19 October 2018

साहित्यम का कविसम्मेलन - मुशायरा (7 अक्तूबर 2018) - भवन्स केम्पस अंधेरी, मुंबई



7 अक्तूबर 2018 की शाम साहित्यम के लिये एक ख़ुशगवार शाम बन कर आयी। देश के अलग-अलग हिस्सों से अनेकानेक कवियों, शायरों के साथ एक कवि-सम्मेलन मुशायरे का आयोजन किया गया। उम्मीद नहीं की थी कि सरस-साहित्य के इतने सारे पिपासु किसी ऐसी शाम के इंतज़ार में बरसों से मुंतज़िर थे! भवन्स कल्चरल सेण्टर, अन्धेरी और साहित्यम के संयुक्त तत्वावधान में एस पी जैन औडिटोरियम श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था। भवन्स की औडियन्स वैसे भी बहुत ही रसिक और ललित-कलाओं के सुलझे हुए पारखियों की औडियन्स है। सही जगह पर दाद देना और हर एक अच्छी रचना को तालियों की गड़गड़ाहट से नवाज़ना कोई इन लोगों से सीखे। मुम्बई के साहित्यिक कार्यक्रमों में शारदा-वन्दन का चलन अब लगभग ख़त्म सा ही हो गया है। हमने सोचा कि लोग आवें तब तक सरस्वती पूजन कर लें। अब तक कोई 15-20 लोग ही आये थे। हमने माँ शारदे की छवि जी पर माल्यार्पण किया, दीप प्रज्वलन किया, प्रसाद धराया (भारतीय मानयता के अनुसार पूजा के साथ प्रसाद रखना आवश्यक माना गया है। हमने इस ओर पहल करने की कोशिश की) और जैसे ही 'या कुन्देन्दु तुषार हार धवला' का पाठ कर के पलटे तो पता चला कि आधे से अधिक सभागार भर चुका है। भवन्स के श्रोतागण समय के भी बहुत ही पाबन्द हैं।



उस के बाद श्री ललित वर्मा जी का उद्बोधन हुआ। अगर सरस साहित्य का आनंद लेना है तो भवंस जैसे इदारों से जुड़ना और जुड़े रहना अपरिहार्य है। इस के बाद मंच संचालक श्री देवमणि पाण्डेय जी ने माइक सम्हाला। सब से पहले आकिफ़ शुजा फ़िरोजबादी को काव्यपाठ के लिये आमंत्रित किया गया। बतौर कुलदीप सिंह जी (तुम को देखा तो ये ख़याल आया के संगीतकर), आकिफ़ शायद एकमात्र सिक्स पेक एप्स वाले शायर हैं। देखने में हीरो जैसे।

नज़र उट्ठे तो दिन निकले झुके तो शाम हो जाये।
अगर इक पल ठहर जाओ तो रस्ता जाम हो जाये॥



आकिफ़ की इन पंक्तियों पर श्रोताओं ने झूम झूम कर दाद दी। आकिफ़ ने और भी कई मुक्तक पढे और एक गीत भी पढ़ा। इन का गाने का अंदाज़ लोगों को बहुत भाया। इन के बाद मंच पर आये संतोष सिंह।

तुमसे मिलता हूँ तो कुछ देर ख़ुशी रहती है।
फिर बहुत देर तक आँखों में नमी रहती है॥
संतोष सिंह उभरते हुये शायर हैं और देश के अनेक हिस्सों में मुशायरे पढ़ चुके हैं। तहत के साथ साथ तरन्नुम पर भी इनकी अच्छी पकड़ है। श्रोताओं को अपने जादू की गिरफ़्त में लेना इन्हें ब-ख़ूबी आता है। संतोष जी के बाद मंच पर काव्य-पाठ के लिये अलीगढ़ से पधारे मुजीब शहज़र साहब को दावते-सुख़न दी गयी। मुजीब साहब ने आते ही श्रोताओं से सीधा-संवाद स्थापित कर लिया। श्रोताओं ने भी इनके शेरों का भरपूर लुत्फ़ उठाया।

