3 August 2011

चोट खा कर भी, शराफ़त कर रहा है आदमी - नवीन

नया काम
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सच तो ये ही है इनायत कर रहे हैं आदमी। 
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥


ईंट-पत्थर का कलेवर ईंट-पत्थर हो गया।
देखते ही देखते साम्राज्य खंडर हो गया।
सब की लापरवाहियों से घर जो जर्जर हो गया।
सिर्फ़ उस घर की मरम्मत कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥


हम बहुत कमज़ोर हैं हम पर तरस खाओ हुज़ूर।
नफ़रतों की आग पर कुछ प्यार बरसाओ हुज़ूर।
जो हुआ सो हो गया अब तो सुधर जाओ हुज़ूर।
रोज़ शैतानों से मिन्नत कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥


कम बुरे बन्दे को चुन कर आबकारी सोंप कर।
जिम्मेदारों को वतन की जिम्मेदारी सोंप कर।
सेंधमार अहले-वतन को सेंधमारी सोंप कर।
बस इशारा भर सियासत कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥


रहबरों को राह दिखलाएँ इसी उम्मीद में।
मरहमों पर काम करवाएँ इसी उम्मीद में।
काश! कल कुछ काम आ जाएँ इसी उम्मीद में।
अपने ज़ख़्मों की हिफ़ाज़त कर रहे हैं आदमी॥
चोट खा कर भी शराफ़त कर रहे हैं आदमी॥


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उनको लगता है फ़ज़ीहत कर रहा है आदमी
हमको लगता है मरम्मत कर रहा है आदमी

भीड़ ने बस ये कहा, हमको भी जीने दीजिये
वो समझ बैठे, बग़ावत कर रहा है आदमी

छीन कर कुर्सी, अदालत में घसीटा है फ़क़त
चोट खा कर भी, शराफ़त कर रहा है आदमी

सल्तनत के तख़्त के नीचे है लाशों की परत
कैसे हम कह दें, हुक़ूमत कर रहा है आदमी

मुद्दतों से शह्र की ख़ामोशियाँ यह कह रहीं
आज कल भेड़ों की सुहबत कर रहा है आदमी


फालातुन फालातुन फालातुन फाएलुन 
2122 2122 2122 212
बहरे रमल मुसमन महजूफ

3 comments:

  1. बेहतरीन, गज़ब की अभिव्यक्ति।

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  2. सल्तनत के तख़्त के नीचे है लाशों की परत|
    कैसे हम कह दें, हुक़ूमत कर रहा है आदमी|६|

    वाह! सर।

    बहुत बेहतरीन!

    सादर

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