ हु का जाय सकै । बस प्रतीक्षा करी जाय सकै काहु और रिसतेदार के आयवे की जा कौ हाथ पकारिवे के लिएँ दूल्हे राजा के पिता श्री हमारौ हाथ छोड़ें । सो भैया हमनें हु प्रतीक्षा करिवौ ही ठीक समुझौ । अगलौ शेर

 

दुखड़े भरी हैं ये जीवन की राहें ।

ऐसे में हमें चाहिए आप की बाँहें ॥

 

साब मन में आयौ कि साले कों पकरि कें द्वै-चार जमाय देंय फिर सुन्दरी संतो सीतापुरी जी की याद आय गयी । सोची या में तौ जमाय देउगे लल्ला परन्तु संतो की तरफ नेंक आँख हु तरेरी तौ वे पेंसठ बीन-बाज तुमारी खटिया खड़ी कर दिंगे । मन मसोस कें चुप्प रहिवौ ही नीकौ लगौ साब ।

 

कछु ही देर बाद ऊपर वारे नें हमारी सुन लीनी साब । यहाँ एक और रिस्तेदार आय कें टपकौ वहाँ हमारौ हाथ मुक्त भयौ और साब फिर कौन रुकै हम ये गये वे गये और नौ दो ग्यारह यानि अंतर्ध्यान है गये । जान बची और लाखों पाये । लौट कें कवि जी घर कों आये ।

 

नवीन सी चतुर्वेदी

मुम्बई
9967024593

 

व्यंग्य - वाह रे मीडिया - अर्चना चतुर्वेदी

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धर्म के काम में हवन होवे चाहे विवाह में हो या गृहशांति में तब थोड़ो थोड़ो घी डारो जाए ताकि अग्नि प्रज्वलित रहे, पर हमारे देश में  मीडिया देश में अशांति के हवन में कनस्तर भर घी उड़ेल कर अग्नि कूं भड़काबे कौ काम बखूबी कर रह्यो है  | जैसे कुटिल पडौसने सास बहु की लड़ाई करा कै मजा लेमे, उनके कान में मंतर फूंक कें वैसे ही न्यूज चैनल वाले भी अलग अलग धर्मन की सास बहु अर्थात कट्टर लोगन कूं बिठा के , ऐसे ऐसे सवाल कर डारे  कि कई बार तो वहीँ हाथापाई की नौबत आ जाबे है | ऐसे लोगन के लिए हमारे यहाँ बृज भाषा में एक कहावत बोली जाबे  “भुस में आग लगाय जमालो,दूर भजी” पर ये मीडिया वारे तो इतने पहुंचे भये  हैं कि आग लगाकें  बापे ही  रोटियां सेकबे बैठ जामे,भाजे भी नाय  |

चाचा मामा की जुगाड़ से चैनल और अखबार में नौकरी पाए भये  ये रिपोर्टर खुद कूं  सर्वज्ञानी समझें और किसी पे  भी कमेन्ट करना काई भी  आग को हवा देना अपनो  परम कर्तव्य समझें  | इनके हिसाब से समाचार मतलब बुरी बातें ही होबे |

ये लोग हर खबर कूं  चटपटी  और मसालेदार बनाबे  के चक्कर में ख़बरन कूं  गरिष्ठ बना रहे हैं दिल्ली में कछु  ब्लूलाइन बस वारे  एक दूसरे से होड़ कर बसों कूं  भगाते थे बिना ये सोचे कि सवारी की सुरक्षा भी उनकी ही  जिम्मेदारी हते , उसी तरह ये लोग भी अपनी आपसी दौड़ और ब्रेकिंग न्यूज के कम्पटीशन में देश के लिए घातक बनते जाय  रहे हैं | काई  के बयान को तोड़ मरोड़ कर बार बार दिखानो  और तुरंत दो चार खर खोपड़ीन कूं  बुलाके कुचर्चा कराबो इनको टाइम पास है क्योंकि बा चर्चा कौ कछु निष्कर्ष तौ निकलेगो ना जूतम पजार और है जाबेगी |

