हाइकु

[१]
सत्य की खोज
आईने का सामना
सब ग़लत.................

[२]
दुग्ध नदियाँ
जल स्रोतों की खोज
जल पे जंग  

[३]
आई लव यू
औरत बुरी बला
आई मिस यू.....................

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - मयंक अवस्थी जी [६] और रवि कांत पाण्डेजी [७]

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' के अगले पड़ाव में इस बार दो रचनाधर्मियों को पढ़ते हैं|


भाई श्री मयंक अवस्थी जी:-

श्री मयंक अवस्थी जी रिजर्व बॅंक, नागपुर में कार्यरत हैं| शे'रो शायरी का बहुत ही जबरदस्त ज्ञान है आपको| और अब देखिए उन की अनुभवी लेखनी ने चौपाइयों के माध्यम से क्या जलवे बिखेरे हैं:-

निर्निमेष तुमको निहारती|
विरह –निशा तुमको पुकारती|
मेरी प्रणय –कथा है कोरी|
तुम चन्दा, मैं एक चकोरी|१|

खत भी तुमको भिजवाया पर|
शलभ, वर्तिका तक आया पर|
कब सुनते हो शून्य कथायें|
महाअशन में ये समिधायें|२|

तुम बादल मैं प्यासी धरती|
तुम बिन मैं सिँगार क्या करती|
बन जाते माथे पर कुमकुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|३|
शलभ=पतंगा, वर्तिका=शम्मा, महाअशन=यज्ञ की विकराल अग्नि



भाई श्री रविकान्त पाण्डे जी:-

भाई रवि कांत पाण्डे जी हम से पहली बार जुड़े हैं| उन के बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं है, परंतु उनकी लेखनी स्वयँ ही उनका परिचय दे रही है:-

मौसम के हाथों दुत्कारे|पतझड़ के कष्टों के मारे|सुमन हृदय के जब मुरझाये|
तुम वसंत बनकर प्रिय आये|१|


नूतन किसलय तुमसे पाकर|
जीर्ण-शीर्ण सब पात हटाकर|

मस्ती में होकर मतवाली|

झूम रही उपवन की डाली|२|


लोग कहें घर दूर तुम्हारा|

किंतु नहीं मैने स्वीकारा|

दिल में मेरे बसते हो तुम|

कितने अच्छे लगते हो तुम|३|


भाई श्री मयंक जी और भाई श्री रवि कांत जी को बहुत बहुत बधाई इतने सुंदर्र और स-रस चौपाइयों को पढ़ने का सु-अवसर प्रदान करने के लिए|

इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

कुछ मुश्किलें, कुछ उलझनें, कुछ खामियाँ भी हैं हुज़ूर - नवीन

कुछ मुश्किलें, कुछ उलझनें, कुछ खामियाँ भी हैं हुज़ूर
आवाज़ है आवाज़ पर ख़ामोशियाँ भी हैं हुज़ूर

अपनी बपौती जान कर, जंगल नहीं काटें कोई
इन जंगलों में, जन्तुओं की बस्तियाँ भी हैं हुज़ूर

जिस सोच ने, तुहफ़े दिये हैं, 'ताज़महलों' से हमें
उस सोच में, "क़ारीगरों की उँगलियाँ" भी हैं हुज़ूर

ये ज़िन्दगी अन्धा कुँआ है, जानते हैं सब 'नवीन'
पर इस कुँए में, हौसलों की रस्सियाँ भी हैं हुज़ूर


बहरे रजज मुसम्मन सालिम 
मुस्तफ़ इलुन x 4 
2212 x 4 

लोनावाला, महाराष्ट्र स्थित सहारा सिटी, एम्बे वेली के प्राकृतिक सौंदर्य पर

पर्वतों के बीच फैली घाटियां
घाटियों में मुस्कुराती वादियां
वादियों में तैरती चंचल हवा
और हवा कहती तमाम कहानियाँ

कितने हैं नजदीक धरती - आसमाँ
एक दूजे पे हों जैसे मेहरबाँ
ये नज़ारा देख के रब दी कसम
ज़िस्म-ओ-जाँ लेने लगें अँगङाइयाँ

देखते बनती है तारों की चमक
करती है मदहोश फूलों की महक
ज़िन्दगी बन के परी नाचे यहाँ
इस सिरे से उस सिरे तक बेधङक

झुंड में झरने करें अठखेलियाँ
झीलों का साम्राज्य फैला है यहाँ
बस यहीं पे रंज़ोगम शिक़वे - गिले
बारहों महीने मनाते छुट्टियाँ

