हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
आँखे सनी हों या आँखे भरी हों ,दोनो ही उदासियाँ बिखेरती हैं । आज आंखें भरी थी दो नहीं कई आँखें ,आँखों से बरस रही थी उदासियां। उन बरसती उदासियों में एक चेहरा उभर रहा था साँवला सा।