काई भी  साधारण सी न्यूज कूं  भी डरावने म्यूजिक अजीब ढंग से सुनाके ये रामगोपाल वर्मा की डरावनी फिल्मन कूं भी पीछे छोड़ चुके हैं | ये लोग भूल चुके हैं कि ये पत्रकार हैं और इनको  काम लोगन तक खबर पहुंचाबो हैं, लोग बागन कूं कब्र में पहुँचाबे कौ ना है  | इनकी हरकतन  कूं  देखके कभी कभी तौ  अपने देश के मीडिया पर शक होबे लगो है ...  क्या सचमुच जे  हमारे देश के ही हैं मुंबई हमलन  के दौरान जा तरीका से  इन्होने पल पल की खबर और प्लानिंग दिखाई  बाको  फायदा देश कूं नहीं आतंकवादियन कूं ज्यादा भयो जो टीवी देखकर अपनी रणनीति बना रहे हे | यानी बिनकुं हमारे न्यूज चैनलों की अक्लमंदी पर पूरो  भरोसो हो  | जे तौ अधर तैयार रहें जे बताबे कूं कि सरकार पकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ अब का करबे की सोच रही हते | जा देश में ऐसी मीडिया ऐसी पत्रकारिता होबेगी बाको मालिक तौ भगवान भी ना है सके |

मीडिया तो जो है सो है हमारे यहाँ की जनता भी सुभानअल्लाह है, कोई बोले “कौवा कान ले गयो ” तो जे लोग डंडा लेके कौव्वे के पीछे भाग लेंगे | अरे महानआत्मा पहले कान देख तौ  लो गयो  भी है कि नाय  | भाई अक्ल ना चल रही तो वो वाली कोल्ड्रिंक पीकें अपनी ‘अकल लगाओ’ कम से कम सुने सुनाये पर तौ ना जाओ तभी जा  देश कौ  और लोगन  कौ कुछ भलो है सके।

अर्चना चतुर्वेदी
9899624843







ब्रजभाषा व्यंग्य - जा रे कारे बदरा - मदन मोहन 'अरविन्द'


चहुँ दिस कान्ह कान्ह कहि टेरत अँसुअन बहत पनारे 

जा रे कारे बदरा
 
मदन मोहन 'अरविन्द'

'ब्रज के बिरही लोग बिचारे', अब महाकवि सूर के बचन हैं सो टारे कैसैं जायँ। ब्रज सौं बिरह कौ सम्बन्ध जोड़ दियौ तौ जोड़ दियौ, पर इतनौ कहकें सूरदास ठहरे नायँ। वे जानते हते कै बरसात बिना बिरह अधूरौ, तासौं संग की संग कह दई, 'सदा रहत पावस ऋतु हम पै जबते स्याम सिधारे'। सौ टका साँची कही, काहू बुजुर्ग बिरही सौं पूछ कै देख लीजौं, पतौ चल जायगौ, पावस में बिरह की डिगरी बढ़ती-चढ़ती ही दीखै। अब आप हम सौं पूछौगे कै भैया बाबड़े भये हौ का, कौन से ज़माने के बिरह की बात लै बैठे, दुनिया इक्कीसमी सदी में पहुँच गयी और तुम बाबा आदम के जमाने कौ बिरहा गायवे बैठ गए। उत्तर में आपते निवेदन मात्र इतनौ कै नई नौ दिना, पुरानी सौ दिना। बैसैं हू बिरह नयौ कहा, पुरानौ कहा। पैकिंग बदली होय तौ बदली होय प्रोडक्ट तौ पुरानौ ही है। 