धूप की दादागिरी है बेअसर
शबनमी कालीन फैली हर डगर
कानों में बजती हों जैसे घंटियाँ
बादलों के बीच होता है सफर

मन थका, आराम पाता है यहां
दिल खुशी के गीत, गाता है यहाँ
आप भी महसूस कर के देख लो
ज़िन्दगी का लुत्फ़ आता है यहाँ

सड़क पर

चलें रीति से
नीति निभाते
मीत सड़क पर

हौले हौले कदम उठायें
इधर उधर भी नज़र फिरायें
बेमतलब ना दौड़ लगायें
अवरोधक पे
पल भर थम जायें
सोचें फिर रुक कर
चलें रीति से - नीति निभाते - मीत सड़क पर

जीवन है मारग जैसा ही
रखवाली की गरज इसे भी
जिसने इसकी अनदेखी की
उसकी हालत
सब जानें, होती
बद से भी बदतर
चलें रीति से - नीति निभाते - मीत सड़क पर

दौनों होते नये पुराने
दौनों के सँग लोग सयाने
दौनों 'निविदा' के दीवाने
दौनों सब से
लेते हैं हक से
अपना-अपना 'कर'
चलें रीति से - नीति निभाते - मीत सड़क पर

परतन्तर की हार हुई, हमने परजातन्तर पाया

गणतंत्र दिवस की शुभ कामनाएँ

हर इक हिन्दुस्तानी जब खुल कर अपनी ज़िद पर आया|
परतन्तर की हार हुई, हमने परजातन्तर पाया|१|

जिनके नाम पता उनको तो दिल्ली याद करेगी ही|
हम उनको भी याद करें दिल्ली ने जिनको बिसराया|२|

वंदे माSतरम को गा कर अजब सुकूँ सा मिलता है|
उस का रौब अलग होता जिसने कि तिरंगा फहराया|३|

छुट्टी का कारण बन के रह जाए ना गणतंत्र दिवस|
इसीलिए मैने बच्चों सँग राष्ट्र-गान तन कर गाया|४|

कभी भूल के भी भुलाना न यारा

जता प्रेम को, आप ने जो पुकारा।
हमारे दृगों से बही अश्रुधारा।।
कभी भूल के भी भुलाना न यारा।
हमारे लिए आप सा कौन प्यारा।१।



भुजंग प्रयात छंद


वर्णिक छंद
चार चरण
प्रतेयक चरण में चार बार यगण
यमाता यमाता यमाता यमाता
लघु गुरु गुरु x ४
ल ला ला  -  ल ला ला  -  ल ला ला  -  ल ला ला 
यहाँ लिखे गए ला का अर्थ सिर्फ दीर्घ / गुरु अक्षर है

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - राणा प्रताप सिंह जी [5]

सम्माननीय साहित्य रसिको

आइए इस बार पढ़ते हैं आज के दौर के नौजवान रचनाधर्मी बन्धु राणा प्रताप सिंह जी को| इलाहाबाद में जन्मे राणा प्रताप जी वायु सेना में कार्य रत हैं| आप अपना एक ब्लॉग [http://www.rp-sara.blogspot.com] भी चलाते हैं| शे'रोशायरी के जबरदस्त शौकीन राणा प्रताप जी ने हिन्दुस्तानी छंद साहित्य सेवा के उद्देश्य से इस समस्या-पूर्ति में भाग लेते हुए अपनी प्रस्तुति भेजी है|

मुझसे कटे कटे रहते हो|
औरों संग अविरल बहते हो|
सबके नाज उठाते हो तुम|
पर मुझको तरसाते हो तुम|१|

जितना मुझको तरसाओगे|
उतना निकट मुझे पाओगे|
तुम में 'मैं', मुझमें 'तुम', जानो|
मुझसे 'तुम', तुमसे 'मैं', मानो|२|

मिट जायेगा भेद हमारा|
जैसे गंग जमुन जल धारा|
हो मेरी स्मृतियों में गुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|३|


देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी [4]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली और फिर पहली से दूसरी रचना आते आते काफ़ी वक्त लगा| अब साहित्य रसिकों को जैसे जैसे पता चल रहा है, वो अपनी अपनी रचनाएँ भेजने लगे हैं| इस शुभ कार्य में अपना अमूल्य योगदान देने के लिए आप सभी का पुन: पुन: आभार|

