9 June 2011

चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - दुनिया को ताज लगे, उसे मुमताज लगे


सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन



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घनाक्षरी छंद के बारे में हम ने एक बात नोट की| पढ़ कर समझने की बजाय जब लोगों ने इस को औडियो क्लिप के जरिये सुना तो तपाक से बोल उठे अरे ये तो वो वाला है, हाँ मैंने सुना है इसे, अरे मैं तो जानता हूँ इसे| इस तरह की बातों को ध्यान में रखते हुए हम घोषणा के वक्त दी गयी औडियो क्लिप्स को दोहराना जारी रखते हैं:-




तिलक भाई द्वारा गाई गई रचना श्री चिराग जैन जी की है, और कपिल द्वारा गाई गई - मेरी|
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मुंबई में बरखा रानी की कृपा हो गयी और भाई हमने भी उस का स्वागत आलू के पराठों के साथ कर दिया है| कल गंगा दशहरा है - गंगा स्नान की प्रथा है, नाशिक जाएँगे - राम घाट पर स्नान करने| हालांकि बदलते समय के साथ नदियों का स्वरूप बदला है, पर श्रद्धा और आस्था भी अपनी जगह है भाई| पश्चिमी सभ्यता के लिए हर जगह सब कुछ एडजस्ट कर लेते हैं हम; तो अपने संस्कारों के लिए थोड़ा बहुत क्यूँ नहीं? फिर रविवार को एकादशी है तो उस दिन इच्छा है त्र्यंबकेश्वर दर्शन की|

आलू के पराठों की याद आते ही याद आ जाता है पंजाबी लहजा| तो ठेठ पंजाबी लहजे वाले और काव्य के किसी भी प्रारूप में भाषाई चौधराहट को सिरे से नकारने वाले योगराज प्रभाकर जी के घनाक्षरी कवित्तों के मजे लेते हैं आज| योगराज जी ने श्रंगार रस वाली पंक्ति को ताजमहल संदर्भित प्रेम से जोड़ कर अभिनव प्रस्तुति दी है| सामान्यत: श्रंगार रस का नाम आते ही हम लोग रीति काल की कल्पना करने लगते हैं या फिर बिहारी, सूरदास, तुलसी, केशव, सेनापति और घनानन्द जैसे तमाम कवियों द्वारा रचित काव्य का स्मरण करने लगते हैं| दरअसल श्रंगार रस का क्षेत्र काफी वृहद है और अब तो इंटरनेट पर उपलब्ध भी है, सो हम यहाँ उस विशाल शास्त्र की तरफ सिर्फ इंगित करते हुए आगे बढ़ते हैं|






हरेक दीवार तोड़, एक छत नीचे आ के ,
छोटी मोटी बातें खुद, बैठ निपटाइए|

अपना ये घर टूटे, सब इसी ताक में है,
इसे टूटने न देंगे, कसम ये खाइए |

खोलो ऑंखें समझ लो, दुशमन के मंसूबे,
उसके भुलावे में न, हरगिज़ आइए |

फूट पड़ी घर में तो, घर बच पायेगा न,
राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइए ||

[फूट पड़ी घर में तो............. 'मुख्य पंक्ति' को यथार्थ के काफी करीब ले गए हैं आप|
'वसुधेव कुटुम्बकम' को समर्पित इस पंक्ति पर आप ने वाकई जबर्दस्त प्रस्तुति दी है]


देख रूप रंग तेरा, सुध बुध भूले सभी,
तेरे इस रूप ने तो, जग भरमाया है |

ताब तेरी झेल पाना, आदमी के बस कहाँ,
देख तेरी सुन्दरता, चाँद भी लजाया है |

रूप का खज़ाना रख, यमुना के तीर पर,
मालिक ने प्रेमियों को, तो'फ़ा भिजवाया है |

दुनिया को ताज लगे, उसे मुमताज लगे,
जिस प्रेमी बादशा' ने, तुझको बनाया है ||

[इस छन्द ने तो 'मुख्य पंक्ति' से ऊपर चढ़ कर बात कही है भाई| और इसे ही कहते हैं कवि की
कल्पना| मुझे लगता है इस छन्द की तारीफ़ आप लोग मुझ से बेहतर करेंगे]



