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લઘુકથા – અગરબત્તી - રક્ષા શાહ

નાજુક,નમણી અને ઘઉંવર્ણી એકની એક દીકરી સુગંધી.. મંદિરના ગર્ભદ્વાર જેવું નાનકડું દિલ સુગંધીનું. પણ આવકાર બધાનો.ગરીબ પરિવારની આ દીકરી અન્ય કાજે પોતાનું જીવન ટૂંકું કરતી અને સુગંધ ફેલાવતી.. 

राजस्थानी लघुकथा - पर्दो अर गहना - डॉ रानी तँवर

गाँव में ढोल-नगारा बज्या, गली-गली में हुंकार उठी— "जमींदार री बहू आवे है, देखो देखो…!"

 

सोने-चाँदी री झंँकार, गहना-गठ्ठा, लाल-पीळा जोड़ाबींदणी असी सजली लागी जणों कोई देवी मूर्त्ति हो।

लघुकथा - माघ की ठिठुरन में हरीराम की झोपड़ी – सुनीता चौधरी

 माघ का महीना था। ठंडी हवा सुइयों की तरह शरीर में चुभ रही थी। आसमान से उतरती ओस मानो धरती को और ठंडा करने पर तुली हो।

लघुकथा - धूप के रंग - योगराज प्रभाकर

वह अंधा था। जन्म से। पर उसे धूप से मोह था।

हर सुबह छत पर बैठता। चेहरे को आकाश की ओर उठाता।

लघुकथा – पासा - सतीश दुबे

खाना लगा दूँ?”
हूँ...
मूड तो अच्छा है?”
हाँ...
स्मिता आजकल ज़िद नहीं करती।
हूँ...

लघुकथा - दीपक बनो - डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया 'हेमाक्ष'

मंथन अपने दादा जी के साथ शाम की सैर करने निकला और कुछ दूर चलने पर दादा जी को उनका भतीजा पंकज मिला। पंकज ने ताऊजी को देखकर अनदेखा करने का प्रयास किया, मगर ताऊजी ने पंकज को आवाज दी और कुशल क्षेम पूछा और आशीर्वाद देते हुए दीपक बनने की सलाह देते हुए आगे बढ़ गए।  

लघुकथा - आँसुओं की भाषावली - योगराज प्रभाकर

विद्यालय के बाहर एक लड़का अक्सर अकेला बैठा मिलता था। उसकी निगाहें उन चेहरों पर होतीं जो उस बरामदे से गुज़रते समय रो चुके होते। वह कुछ नहीं पूछता था। 

लघुकथा - माँ - अनिल शूर ‘आज़ाद’

रात्रि साढ़े दस बजे उसकी हरिद्वार की ट्रेन थी। निर्धारित कार्यक्रमानुसार उसने श्मशान-भूमि के विशेष कक्ष में रखी माँ की अस्थियाँ लीं और वहीं से सीधे स्टेशन पहुँचा। 

लघुकथा - समझौता - सुरेश बरनवाल

दंगों में कत्लोगारत में शामिल थे वह दोनों। दोनों दूसरे धर्म के थे। इसलिए दोनों के दल एक-दूसरे पर हमला कर रहे थे। देर रात को जब पुलिस चारों तरफ़ फैल गई तो सभी दंगाई छिपते-छिपाते अपने-अपने घरों को जाने लगे। ऐसे में एक गली में अचानक वे दोनों अँधेरे में एक-दूसरे के सामने आ गए।

लघुकथा - जूण - डॉ. शील कौशिक

शाम के समय पार्क से उठकर औरतें अपने-अपने ठिकानों पर चल पड़ी। नीता और शीतल पार्क के गेट से बाहर निकल रही थी कि सामने मादा कुक्कर पर नज़र पड़ी। दोनों के मुँह से एक साथ निकला, "हे भगवान! फिर से पेट से है यह तो। अभी कुछ दिन पहले ही तो जने थे पूरे छह पिल्ले...

लघुकथा - आधे अधूरे - योगराज प्रभाकर

फोटो एलबम के पन्ने पलटते-पलटते एक पुरानी, धुँधली सी तस्वीर उभर आई। देखते ही आवाज़ आई, “नाना जी, ये घर हमारा ही है न? बँटवारे से पहले वाला?”