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' की चौथी रचना हाजिर है आपके सामने| इस बार हम पढ़ते हैं एक ऐसे व्यक्ति को जो कि व्यवसाय से जुड़े होने के बावजूद साहित्य सेवा में लगे हुए हैं| इलाहाबाद की मिट्टी से जुड़े भाई श्री शेष धर तिवारी जी और मंचों से भी साहित्य की सेवा कर रहे हैं| आप अपना एक ब्लॉग [http://sheshdt.blogspot.com] भी चलाते हैं| प्रस्तुत रचना में आप के अनुभव की झलक स्पष्ट रूप से दृष्टि गोचर होती है|

एक दिवस आँगन में मेरे |
उतरे दो कलहंस सबेरे|
कितने सुन्दर कितने भोले |
सारे आंगन में वो डोले |१|

मैंने उनको खूब रिझाया |
दाना दुनका खूब खिलाया|
पर जब छूना चाहा मैंने |
फैलाए दोनों ने डैने |२|

उड़े गगन को छूना चाहें |
पायीं जैसे अपनी राहें|
अच्छी है यह प्रीत जगत की |
जैसे भगवन और भगत की |३|

दिल को मेरे तुम भाते हो |
जब भी मेरे घर आते हो|
दिल में मेरे रहते हो तुम |
कितने अच्छे लगते हो तुम|४|


सप्ताहांत में हम पढ़ेंगे एक नौजवान शायर की चौपाइयाँ|


देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

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सभी साहित्य रसिकों का पुन: ध्यनाकर्षण करना चाहूँगा कि मैं स्वयँ यहाँ एक विद्यार्थी हूँ, और इस ब्लॉग पर सभी स्थापित विद्वतजन का सहर्ष स्वागत है उनके अपने-अपने 'ज्ञान और अनुभवों' को हम विद्यार्थियों के बीच बाँटने हेतु| इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

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पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन' जी [3]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन' जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

आइए आज पढ़ते हैं मित्र धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन' जी को| आप की 'सज्जन की मधुशाला' [http://sajjankimadhushala.blogspot.com] ने काफ़ी प्रभावित किया है| आपका कल्पना लोक {http://dkspoet.blogspot.com] भी काफ़ी रुचिकर है| आइए पढ़ते हैं कि समस्या पूर्ति की पंक्ति 'कितने अच्छे लगते हो तुम' को कितने प्रभावशाली और रोचक ढँग से पिरोया है आपने अपने कथ्य में|

नन्हें मुन्हें हाथों से जब ।
छूते हो मेरा तन मन तब॥
मुझको बेसुध करते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम |१|

रोम रोम पुलकित करते हो।
जीवन में अमृत भरते हो॥
जब जब खुलकर हँसते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम |२|

पकड़ उँगलियाँ धीरे धीरे।
जब जीवन यमुना के तीरे|
'बाल-कृष्ण' से चलते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम।३|

देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
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पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलील' जी [2]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

आचार्य श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी ने इस समस्या पूर्ति 'कितने अच्छे लगते हो तुम' को अपना आशीर्वाद प्रदान करते हुए, अपनी रचना भेजी है| विस्मय की बात है कि आचार्य जी ने 'चूहे' जैसे विषय पर समस्या की पूर्ति की है, जो कि सहज प्रशंसनीय है| आप लोग भी इस अद्भुत कृति का आनंद लीजिएगा:-

कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||

नहीं किसी को ठगते हो तुम |

सदा प्रेम में पगते हो तुम ||

दाना-चुग्गा मंगते हो तुम |

चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम ||

आलस कैसे तजते हो तुम?

क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?

चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |

बिल्ली से डर बचते हो तुम ||

क्या माला भी जपते हो तुम?

शीत लगे तो कँपते हो तुम?

सुना न मैंने हंसते हो तुम |

चूजे भाई! रुचते हो तुम |



आचार्य जी स्वयं भी एक ब्लॉग चलाते हैं| उन के ब्लॉग का पता है:- http://divyanarmada.blogspot.com

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
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छंद - नव-कुण्डलिया - IND SA 2nd ODI 15.01.11

बल्लेबाज़ों ने किया, पहले बन्टाधार|
फिर अफ्रीका ने करी, बेटिँग धुँआधार||
बेटिँग धुँआधार, हार का देखा मंज़र|
टी वी कर के ऑफ, लगाया हमने बिस्तर|
नीरू* ने फिर डेढ़ बजे जब फ़ोन लगाया|
तब जाना कि मुनाफ़ पटेल ने बेंड बजाया||