आज की दुनिया में बिरह कौ बैक्टीरिया अपने पूरे जोबन पै है। सब के सब बिरही, काहू कूँ सत्ता कौ बिरह, काहू कूँ सम्पदा कौ, काहू कूँ पद-प्रतिष्ठा कौ तौ काहू कूँ रोजी-रोटी कौ, नाना प्रकार के बिरह। 'बिरह की मारी बन बन डोलूँ बैद मिला नहिं कोय', जा बीमारी कौ इलाज न पहलै भयौ न आज होय। हाथ कंगन कू आरसी का, पढ़े लिखे कू फारसी का, सब देख रहे हैं, आजकल सत्ता के बिरह कौ बुखार कैसौ लाइलाज होतौ जाय रह्यौ है। सन्निपात में सत्ता कौ रोगी कैसी-कैसी ऊल-जलूल बकै, है जाकी दवाई काऊ बैद के पास? हाँ, पहलै की तरह अब काऊ कौं पिया के परदेस कौ बिरह नायँ होय, और होय तौ काहे कू, सम्पदा सौं संजोग की संभावना बन जाय तौ फिर मानस जात के बिरह पै कौन ध्यान देय। बड़ी कोठी, लंबी कार, मोटौ बैंक बैलेंस सब कछू है सकै तौ फिर दस-बीस बरस एक दूसरे ते अलग पड़े रहे तौ जा बिरह कौ का रोमनौ? अरे मोबाइल है, वीडियो चैट है, रोज मिलौ, रोज बात करौ। संचार क्रांति के या दौर में कौनसी काऊ कबूतर की चोंच में चिट्ठी चिपकानी है, कै फिर काऊ बदरा कूँ दूत बनाय कै बालम के द्वार भेजनौ है। जो ऐसौ होतौ फिर तौ हर बरसात अटरिया-अटरिया पै जा रे कारे बदरा की गूँज है रही होती। जानै कितने मेघदूत रचे जाय चुके होते और न जानै कितने काव्य-रस-रसिक नित्य इनकौ रस पान कर कै अघाय रहे होते।


अब मानौ कै न मानौ, रामगिरि पर्वत पै अकेले पड़े निष्कासन कौ डंड झेल रहे यक्ष की बिरह-बेदना यक्षलोक स्थित अलकापुरी के एकांत में उनकी प्रियतमा तक एक मेघ के माध्यम सौं पहुँचाय कै महाकवि कालिदास और उनकी रचना मेघदूत कूँ कालजयी प्रतिष्ठा प्राप्त भई। सोच कै मन में हूक सी उठै कै ऐसी प्रतिष्ठा काऊ और के भागन में क्यों नायँ। मेरी पड़ौसन खाय दह्यौ, मो पै  कैसैं जाय रह्यौ, अरे हम काऊ ते कम हैं का। मन में आई सो ठान बैठे, बिरह कौ अनुभव तौ अपनौ हू काहू सौं उन्नीस नायँ पर सन्देसौ भेजवे कू मेघ की खोज जरूरी हती। अब कोई ऐसौ टिकाऊ मेघ होय जो थोड़ी देर ठहरै और ढंग ते हमारी बात सुनै तौ कछू बात बनै, पर आजकल के मेघ इत आये उत गए। देखते-देखते एक दिन ऐसौ हू आयौ कै हमने दीखवे में अनुभवी और वयोवृद्ध एक मेघ कू थोड़ी देर के ताईं हमारी बात सुनवे कू जैसें-तैसें मनाय लियौ, पर दुर्भाग्य देखौ कै हमारी मर्मान्तक पीड़ा सुनकै हू मेघ पसीज्यौ  नायँ, कहवे लग्यौ भैया अबते कोई मेघ न कहूँ सन्देस लै कै जायवे की हिम्मत करैगौ न पानी लै जायवे की। आजकल तिहारे राजकरमचारी जमीन-आसमान एक करै दै रहे हैं। बरसन पहलै मैं पानी लै कै चल्यौ तौ संग-संग अनेक बिरही जनन के सँदेसे पहुँचायवे की इच्छा मन में हती पर जाते भये मारग में ऐसे-ऐसे महानुभावन सौं भेंट भई कै दुबारा सपने हू में उनसौं मिलवे की कामना न रही।  कोई कहै हम स्थानीय निकाय के, कोई कहै हम राज्य सरकार के तौ कोई कहै हम केंद्र सरकार के अधिकारी हैं। बड़ी निराली बात लगी। इलाकौ एक और राज करवे बारे इतने। सबके सब मेरी तरफ सिकारी की नजर सौं घूरते मिले। जगह-जगह उत्कोच, अरे रिस्वत, जाते तुम पृथ्वी वासी अब सेवाशुल्क कहौ, दैते-दैते दम फूल गयौ। एक जगह तौ ऐसौ इरझ्यौ कै भैया बरसन बाद घर लौटनौ है रह्यौ है। कछू सज्जन मिले, कहवे लगे आमन्दनी की जाँच करवे बारे बिभाग ते हैं, पानी कहाँ ते लाये, बही-खाते दिखाऔ, मैनें लाख समझाए भैया जि पानी तौ मैं हर बरसात में सागर सौं लाय कै धरती कू दैतौ आयौ हूँ, इतनी सुनकै दूसरे सज्जन कड़क अवाज में बोले अच्छा, सफेद झूठ। चल बताय, समुद्र कौ खारौ पानी लै कै कौनसी प्रोसेसिंग यूनिट में मीठौ करै और समुद्र का तेरौ रिस्तेदार लगै सो वाते बिना बिल-परचा पानी मिल जाय। एक तीसरे सज्जन ने मेरी बात सुनी तौ चौंकवे के अंदाज में कहवे लगे अरे, हर बरसात काम करै और बच कै निकर जाय, तेरौ सबरौ कारौ कारोबार अब हमारी निगाह में आय गयौ है। देखें अब कैसें  छूटैगौ। इतने दिन सेवाशुल्क अदा करते-करते  मैं एक दम खाली है गयौ हतो और कहाँ ते लामतौ सो इन सबके घर-दफतरन के  चक्कर मारते-मारते का खबर कितने साल बीत गए, न मैं कहूँ पानी पहुँचाय पायौ और न घर की कछू खबर-सुध लै पायौ। भैया, सौगंध खाय लई अब सन्देस तौ दूर मैं काहू जगह पानी हू न लाऊँ। मेघ कौ दर्द देख्यौ तौ हम अपनी बिरह-ब्यथा भूल गए। खाली एक सलाह दै कै हमनें भरे मन सौं बरसन के बिरही मेघ कू बिदा कियौ कै मित्र, अब अगर ऐसी स्थिति में फिर कहूँ घिरवे लगौ तौ निर्भय है कै काऊ निरीह-निर्धन की आँखिन में स्थान ग्रहण कर लीजौं , ता पीछै  जितने चाहौ बरसते राहियोंतुम न राजा की आँखिन में आऔगे, न राज की और न राजकरमचारिन की।

