15 June 2011

तुफ़ैल चतुर्वेदी जी की गज़लें


tufail chaturvedi
हुआ जिसका भरोसा भी नहीं था|
कि वो उभरा – जो तैरा भी नहीं था|१|

महब्बत इम्तेहा लेती है ऐसे|
वो ही चुप था – जो गूँगा भी नहीं था|२|

शहंशाहों से यारी थी हमारी|
भले ही पास ढेला भी नहीं था|३|

बुराई जिस तरह मेरी हुई है|
मियाँ, मैं ऐसा अच्छा भी नहीं था|४|

ज़रूरत पेश आती दुश्मनी की|
तअल्लुक़ इतना गहरा भी नहीं था|५|

मैं सदियाँ छीन लाया वक़्त तुझसे|
मेरे कब्ज़े में लमहा भी नहीं था|६|

तेरी हालत बदल पाती तो कैसे|
कि जब आँखों में सपना भी नहीं था|७|





धीरे धीरे अश्क़ तो कम हो जाएंगे|
लेकिन दिल पर ज़ख्म रक़म हो जाएंगे|१|

दीवाने की पलकें खुलने मत देना|
सहरा तेरे बंजर नम हो जाएंगे|२|

मेरे पैरों में चुभ जाएंगे लेकिन|
इस रस्ते से काँटे कम हो जाएंगे|३|

उसकी याद का झोंका आने वाला है|
ये जलते लम्हे शबनम हो जाएंगे|४|

हम थक कर बैठेंगे उस की चौखट पर|
सारे राही तेज़ क़दम हो जाएंगे|५|

सूखती जाती है तेरी यादों की झील|
पंछी ग़ज़ल के आने कम हो जाएंगे|६|

दुनियादारी ताक़ पे रखने का जी है|
घर में रह कर हम गौतम हो जाएंगे|७|






दिलों के ज़हर को शाइस्तगी ने काट दिया|
अँधेरा था तो घना – चाँदनी ने काट दिया|१|

बड़ा तवील सफ़र था हयात का लेकिन|
ये रास्ता मेरी आवारगी ने काट दिया|२|

हमें हमारे उसूलों से चोट पहुँची है|
हमारा हाथ हमारी छुरी ने काट दिया|३|

तुम अगले जन्म में मिलने की बात करते हो|
ये रास्ता जो मेरी ख़ुदकुशी ने काट दिया|४|

खमोशियों से तअल्लुक़ की डोर टूट गयी|
पुराना रिश्ता तेरी बेरुख़ी ने काट दिया|५|

ज़िगर के टुकड़े मेरे आँसुओं में आने लगे|
बहाव तेज़ था, पुश्ता नदी ने काट दिया|६|
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जिस जगह पत्थर लगे थे, रंग नीला कर दिया|
अब के रुत ने मेरा बासी ज़िस्म ताज़ा कर दिया|१|

आईने में अपनी सूरत भी न पहिचानी गई|
आँसुओ ने आँख का हर अक़्स धुंधला कर दिया|२|

उस की ख़्वाहिश में तुम्हारा सिर है, तुम को इल्म था|
अपनी मंज़ूरी भी दे दी, तुमने ये क्या कर दिया|३|

उस के वादे के इवज़ दे डाली अपनी ज़िंदगी|
एक सस्ती शय का ऊंचे भाव सौदा कर दिया|४|

कल वो हँसता था मेरी हालत पे, अब हँसता हूँ मैं|
वक़्त ने उस शख़्स का चेहरा भी सेहरा कर दिया|५|

था तो नामुमकिन तेरे बिन मेरी साँसों का सफ़र|
फिर भी मैं ज़िंदा हूँ, मैंने तेरा कहना कर दिया|६|

हम तो समझे थे कि अब अश्क़ों की किश्तें चुक गईं|
रात इक तस्वीर ने फिर से तक़ाज़ा कर दिया|७|
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आहट हमारी सुन के वो खिड़की में आ गये|
अब तो ग़ज़ल के शेर असीरी में आ गये|१|