* my friend's name

छन्द - अमृत-ध्वनि - मकर संक्रांति

जीवन हिल मिल कर जियो, दूर करो हर भ्रांति|
सब से ये ही कह रहा, पर्व मकर संक्रांति||
पर्व मकर संक्रांति, सु-लायक, शांति प्रदायक|
नीति विधायक, प्रीति सु-भायक, रीति निभायक|
शुभ वरदायक, मंगल गायक, नायक जन-मन|
सदगुणदायक, दोष नशायक, दायक जीवन||

'क्लासिक' रहा है आदमी

IPL में खिलाड़ियों के Gladiators की तरह बिकने पर संसदीय टिप्पणी के सन्दर्भ में:-,


हर दौर में 'अपने लिए माफिक' रहा है आदमी|
संक्षेप में कहिए अगर 'क्लासिक' रहा है आदमी|
किस दौर में खोए हो तुम, किस के लिए बेचैन हो|
अब तो स्वयँ बाजार में जा, बिक रहा है आदमी||






IND SA 1 DAY SERIES - JAN 11

ट्वेन्टी-ट्वेन्टी, टेस्ट में; स्वप्न हुए साकार|
इकदिवसी अब आ रहे, साथ लिए ललकार||
साथ लिए ललकार, करो स्वीकार चुनौती|
जाँबाज़ो इस बार, दरो दे धार दरौंती|
विश्व चषक है द्वार खड़ा देखे तुम सबको|
विजय वरो तुम यार, मनाएँ हम सब रब को||

IPL Sale पर एक छंद

बीती बीते वीक में, आय्पीयल की सेल
खड़े रह गये टापते, लारा, सौरव, गेल
लारा, सौरव, गेल, सनथ भी फेल हो गये
कई तजुर्बेकार, यहाँ बेमेल हो गये
मोदी, पाकिस्तान, तजुर्बे की इ फजीती
दिला गयी फिर याद, अनगिनत बातें बीती

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - श्री कंचन बनारसी जी [1]

मित्रो इस साहित्यिक प्रयास के पहले प्रतिभागी बनने का गौरव प्राप्त हुआ है भाई उमा शंकर चतुर्वेदी उर्फ कंचन बनारसी जी को| आप स्वयँ देखिएगा कितनी सहज-सरस-सुंदर-सुमधुर चौपाइयाँ प्रस्तुत की हैं आपने| भारतीय छंद शास्त्र विधा के क्षेत्र में एक नया प्रयास रूप आरम्भ हुए इस प्रायोजन में अपनी सहभागिता दर्ज करा कर आपने सहज वन्दनीय कार्य किया है| आपको बहुत बहुत आभार| आशा है अन्य साहित्य रसिक भी इस दिशा में अपना अमूल्य योगदान अवश्य प्रदान करेंगे|

खुद अपनेंपन से भगते हो ।
पता नहीं किसको ठगते हो ॥
रात - रात भर जब जगते हो ।
अंतर मन से तब भजते हो ॥
प्रीत पाग में पगते हो तुम ।
कितने अच्छे लगते हो तुम ॥
प्रस्तुतिकर्त्ता: श्री उमा शंकर चतुर्वेदी उर्फ कंचन बनारसी
आपका ब्लॉग:- http://kanchanbanarshi.blogspot.com/

कोई तो बताए कि ये कैसा लोकतंत्र है

सुखियों को और सुखी करने की है जुगाड़
दुखियों को और दुखी करने का मंत्र है|

खुलेआम लूटपाट करने का लाइसेंस
जन-धन हरने का स्व-चालित यंत्र है|

जेल [jail] वाला बेल [bail] वाला हर एक नागरिक
इलेक्शन लड़ने का जहाँ पे स्वतंत्र है|

लोकपाल जहाँ करे गोलमाल दे धमाल
कोई तो बताए कि ये कैसा लोकतंत्र है||

आने वाले नये साल [केलेंडर ईयर] की ढेर सारी शुभकामनाएँ

टेंशन सारी छोड़ के, बढ़िया करें विचार|
बढ़िया पहनें-खायँ हम, बढ़िया हों व्यवहार||
बढ़िया हों व्यवहार, यार आमद या खर्चे|
बढ़िया हों आधार, करें सब बढ़िया चर्चे|
बढ़िया मेल मिलाप होयँ बढ़िया ट्रांजेक्शन|
बढ़िया हो नव-वर्ष, रहे ना कोई टेंशन||