मदन मोहन 'अरविन्द
9897562333 

क्षेत्रीय भाषाओं से हिन्दी को नुकसान - नवीन

लोहड़ी, पोंगल और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ। 

एक महत्वपूर्ण विषय पर स्वस्थ-विमर्श हेतु सभी साथियों से निवेदन। 

पूरे देश में आज कल जहाँ एक तरफ़ भोजपुरी व अवधी को भाषाओं की सूची (आठवीं अनुसूची) में स्थान दिलवाने हेतु प्रयास चल रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ विद्वान इस के विरोध में भी उठ खड़े हुये हैं। 

जो पक्ष में हैं वह अपने अस्तित्व, अपने पुरखों की पहिचान को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। जो विपक्ष में हैं उन का कहना है कि अगर क्षेत्रीय भाषा-बोलियों को सूची में शामिल किया गया तो हिन्दी अपना दर्ज़ा खो देगी एवम् उस की जगह उर्दू ले लेगी। 

मैं समझता रहा हूँ कि उर्दू भाषा या बोली न हो कर एक लहजा (pattern) है जो नस्तालीक़ (फ़ारसी स्क्रिप्ट) और देवनागरी के साथ-साथ रोमन में भी लिखी जाती है। यक़ीन जानिये इसे हिब्रू में भी लिखा जा सकता है। इसी तरह संस्कृत को भी बहुत पहले से नस्तालीक़ व रोमन आदि लिपियों में लिखा जाता रहा है। 

मैं समझता रहा हूँ कि भले ही आजकल हिंगलिश लहजा (pattern) सर चढ कर बोल रहा है मगर यह एक स्वतन्त्र भाषा या बोली नहीं है - कम-अज़-कम अब तक तो नहीं ही है। 

मैं समझता रहा हूँ कि भाषा-बोली एवम् लिपि दो अलग विषय-वस्तु हैं। आज दुनिया की तमाम भाषाएँ रोमन में भी लिखी जा रही हैं। मगर इस के चलते सारी दुनिया का ब्रिटेनीकरण तो नहीं हो गया। 