साहिल पे दुश्मनों ने लगाई थी ऐसी आग|
हम बदहवास डूबती कश्ती में आ गये|२|

अच्छा दहेज दे न सका मैं, बस इसलिए|
दुनिया में जितने ऐब थे, बेटी में आ गये|३|

हम तो समझ रहे थे ज़माने को क्या ख़बर|
किरदार अपने, देख – कहानी में आ गये|४|

तुमने कहा था आओगे – जब आयेगी बहार|
देखो तो कितने फूल चमेली में आ गये|५|

उस की गली को छोड़ के ये फ़ायदा हुआ|
ग़ालिब, फ़िराक़, जोश की बस्ती में आ गये|६|

हम राख़ हो चुके हैं, तुझे भी जता तो दें|
बस इस ख़याल से तेरी शादी में आ गये|६|

हाँ इस ग़ज़ल में उन के ख़यालात नज़्म हैं|
इस बार बादशाह – ग़ुलामी में आ गये|७|
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वरक़-वरक़ पे उजाला उतार आया हूँ|
ग़ज़ल में मीर का लहज़ा उतार आया हूँ|१|

बरहना हाथ से तलवार रोक दी मैंने|
मैं शाहज़ादे का नश्शा उतार आया हूँ|२|

समझ रहे थे सभी, मौत से डरूँगा मैं|
मैं सारे शहर का चेहरा उतार आया हूँ|३|

मुक़ाबिले में वो ही शख़्स सामने है मेरे|
मैं जिस की ज़ान का सौदा उतार आया हूँ|४|

उतारती थी मुझे तू निगाह से दुनिया|
तुझे निगाह से दुनिया उतार आया हूँ|५|

ग़ज़ल में नज़्म किया आंसुओं को चुन-चुन कर|
चढ़ा हुआ था, वो दरिया उतार आया हूँ|६|

तेरे बगैर कहाँ तक ये वज़्न उठ पाता|
मैं अपने चेहरे से हँसना उतार आया हूँ|७|
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अदालतें हैं मुक़ाबिल - तो फिर गवाही क्या|
सज़ा मिलेगी मुझे – मेरी बेगुनाही क्या|१|

मेरे मिज़ाज़ में शक़ बस गया मेरे दुश्मन|
अब इस के बाद मेरे घर की है तबाही क्या|२|

हर एक बौना मेरे क़द को नापता है यहाँ|
मैं सारे शहर से उलझूँ मेरे इलाही क्या|३|

समय के एक तमाचे की देर है प्यारे|
मेरी फ़क़ीरी भी क्या – तेरी बादशाही क्या|४|

तमाम शहर के ख़्वाबों में क्यों अँधेरा है|
बरस रही है – घटाओ! कहीं – सियाही क्या|५|

मेरे खिलाफ़ मेरे सारे काम जाते हैं|
तू मेरे साथ नहीं है, मेरे इलाही क्या|६|

बस अपने ज़ख्म से खिलवाड़ थे हमारे शेर|
हमारे जैसे क़लमकार ने लिखा ही क्या|७|
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पल पल सफ़र की बात करें आज ही तमाम|
मंज़िल क़रीब आई, हुई ज़िंदगी तमाम|१|

पौ क्या फटी, कि शब के मुसाफिर हुए विदा|
पीपल की छाँव तुझसे हुई दोस्ती तमाम|२|

पिछली सफ़ों के लोग जलाएं लहू से दीप|
मैं चुक गया हूँ, मेरी हुई रोशनी तमाम|३|

बस उस गली में जा के सिसकना रहा है याद|
उसकी तलब में छूट गयी सरकशी तमाम|४|

कुछ था कि जिस से ज़ख्म हमेशा हरा रहा|
बेचैनियों के साथ कटी ज़िंदगी तमाम|५|

ये और बात – प्यास से दीवाना मर गया|
लेकिन किसी तरह तो हुई तश्नगी तमाम|६|
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धूप होते हुए बादल नहीं मांगा करते|
हम से पागल, तेरा आँचल, नहीं माँगा करते|१|

हम फ़कीरों को ये गठरी, ये चटाई है बहुत|
हम कभी शाहों से मखमल नहीं माँगा करते|२|

छीन लो, वरना न कुछ होगा निदामत के सिवा|
प्यास के राज में, छागल नहीं माँगा करते|३|