इक सितमगर ने यों बेकस पै सितम तोड़ा है।
जैसे मुंसिफ़ ने सज़ा लिख के क़लम तोड़ा है॥
तोड़ने वाले ख़ुदा तुझको सलामत रक्खे।
तू ने यह दिल नहीं तोड़ा है, हरम तोड़ा है॥
हाथ खाली जो गया है मेरे दरवाज़े से।
उस सवाली ने मेरे घर का भरम तोड़ा है॥

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एक मंझे हुये शायर की यही विशेषता होती है कि उस के लिये हर महफ़िल एक सामान्य महफ़िल होती है। मुजीब भाई ने अपने गीतों और ग़ज़लों से ख़ूब समां बाँधा। मुजीब साहब के बाद मंच पर आये गोकुल (मथुरा) से पधारे श्री मदन मोहन शर्मा 'अरविन्द' जी। आप ने उर्दू और ब्रजगजल दौनों की बानगियाँ प्रस्तुत कीं।

आँसू हू पीने हैं हँसते हू रहनौ है।
यों समझौ पानी में पत्थर तैराने हैं॥

सभी ने दोस्त कह-कह कर लगाया यों गले मुझको।
हज़ारों बारे टकराया कभी शीशा कभी पत्थर।
दवा का तो बहाना था उसे बस ज़ख़्म देने थे।
सितमगर साथ में लाया कभी शीशा कभी पत्थर॥
ब्रजगजल में भी मदनमोहन जी का उल्लेखनीय योगदान है। अब बारी थी गुना के राजकुमार और लगभग सभी के लाडले असलम राशिद की। इन के अशआर जितनी बार भी सुनो नये ही लगते हैं। तिस पर इन का पढ़ने का अंदाज़ तो क्या कहने क्या कहने टाइप है।

हम समझे थे चाँद सितारे बनते हैं।
पर अशकों से सिर्फ़ शरारे बनते हैं।
इक मुद्दत पानी से धरती कटती है।
तब जाकर दरिया के किनारे बनते हैं॥
जब असलम मंच से शेर पढ़ रहे होते हैं तो सभागार मंत्रमुग्ध हो कर बस सुनता रहता है। इस के बाद 10 मिनट का अंतराल रखा गया। अंतराल पूर्ण होते ही श्रोताओं ने बिना देरी किये फ़ौरन लौट कर अपनी-अपनी सीटें हासिल कीं। इस के बाद विमोचन का अत्यंत सामान्य सा और एक छोटा सा सम्मान समारोह भी रखा गया। चूँकि पहला और बड़ा उद्देश्य सरस-साहित्य का रसास्वादन करना था इसलिये उक्त दौनों कार्यक्रम बिना किसी तामझाम और रूटीन फोर्मेलिटीज़ के अंज़ाम दिये गये। सभी सहयोगियों के फुल्ली मेच्योर्ड होने के कारण ही हम ऐसा कर पाये। सभी सहयोगियों का इसलिये भी विशेष आभार व्यक्त करना अनिवार्य है कि उन्हों ने टिपिकल फूलमाला शाल श्रीफल कार्यक्रमों में अधिक रुचि नहीं दरसाई।
ब्रज भाषा में ग़ज़लों के द्वितीय पुष्प स्वरूप पहले साझा संकलन 'ब्रजगजल' का विमोचन आदरणीय ब्रजमोहन चतुर्वेदी [प्रसिद्ध पुश्तैनी चार्टर्ड अकाउंटेंट, इन की कई पीढ़ियाँ CA हैं और इन का नाम लिमका बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज़ है], सुनील चतुर्वेदी (IPL मॅच रेफरी), डा. मदनगोपाल एवं अरविन्द मनोहरलाल जी चतुर्वेदी [प्रसिद्ध वित्तीय सलाहकार), श्री पी एल चतुर्वेदी लाल साब [संपादक भायंदर भूमि), श्री अनिल तिवारी (निवासी संपादक हिन्दी सामना) सहित अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिती में सम्पन्न हुआ। सम्मान स्वरूप सभी कवियों / शायरों एवं सहयोगियों को मीमेंटों भेंट किये गये।

