कहते हैं कि हर मुल्क, हर
क़ौम और हर मोहल्ले में,
कमोबेश एक न एक बादशाह ज़रूर पैदा होता है—कहीं शायरी का, कहीं
सियासत का, कहीं जुर्म का। मगर हमारे दौर का जो बादशाह है, वह न ताज पहनता है, न
सिंहासन पर बैठता है;
वह बैठता है अपनी तिजोरी पर, और ताज की जगह
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