मैं समझता रहा हूँ कि ब्रजभाषा एक समय पूरे संसार की साहित्यिक भाषा रही है। मगर अफ़सोस आज ब्रजभाषा चर्चाओं में नहीं है। शायद समय को यही स्वीकार्य हो। शायद ब्रजभाषा सद्य-प्रासंगिक स्तरों  से बचते हुये संक्रमण काल की प्रतीक्षा कर रही हो। 

मैं समझता रहा हूँ कि आज भी हम तथाकथित हिन्दी-उर्दू भाषी व्यक्ति, तथाकथित हिन्दी-उर्दू की बजाय, अवधी-भोजपुरी-राजस्थानी-ब्रज-हिमाचली-गुजराती-मराठी आदि ही अधिकांशत: बोलते हैं। या फिर हिन्दुस्तानी या हिंगलिश या इंगलिश। दक्षिण भारत का मुसलमान तुलू-कन्नड़-तमिल आदि बोलता है। बांग्लादेश में आज भी बंगाली बोली जाती है। 

मैं समझता रहा हूँ कि यदि हमारी हिन्दवी या हिन्दुस्तानी ज़ुबान को तथाकथित हिन्दी या उर्दू के दायरों में न बाँटा जाता तो कहीं ज़ियादा बेहतर होता।  

विमर्श का केन्द्र - क्षेत्रीय बोलियों को सूची में शामिल करने से हिन्दी को होने वाले नुकसान - है। 

आप सभी साथियों से निवेदन है कि इस स्वस्थ-विमर्श में अपने मूल्यवान विचारों को अवश्य रखें। 

सादर, 

नवीन सी• चतुर्वेदी 


9967024593 
13.01.2016

ब्रज गजल - सालिम शुजा अन्सारी

Saalim Shuja Ansari's profile photo
सालिम शुजा अंसारी 


ब्यर्थ कौ चिन्तन-चिरन्तन का करैं
म्हों इ टेढौ है तौ दरपन का करैं

देह तज डारी तुम्हारे नेह में
या सों जादा और अरपन का करैं

आतमा बिरहिन बिरह में बर रई
या में भादों और सावन का करैं

प्रेम कौ अमरित निकसनौ नाँय तौ
क्षीर-सागर तेरौ मंथन का करैं

ढेर तौ होनो इ है इक रोज याहि
काया माटी कौ है बर्तन का करैं
 
झर रहे हैं डार सों पत्ता सतत
बोल कनुआ तेरे मधुबन का करैं

ब्रज-गजल कौं है गरज पच्चीस की 
चार छः "सालिम" बिरहमन का करैं
 
·        

बात नहीं है कछु तो फिर बतरामें चौं...
सुनबे बारौ कोई नाय,.... टर्रामें चौं...

तैने सिगरी पोथी चौपड़ चाट लई...
हम मूरख हैं हम तोकूँ समझामें चौं...

दाता ने दुई आँख दई ऐं देखन कूँ...
अँधे हैं का..अँधन से टकरामें चौं...

दास हमईं हैं हमईं द्वार तक जानो है...
बे राजन हैं बे कुटिया तक आमें चौं...
 
जानत हैं हम चार दिनन कौ है मंगल...
झूमें...नाचें..इठलामें ...इतरामें चौं...

हम हूँ कान्हा की नगरी के बासी हैं...
कोऊ-काऊ से पीछे हम रह जामें चौं..

थोड़ी तो कट गई थोड़ी कट जामेगी...
रोबें...पीटें...चीखें...और चिल्लामें चौं...

हम पे का आरोप धरोगे तुम सोचो...
हम निश्छल हैं हम तुम सूँ सरमामें चौं...

दुनिया तो इक माया मोह का जाला है..
जीवन पन्छी कौ जामें उलझामें चौं...

तुमने अपुनी सूरत ही बिसराय दई...
तुम को "सालिम" इब दरपन दिखलामें चौं..
 
·        


अपने दामन में काँटे भरें जातु ऐं
लोग जीवे की खातिर मरें जातु ऐं....

जो खुदा सूँ सबन कूँ डरावत रहे....
अपनी परछाईं'अन सूँ डरें जातु ऐं....