मुशायरे के दूसरे सत्र के लिये लोग बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे इसलिये संचालक महोदय ने भी फटाफट देश विदेश में अनेक मुशायरे पढ़ चुकी मशहूर शायरा प्रज्ञा विकास को आवाज़ दी।

इश्क़ क्या है बस इसी एहसास का तो नाम है।
आग का महसूस होना हाथ जल जाने के बाद॥
प्रज्ञा विकास एक ऐसी शायरा हैं जिन्हें श्रोताओं की बहुत अच्छी समझ है। मंच के अनुसार शायरी का इंतख़ाब करती हैं और ख़ूब तालियाँ बटोरती हैं। किसी ख़ूबसूरत शायरा, नामचीन कवि / शायर या तालियाँ बटोर चुके हास्य कवि के बाद काव्यपाठ के लिये मंच पर आना किसी शहादत से कम नहीं होता। यह शहादत नाचीज़ यानि नवीन चतुर्वेदी ने अपने नाम लिखवायी।  शुरुआत ब्रजभाषा से की :-

अमरित की धारा बरसैगी, चैन हिये में आवैगौ।
अपनी बानी बोल कें देखौ, म्हों मीठौ है जावैगौ।
अपने'न सों ही प्यार करौ और अपने'न सों ही रार करौ।
अपने'न में जो मजा मिलैगौ, और कहूँ नाँय आवैगौ॥

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इन पंक्तियों पर श्रोताओं का जो आशीर्वाद मिला वह इन पंक्तियों तक लगातार ख़ाकसार के हिस्से में आता रहा।

पहले तो हमको पंख हवा ने लगा दिये।
और फिर हमारे पीछे फ़साने लगा दिये।
तारे बेचारे ख़ुद भी सहर के हैं मुंतज़िर।
सूरज ने उगते-उगते ज़माने लगा दिये॥
नवीन चतुर्वेदी के बाद दावते-सुख़न दी गयी फ़िरोज़ाबाद से तशरीफ़ लाये जनाब सालिम शुजा अंसारी साहब को।

व्यर्थ कौ चिन्तन, चिरन्तन का करें। 
म्हों ई टेढ़ौ है तौ दरपन का करें॥ 
देह तज डारी तुम्हारे नेह में। 
या सों जादा और अरपन का करें॥ 
ब्रजगजल कों है गरज पच्चीस की। 
चार-छह ‘सालिम’-बिरहमन का करें॥ 

फिर रमा धूनी, कोई आसन लगा।
हो ही जायेगी मुहब्बत, मन लगा।
चाँदनी से सील जायेगा बदन।
जिस्म पर अब धूप का उबटन लगा॥
सालिम साहब के अशआर पर श्रोतागण ने ख़ूब दाद दी। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सालिम भाई ने भी शायरी को फुल्ली एंजॉय किया। ब्रजग्जाल के सफ़र के हमराही भी हैं सालिम भाई। इस के बाद शहरे-मुंबई के वरिष्ठ शायर श्री हस्तिमल हस्ती जी को आवाज़ दी गयी।

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है।
नये परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।
जिस्म की बात नहीं थी उन के दिल तक जाना था।
लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है।।
हस्ती जी की यह ग़ज़ल जगजीत सिंह जी ने गायी है। अपने एक अलग तरह के अंदाज़ के लिये मशहूर हस्ती जी ने श्रोताओं से खचाखच भरे हाल में भरपूर तालियाँ बटोरीं। इन के बाद बारी थी स्वयं संचालक देवमणि पाण्डेय जी की।