शरमाये काला तवा, बन्नो का दरश कर
लगे जैसे नैरोबी से आई कोई नार है |

कौवा जैसे निकला हो भींज कर चूने में से,
बन्ने की सूरत पे भी, ऐसा ही निखार है |

सीढ़ी लगवायी जब, जयमाल डालने को,
बन्नो जी को तब हुआ, बन्ने का दीदार है |

बन्नो जया भादुरी का, एक बटा तीन लगे,
बन्ने का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है ||

["जया भादुरी का एक बटा तीन" बाप रे बाप कैसी कैसी कल्पनाएं आ रही हैं -
यार खुश कर दित्ता|]



अंग्रेज़ियत के रंग में अमूमन रँग चुके आज के दौर में ऐसे छंदों को पढ़ने का आनंद ही और है| 'विशेष पंक्ति' वाले छन्द पर काम करने वाले कवियों की संख्या अब हो गई है तीन| आप लोग आनंद लीजिएगा योगराज जी के छंदों का, और हाँ, अपनी बहुमूल्य राय देना न भूलें प्लीज| तब तक हम तैयारी करते हैं एक और धमाकेदार पोस्ट की|

जय माँ शारदे!

22 comments:

  1. वाकई धमाकेदार पोस्ट है। ताजमहल की बात करके तो योगराज जी ने वाकई एक नया आयाम दिया है इस आयोजन को। हर घनाक्षरी शानदार है। योगराज जी को बहुत बहुत बधाई।

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  2. योगराज जी के छंद बहुत मनोहारी हैं।
    उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं।
    समस्यापूर्ति का यह मंच शब्दों और छंदों की अलंकृत कारीगरी के नए आयामों के लिए प्रसिद्ध होता जा रहा है।
    बधाई नवीन जी।

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  3. छन्दों का सौन्दर्य देखते ही बनता है, सभी छन्द एक से बढ कर एक हैं श्री योगराज जी को बधाई।

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  4. इतने मनोहारी छंदों के लिए योगेश जी को बधाई।

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  5. अच्छी रचनाओं के लिए बधाई
    आशा

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  6. ओजी योगराज बाउजी... कमाल कर दित्ता तुसी...वाह...वाह...तीनो के तीनो छंद अद्भुत से भी बहुत आगे वाले अद्भुत लगे...
    दुनिया को ताज लगे, उसे मुमताज लगे और बन्नो जया भादुरी का, एक बटा तीन लगे वाले लाइनों ने तो हमें दीवाना बना है आपकी रचना शीलता का...वाह वाह करते नहीं थक रहे हैं हम...क्या छंद पढने को मिलें हैं...तबियत इन मौसमी फुहारों में और भी बाग़ बाग़ हो गयी है...
    नवीन जी आपकी यात्रा शुभ हो खूब आनंद कर के आयें ये ही कामना करते हैं.

    नीरज

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  7. योगराज जी!

    वन्दे मातरम.

    तीनों घनाक्षरी छंद अपनी मिसाल आप है. आपकी रचनाधर्मिता को नमन.