हम बुजुर्गों की रिवायत से जुड़े हैं भाई|
नेकियाँ कर के कभी फल नहीं माँगा करते|४|

देना चाहे तू अगर, दे हमें दीदार की भीख|
और कुछ भी – तेरे पागल नहीं माँगा करते|५|

आज के दौर से उम्मीदेवफ़ा! होश में हो?
यार, अंधों से तो काजल नहीं माँगा करते|६|
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गुबार दिल से पुराना नहीं निकलता है|
कोई भी सुलह का रस्ता नहीं निकलता है|१|

उठाए फिरते हैं सर पर सियासी लोगों को|
अगरचे, काम किसी का नहीं निकलता है|२|

लड़ाई कीजिये, लेकिन, जरा सलीक़े से|
शरीफ़ लोगों में जूता नहीं निकलता है|३|

तेरे ही वास्ते आँसू बहाये हैं हमने|
सभी का हम पे ये क़र्ज़ा नहीं निकलता है|४|

जो चटनी रोटी पे जी पाओ, तब तो आओ तुम|
कि मेरे खेत से सोना नहीं निकलता है|५|

ये सुन रहा हूँ कि तूने भुला दिया मुझको|
वफ़ा का रंग तो कच्चा नहीं निकलता है|६|
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अश्क़ों से आँखों का पर्दा टूट गया|
इश्क़ का आखिर कच्चा धागा टूट गया|१|

बेटे की अर्थी चुपचाप उठा तो ली|
अंदर अंदर लेकिन बूढ़ा टूट गया|२|

सोचा था सच की ख़ातिर जाँ दे दूँगा|
मेरा मुझसे आज भरोसा टूट गया|३|

पर्वत की बाँहों में जोश अलग ही था|
मैदानों में आ कर दरिया टूट गया|४|

नई बहू से इतनी तबदीली आई|
भाई का भाई से रिश्ता टूट गया|५|
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प्यार किया है तो मर जाना थोड़ी है|
दीवाना – इतना दीवाना थोड़ी है|१|

आँखों से धोका मत खा जाना, इन में|
तू भी है – खाली वीराना थोड़ी है|२|

तनहा दिल आखिर दुनिया से हार गया|
लेकिन वो दुनिया की माना थोड़ी है|३|

टूटे रिश्ते पर रोना-धोना कर बंद|
उस को अब की बार मनाना थोड़ी है|४|

शुहरत की ऊँचाई पर इतराता है|
पर्वत से वादी में आना थोड़ी है|५|

हम तुम कागज़ पर सदियों साँसें लेंगे|
लफ़्ज़ों का जादू मर जाना थोड़ी है|६|
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हवा को रुख बदलना चाहिए था|
दिया मेरा भी जलना चाहिए था|१|

डुबोया आँसुओं में सारा जीवन|
समंदर से निकलना चाहिए था|२|

पड़े हो रास्ते पर खाक ओढ़े|
हवा के साथ चलना चाहिए था|३|

पिघल उठ्ठी थी तारीकी फ़जा की|
हमें कुछ और जलना चाहिए था|४|

जरूरी था सभी के साथ रहते|
जरा सा बच के चलना चाहिए था|५|

अँधेरा आदतन करता है साज़िश|
मगर सूरज निकलना चाहिए था|६|

तुम्हारी बात बिलकुल ठीक थी बस|
तुम्हें लहज़ा बदलना चाहिए था|७|
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नहीं झोंका कोई भी ताज़गी का|
तो फिर क्या फायदा इस शायरी का|१|

बहुत दिन तक नहीं बहते हैं आँसू|
वो दरिया हो गया सहरा कभी का|२|

किसी ने ज़िंदगी बरबाद कर दी|
मगर अब नाम क्या लीजै किसी का|३|

महब्बत में ये किसने ज़हर घोला|
बहुत मीठा था पानी इस नदी का|४|

तेरी तस्वीर पर आँसू नहीं हैं|
मगर धब्बा नहीं जता नमी का|५|

वही जो मुस्कुराता फिर रहा है|
उदासी ढूँढती है घर उसी का|६|

वो रिश्ता तोड़ने के मूड में है|
मियाँ पत्ता चलो अब ख़ुदकुशी का|७|

सिमट आए फिर इक दिन ज़ात में हम|
बहुत दिन दुख सहा ज़िंदादिली का|८|

किसी दिन हाथ धो बैठोगे हमसे|
तुम्हें चस्का बहुत है बेरुख़ी का|९|
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[ये १५ गज़लें उपलब्ध कराने के लिए, भाई विकास शर्मा 'राज़' जी का बहुत बहुत आभार]

35 comments:

  1. एक से बढ़ कर एक शे'अर.. किस-किस को अच्छा कहें.. एकदम से मजा आ गया. तुफैल जी से रू-ब-रू कराने के लिए हार्दिक आभार.

