27 November 2010

क्या कहते हैं आप?

साहित्यकार कैसा होना चाहिए?

बड़ा ही सीधा सा प्रश्न है ना ये! फिर भी कुछ है जो अनुत्तरित सा लगता रहता है|

मसलन:-

क्या साहित्यकार वो है :-

जो लिखता है.......
जो दूसरों के लिखे को भी पढ़ता है..............
जो सिर्फ़ अपनी आत्मा की आवाज़ पर ही लिखता है.............
जो दूसरों के कहने पर ही लिखता है...........
जो तारीफ करना जानता है............
जो तारीफ सुनने का शैदाई होता है............
जो साधारण बात को भी अलंकृत कर दे.........
जो सिर्फ़ अपनी दुनिया में ही सुखी और संतुष्ट रहता है..............
जिसे बाहर की दुनिया को देखने का भी शौक हो............
जो झक्की मिज़ाज हो.............
जिसकी सदाशायता के चर्चे सभी जगह हों.............
जिसके यहाँ महफ़िलों का दौर चलता रहता हो...............
जिसकी बातों में हमेशा आदर्श की बातें हों...............
जो जन साधारण से ऊपर उठ कर हो.............
जिसे सरकार पुरस्कृत करे...............
जो कई कई सालों से लिख रहा हो और जिसे सभी जानते हों............
जो पहचान का मोहताज होने के बावजूद साहित्य के प्रति समर्पित हो...................
जो स्थापित लोगों की रचनाओं को सम्मान देना जनता हो............
जो नयी पौध को भी उत्साहित करने में विश्वास रखता हो.......
जो दिल पे चोट करने वाली ग़ज़ल लिखे............
जिसकी हिन्दी पर अच्छी पकड़ हो.................
जिसने कुछ नयी विधा का प्रादुर्भाव किया हो.................


आदि आदि आदि...............


और भी बहुत कुछ| क्या ये सभी लक्षण होने चाहिए एक साहित्यकार में? या इन में से कुछ? या इनके अलावा भी.....
वो!
वो!!
वो!!!
वो!!!!

क्या कहते हैं आप? हम किसे समझें साहित्यकार? क्या परिभाषा होनी चाहिए साहित्यकार की? क्या आप सभी बुद्धिजीवी अपने कीमती वक्त में से कुछ पल निकाल कर इस विषय पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणी देना चाहेंगे? इस विद्यार्थी को आप सभी के उत्तरों की प्रतीक्षा रहेगी|

आपका अपना ही
नवीन सी चतुर्वेदी

20 comments:

  1. sahityakaar wahi jiski lekhne aam jan ko udelit kar de.. gahree paith jay... ek kukam bana le. lage ki jaisa likhne wala apna hi koi hai..... wah sahitya nahi jo kitabon mein daba rahkar aam logon ke samajh se door ho..
    bahut samyik prashna hai yah!
    ghumta ghaamta aake blog par aa pahuncha... achha laga

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  2. धन्यवाद विजय भाई| फेसबुक हो ये ब्लॉग्स, किसी भी पोस्ट पर दर्जनों पोस्ट्स का ख्वाब सजाए बैठे साहित्य प्रेमियों के घर आँगन में साहित्यिक विषय पर कम से कम एक जवाब आया तो सही|

    आपकी राय महत्वपूर्ण है|

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  3. साहित्यकार विषयक बहुत सही प्रश्न उठाया है आपने
    ..मेरी नज़र में वही साहित्य अच्छा है जिसे बहुत से लोग विशेषकर जिस उद्देश्य से लिखा हो उसे लोग ह्रदयगम कर लें ... बहुत कुछ लिखा जाता है लेकिन यदि हम निष्कर्ष निकलते हैं तो बहुत सा लिखा तो किसी और के लिए लेकिन पढ़ते कोई और ही हैं ... मसलन एक वातानुकूलित में बैठा लेखक जिस गली वह भूल कर भी नहीं जाता उसका मार्मिक चित्रण कर अपने शब्दजाल से पाठकों को आकर्षित तो कर लेता है लेकिन यह कितने लोगों तक पहुंचकर सार्थक बन पाता है..... सच में यदि साहित्य की बात करें तो ... सूर, तुलसी, रहीम, कबीर इतना कुछ लिख कह गएँ हैं कि उस तक पहुंचना संभव नहीं लगता ..... वे जिस निश्वार्थ भाव और सम्पर्पित होकर लिखते थे, रचते थे वैसा समर्पण अब कहाँ?
    खैर मैं तो यही कहूँगी कि जो अपनी बात निश्वार्थ भाव से मनसा वाचा कर्मणा के तर्ज पर अधिक से अधिक आम जन तक पहुंचाकर किसी का भी भला करें वही अच्छा साहित्यकार हो सकता है .....
    शेष बड़े-बड़ी साहित्यकार यदि इस विषय पर कहते तो हमें भी कुछ ज्ञान हो पाता!!!!!!!

