19 November 2012

मिरी दीवानगी पर वो, हँसा तो - नवीन

मिरी दीवानगी पर वो, हँसा तो
ज़रा सा ही सही लेकिन, खुला तो

अजूबे होते रहते हैं जहाँ में
किसी दिन आसमाँ फट ही पड़ा, तो?

उमीदों का दिया बुझने न देना
जलेगी जाँ अगर दिल बुझ गया, तो

सभी को चाहिये अपना सा कोई
घटेंगे फ़ासले, निस्बत – ‘बढ़ा तो’

सुना है तुमको सब से है मुहब्बत
अगर हमने तुम्हें झुठला दिया, तो?

वो दुनिया भर में भर देंगे उजाले
अगर मग़रिब से कल सूरज उगा – तो

मैं उसको पेश तो कर दूँ जवाहिर
मगर उसकी नज़र में दिल हुआ, तो?

सफ़ीने क्यूँ हटा डाले नदी से?
पुराना पुल अचानक ढह गया, तो?

नहीं कह पाना मुमकिन ही न होगा
“दिया अपना जो उसने वासता, तो”

ग़ज़ल सुनते ही दिल बोला उछल कर
अरे क्या बात है – फिर से ‘सुना तो’


:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

5 comments:

  1. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  2. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 20/11/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है

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  3. वाह बहुत ही रसदार ग़ज़ल...

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  4. बहुत ही बढ़ियाँ गजल...
    :-)

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  5. सुन्दर शब्द चयन और रचना |
    आशा

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