14 June 2011

अंतर श्लेष और यमक अलंकार के बीच

अक्सर देखा गया है है कि कई शोधार्थी यमक और श्लेष अलंकार के अंतर में ही उलझ के रह जाते हैं| दरअसल दोनों अलंकार एक दूसरे के विपरीत हैं| यथा :-

शब्द एक बार ही आए अर्थ अनेक हों तो श्लेष अलंकार होता है
शब्द एक से अधिक बार आए और अर्थ भी एक से अधिक हों तो यमक अलंकार होता है


श्लेष अलंकार :-

आइये पहले उदाहरण के द्वारा श्लेष अलंकार को समझने का प्रयास करते हैं|

प्रसिद्ध कवि रहीम जी का एक दोहा लेते हैं :-


रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।
इस दोहे में कही गई बात बिलकुल साफ है| यदि पानी नहीं तो मोती, मनुष्य और चून / आटे की कोई महत्ता नहीं| मोती के संदर्भ में पानी का अर्थ हुआ चमक, मनुष्य के संदर्भ में पानी का आशय हुआ रुतबा या कि फिर यूं कहो कि मान-सम्मान और चून / आटे के संदर्भ में तो ये पानी ही हुआ|


शब्द एक ही आए, एक बार ही आए पर अर्थ अनेक निकलते हों, तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है| आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी के शब्दों में:-
वक्ता- श्रोता जब करें, भिन्न शब्द के अर्थ
रचें श्लेष वक्रोक्ति कवि, जिनकी कलम समर्थ..

एक शब्द के अर्थ दो, करे श्लेष-वक्रोक्ति.
श्रोता-वक्ता हों सजग, समझें न अन्योक्ति..

जहाँ पर एक से अधिक अर्थवाले शब्द के प्रयोग द्वारा वक्ता का एक अर्थ पर बल रहता है किन्तु श्रोता का दूसरे अर्थ पर, वहाँ श्लेष वक्रोक्ति अलंकार होता है. इसका प्रयोग केवल समर्थ कवि कर पाता है चूँकि विपुल शब्द भंडार, उर्वर कल्पना शक्ति तथा छंद नैपुण्य अपरिहार्य होता है. उदाहरण के लिए मेरा एक दोहा भी देखिये :-

सीधी चलते राह जो, रहते सदा निशंक|
जो करते विप्लव, उन्हें, 'हरि' का है आतंक||

ऊपर के दोहे में प्रयुक्त 'हरि' शब्द के दो अर्थ हैं बंदर और ईश्वर - यह देखिये -
जो लोग सीधे चुप चाप रास्ते से निकल जाते हैं, वो निशंक रहते हैं यानि उन्हें कोई प्राबलम नहीं होती| पर जो विप्लव करते हैं यानि छेड़खानी करते हैं - वो ही बंदरों से आतंकित भी होते हैं|
जो लोग जीवन सीधे रास्ते जीते हैं उन्हें कोई भय नहीं| परंतु जो लोग विप्लवी होते हैं यानि कि सीधी राह नहीं चलते; हरि यानि ईश्वर का आतंक भी उन्हें ही होता है|
तो ये होता है श्लेष अलंकार| मेरा एक और छन्द देखिएगा:-


माना कि विकास, बीज - से ही होता है मगर
इस का प्रयोग किए- बिना, बीज फले ना|

इस में मिठास हो तो, अमृत समान लगे
खारापन हो अगर, फिर दाल गले ना|

इस का प्रवाह भला कौन रोक पाया बोलो
इस का महत्व भैया टाले से भी टले ना|

चाहे इसे पानी कहो, चाहे इसे ज्ञान कहो
सार तो यही है यार, 'नार' बिन चले ना||

इस छन्द में प्रयुक्त 'नार' शब्द के दो अर्थ हैं| पहला अर्थ है 'पानी' और दूसरा अर्थ है 'ज्ञान'| आप इस पूरे छन्द को दो बार पढ़ें, आप को लगेगा कि इस में कहा गया है कि पानी के बिना नहीं चलता / ज्ञान के बिना नहीं चलता| यही होता है श्लेष अलंकार का जादू| खासकर पूरे छन्द में जब सिर्फ एक ही शब्द के कारण पूरे के पूरे छन्द के दो अर्थ हो जाते हैं, तो ये एक जटिल काव्य कृति मानी जाती है| इसे विद्वतजन बहुव्रीहि समास कह कर भी संबोधित करते हैं|