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  2. यह अंदाज़ पसंद आया

    प्यार किया है तो मर जाना थोड़ी है
    दीवाना – इतना दीवाना थोड़ी है

    तुफ़ैल जी की सभी ग़ज़लें बहुत पसंद आईं. आभार.

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  3. वातायन क्या खोला हमने एक के बाद एक गज़ल का झोंका आया ,मधु रस लाया ,दिल हर्षाया ,भावों ने कितना तरसाया .एक से बढ़ कर एक -
    उठाए फिरतें हैं सर पर सियासी लोगों को ,
    अगरचे काम किसी का नहीं निकलता ।
    महब्बत में ये किसने ज़हर घोला ,
    बहुत मीठा था पानी इस नदी का .शुक्रिया भाई साहब आपका इस दावत के लिए .बहुत बढिया सामान परोसा .

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  4. प्रिय नवीन जी,

    आपसे तअल्लुक ई-कविता और थोडा गुरूजी श्री पंकज सुबीर साहब के ब्लॉग से है।

    वातायन पर श्री तुफैल चतुर्वेदी जी की गज़लें पढ़ी औअर बस पढ़ता ही रहा। पहली गज़ल के इस शे’र पर तो क्या कहूँ :-

    जरूरत पेश आती दुश्मनी की
    तअल्लुक इतना गहरा भी नही था

    और इस शे’र ने तो जैसे पूरी महफिल ही लूट ली हो :-

    हम तो समझे थे कि अब अश्क़ों की किश्तें चुक गईं|
    रात इक तस्वीर ने फिर से तक़ाज़ा कर दिया

    बहुत अच्छी प्रस्तुति के लिये श्री नवीन जी का आभार....

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    नोट : एक मश्विरा है शायद आप अन्यथा नही लेंगे कि इतनी उम्दा गजलों को एक साथ १५ नही ५-५ की किश्तों में की जायें तो किसी भी सुधि पाठक को वक्त मिलता है कि रचनाकार के मन में झाँकने का....

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  5. भाई नवीन जी तुफैल जी की गज़लें पढ़वाने के लिये आभार

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  6. बार बार पढ़ने को मन करता है.
    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

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  7. नवीन जी तुफैल जी की गजले पढवाने और सुन्दर संकलन के लिए धन्यवाद और आभार
    महब्बत में ये किसने ज़हर घोला|
    बहुत मीठा था पानी इस नदी का|४|

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  8. मैं सदियाँ छीन लाया वक़्त तुझसे|
    मेरे कब्ज़े में लमहा भी नहीं था|
    behtreen najm se parichay karane ke liye bahut bahut shukriya......

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  9. क्या बात , सभी एक से बढकर एक

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  10. आद. नवीन जी,
    तुफैल जी की बेहतरीन ग़ज़लें पढ़वाने के लिए शुक्रिया !
    आभार !

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  11. इतनी सुन्दर और प्यारी गजलें पढ़वाने के लिए आभार

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  12. एक से बढ़ कर एक
    great collection

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  13. बेहतरीन गज़लियात , एक से एक बढकर।

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  14. भावपूर्ण अभिव्यक्ति और सुन्दर प्रस्तुति........ बहुत बहुत बधाई...

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  15. आपने पढ़वाया...बहुत बहुत शुक्रिया..शानदार ग़ज़लें

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  16. khoobsoorat prastuti , aabhaar
    राजनेताओं की मक्कारी और अनवरत भ्रष्टाचार के बावजूद
    भारतीय स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं .

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  17. तुफैल साहब की रचनाओं को सब तक पहुँचाने का आपको और विकाश जी दोनों को दिल से आभार....!!! पचास साल पूरे करने पर तुफैल साहब को विनम्र बधाई !