नीती में अंतर न हो, प्रीति बढ़े दिन रात|
दुर्बल- निर्धन व्यक्ति पे, करें न हम आघात||
करें न हम आघात, बात बस इतनी प्यारे|
दम दम दमके चंद्र, साथ जब चमकें तारे|
हिल मिल हम रह पायँ, भूल कर बातें बीती|
औरों को बतलायँ - वही - जो पालें नीती||


सभी साहित्य रसिकों को आने वाले नये साल [केलेंडर ईयर] की ढेर सारी शुभकामनाएँ|

प्रेम - उत्पत्ति, विकास और प्रभाव

भाव जभी उदगार बन - सहज, पूछते क्षेम|
अनुभूति की कोख से, तभी जन्मता प्रेम||
तभी जन्मता प्रेम, नेम से फलता बढ़ता|
सरोकार के साथ, गगन सा ऊँचा चढ़ता|
रहता दिल में, ख़ाता गुस्सा, पीता नफ़रत|
लेता कुछ ना, हरदम देने को ही उद्यत||

चल फिर हम तुम प्रेम से, करें प्रेम की बात|
प्रेम सगाई विश्व में, सर्वोत्तम सौगात||
सर्वोत्तम सौगात, घात ना करती है ये|
कैसा भी हो जख्म, फटाफट भरती है ये|
प्रेम बिना पुरुषार्थ - विनाशक, नारि - निरंकुश|
प्रेम बढ़ा कर लेता, नर, हाथी पर अंकुश||

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

हम में से कई ने अपने बचपन की पाठ्य पुस्तकों में यह कविता पढ़ी होगी:

उठो लाल अब आँखें खोलो|
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो|
बीती रात, कमल दल फूले|
उन के ऊपर भँवरे झूले|

हम में से ज़्यादातर ने रामायण और हनुमान चालीसा भी ज़रूर पढ़ी है| आइए देखें कुछ पंक्तियाँ:-

मंगल भवन अमंगल हारी|
द्रवहु सू दसरथ अजर बिहारी||

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर|
जय कपीश तिहुँ लोक उजागर||

ऊपर की पंक्तियों को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो आप पाएँगे ये चौपाई 'छंद' हैं|

चौपाई छंद

सबसे सरल छंद है ये| चार चरणों में बँटा होता है ये| प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ होती हैं| पहले-दूसरे चरणों के अंत में समान शब्द आते हैं, और तीसरे-चौथे चरणों के अंत में समान शब्द आते हैं| यदि कवि चारों के चारों चरणों में समान शब्द लेना चाहे, तो सुंदरता और भी बढ़ जाती है| चरणांत में तगण और जगण वर्जित|

उदाहरण देखिए:-

उठो लाल अब आँखें खोलो
१२ २१ ११ २२ २२ = १६ मात्राएँ

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर
११ ११२१ २१ ११ २११ = १६ मात्राएँ


देखा आपने कितना आसान है ये छंद| तो चलो इस मंच पर की सबसे पहली 'समस्या पूर्ति' शुरू करते हैं| यह समस्या पूर्ति लोगों में रुझान जागने तक जारी रहेगी| उस के बाद सदस्यों / रचनाकारों के उत्साह को देखते हुए दूसरी पॅक्ति की घोषणा की जाएगी|


पहली समस्या पूर्ति की पंक्ति है:-

"कितने अच्छे लगते हो तुम|"

आपको ऊपर दी गयी पंक्ति को ध्यान में रखते हुए कम से कम चार चरणों वाली ३ चौपाई लिख कर navincchaturvedi@gmailcom पर भेजनी हैं, जिन्हें समय समय पर यहाँ मंच पर प्रकाशित किया जाएगा| रचनाकारों के समझने हेतु एक प्रस्तुति यहाँ दी जा रही है?:-

सब के सब अपने लगते हैं| पर जब तब हम को ठगते हैं|
सबकी बातें मोहित करतीं| आँखों में आँसू भी भरतीं|१|

अपने अपने कारण सबके| कोई न रहना चाहे दब के|
विजय पताका लहराते हैं| अपना दम खम दिखलाते हैं|२|

इन सब में तुम अलग थलग हो| उच्च गगन के मुक्त विहग हो|
सचमुच सच्चे लगते हो तुम| कितने अच्छे लगते हो तुम|३|