महक कलियों की, फूलों की हँसी अच्छी नहीं लगती।
मुहब्बत के बिना यह ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती।
कभी तो अब्र बनकर झूमकर निकलो कहीं बरसो।
कि हर मौसम में ये संज़ीदगी अच्छी नहीं लगती॥

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भवन्स के श्रोतागण देवमणि जी से सुपरिचित हैं। अपने चिर-परिचित मनमोहक अंदाज़ में इन्हों ने विविध रचनाओं से ख़ूब रसवृष्टि की। संचालक महोदय के बाद कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री सागर त्रिपाठी जी ने मोर्चा सम्हाला। जिस तरह अमिताभ बच्चन जी जब कुली का रोल करते हैं तो एकजेक्ट कुली लगते हैं, शराबी फ़िल्म में टिपिकल शराबी और बागवान में एक सुलझे हुये जुझारू प्रवृत्ति के दंपति, उसी तरह सागर त्रिपाठी जी का भी यही रुतबा है कि वह जिस महफ़िल में जाते हैं वहाँ के श्रोताओं के अनुरूप ख़ुद को ढाल लेते हैं। सुपरस्टार हैं त्रिपाठी जी।

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आयोजक ने सागर त्रिपाठी जी से विशेष रूप से निवेदन किया था कि सभागार में कुछ ऐसे श्रोता भी हैं जो विशेष कर आपको सुनने आये हैं तो आप छंद अवश्य पढ़ें। 

एक बहुत अच्छी महफ़िल सुहानी यादों के साथ अपने अंज़ाम तक पहुँची। कार्यक्रम के बाद कवियों को स्टेज पर ही लोगों ने घेर लिया। समयसीमा का उल्लंघन होने के कारण प्रबंधन से क्षमा याचना की गयी और प्रबंधन ने भी उदारता दिखलाते हुये ‘भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी’ बड़ी ही सा-हृदयता के साथ दी। अदब के आदाब क्या होते हैं यह सभी ने बहुत अच्छी तरह से महसूस किया। पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा, नियोजन एवं निष्पादन का दायित्व विनय चतुर्वेदी ने अपने हाथों में रखा और इस दायित्व का पूरी तन्मयता और समर्पण के साथ निर्वाह किया। अमूमन ऐसे कार्यक्रमों से, कवियों को छोड़ दें तो, युवावर्ग नदारद रहता है। परन्तु इस मामले में भी साहित्यम सौभाग्यशाली रहा कि कुछ एक युवक और युवतियाँ भी इस महफ़िल का हिस्सा बने। एक अच्छे प्रयास को भविष्य में फिर से दोहराने का सपना सँजोये, अतृप्त प्यास के साथ, सभी का आभार व्यक्त करते हुये आयोजक अपने घर को लौटे।  

 

हिन्दी मेडिया पर मुशायरे की ख़बर की रपट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। 


जय श्री कृष्ण
राधे राधे  

10 February 2018

एक राष्ट्र एक चुनाव - नवीन

एक राष्ट्र एक चुनाव - 

21 जनवरी रविवार को टाइम्स नाउ पर भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का इण्टरव्यु देखने को मिला और जैसा कि अपेक्षित था बहुत से लोगों ने इस साक्षात्कार पर अपनी-अपनी सोच के अनुसार नुक्ताचीनी भी की। ख़ैर, हम लोग दुनिया के वयस्क लोकतंत्रों में शुमार होते हैं इसलिए उस नुक्ताचीनी का स्वागत करना ही श्रेयस्कर है। इस साक्षात्कार ने हमारे सामने कई उदाहरण प्रस्तुत किये हैं यथा ट्विटर पर सवाल-जवाब के बजाय इस तरह भी शिष्ट रहते हुये, विषय पर केन्द्रित रहते हुये, एक साथ बहुत से लोगों तक शालीनता से अपने विचार पहुँचा सकते हैं। हम सब देख रहे हैं अमूमन हर चेनल पर किस तरह नेता लोग तू-तू मैं-मैं करने लगे हैं और टी वी चेनल वाले उन को बाक़ायदा ‘लताड़ने’ लगे हैं। इस तरह से तो हम अशिष्टताओं की समस्त सीमाओं का उल्लंघन करते हुये किसी अनपेक्षित काल के गर्त में ही समा पायेंगे। “सोचना भूलने लगे हैं हम – वक़्त रहते उपाय सोचा जाय”॥ हम सब की प्रययक्ष-अप्रयक्ष सहमति से ही ऐसा अवांछित वातावरण बना है इसलिये हम सब पर फर्ज़ है कि समय रहते बेहतरी की पैरोकारी की जाये। 

