हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
शाम ए हिज्र, पुरवाई, और फिर ये तन्हाई
जान ओ दिल पे बन आई और फिर ये तन्हाई
वक़्त ने ली अँगड़ाई, और फिर ये तन्हाई
हो न जाये रुस्वाई, और फिर ये तन्हाई