'कितने अच्छे लगते हो तुम', ये हिस्सा प्रस्तुति के किसी भी चरण में लेने के लिए स्वतंत्र हैं सभी रचनाकार|

आप सभी अपनी अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें

हिंद युग्म पुरस्कृत ग़ज़ल: अच्छा लगता है - नवीन

इस ग़ज़ल पर नया काम
तनहाई का चेहरा अक्सर सच्चा लगता है।
ख़ुद से मिलना बातें करना अच्छा लगता है।१।

दुनिया ने उस को ही माँ कह कर इज़्ज़त बख़्शी।
जिसको अपना बच्चा हरदम बच्चा लगता है। २।

वक्त बदन से चिपकी स्थितियों के काँधों पर।
सुख-दुख संग लटकता जीवन झोला लगता है।३।

हम भी इसी दुनिया के रहने वाले हैं यारो।
हमको भी कोई बेगाना अपना लगता है।४।

सात समंदर पार बसे वो, उस को क्या मालूम।
उस को फ़ोन करूँ तो कितना पैसा लगता है।५। 
 
ताज़्ज़ुब होता है हम-तुम कैसे पढ़ लिख गये यार।
अब तो पैदा होने में भी खर्चा लगता है।६।

दुनिया ने जब मान लिया फिर हम क्यूँ ना मानें!
तेंदुलकर हर किरकेटर का चच्चा लगता है।७।

 =========================================


नवंबर माह की हिंद युग्म द्वारा आयोजित यूनिप्रतियोगिता में इस ग़ज़ल को पुरस्कृत किया गया है| इस अनुग्रह के लिए हिंद युग्म परिवार का शत शत आभार|




Monday, December 20, 2010
NAVIN C. CHATURVEDI
प्रतियोगिता मे छठा स्थान नवीन चतुर्वेदी की ग़ज़ल को मिला है। हिंद-युग्म पर यह उनकी पहली रचना है। नवीन सी चतुर्वेदी का जन्म अक्टूबर 1968 मे मथुरा मे हुआ। वाणिज्य से स्नातक नवीन जी ने वेदों मे भी आरंभिक शिक्षा ग्रहण की है। अभी मुम्बई मे रहते हैं और साहित्य के प्रति खासा रुझान रखते हैं। आकाशवाणी मुंबई पर कविता पाठ के अलावा अनेकों काव्यगोष्ठियों मे भी शिरकत की है और आँडियो कसेट्स के लिये भी लेखन किया है। ब्रजभाषा, हिंदी, अंग्रेजी और मराठी मे लेखन के साथ नवीन जी ब्लॉग पर तरही मुशायरों का संचालन भी करते हैं। ज्यादा से ज्यादा नयी पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने का प्रयास है।


पुरस्कृत रचना: अच्छा लगता है


तनहाई का चेहरा अक्सर सच्चा लगता है|
खुद से मिलना बातें करना अच्छा लगता है। |१|

दुनिया ने उस को ही माँ कह कर इज़्ज़त बख़्शी|
जिसको अपना बच्चा हरदम बच्चा लगता है। |२|

वक्त बदन से चिपके हालातों के काँधों पर|
सुख दुख संग लटकता जीवन झोला लगता है|३|

हम भी तो इस दुनिया के वाशिंदे हैं यारो|
हमको भी कोई बेगाना अपना लगता है। |४|

सात समंदर पार रहे तू, कैसे समझाऊँ|
तुझको फ़ोन करूँ तो कितना पैसा लगता है। |५|

मुँह में चाँदी चम्मच ले जन्मे, वो क्या जानें?
पैदा होने में भी कितना खर्चा लगता है। |६|

शहरों में सीमेंट नहीं तो गाँव करे भी क्या|
उस की कुटिया में तो बाँस खपच्चा लगता है। |७|

वर्ल्ड बॅंक ने पूछा है हमसे, आख़िर - क्यों कर?
मर्सिडीज में भी सड़कों पर झटका लगता है। |८|

दुनिया ने जब मान लिया फिर हम क्यूँ ना मानें!
तेंदुलकर हर किरकेटर का चच्चा लगता है। |९|

सलाम सचिन तेंदुलकर

अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट में शतकों का अर्ध शतक पूरा करने पर सचिन तेंदुलकर के सम्मान में:-

सचिन सचिन सच्चिन सचिन, सचिन सचिन सच्चिन्न|
दुनिया की किरकेट का, तुम हो भाग अभिन्न||
तुम हो भाग अभिन्न, भिन्न है खेल तुम्हारा|
खिन्न हुआ था वार्न, देख कर स्वप्न, बेचारा|
आज तलक है याद, सचिन हमको वो मंज़र|
'बच्चू' जिसने कहा, उसी को मारा सिक्सर||

नवगीत : आप हम सब खुश रहें

आप हम सब खुश रहें!

खेत खलिहानों में
पैदावार हो,
हसरतों का ना कहीं
व्यापार हो,
बाल बच्चों को मिले
शिक्षा अमित,
बहन बेटी घूम पाएँ
भय रहित,
हो तरक्की
और
नदियाँ भी बहें|
आप हम सब खुश रहें।1|

गैर की दहलीज पर
जब जाएँ हम,
मोल इज़्ज़त का
न दे के आएँ हम,
बाँह फैला के
सभी को स्थान दें,
साथ ही सरहद पे भी
हम ध्यान दें,
ताकि भावी पीढ़ियाँ
सब सुख लहें|
आप हम सब खुश रहें।2|

हम रहें खुश
इस तरह कुछ
इस बरस,
विश्व को
आए न हम तुम पे
तरस,
हम भी हैं कुछ
विश्व को
बतलाएँ हम,
कंधे से कंधा मिला
बतियाएँ हम,
देख तन गोरा
न स्तर से ढहें|
आप हम सब खुश रहें।3|

सब से छोटी बहर की ग़ज़ल

मुद्दतों से एक जुनून था, सब से छोटे रूक्न पर ग़ज़ल लिखूं| गूगल पर सर्च किया, 'फाइलातुन' और 'फाइलुन' रूक्न पर ग़ज़लें मिलीं| फिर सोचा अगर इस से भी छोटे रूक्न को पकड़ा जाए तो कैसा! एक कोशिश जो की सिर्फ़ ३ मात्रा वाले रूक्न 'फअल' पर, जो अब आप सभी के सामने हाजिर है| आप सभी की राय मेरे लिए महत्वपूर्ण है| कृपया अपनी राय से ज़रूर अवगत कराने की कृपा करें|

सजन |
नमन |१|

सिफ़र |
सघन |२|

स-धन |
सु-जन |३|

महक |
चुभन |४|

शरम |
वसन |५|

धरम |
न हन |६|

समय |
वहन |७|

फिकर |
अगन |८|

कुमति |
पतन |९|

सफ़र |
जतन |१०|

नव-युवकों का करना ही होगा अभिनंदन

अद्भुत, अत्युत्तम, अमित, अनुपम, अगम, अपार|
कल थी सारी इंडिया, यूसुफ़ पर बलिहार||
यूसुफ़ पर बलिहार, यार सब हक्के बक्के|
घुमा घुमा कर क्या मारे हैं चौके छक्के|
खेल-कला-व्यापार-राजनीति या प्रबंधन|
नव-युवकों का करना ही होगा अभिनंदन||

हरिगीतिका छन्द विधान

हरिगीतिका छन्द विधान 

सोलह गिनें मात्रा, रुकें फिर, सांस लेने के लिए|
फिर बाद उस के आप मात्रा - भार बारह लीजिए||

चरणान्त में लघु-गुरु, तुकान्तक, चार पंक्ति विधान है|
हरिगीतिका वह छन्द है जो, महफ़िलों की शान है||




उदाहरण मात्रा गणना सहित  


सोलह गिनें मात्रा, रुकें फिर, 
२११ १२ २२ १२ ११ = १६ मात्रा, यति 

सांस लेने के लिए|
२१ २२ २ १२ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु 


फिर बाद उस के आप मात्रा - 
 ११ २१ ११ २ २१ २२ = १६ मात्रा, यति

भार बारह लीजिए||
२१ २११ २१२ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु


चरणान्त में लघु-गुरु, तुकान्तक, 
११२१ २ ११ ११ १२११ = १६ मात्रा, यति 
 
चार पंक्ति विधान है|
 २१ २१ १२१ २ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु

हरिगीतिका वह छन्द है जो, 
११२१२ ११ २१ २ २ = १६ मात्रा, यति 
 
महफ़िलों की शान है||
 १११२ २ २१ २ = १२ मात्रा, अंत में लघु गुरु


हरिगीतिका छंद १६+१२=२८ मात्रा वाला छंद होता है| अंत में लघु गुरु अनिवार्य है| इस छंद का अलिखित नियम यह है कि इस की धुन -