इस साक्षात्कार को कुछ लोग प्रायोजित साक्षात्कार भी कह रहे हैं, मगर मैं ने उस बिन्दु को दरकिनार कर मोदी जी द्वारा प्रस्तावित ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के विचार पर मनन-चिंतन किया। 

पिछले अनेक वर्षों से हम सब चुनावों के प्रभावों में जी रहे हैं। ईमानदारी से कहा जाय तो हर चुनाव से पहले और बाद में राष्ट्रीय -उत्पादिकता पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अनेक प्रभाव पड़ते हैं जो कि ऊपर से नीचे की दिशा में गतिशील होते हुये सर्व-सामान्य मानवी के जीवन व्यवहार तक पहुँच कर उसको प्रभावित करते हैं। हमें मान लेना चाहिए कि हर चुनाव, भारतीय-मनीषा की धुरी मानी जाने वाली सहिष्णुता को निरन्तर कमजोर करता जा रहा है। हमारे बच्चे चाहे वे किसी भी क़ौम के हों, किसी भी आयु-वर्ग के हों; दिन-ब-दिन अ-संस्कारित होते जा रहे हैं। जब राजनीति दूकान बन ही चुकी है तो उस का बाज़ार के नियमों के अनुसार चलना-चलाना भी अपरिहार्य होता जा रहा है। बात  राजनीति की आती है तो राजनीति से जुड़े लोग अराजनीतिक कैसे बने रह सकते हैं? घोडा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या? चुनाव में अगर कोई व्यक्ति साम-दाम-दण्ड-भेद पर काम न करे तो उस की प्रासंगिकता खतरे में पड़ जाती है। यह हमारे समय का सत्य है और बेहतर है कि हम इस सत्य को ईमानदारी के साथ स्वीकार कर लें। 

स्वयं मोदी जी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ‘एक राष्ट्र – एक चुनाव’ को अमल में लाना न ख़ुद अकेले उन के, न ही अकेले भारतीय जनता पार्टी के बूते में है बल्कि अगर इस विचार को वास्तविकता का अमली जामा पहनाना है तो समग्र राष्ट्र ही को इस विषय पर मिल कर दिशा तय करना होगी। वार्तालाप होना चाहिये। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में आलेख आने चाहिये। टी वी चेनल्स पर स्वस्थ बहसें चलाना चाहिये। सोशल साइट्स पर सीमोल्लंघन से बचते हुये विचारों का परस्पर आदान-प्रदान होना चाहिये। विचारों का समुद्र-मंथन होगा तो समाधान रूपी अमृत अवश्य मिलेगा। 

