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नज़्म - ख़ार - इस्मत ज़ैदी शिफ़ा

 


फूलों से लदे इन बाग़ों की

और रंग बिरंगे फूलों की

हर कोई सिफ़त बतलाता है

हर कोई ख़ुशी जतलाता है

ग़ज़ल - ‘शेफ़ा’ कजगाँवी

बन गया तिश्नालबी की जो निशानी एक दिन
ज़ुल्म की आँखों में भी लाया वो पानी एक दिन

ख़ुश्क लहजा तल्ख़ जुमले और बलन्दी का नशा
पस्तियाँ दिखला न दे ये लन्तरानी एक दिन

जैसे मिट्टी के खिलौने अब नहीं मिलते कहीं
ख़त्म हो जाएँगी लोरी और कहानी एक दिन

ऐसे जज़्बे जो पस-ए-मिजगाँ मचलते रह गये
आँसुओं ने कर दी उन की तर्जुमानी एक दिन

अपनी हर ख़्वाहिश को तुम पामाल कर के चुप रहे
बन न जाये रोग ऐसी बेज़ुबानी एक दिन

ख़त्म कर के हर निशानी ये तहय्या कर लिया
हम भुला देंगे सभी यादें पुरानी एक दिन

बा-रहा अञ्जाम से यूँ बा-ख़बर उस ने किया
दार पर चढ़वा न दे ये हक़-बयानी एक दिन

सोचते हैं तेरे अपने बस तेरे हक़ में ‘शेफ़ा’
दूर कर ले अपनी सारी बदगुमानी एक दिन

‘शेफ़ा’ कजगाँवी

बारहा निकला मैं इस रस्ते से, बस ठहरा न था - इस्मत ज़ैदी शेफ़ा

बारहा निकला मैं इस रस्ते से, बस ठहरा न था
सच ये है कि आप ने भी तो कभी रोका न था

उन की कोशिश राएगाँ हो जाएगी सोचा न था
मैं कहीं अंदर से टूटा तो मगर बिखरा न था

मुन्तज़िर रहती ज़मीं कब तक, बिल-आख़िर फट गई
बादलों का एक भी टुकड़ा यहाँ बरसा न था

उस के फूलों के एवज़, मैं ने उसे काँटे दिये
पूरा सच हो या न हो , इल्ज़ाम ये झूठा न था

मैं गुलिस्तानों के गुल बूटों से वाबस्ता रहा
ख़ार ओ ख़स से भी मगर रिश्ता मेरा टूटा न था

हम सवाल ए ज़ीस्त सुलझाने की कोशिश में रहे
मस’अला ये इस क़दर उलझा कि फिर सुलझा न था

ऐ ’ शेफ़ा’ क्योंकर ये फ़र्क़ आया इबादतगाह में

ये जगह वो थी जहाँ कोई बड़ा - छोटा न था

इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा'