5 November 2010

सांगोपांग सिंहावलोकन छंद - घनाक्षरी कवित्त - नवीन

सांगोपांग सिंहावलोकन छंद
घनाक्षरी कवित्त

कवित्त का विधान
टोटल ४ पंक्तियाँ
हर पंक्ति ४ भागों / चरणों में विभाजित
पहले, दूसरे और तीसरे चरण में ८ वर्ण
चौथे चरण में ७ वर्ण, १६+१५ भी चलता है।
इस तरह हर पंक्ति में ३१ वर्ण

सिंहावलोकन का विधान
कवित्त के शुरू और अंत में समान शब्द
जैसे प्रस्तुत कवित्त शुरू होता है "लाए हैं" से और समाप्त भी होता है "लाए हैं" से

सांगोपांग विधान
ये मुझे प्रात:स्मरणीय गुरुवर स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी ने बताया कि छंद के अंदर भी हर पंक्ति जिस शब्द / शब्दों से समाप्त हो, अगली पंक्ति उसी शब्द / शब्दों से शुरू हो तो छंद की शोभा और बढ़ जाती है| वो इस विधान के छंन्द को सांगोपांग सिंहावलोकन छंद कहते थे|


कवित्त:
लाए हैं बाजार से दीप भाँति भाँति के हम,
द्वार औ दरीचों पे कतार से सजाए हैं|
सजाए हैं बाजार हाट लोगों ने, जिन्हें देख-
बाल बच्चे खुशी से फूले ना समाए हैं|
समाए हैं संदेशे सौहार्द के दीपावली में,
युगों से इसे हम मनाते चले आए हैं|
आए हैं जलाने दीप खुशियों के जमाने में,
प्यार की सौगात भी अपने साथ लाए हैं||


:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

6 comments:

  1. एक बार फिर मज़ा आ गया। इतने अच्छी छंद की सृष्टि की है आपने।
    word cerification हटा दीजिए।

    चिरागों से चिरागों में रोशनी भर दो,
    हरेक के जीवन में हंसी-ख़ुशी भर दो।
    अबके दीवाली पर हो रौशन जहां सारा
    प्रेम-सद्भाव से सबकी ज़िन्दगी भर दो॥
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    सादर,
    मनोज कुमार

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  2. मनोज जी मैं ब्लॉग में नया हूँ| ये वर्ड वेरिफिकेशन के बारे में बताएँ प्लीज़|

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  3. ब्लॉग नेहा की नोटबुक nehasnotebook.blogspot.com
    पर आपकी इस पोस्ट का लिंक
    दिया गया है|
    आपका आभार|
    आपकी राय की प्रतीक्षा में|
    धन्यवाद|

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  4. बहुत बहू आभार नेहा जी|

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  5. बहुत सुंदर तरीके से समझाया है

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  6. अति उत्तम सांगोपांग प्रयोग

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