वर्तमान में हम लोग तक़रीबन आधा राष्ट्रीय-समय चुनावों के हवन-कुण्ड में आहुति बना कर झोंक रहे हैं। अगर इस समय-गणना में सर्वज्ञात छुट्टियाँ एवं टाइम-पास आदि भी जोड़ लिये जायेँ तो शायद हम लोग तीन चौथाई यानि पचहत्तर फीसदी राष्ट्रीय-समय बर्बाद कर रहे हैं। आइये एक पल के लिये सोचा जाये - यदि सर्व-सम्मति से पाँच साल में एक बार ही  चुनाव कराये जाएँ और भले ही वह प्रक्रिया कुल जमा छह महीने के राष्ट्रीय-समय का उपभोग कर भी ले तो भी हमारे हाथ में पूरा-पूरा साढ़े चार साल का राष्ट्रीय-समय बचता है जो कि निश्चित ही बेहतरी के कामों में उपयोग हो सकेगा। संसाधनों का इस से बेहतर उपयोग और क्या हो सकता है! मुझे भी लगता है कि मोदी जी के इस प्रस्ताव पर राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार से चर्चाएँ की जानी चाहिये। मैं मोदी जी के ए’एक राष्ट्र – एक चुनाव’ के प्रस्ताव से सहमत हूँ! क्या आप भी सहमत हैं? 
नवीन सी. चतुर्वेदी 
navincchaturvedi@gmail.com 
9967024593

30 January 2018

मुहम्मद अल्वी... शब्दों का चित्रकार.. - असलम राशिद

Image result for मोहम्मद अलवीमेरे बड़े भाई मरहूम आरिफ़ "मीर" के मुँह से पहली बार ये लफ़्ज़ सुने तो अजीब लगा था, "शब्दों का चित्रकार" कैसे हो सकता है कोई, चूँकि बड़े भाई बहुत कम उम्र में भी बड़े अदबनवाज़ और पाये के शायर थे तो ऐसे ही तो कोई बात न कह सकते थे, बड़ी हिम्मत करके पूछा कि कौन हैं ये, तब उन्होंने मुहम्मद अल्वी साहब के ढेर सारे शेर सुनाये.. और अल्वी साहब की निदा फ़ाज़ली साहब की संपादित एक किताब दी, एक ही बैठक में वो छोटी सी पेपरबैक पढ़ डाली, फिर उसे कितनी बार पढ़ा ये भी याद नहीं. 

अल्वी साहब को पढ़ कर तय कर लिया कि इनको और ढूंढ़ कर पढ़ा जायेगा, उस वक़्त इंटरनेट हमारे यहां नया नया था और एक वेबसाइट थी उरडुपोएटरी.कॉम, जो आज के ज़माने की रेख़्ता की तरह ही शायरी का बेहतरीन इन्तेख़ाब रखती थी, उस पर मुहम्मद अल्वी साहब मिल गए, जितनी ग़ज़लें थीं सब पढ़ डालीं, पढ़ क्या डालीं याद कर लीं.. और मरहूम जौन एलिया के साथ साथ (जॉन एलिया साहब को हम 1994 से पढ़ सुन रहे हैं जब मरहूम उस्ताद कृष्णबिहारी नूर साहब ने अपने शागिर्द और मेरे बड़े भाई दीपक जैन 'दीप' भाई को दुबई, कराची, लाहौर के मुशायरों की वीडियो कैसेट्स दीं थीं कहा था कि इन लोगों को सुनो, और मेरे बड़े भाई आसिफ़ सर, दीपक भाई और मैंने बेशुमार बार उन कैसेट्स को सुना। आज जब इस दौर के नौजवान जॉन एलिया को अपने फ्ब स्टेटस पर जगह दे रहे हैं, हम तब उस दौर में जॉन एलिया को दिल मे जगह दे चुके थे और जब जॉन आम हुए तो बेहद ख़ुशी हुई कि हमने जौन को तब जिया जब लोगों ने उनका नाम भी न सुना था, ख़ैर...) मुहम्मद अल्वी साहब को लोगों तक पहुंचा कर अपने अलहदा इन्तेख़ाब की दाद हासिल की.. हालांकि उस्ताद लोग कहते थे, की जो पढ़ रहे हो वो दूसरों को मालूम नहीं होना चाहिए, मगर ख़ुद को रोका न जा सका इतने कमाल के शेर दूसरों तक पहुंचाने से... 

