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व्यंग्य - कंजूसों का बादशाह - डॉ. प्रमोद सागर

कहते हैं कि हर मुल्क, हर क़ौम और हर मोहल्ले में, कमोबेश एक न एक बादशाह ज़रूर पैदा होता है—कहीं शायरी का, कहीं सियासत का, कहीं जुर्म का। मगर हमारे दौर का जो बादशाह है, वह न ताज पहनता है, न सिंहासन पर बैठता है; वह बैठता है अपनी तिजोरी पर, और ताज की जगह