।।सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन।।
एक ज़माना हुआ करता था जब टेलीविज़न परिवार के सभी सदस्यों को एक जगह एकत्र करने का पर्याय बन गया था। अब तो गेजेट्स की मेहरबानी ये है कि जितने मुंड, उतने टी. वी. सेट्स / गेजेट्स हों तो भी अचरज नहीं। कभी-कभार ही मौक़े बनते हैं जब परिवार के सभी सदस्य एक ही प्रोग्राम एक साथ देखते हों। कल ऐसा ही एक मौक़ा बना जब शाम को टी. वी. पर आमिर ख़ान वाली 'तारे ज़मीन पर' फिल्म आ रही थी। उस फिल्म के केंद्र में जो बच्चा ईशान है उस के पिता आमिर खान के पास अपने बेटे की बीमारी से संबन्धित कुछ सामग्री [इंटरनेट पर से उन के नहीं उन की पत्नी द्वारा जुटाई गई] ले कर पहुँचते हैं और बड़े ही दम्भ के साथ ये जताते भी हैं कि कोई ये न समझे कि उन्हें [ईशान के माँ-बाप को] अपने बच्चे की कोई फ़िक्र नहीं है। इस पर आमिर खान वाला किरदार क्या कहता और करता है, अमूमन सभी को पता होना तो चाहिये, न हो तो मेरी प्रार्थना है एक बार यह फिल्म देख ही लें, टाइम खोटी हरगिज न होगा। आप सोच रहे होंगे कि मैं ये सब क्यूँ लिख रहा हूँ? कारण है ये सब लिखने का! काव्य-परिचर्चा या कवि-सम्मेलन या कवि गोष्ठी के नाम पर जो कुछ सुनने / देखने को मिल रहा है, मुँह में कड़वाहट भरने के लिये पर्याप्त है। इतना ही नहीं, ऐसे प्रयासों को ले कर जो दावे किये जाते हैं, वो भी खुलेआम मंचों से पूरी तरह से उघड़े हो कर, क्षमा करना मित्रो, इस 'तारे ज़मीन पर' वाले ईशान के पिता के वक्तव्य की तरह ही लगते हैं। ख़ैर, समय अपना काम करेगा, हम और आप अपना काम करते हैं।