मैं ये एतराफ़ करता हूँ कि आज मेरी जितनी भी जैसी भी शायरी है, जो नयापन मैं लाने की कोशिश करता हूँ उसमें बहुत बड़ा हाथ अल्वी साहब की शायरी का है..मैंने अल्वी साहब को उस दिये की तरह दिल मे हमेशा रोशन रखा है जिसके जरिये मैं अपने ज़हनी दियों को रोशन कर रहा था, और आज भी कर रहा हूँ। उनकी पहली किताब "ख़ाली मकान" से "आख़री दिन की तलाश" "तीसरी किताब" और "चौथा आसमान" तक उनकी शायरी ने मेरे अंदर के शायर को नई ज़िन्दगी बख़्शी, जो इस्तिआरे अल्वी साहब के यहाँ इस्तेमाल हुए उनको पढ़कर हैरत होती थी कि ये मफ़हूम इतनी आसानी से शेर में कैसे ढाला जा सकता है, मगर अल्वी साहब तो शब्दों के चित्रकार थे, बेहद आसानी से अजीबोगरीब मफ़हूम को शेर में ढाल देते थे..

घर में क्या आया कि मुझको
दीवारों ने घेर लिया है

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किसी भी होंठ पर जा बैठती है
'हँसी' सच पूछिये तो फ़ालतू है

हमें क्या घास डालेगी भला वह
'ख़ुशी' ऊँचे घराने की बहू है

पड़ी रहती है घर मे सर झुकाए
ये 'नेकी' तो बिचारी पालतू है

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घर वाले सब झूठे हैं
सच्चा घर मे तोता है

पक्की फ़स्ल है चारों ओर
और बिजूका भूखा है

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'अल्वी' ख़्वाहिश भी थी बाँझ
जज़्बा भी ना-मर्द मिला

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अरे ये दिल और इतना ख़ाली
कोई मुसीबत ही पाल रखिए

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गुजरात के मशहूर सूफ़ी वजीहुद्दीन गुजराती के सज्जादानशीनों में शामिल अल्वी साहब तबियत से भी सूफ़ी थे.. अपने अंदर सारी कायनात को समेटे, सबके दुःख को अपना दुःख कहते हुए अल्फ़ाज़ की शक्ल में ढालते रहे.. बेहद मनमौजी तबियत के अल्वी साहब शायरी को ख़ुदाई इमदाद कहते थे, और जब लगता कि इमदाद नहीं हो रही तो ख़ामोश हो जाते और ख़ुद को कहीं और झोंक देते.. ऐसा उनके साथ कई बार हुआ.. बीच मे 7 साल तक उन्होंने एक भी शेर नहीं कहा.. और जब कहे तो वो ही कहे जो तारीख़ बन गए...

मैं ख़ुद को मरते हुए देख कर बहुत ख़ुश हूँ
और डर भी है कि मेरी आँख खुल न जाए कहीं

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काम की ख़ातिर दिन भर दौड़ लगाते हैं
बेकारी में आख़िर कुछ तो काम मिला

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कुछ नहीं था एल्बम में
फिर भी कुछ कलर चमके

सतहे आब पर अल्वी
मछलियों के पर चमके

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पड़ा था मैं इक पेड़ की छाँव में
लगी आँख तो आसमानों में था

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इन्हीं लोगों से मिल कर ख़ुश हुआ था
इन्हीं लोगों से डरता फिर रहा हूँ  

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अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूँ
लिफ़ाफ़े में कुछ रौशनी भेज दे

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आग अपने ही लगा सकते हैं
ग़ैर तो सिर्फ़ हवा देते हैं

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उन दिनों घर से अजब रिश्ता था
सारे दरवाज़े गले लगते थे

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अल्वी साहब ने नज़्मों को भी बहुत आला मुक़ाम अता किया..
आपकी नज़्में नज़ीर हैं आने वाली नस्लों के लिए...