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  4. जी कविता जी, बहुत ही सत्य बातें कही हैं आपने| बड़े साहित्यकारों का आप की तरह मुझे भी इंतज़ार है अब तक|

    आपका स्वागत है ओबिओ के दूसरे महा इवेंट में| पूरी जानकारी यहीं मेरे ब्लॉग पर दी हुई है|

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  5. साहित्यकार को अच्छी तरह से परिभाषित आकर दिया आपने. हम भी अनुत्तरित से ठगे से है. कि अब क्या कहें?

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  6. वंदना जी बहुत बहुत आभार आपने इस विषय को पढ़ कर कुछ तो कहा|

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  7. साहित्य सर्जक , समाज के प्रति संवेदनशील और कलम के प्रति प्रतिबद्ध होता है साहित्यकार!

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  8. आपकी बहुमूल्य राय के लिए आभार अनुपमा जी|

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  9. बुद्धिजीवी वर्ग में एक साहित्यकार का मुकाम बहुत ही बुलंद और सम्माननीय माना जाता है ! यदि साहित्य किसी एक दौर में उस समाज का दर्पण माना गया है तो एक साहित्यकार भी किसी उस दर्पण को तराशने और सजाने-संवारने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है ! जहां एक साहित्यकार समाज की इज्ज़त और मान का पात्र होता है, वहीँ दूसरी ओर बहुत से दायित्व भी एक साहित्यकार के हिस्से में आते हैं ! इन्ही दायित्वों की रोशनी में यह तय किया जाता है की एक साहित्यकार कैसा होना चाहिए ! मैं इस सम्बन्ध में मेरी जाती राय के अनुसार आठ बिंदु मैं आप सब के साथ साझा करना चाहूँगा !

    एक साहित्यकार का एक बेहतरीन पाठक और आलोचक होना निहायत लाजमी है ! एक पाठक के तौर पर सम्बंधित विधा का साहित्य पठन उसके लिए बहुत ज़रूरी हो जाता है, जिससे कि वह उस विधा में होने वाली प्रत्येक गतिविधि पर नज़र रख सके ! एक पाठक के तौर पर अन्य साथी लेखकों का मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन की जिम्मेवारी भी उस पर आती है ! अक्सर देखा यह गया है कि एक मुकाम पर पहुँचने पर दूसरों को पढना शायद अपनी हतक समझने लगते हैं ! आलोचक होना इस लिए ज़रूरी है कि वह स्वरचित साहित्य कि कमी बेशिओं को बखूबी पहचान सके और उन में ज़रूरी सुधार भी कर सके !

    सादा बयानी किसी भी साहित्यक विधा की जान होती है ! एक साहित्यकार की भाषा क्लिष्टता से सदा मुक्त होनी चाहिए ! औरों से अलग दिखने मात्र के लिए क्लिष्ट शब्दावली का प्रयोग और उलटे सीधे ख्याली बिम्बों के इस्तेमाल का चलन साहित्य के आम लोगों तक पहुँचने में सबसे बड़ा बाधक बन रहा है !

    कोई साहित्यकार किसी "वाद" या "विचारधारा" का अनुयायी हो सकता है, मगर उसे इस बात का ध्यान हमेशा रखना चाहिए कि ये सब चीज़ें राष्ट्रीय हितों से किसी भी सूरत में टकरानी नहीं चाहिए ! साहित्यकार चूंकि देश की धरोहर हैं इस लिए उनके लिए राष्ट्रहित सबसे सर्वोपरि होना अनिवार्य है !

    एक साहित्यकार को भाषा, क्षेत्र, जाति, समुदाय और धर्म के से सदा ऊपर उठ ही अपना रचना धर्म निभाना चाहिए ! अपने आप को इन छोटे छोटे दायरों में क़ैद कर लेना किसी भी साहित्यकार की सोच को भी सीमित कर देता है ! उसको किसी एक दायरे में बंधने की बजाय अपनी सोच का दायरा हमेशा विस्तृत करते रहने का लगातार प्रयास करते रहना चाहिए !

    एक साहित्यकार को har समय अपने आस पास, समाज, देश और दुनिया में होती घटनायों के प्रति हर समय सजग और चौकन्ना रहना भी बहुत ज़रूरी है ! एक सजग साहित्यकार ही नवीन साहित्य का सृजन करने में सक्षम होता है !

    एक और गुण एक साहित्यकार के लिए बहुत ज़रूरी होता है, वह है संवेदनशील होना ! यहाँ एक बात याद रखने वाली बात यह भी है की संवेदना की जगह अति-भावुकता न ले ले ! क्योंकि अति-भावुक होकर रचा गया साहित्य क्षण भंगुर ही होता है !

    कोई भी साहित्य तब तक स्थातित्व और प्रौढ़ता को प्राप्त नहीं हो सकता जब तक वह अपनी जड़ों और मूल्यों से दूर रहता है ! ऐसा साहित्य अवास्तविकता और सतही होकर रह जाया करता है ! अत: एक साहित्यकार के लिए अपनी परम्परायों तथा नैतिक व सामजिक मूल्यों को हमेशा सम्मान देते रहना अति अनिवार्य हो जाता है !