पीर पक कें हरे ह्वै गए जो जखम
बे जखम ही दरद कूँ हरें जातु ऐं...

हम नें तोहरे नगर की डगर तज दई
हर अमानत हू बापस धरें जातु ऐं...

भूल कें हू हमें बिस्व भूलै नहीं
काम कछ ऐसौ हम हू करें जातु ऐं..

कछ निसाने निसाने पै 'सालिम' लगे
कछ निसाने छटक कें परें जातु ऐं...
 
·       


अग्रसर है आजकल असर नयौ-नयौ। 
रहगुजर नई-नई सफर नयौ-नयौ॥

इक पुरानी ठौर ही सो टौर बन गई। 
अब हमन कों चाँहियै खँडर नयौ-नयौ॥ 

चार दिन ठहर तौ जाउ काढ दिंगे हम। 
मन में आज ही बसौ है डर नयौ-नयौ॥ 

हौलें-हौलें होयगौ भलाई कौ असर। 
आज ही पियौ है यै जहर नयौ-नयौ॥ 

जैसें ही लड़ो सों बाप की नजर मिलीं। 
है गयौ दुपट्टा तर-ब-तर नयौ-नयौ॥

सासरौ, सजन, ससुर, नये सगे'न के संग। 
लग रह्यौ है बाप कौ हू घर नयौ-नयौ॥ 

नयी नवेली दुलहनी कौ चित्त है उदास। 
मन में उठ रह्यौ है इक भँवर नयौ-नयौ॥

'सालिम' एक दिन चमक उतर ही जायगी। 
और कै दिना रहैगौ घर नयौ-नयौ||
 
·        


बोझ मन सूँ जबै आसा'न के हट जामतु ऐं...
सबै आकास हु धरती सूँ लिपट जामतु ऐं....

बेदना मन की जो आ पामें न मन सूँ बाहर.....
टीस बन-बन कें बे सब्दन में सिमट जामतु ऐं....

का कहें कौन सूँ और कौन सुनैगौ अपनी....
सोर इत्तो है कि इब कान ही फट जामतु ऐं....

मन बटोही जो कबहुँ प्रेम डगर कूँ निकसै....
ईंट पत्थर सूँ डगर सगरी ही अट जामतु ऐं...

एक लँग मन है तौ इक लंग मेरी हुसियारी...
राह हर मोड़ दुराहे'न में फट जामतु ऐं....

साँच कों दैनी परै अग्नि परीक्षा "सालिम"...
झूट के हक्क में कानून उलट जामतु ऐं....
 


·        
म्हों चलावे को बस हुनर आवे....
सिर्फ तोकूँ बकर बकर आवे....

दै दियो है गलत पतो सब कूँ...
कोई आवे तो फिर किधर आवे....

थोबड़े सिगरे अजनबी लागें....
कोई अपुनों कहूँ नजर आवे....

बैठ ले कबहुँ  साधु सन्तन में....
मन पे सायद कछू असर आवे....

पाँव घायल भये हैं मखमल सूँ...
अब तो काँटन भरी डगर आवे....

शीशमहलन में आके भी मोकूँ...
याद अपुनों वही खण्डर आवे..

बाको भूला तो मत कहो 'सालिम'....
भोर निकरे जो साँझ घर आवे....
 
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होरी को वो रंग रच्यौ है तन मन में
हुरियारे हुरियाय रहे हैं गैलन में

रंग बिरंगी पिचकारी में भर के रंग
अच्छे खासे खोये गये हैं बचपन में

लिपटन चिपटन के उबटन की बलिहारी
प्रेम हिलौरें मार रयो है कन-कन में

अंगन सौं हिल मिल कें रंग भये खुसरंग
छई अबीर गुलाल छटा हर आँगन में

जहँ देखो तहँ बम भोले के जयकारे
भंग बँट रही है कुल्ला और कुलियन में

भँग चढ़ाये चुके जो वे सिगरे भँगड़ी
मगन होये रहे देख देख मुख दरपन में

होरी में सब झनक रहे हैं यों"सालिम"
जैसे गुपियन की पायलिया मधुबन में

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सालिम शुजा अन्सारी
9837659083
ब्रजगजल