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सुनते हो इक बार वहाँ फिर हो आओ
एक बार फिर उस की चौखट पर जाओ
दरवाज़े पर धीरे धीरे दस्तक दो
जब वो सामने आए तो प्रणाम करो
''मैं कुछ भूल गया हूँ शायद'' उस से कहो
क्या भूला हूँ याद नहीं आता कह दो
उस से पूछो ''क्या तुम बतला सकती हो''
वो हँस दे तो कह दो जो कहना चाहो
और ख़फ़ा हो जाए तो ....आगे मत सोचो

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क़ब्र में उतरते ही
मैं आराम से दराज़ हो गया
और सोचा
यहाँ मुझे
कोई ख़लल नहीं पहुँचाएगा
ये दो-गज़ ज़मीन
मेरी
और सिर्फ़ मेरी मिलकियत है
और मैं मज़े से
मिट्टी में घुलता मिलता रहा
वक़्त का एहसास
यहाँ आ कर ख़त्म हो गया
मैं मुतमइन था
लेकिन बहुत जल्द
ये इत्मिनान भी मुझ से छीन लिया गया
हुआ यूँ
कि अभी मैं
पूरी तरह मिट्टी भी न हुआ था
कि एक और शख़्स
मेरी क़ब्र में घुस आया
और अब
मेरी क़ब्र पर
किसी और का
कतबा नस्ब है!!

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रातों को सोने से पहले
नई पुरानी यादों को
उलट-पलट करते रहना
वर्ना काली पड़ जाएँगी
इधर उधर से सड़ जाएँगी

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एक ज़ंग-आलूदा
तोप के दहाने में
नन्ही-मुन्नी चिड़िया ने
घोंसला बनाया है

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अल्वी साहब को अदब ने वो मुक़ाम नहीं बख़्शा जिसके वो मुस्तहिक़ थे, मगर अदब की तारीख़ मुहम्मद अल्वी साहब के ज़िक्र के बिना मुकम्मल नहीं होगी। अल्लाह यक़ीनन अल्वी साहब को जन्नत में आला मुक़ाम अता करेगा..


अलविदा अल्वी साहब..

19 January 2018

देशभक्ति की कविताएँ / मुक्तक

मेरा हिन्दोसताँ सब से अलग सब से निराला है।
ये ख़ुशबूओं का गहवर है बहारों का दुशाला है।
अँधेरो तुम मेरे हिन्दोसताँ का क्या बिगाड़ोगे।
मेरा हिन्दोसताँ तो ख़ुद उजालों का उजाला है॥

ये ऋषियों का तपोवन है फ़क़ीरों की विरासत है।
ये श्रद्धाओं का संगम है दुआओं की इबारत है।
भले ही हर तरफ़ नफ़रत का कारोबार है लेकिन। 
ये इक ऐसा क़बीला है जिसे सब से मुहब्बत है॥

बुजुर्गों से वसीयत में मिले संस्कार उगलती है।
समन्वय से सुशोभित सभ्यता का सार उगलती है।
ज़माने भर के सारे तोपखाने कुछ नहीं प्यारे।
हमारे पास ऐसी तोप है जो प्यार उगलती है॥

हमारा दिल दुखा कर जाने क्या मिलता है लोगों को।
हमें यों आज़मा कर जाने क्या मिलता है लोगों को।
ये ऐसा प्रश्न है जिस का कोई उत्तर नहीं मिलता।
तिरंगे को जला कर जाने क्या मिलता है लोगों को॥

हम आपस में लड़ेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी।
अगर झगड़े बढेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी।
अगर अब भी नहीं समझे तो फिर किस रोज़ समझेंगे।
सियासत में पड़ेंगे तो तरक़्क़ी हो न पायेगी॥

जो मंजिल तक पहुँचते हैं वे रस्ते कैसे देखेंगे।
जो घर को घर बनाते हैं वे रिश्ते कैसे देखेंगे।
अगर झूठी शहादत में फ़ना होती रही नस्लें।
तो फिर हम लोग पोती और पोते कैसे देखेंगे॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी