![]() |
| खिलता हुआ गुलाब / Opening Lotus Flower |
कारण झगड़े का बनी, बस इतनी सी बात
हमने माँगी थी मदद, उसने दी ख़ैरात
किया चाँद ने वो ग़ज़ब, पल भर मुझे
निहार
दिल दरिया को दे गया, लहरों की
सौगात
कहाँ सभी के सामने, कली बने है फूल
तनहाई में बोलना, उस से दिल की बात
सर पर साया चाहिये ? मेरा कहना मान
हंसा को कागा बता, और धूप को रात
आँखों को तकलीफ़ दे, डाल अक़्ल पर ज़ोर
हरदम ही क्या पूछना, मौसम के हालात
:- नवीन सी. चतुर्वेदी
दोहा
ग़ज़ल के बारे में सुना था। कुछ एक दोहा ग़ज़लें पढ़ी भी थीं। अग्रजों से बात भी की। दो
मत सामने आये। पहला मत - हर दो पंक्तियाँ बिलकुल दोहे के समान ही हों। यदि ऐसा
करें तो फिर ग़ज़ल कहाँ हुई, वो तो दोहे ही रहे। दूसरा मत ये कि शिल्प दोहे का
लें और ग़ज़ल के माफ़िक़ पहले दोहे [मतले] के बाद के ऊला-सानी टाइप दोहे [शेर] कहे
जाएँ। पहले मत वालों को पूर्ण सम्मान परन्तु मुझे दूसरा मत अधिक उचित लगा। तो मेरा
यह पहला प्रयास दोहा ग़ज़ल के माध्यम से आप के समक्ष है, आप की
राय का इंतज़ार रहेगा।
सभी मित्रों को ईद की हार्दिक
शुभकामनायें............................