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  8. भाई योगराज जी आपकी तीनों की तीनों घनाक्षरी अपने आप में बेमिसाल हैं ........इस हेतु कृपया हृदय से बधाई स्वीकार करें ..........भाई नवीन जी का इस आयोजन के लिए बहुत बहुत आभार ....:)))))))

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  9. //हरेक दीवार तोड़, एक छत नीचे आ के ,
    छोटी मोटी बातें खुद, बैठ निपटाइए// वाह वाह, एक छत के नीचे आने से छोटी मोटी ही नहीं लम्बी चौड़ी बातों को भी निपटाया जा सकता है, बसर्ते एक छत के नीचे बैठा जाय न की छत तो दूर फर्श छोड़ ही भाग लिया जाय |

    //अपना ये घर टूटे, सब इसी ताक में है,
    इसे टूटने न देंगे, कसम ये खाइए // बेहद संजीदा बात कही है आपने, जरूरत है घर तोड़ने वालों को पहचान कर सतर्क रहने की, क्यू की ये घर तोड़ने वाले बहुत घाघ किस्म के लोग होते है और फुट ड़ाल राज करने में विश्वास करते है |

    //खोलो ऑंखें समझ लो, दुशमन के मंसूबे,
    उसके भुलावे में न, हरगिज़ आइए // बिलकुल सही सुझाव, अमल करने की आवश्यकता |

    //फूट पड़ी घर में तो, घर बच पायेगा न,
    राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइए // आहा ! करोड़ों की बात, क्या बात कही है आपने |
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    //देख रूप रंग तेरा, सुध बुध भूले सभी,
    तेरे इस रूप ने तो, जग भरमाया है // वाह वाह , सौंदर्य वर्णन का बेहतरीन नमूना,

    //ताब तेरी झेल पाना, आदमी के बस कहाँ,
    देख तेरी सुन्दरता, चाँद भी लजाया है // बिलकुल सही बात |

    //रूप का खज़ाना रख, यमुना के तीर पर,
    मालिक ने प्रेमियों को, तो'फ़ा भिजवाया है // बिलकुल इस खुबसूरत मकबरे को देख कर तो यही लगता है | जिसके याद में इस खुबसूरत मकबरा को जिन्होंने बनवाया है उस ताज को देखने पर तो महबूबा ही दिखेगी |
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    //शरमाये काला तवा, बन्नो का दरश कर
    लगे जैसे नैरोबी से आई कोई नार है // हा हा हा हा , बहुत खूब सर, हास्य शैली में भी आप कि पकड़ बेजोड़ है |

    //जैसे कोई काला कौवा चूने में नहा के आया
    बन्ने की सूरत पे भी, ऐसा ही निखार है // बहुत खूब, क्या बात है |

    //सीढ़ी लगवायी जब, जयमाल डालने को,
    बन्नो जी को तब हुआ, बन्ने का दीदार है // आय हाय, राम ने मिलाई ऐसी जोड़ी ....

    //बन्नो जया भादुरी का, एक बटा तीन लगे,
    बन्ने का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है// ये ल्यो , आखिर शहंशाह को आपने लपेटे में ले ही लिया, और हां एक बटा तीन वाली बात बहुत मजेदार है |
    आदरणीय योगराज प्रभाकर (प्रधान संपादक www.openbooksonline.com) जी, आपकी ये तीनों घनाक्षरी पढ़ मन मुग्ध है, ग़ज़ल, लघुकथा, संस्मरण,रुबाई, हाइकु, रिपोर्ताज, कह मुकरी आदि विधाओं में आपके लेखन का लोहा तो हम सब पहले से ही मानते आ रहे है किन्तु अभी घनाक्षरी में आपके महारत को देख कर तो लगता है कि शायद ही साहित्य की कोई विधा आप से छुटा हो | बहुत बहुत बधाई सर जी |

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  10. वाह ! योग राज जी सुन्दर छंद | पढ़ कर बहुत अच्छा लगा | बधाई !!!

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  11. तीनों छंद बहुत ही मनमोहक .....

    भाव और शिल्प ....दोनों उत्तम

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  12. आदरणीय महेंद्र वर्मा जी - यह सब आप जैसे विद्वानों से ही सीख रहा हूँ ! बहरहाल ज़र्रनावाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया !

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  13. भाई धर्मेद्र सिंह जी, आपको छंद पसंद आए जान कर बहुत अच्छा लगा - उत्साहवर्धन हेतु आपका बहुत बहुत आभार !