और अब यमक अलंकार :-

एक शब्द एक से अधिक बार आए और अर्थ भी अलग अलग निकलें तो यमक अलंकार होता है| बहुत पुराना दोहा जो अमूमन हर साहित्य प्रेमी जानता है:-

कनक - कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय|
या खाएं बौराय जग, वा पाएँ बौराय|

यहाँ शब्द 'कनक' के दो अर्थ हैं| धतूरा और सोना / स्वर्ण| कवि कह रहा है कि धतूरे से ज्यादा मादक / नशीला है सोना| धतूरा खा कर आदमी बौराता है / पगलाता है परंतु सोना तो पाने के साथ ही बौरा जाता है|

यमक अलंकार का एक और उदाहरण भूषण कवि के कवित्त के माध्यम से:-

ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी
ऊँचे घोर मंदर के अन्दर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करें कंद मूल भोग करें
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं।
भूषन शिथिल अंग भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।
‘भूषन’ भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जड़ातीं ते वे नगन जड़ाती हैं॥
अर्थ -
[1] ऊंचे घोर मंदर - ऊंचे विशाल घर-महल / ऊंचे विशाल पहाड़
[2] कंद मूल - राजघराने में खाने के प्रयोग में लाये जाने वाले जायकेदार कंद-मूल वगैरह / जंगल में कंद की मूल यानि जड़
[3] तीन बेर खातीं - तीन समय खाती थीं / [मात्र] तीन बेर [फल] खाती हैं
[4] भूषन शिथिल अंग - अंग भूषणों के बोझ से शिथिल हो जाते थे / भूख की वजह से उन के अंग शिथिल हो गए हैं
[5] बिजन डुलातीं - जिनके इर्द गिर्द पंखे डुलाये जाते थे / वे जंगल-जंगल भटक रही हैं
[6] नगन जड़ातीं - जो नगों से जड़ी हुई रहती थीं / नग्न दिखती हैं

यमक अलंकार का एक उदाहरण डा. सरोजिनी प्रीतम की आधुनिका कविता / हास्य क्षणिका से :-

तुम्हारी नौकरी के लिए कह रखा था,
सालों से,
सालों से।

एक दोहा मेरी तरफ से भी

आने वाले वक्त में, दुर्लभ होगी यार|
कर दे बुक अड्वान्स में, 'पिंगल' बुक दो चार|

मुझे लगता है कम से कम इस दोहे का अर्थ तो हर कोई समझ ही जाएगा| पिंगल बुक यानि पिंगल शास्त्र की वो किताब जिसमें तमाम छंदों के बारे में विस्तार से समझाया गया है| आने वाले समय में ऐसी पुस्तकें [बुक्स] आसानी से उपलब्ध नहीं होंगी, लिहाजा उन्हें अभी से ही बुक कर देना चाहिए|

चलते चलते एक बार फिर से दोहराते हैं:-

एक शब्द एक बार आए अर्थ अनेक हों तो श्लेष अलंकार
और
एक शब्द एक से अधिक बार आए और अर्थ भी एक से अधिक हों तो यमक अलंकार

[आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के मार्गदर्शन और आशीर्वाद के साथ]

8 comments:

  1. बहुत अच्छी तरह से समझाया है आपने अर्थ और अंतर को।
    आभार।

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  2. बहुत अच्छी ग्यानवर्द्धक पोस्ट लेकिन मै छंदों की जानकारी मे पीछे छूट गयी । धन्यवाद।

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  3. बहुत अच्छे से समझाया है आपने. आज के युग में ऐसी साहित्य सेवा अन्यंत्र मिलनी दुर्लभ है.
    आप द्वारा रचित छंद अद्वितीय हैं.

    नीरज

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  4. बहुत अच्छी व्याख्या की है नवीन भाई। आपको और आचार्य जी को बधाई।

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  5. वह आज तो ये फ़र्क समझ आ गया ... धन्यवाद ... आपको और आचार्य जी को बधाई....

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  6. वाह नवीन जी ,ये ब्लॉग इतना ज्ञानवर्धक है ये आज पता चला
    अब तो मुझे जहां समस्या होगी ,,समाधान खोजने यहीं आऊंगी
    बधाई

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  7. नवीन जी श्लेष अलैकार अच्छी तरह आ गया है बहुत बहुत आभार
    आशा

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  8. बहुत सुन्दर और ज्ञानवर्धक पोस्ट!

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