    योगराज प्रभाकर
    (प्रधान सम्पादक)
    http://www.openbooksonline.com

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  10. मान्यवर योगराज जी, आप ने वाकई इस विषय को गंभीरता से लिया है| आपकी बेबाक राय मेरे जैसे विद्यार्थी के लिए अनमोल है| बहुत बहुत धन्यवाद योगराज प्रभाकर जी|

    आज एक तरफ युवा वर्ग साहित्य से बिल्कुल ही कट चुका है| दूसरी तरफ साहित्य के मायने ही नहीं समझ पा रहा इसी युवा वर्ग का दूसरा धड़ा| ये भी सच है कि ऊपरी तौर पर साहित्यकारों को समाज भले ही सम्मानित करता हो, परंतु समाज की क्या राय होती है साहित्य सेवियों के प्रति, हम सभी अच्छी तरह जानते हैं|

    हमारे सीनियर्स का मार्गदर्शन ऐसे में बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है| किसी भी साहित्यकार के लिए ज़रूरी है इस विषय पर अपनी राय देना|

    आशा करता हूँ, स्थापित साहित्यकार इस विषय को पढ़ कर अपनी राय अवश्य देंगे|

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  11. saahityakaar ka bahut badhiya bakhaan kiya hai aapne...
    saahityakaar ko sabse pehle ek achha pathak hona chahiye..jo ki sabki rachna ko padhe aur apni raay de...aisa nahi ki bas waah waahi kar de,,,agar kuch kami ho to wo bhi batani chahiye..jisse likhne wale ko ye bhi maalum pade ki kahan fault hai.....
    uske baad likhna hai sahityakaar ka main quality....likhna bhi aisa nahi wo likh kar wo khud ko hi sabse achha samjhe...dusro ki tipanni par bhi vichar karni chahiye...agar tipanni negative hai to use notice karke sudharna chahiye taaki agli baar wo hi insaan kahe ki haan bahut sahi rachna hai......


    Preetam Tiwary
    Administration Team Member
    www.openbooksonline.com

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  12. वाह प्रीतम भाई, युवावस्था में भी आप के विचार काफ़ी प्रभावशाली हैं| ईश्वर आपको हर कामयाबी बख़्शे| आपने समय निकल कर अपनी राय साझा की, इसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद|

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  13. नवीन जी आपकी पोस्ट बहुत गंभीर विषय पर है. मैं कुछ प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ अपने आपको इस स्थिति में नहीं देख पा रही हूँ. खास कर जब माननीय योगराज प्रभाकर जी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है.मैं तो बस इतना कह सकती हूँ की जैसे एक अच्छा वक्ता होना के लिए एक अच्छा श्रोता होना जरुरी है वैसे ही अच्छा लेखक होने के लिए एक अच्छा पाठक होना जरुरी है दूसरों के लेख पढ़ें फिर प्रतिक्रिया दें ना की अपना ही लेख लिखते रहें

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  14. रचना दीक्षित जी बहुत बहुत धन्यवाद आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए| सही ही तो है अगर हम दूसरों को पढ़ेंगे ही नहीं तो बाहर की दुनिया को देखेंगे कैसे? अब ये 'दूसरे', हमारे बीच के ही युवा साहित्यकार भी हो सकते हैं| ओबिओ के दूसरे इवेंट में इस तरह के और भी कुछ नवागन्तुकों की प्रतीक्षा है| आपसे भी प्रार्थना है मित्र मंडली सहित अवश्य पधारें और आयोजन की शोभा बढ़ाएँ|

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  15. आलेख और टिप्पणियों के माद्यम से साहित्य की बहुत सी परिभाषाएं समझी...
    सार्थक पोस्ट !

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  16. साहित्य ही किसी देश को वैचारिक रूप से प्रबल बनाता है.
    इसी लिए साहित्यकार ऐसा होना चाहिए जो अपने विचारों से समाज का ना सिर्फ़ स्वस्थ मनोरंजन करे बल्कि उसे कहीं ना कहीं सोचने पर भी मजबूर करे. केवल प्रसंशा या वाहवाही के लिए सस्ता या भॉड़ा साहित्य लिखना सिर्फ़ व्यवसाय मात्र है.

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  17. शेखर भाई आप ने अपने अग्रजों के संस्कारों को सम्मानित किया है| आदरणीय स्व. श्री शंकर लाल जी की परंपरा को आप अवश्य आगे बढ़ाएँगे, ये सुनिश्चित है| युवावस्था में ही आप के विचारों ने प्रभावित किया है| आभार|

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  18. जो कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा बात कह जाये....माफ़ करियेगा अर्थशास्त्र का स्टुडेंट हूँ ..आदत से मजबूर हूँ

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  19. ओहो, ये तो सोचा ही नहीं था भास्कर बंधु| भाई अलग हट के राय दी है आपने| धन्यवाद|

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