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  18. बहुत शानदार

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  19. शानदार ग़ज़लें|
    विजयादशमी पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं।

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  20. वाह...वाह...वाह
    तुफ़ैल साहब की शायरी सीधे दिल में उतर गई.

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  21. वाह ...बहुत बढि़या प्रस्‍तुति ..सभी गजलें एक से बढ़कर एक हैं आभार ।

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  22. सुंदर रचनाएं .. एक से बढकर एक !!

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  23. आईने में अपनी सूरत भी न पहिचानी गई|
    आँसुओ ने आँख का हर अक़्स धुंधला कर दिया|बहुत शानदार.

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  24. आदरणीय महोदया
    अमृता जी का हौज खास वाला घर बिक गया है। कोई भी जरूरत सांस्कृतिक विरासत से बडी नहीं हो सकती। इसलिये अमृताजी के नाम पर चलने वाली अनेक संस्थाओं तथा इनसे जुडे तथाकथित साहित्यिक लोगों से उम्मीद करूँगा कि वे आगे आकर हौज खास की उस जगह पर बनने वाली बहु मंजिली इमारत का एक तल अमृताजी को समर्पित करते हुये उनकी सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने के लिये कोई अभियान अवश्य चलायें। पहली पहल करते हुये भारत के राष्ट्रपति को प्रेषित अपने पत्र की प्रति आपको भेज रहा हूँ । उचित होगा कि आप एवं अन्य साहित्यप्रेमी भी इसी प्रकार के मेल भेजे । अवश्य कुछ न कुछ अवश्य होगा इसी शुभकामना के साथ महामहिम का लिंक है
    भवदीय
    (अशोक कुमार शुक्ला)

    महामहिम राष्ट्रपति जी का लिंक यहां है । कृपया एक पहल आप भी अवश्य करें!!!!

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  25. इन्हें लफ़्ज़ में पढ़ा था। आज यहां पढ़ा। हमेशा अच्छी लगी।

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  26. तुफैल साहब का नाम मेरे व्यक्तिगत रूप से सबसे आदरणीय नाम है -- आज से 13 वर्ष पहले मैने एक संकलन प्रकाशित करवाया था -तस्वीरें पानी पर -- मेरी और मेरे 3 अन्य साथियों की गज़लें इसमें थीं --मुझे इसकी प्रतिक्रिया में 300 से अधिक पत्र मिले --तब् इण्टरनेट सम्पर्क नहीं थे या प्रचलित नहीं थे --सभी में ग़ज़लों की भूरि भूरि प्रशंसा थी --लेकिन एक पत्र ऐसा भी था जो बेहद खरा था -- बहुत साफ -साफ शब्दों में गज़लों की स्तरीयता भाषा और व्याकरण पर बेबाक टिप्पणी की गयी थी-जो कि किसी को शायद स्वीकार न होती लेकिन मै इस कड़वी दवा से बेहद प्रभावित हुआ यह पत्र तुफैल साहब का था -पत्राचार बढा -एक् लम्बी मुलाकात हुयी --और उनके द्वारा सम्पादित सालाना शुमारा --रस -रंग में अपनी शिरकत बनी रही । रस- रंग का -सम्पादन कड़ा होता था और सम्पादकीय स्मरणीय होता था --ये सलाना शुमारा बाद में लफ़्ज़ नाम की त्रैमासिक मैगज़ीन में तब्दील हो गया । पिछले दशक में उर्दू गज़लकारों को देवनागरी पाठकवर्ग मे स्थापित करवाने का यह सबसे स्तरीय सबसे प्रभावशाली और सबसे सशक्त प्रयास है - पाकिस्तान के मुश्ताक अहमद यूसुफी साहब जो वहाँके श्रीलाल शुक्ल भी हैं की 4 पुस्तकों को देवनागरी लिपि में पहुँचाने का कार्य भी मुहत्तरम ने किया है -- अयोध्या प्रसाद गौय लीय जी -प्रकाश पण्डित जी -नरेन्द्रनाथ जी ये तीन नाम ऐसे हैं जिन्होंने उर्दू गज़ल को देवनागरी पाठकवर्ग तक पहुँचाया लेकिन इनमें से कोई खुद शायर नहीं था -- तुफैल साहब खुद भी शीर्षस्थ शायरों मे शुमार किये जाते हैं लेकिन साहित्य को उनकी देन बहुत बड़ी है और उनके बगैर गज़ल की चर्चा आज अधूरी है --उन्होंने कई विदेश यात्रायें की है -- मैं आपको एक पाकिस्तान के अखबार की कतरन देता हूँ देखिये कि पाकिस्तान के अखबार उनके बारे में क्या कहते हैं --ये रिपोर्ट महशहूर पत्रकार हसन आबिदी की है जो उन्होंने तुफैल साहब के एक पाकिस्तान दौरे के बाद डान अखबार में दी थी --।

