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कविता - भोर - अनिता सुरभि

 


संवेदनाओं के पोरों से

अंधेरे को पीछे धकेल

आँखें मलती किरणों को 

अपने अन्तर्तम में सहेज

सुनहरा दिन

आसमान की साँकल खोल

धीरे-धीरे धरा पर

उतरता है, तो