28 November 2012

अभी हयात का मतलब समझना बाकी है - नवीन

तवील जंग में शामिल भी टूट सकते हैं
रसद रुकी तो मुजादिल भी टूट सकते हैं

मुसीबतों के फ़साने को दफ़्न रहने दो
कुरेदने से कई दिल भी टूट सकते हैं

घटाओ अब तो बरस जाओ तपते दरिया पर

तपिश बढ़ेगी तो साहिल भी टूट सकते हैं

तमाम ख़ल्क़ में उलफ़त के सिलसिले फैलाओ
इसी मक़ाम पे क़ातिल भी टूट सकते हैं

अभी हयात का मतलब समझना बाकी है
घटा-बढ़ा के तो हासिल भी टूट सकते हैं
तवील जंग - लम्बी लड़ाई
रसद - सेना के लिए सप्लाई किया जाने वाला खाना-पानी, सामान वग़ैरह
मुजादिल - युद्ध लड़ने वाले सिपाही [अरबी शब्द]
ख़ल्क़ - विश्व
हयात का मतलब - जीवन का अर्थ meaning of life
हासिल - उपलब्धि, किसी जोड़-बाकी-गुणा-भाग का परिणाम 

बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ  
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
1212 1122 1212 22  

9 comments:

  1. भाई नवीनजी, आपकी शैली संभवतः संक्रांति काल से गुजर रही है. ऐसा मुझे ही प्रतीत हो रहा है या आपको भी इसका भान है ! ऐसे में शिल्प संवाद के ऊपर हावी दीखती है.
    परन्तु, मुझे इसका भी गुमान है कि आप शीघ्र ही इस काल विशेष की इस चौखट से हो कर आसन्न भावापेक्षाओं को संतुष्ट करते हुए इस निलय में भी नितांत सहज दिखेंगे.
    मुझे मालूम है कि मेरे इंगित आपको मन ही मन गुदगुदा रहे होंगे.
    निरंतर प्रयास की पवित्रता पर आपको हार्दिक बधाई, भाईजी. ..

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  2. आदरणीय सौरभ भाई प्रणाम

    आप मेरे अग्रज हैं और आप ने अपनी बेबाक टिप्पणी दे कर साबित किया कि आप स्नेह के साथ साथ मुझ पर अधिकार भी रखते हैं, इस स्नेह सिक्त अधिकार ने अभिभूत किया, निस्संदेह :)

    मैं पुन: निवेदन करूँगा कि आप के मन्तव्य को थोड़ा और खुल कर व्यक्त करने की कृपा करें, ताकि मैं आप के मार्गदर्शन से लाभान्वित हो सकूँ

    उत्तर अवश्य दें

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  3. भाई नवीनजी, आपके पद्य-प्रयास के प्रति मैं सदा से आदर के भाव रखता हूँ. आपकी प्रेरणा का सुफल है, कि मैं छंदों पर बात करता दिखता हूँ. ईश्वर परस्पर भाव-दशा को सदा बनाये रखे.

    मैं पुन: निवेदन करूँगा कि आप के मन्तव्य को थोड़ा और खुल कर व्यक्त करने की कृपा करें, ताकि मैं आप के मार्गदर्शन से लाभान्वित हो सकूँ


    भाईजी, मैं जिस नवीनजी को जानता हूँ वह ललित भावों से पगी रचनाओं, ग़ज़लों या नवगीतों में शब्दों को उनके अर्थ मात्र के कारण नहीं, अपितु उन शब्दों के प्रति अनुभवजन्य समझ होने के कारण प्रयोग करता है. जिसके प्रयुक्त शब्द देसी मिट्टी की सोंधी महक से अश-अश करते होते हैं.
    अब इधर की कुछ ग़ज़लें, विशेषकर प्रस्तुत ग़ज़ल, भारी-भरकम तिसपर से अप्रचलित शब्दों से अँटी दिखती हैं. मेरा निवेदन आपकी शैली में आ रहे (?) इसी ट्रांसफॉर्मेशन की ओर था.
    लेकिन मुझे यह भी विश्वास है कि आप इन शब्दों का साधिकार प्रयोग कर अपने पाठकों को पूर्ववत भाव-मुग्ध करते रहेंगे. शुभ-शुभ.. .

    सादर

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  4. घटाओ अब तो बरस जाओ तपते दरिया पर
    तपिश बढ़ेगी तो साहिल भी टूट सकते हैं,,,

    वाह,,,बहुत खूब सुंदर गजल,,,

    resent post : तड़प,,,

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  5. आ. सौरभ जी मैं आप के कंसर्न का सम्मान करता हूँ और कोशिश करूँगा कि आइन्दा आप की पसंद का भी लिख सकूँ। मौजूदा ग़ज़ल के साथ-साथ हाल का कुछ काम किसी सनेही विशेष की संतुष्टि की ख़ातिर है। हमें सब तरह का काम पेश करना होता है न:)

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  6. कल 30/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. भावप्रधान रचना पर बहुत कठिन शब्दहीन नवीव जी |अच्छा हुआ आपने मीनिग लिख दिए नहीं तो अर्थ ही सर के ऊपर से जाते |
    आशा

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  8. बहुत सुन्दर शेर

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  9. अभी हयात का मतलब समझना बाकी है
    घटा-बढ़ा के तो हासिल भी टूट सकते हैं

    ---सुन्दर गजल....
    ---नवीन जी शब्द कठिन तो नहीं हैं हाँ कुछ शब्द सरल उर्दू के बजाय कठिन फारसीयुक्त के हैं जो हिन्दी आदि उर्दू-इतर भाषियों में इतने अधिक प्रचलित नहीं हैं ...

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