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  14. आदरणीय नीरज गोस्वामी जी - आपकी ज़र्रनावाज़ी का तह-ए-दिल से ममनून हूँ ! जिन दो पंक्तियों का आपने ज़िक्र किया है, वो अब मुझे भी अच्छी लगने लगी हैं ! आपको मेरा यह तुच्छ सा प्रयास पसंद आया - मेरी ते लग्ग गई लाटरी भापा जी, ज्योंदे वसदे रहो !

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  15. माननीया निर्मल कपिला जी - इस उत्साहवर्धन का बहुत बहुत शुक्रिया !

    - माननीया अजित गुप्ता जी - आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

    - माननीया आशा जी - शुक्रिया !

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  16. आदरणीय अम्बरीश श्रीवास्तव भाई जी, आपके उत्साहवर्धन का ह्रदय से धन्यवादी हूँ ! जिस प्रकार समय समय पर आपने मेरा मार्ग-दर्शन किया है, उसके लिए भी सदा आपका आभारी रहूँगा !

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  17. आदरणीय आचार्य संजीव सलिल जी,

    सादर प्रणाम !

    यह सब आप ही की वजह से संभव हुआ है ! हालाकि ज़ेहन से पूरी तरह उतर चुके सनातन भारतीय छंदों में दोबारा मेरी रूचि पैदा करने का श्रेय नवीन भाई जी को जाता है - जिसके लिए मैं सदैव उनका ऋणी रहूँगा ! लेकिन इनके शिल्प की जानकारी मैंने इन्टरनेट पर आपके आलेख पढ़ पढ़ कर ही हासिल की है ! आप जैसे अग्रज हर किसी के भाग्य में नहीं होते ! इस लिए दोनों हाथ उठा कर और सच्चे ह्रदय से यह कहना चाहूँगा - "मेरा मुझ में कुछ नहीं - जो कुछ है सो तेरा !" आपके श्री चरणों में मेरा कोटि कोटि नमन !

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  18. शेखर भाई, आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

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  19. भाई गणेश बाग़ी जी - कुछ समय पूर्ण ओबीओ के एक कामयाव तरही मुशायरे के बाद एक वरिष्ठ शायर ने मुझे फोन किया ! जिस तरह उनके एक एक शेअर को विश्लेषित किया गया था, उस से वे इतने प्रसन थे कि उन्होंने मुझे बताया कि इतनी ख़ुशी शायद उन्हें वो आशार कह कर भी नहीं हुई होगी जितनी कि उन्हें इतना विस्तृत विश्लेषण देख कर हुई ! अपनी रचना पर सार्थक टिप्पणी मिलना किसी भी रचनाकर्मी के लिए प्राय: टोनिक का काम करता है ! आपकी यह डिटेल्ड टिप्पणी मेरे लिए भी किसी टोनिक से कम नहीं है ! यह टिप्पणियाँ जहाँ रचनाकार का उत्साहवर्धन ही करती ही बल्कि उन्हें भविष्य में ओर बेहतर करने के लिए भी प्रेरित करती है ! आपको मेरी अदना सी कोशिश पसंद आई, आपका बहुत बहुत शुक्रिया !

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  20. आपका बहुत बहुत धन्यवाद सुरेन्द्र सिंह "झंझट" साहिब !

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  21. नवीन भाई, सर्वप्रथम इन छंदों को आपले ब्लॉग पर स्थान देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! आपने जिस तरह दिल खोल कर मेरी पीठ ठोकी है - उसके लिए ह्रदय से आपका आभारी हूँ ! दूसरी घनाक्षरी को दुरुस्त करने में जिस तरह आपने मेरा मार्गदर्शन किया, उसके लिए भी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

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  22. कौवा जैसे निकला हो भींज कर चूने में से,
    बन्ने की सूरत पे भी, ऐसा ही निखार है |

    हा हा हा

    सर्वश्रेष्ठ छंद पढ़वाए

    मजा आ गया

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