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  27. by Hasan Abidi


    Vinoy Krishna Chaturvedi from Kashipur, Nainital, India, as a poet is known as Tufail Chaturvedi. He was in Karachi recently and in a couple of mushairas held in the city last week, the young man won much applause.

    Chaturvedi does not seem to be a traditional mushaira poet. With his erudition and eloquence and sharp memory, he will confront one with many surprises. His up-to-date knowledge of Urdu literature, its major classics and of literature produced in other Indian languages - Hindi, Marathi, Punjabi and Gujarati - are noteworthy.

    Trained in commerce, Chaturvedi brings out a literary magazine Lafz (the word) in Devnagri script with some of the contents in the original Hindi and some transcribed from Urdu. His passion is to introduce modern Urdu writings - mostly humour - and young Urdu poets to Hindi readers.

    At a literary sitting jointly organized by the Fiction Group and the Pen for Peace, hosted by columnist/poet Saba Ikram, the visitor expressed his views on literary issues in plain words. He introduced to the audience scores of young ghazal writers and their ghazals, never heard at any forum here.

    Chaturvedi finds absolutely no difference between Urdu and Hindi and believes that only the script divides the two languages. Urdu had deep roots in Indian soil and it would survive against all odds, he said. "The ghazal is such a popular poetic form that it is being written in Gujarati, Marhati, Punjabi and Bengali."

    But for how long will Urdu survive without an economic base and meaningful economic activity attached to it? I asked. He said mushairas also comprised an economic activity as a source of living for many families. But that was not enough; in fact, Urdu had some basic drawbacks rooted in its past. Writers engaged with 'darbars' and the elite classes confined it to their use. They did not allow it to reach the common people.

    Polishing and cleansing of the language was their favourite pastime, they used to weed out words that were coarse and indelicate to them and did not allow new words to enter into their so-called literary sphere.

    Urdu, therefore, could not emerge as a common man's language. For example, Urdu's prose treasure after 200 years was a thin volume of Mirza Ruswa entitled Umrao Jan Ada.

    Chaturvedi felt sorry for the critics who were dogmatic in their views and were indifferent to new writings and to the aspirations of young people. The critics admired Ghalib, who was a rebel in his time, but refused to acknowledge the 'rebels' of their own time.

    Urdu should be brought out from its narrow habitat of poetry and it should be linked with the vast economic area of activities. Its sphere of appeal would thus expand, and its literature enrich, he remarked.

    Thousands of Hindi language readers had read Aab-i-Gum by Mushtaq Ahmed Yusafi in the Devnagri script and only a few hundred might have read it in the Urdu script, he said. This was an obvious comment on Urdu's limited reach in India because of its script.

    नवीन भाई !!बहुत ऊँचा किरदार हमें हासिल है -इनको सर उठा कर देखने में कई लोगों की पगड़ी गिर चुकी है -- आइना हैं ये

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  28. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-704:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  29. बेहतरीन ! एक से बढ़कर एक !

    Gyan Darpan
    .

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  30. ऐसी एक से बढ़ कर एक उम्दा गज़लें पढवाने के लिये सादर आभार....

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  31. एक एक शेर अपने आप में संग्रह होने का माद्दा रखता है ।
    शुक्रिया तुफैल जी..............आप सचमुच कागज पर सदियों सांसें लेंगे ।
    इसमें रंच मात्र भी संदेह नहीं हैं ।।

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  32. अच्छी हैं। उम्दा हैं, लेकिन उस्ताद शायर की कलम से और भी उम्दा बुलंद अशआर निकलने चाहिए। बकौल मीर "ग़ज़ल कहनी न आती थी, तो सौ-सौ शेर कहते थे। मगर एक शेर भी ऐ मीर अब मुश्किल से होता है।"

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