कि तेरे लफ़्ज़ों में है इल्म की शनासाई
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ग़ज़ल - ‘शेफ़ा’ कजगाँवी
बन गया
तिश्नालबी की जो निशानी एक दिन
ज़ुल्म की
आँखों में भी लाया वो पानी एक दिन
ख़ुश्क लहजा तल्ख़
जुमले और बलन्दी का नशा
पस्तियाँ
दिखला न दे ये लन्तरानी एक दिन
जैसे मिट्टी
के खिलौने अब नहीं मिलते कहीं
ख़त्म हो
जाएँगी लोरी और कहानी एक दिन
ऐसे जज़्बे
जो पस-ए-मिजगाँ मचलते रह गये
आँसुओं ने
कर दी उन की तर्जुमानी एक दिन
अपनी हर
ख़्वाहिश को तुम पामाल कर के चुप रहे
बन न जाये
रोग ऐसी बेज़ुबानी एक दिन
ख़त्म कर के
हर निशानी ये तहय्या कर लिया
हम भुला
देंगे सभी यादें पुरानी एक दिन
बा-रहा
अञ्जाम से यूँ बा-ख़बर उस ने किया
दार पर चढ़वा
न दे ये हक़-बयानी एक दिन
सोचते हैं
तेरे अपने बस तेरे हक़ में ‘शेफ़ा’
दूर कर ले
अपनी सारी बदगुमानी एक दिन
‘शेफ़ा’ कजगाँवी
बारहा निकला मैं इस रस्ते से, बस ठहरा न था - इस्मत ज़ैदी शेफ़ा
बारहा निकला मैं इस रस्ते से, बस ठहरा न था
सच ये है कि आप ने भी तो कभी रोका न था
उन की कोशिश राएगाँ हो जाएगी सोचा न था
मैं कहीं अंदर से टूटा तो मगर बिखरा न था
मुन्तज़िर रहती ज़मीं कब तक, बिल-आख़िर फट गई
बादलों का एक भी टुकड़ा यहाँ बरसा न था
उस के फूलों के एवज़, मैं ने उसे काँटे दिये
पूरा सच हो या न हो , इल्ज़ाम ये झूठा न था
मैं गुलिस्तानों के गुल बूटों से वाबस्ता रहा
ख़ार ओ ख़स से भी मगर रिश्ता मेरा टूटा न था
हम सवाल ए ज़ीस्त सुलझाने की कोशिश में रहे
मस’अला ये इस क़दर उलझा कि फिर सुलझा न था
ऐ ’ शेफ़ा’ क्योंकर ये फ़र्क़ आया इबादतगाह में
ये जगह वो थी जहाँ कोई बड़ा - छोटा न था
इस्मत ज़ैदी 'शेफ़ा'
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