लघुकथा - भाड़ में जाय ऐसा इन्क़लाब - नवीन सी. चतुर्वेदी

क़स्बाई संस्कृति के वाहक मध्यवर्गीय परिवार का एक होनहार लड़का रोज़ सुबह उठते ही घर के बाहर के चबूतरे पर बैठ जाता। 

अख़बार पढ़ता और रूस, अमरीका, जर्मन, जापान, चीन आदि-आदि की बातें ज़ोर-ज़ोर से बोलते हुए करता। 

साथ ही हर बार यह कहना नहीं भूलता कि अपने यहाँ है ही क्या? आदि-आदि। 

उस के अपने घर के लोग उसे डाँटते हुए कहते कि अरे बेटा अभी-अभी उठा है। ज़रा दातुन-जंगल कर ले। स्नान कर ले। घड़ी दो घड़ी रब को सुमिर ले। 

मगर वह नहीं सुनता। लोगों से बहसें लड़ाता रहता। 

उस के अनुसार सारे विद्वान विदेशों में हुए और भारत ने तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पाखण्डियों को ही पैदा किया। 

उस लड़के के घर के लोग उसे बार-बार टोकते रहते, मगर वह सुनता ही नहीं।

ऐसे ही किसी एक दिन वह रोज़ की तरह बे-तमीज़ी पर उतारू था। उस के पिता उसे बार-बार टोक रहे थे। वह अनसुना करता जा रहा था। तभी अचानक पड़ोस वाले डेविड साब की वाइफ उस के लिए चाय बिस्कुट ले आई।

पट्ठा अपने बाप की बातों को धता बता कर चाय बिस्कुट के मज़े लेने लगा। 

इस पर उस के पिता आग बबूला हो कर उसे पीटने दौड़ पड़े। न जंगल गया न दातुन की। न नहाया। न रब को सुमिरा। और चाय बिस्कुट खाने लगा। 

उस लड़के के पिता उस लड़के को पीटते इस से पहले ही गली मुहल्ले के बहुत से लोग बीच बचाव में आ गए। 

जिनके घर से चाय और बिस्किटें आई थीं वह डेविड साब उस लड़के के पिता को समझाने लगे कि पण्डित जी आप का लड़का इन्क़लाबी है उसे पीटिये मत। उसे समझने की कोशिश कीजिये। 

यह सुन कर उस लड़के के पिता बोले कि :- 

"अगर सुबह उठ कर बिना दातुन जंगल किये चाय-बिस्किट निगलते हुए दूसरों की तारीफ़ और अपनों की बुराई करना ही इनक़लाब है तो भाड़ में जाय ऐसा इनक़लाब" । 

लघुकथा – प्रसाद - प्राण शर्मा

पहले की तरह इस बार भी धनराज जी ने अपने बेटे का जन्म दिवस राम मन्दिर में खूब धूमधाम से मनाया । वे मन्दिर के प्रेसिडेण्ट हैं। उन के नाम से लोग खिंचे चले आये।

केक काटा गया। खूब तालियाँ बजीं। हैपी बर्थ डे से हाल  गूँज उठा। उपहारों से  स्टेज भर गयी। इतने उपहार भगवान् राम को नहीं मिलते हैं जितने उपहार बेटे को मिले।  सभी अतिथि खूब नाचे - झूमे। शायद ही कोई मधुर गीत गाने से पीछे रहा था।

आरती के बाद प्रसाद के रूप में काजू , अखरोट , किशमिश और मिशरी का मिला - जुला डिब्बा अतिथियों को दिया जाने लगा। हर डिब्बा पाञ्च सौ ग्राम का था। प्रसाद देने  वाले धनराज खुद ही थे।

कुछ अतिथियों के बाद नगर के मुख्य न्यायधीश उत्तम कुमार जी की प्रसाद लेने की बारी आयी। उन्हें देख कर धनराज जी खिल उठे। उन्होंने झट मुख्य न्यायधीश जी को दो डिब्बे थमा दिए।

अपने हाथों में दो डिब्बे देख कर वे हैरान हो गये। पूछ बैठे - " धनराज जी , औरों को तो आप प्रसाद का  एक ही डिब्बा दे रहे हैं , मुझे दो डिब्बे क्यों ? "

" हज़ूर ,आप नगर के विशेष व्यक्ति हैं। " धनराज जी ने  उनके कान में कहा।

मुख्यधीश जी उन्हें एक तरफ ले गये। बड़ी नम्रता से बोले - " देखिये , धनराज जी, ये राम का मन्दिर है। उनके  मन्दिर में सभी अतिथि विशेष हैं। "