ला ला ल ला 
ला ला ल ला ला 
ला ल ला 
ला ला ल ला 

के अनुरूप चलती है| यहाँ धुन वाले ला का अर्थ गुरु अक्षर न समझ कर २ मात्रा भार समझना चाहिए|

ठीक इसी तरह का एक और छंद है - उसे सार या ललित छंद के नाम से जाना जाता है| इस छंद में भी १६+१२=२८ मात्रा होती हैं| अंत में गुरु गुरु आते हैं| और इस सार / ललित छंद की धुन होती है - 

ला ला ला ला 
ला ला ला ला 
ला ला ला ला 
ला ला

यहाँ भी धुन वाले ला का अभिप्राय गुरु वर्ण से न हो कर २ मात्रा भार से है|

हरिगीतिका को कभी कभी कुछ व्यक्ति गीतिका समझने की भूल कर बैठते हैं| जब कि वह एक अलग ही छंद है| गीतिका में १४+१२=१६ मात्रा होती हैं| अंत में लघु गुरु| इस छंद की धुन होती है -

ला ल ला ला 
ला ल ला ला 
ला ल ला ला
ला ल ला 

यहाँ भी धुन वाले ला का अभिप्राय गुरु अक्षर न हो कर २ मात्रा भार है| गीतिका छंद का उदाहरण - "हे प्रभो आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिये"|

सरस्वती वन्दना


सरस्वती वन्दना


पद्मासनासीना, प्रवीणा, मातु, वीणा-वादिनी।
स्वर-शब्द-लय-सरगम-समेकित, शुद्ध-शास्वत-रागिनी॥
 
सब के हृदय सन्तप्त हैं माँ! निज-कृपा बरसाइये।
भटके हुए संसार को माँ! रासता दिखलाइये॥
 

यति-गति समो कर ज़िन्दगी में, हम सफल जीवन जिएँ।
स्वच्छन्द-सरिता में उतर कर, प्रेम का अमृत पिएँ॥
व्यवहार में भी व्याकरण सम, शुद्ध-अनुशासन रहें।
सुन कर जिन्हें जग झूम जाए, हम वही बातें कहें॥ 
 

इक और छोटी सी अरज है, शान्ति हो हर ठौर में।
परिवार के सँग हम खुशी से, जी सकें इस दौर में॥  
कह दीजिये अपनी बहन से, रह्म हम पर भी करें।
हे शारदे! वर दीजियेगा, हम सरसता को वरें॥


नवीन सी. चतुर्वेदी

छन्द हरिगीतिका




YouTube link :- Saraswati vandana - https://m.youtube.com/watch?v=hA3leJgE4Do

नव-कुण्डलिया - IND vs NZ 2nd ODI JAIPUR 01.12.10

गोवाहाटी में दिखी, हट कर युवा ब्रिगेड|
कीवी जिसके सामने, करते दिखे परेड||
करते दिखे परेड, ग्रेड दिखलाई जम के|
अश्विन, युवी, विराट, श्रिसन्त धमक कर चमके|
हमने तो यारो ये ही निरधार कर लिया|
भारत जब भी खेला, जीती टीम इंडिया||

क्या कहते हैं आप?

साहित्यकार कैसा होना चाहिए?

बड़ा ही सीधा सा प्रश्न है ना ये! फिर भी कुछ है जो अनुत्तरित सा लगता रहता है|

मसलन:-

क्या साहित्यकार वो है :-

जो लिखता है.......
जो दूसरों के लिखे को भी पढ़ता है..............
जो सिर्फ़ अपनी आत्मा की आवाज़ पर ही लिखता है.............
जो दूसरों के कहने पर ही लिखता है...........
जो तारीफ करना जानता है............
जो तारीफ सुनने का शैदाई होता है............
जो साधारण बात को भी अलंकृत कर दे.........
जो सिर्फ़ अपनी दुनिया में ही सुखी और संतुष्ट रहता है..............
जिसे बाहर की दुनिया को देखने का भी शौक हो............
जो झक्की मिज़ाज हो.............
जिसकी सदाशायता के चर्चे सभी जगह हों.............
जिसके यहाँ महफ़िलों का दौर चलता रहता हो...............
जिसकी बातों में हमेशा आदर्श की बातें हों...............
जो जन साधारण से ऊपर उठ कर हो.............
जिसे सरकार पुरस्कृत करे...............
जो कई कई सालों से लिख रहा हो और जिसे सभी जानते हों............
जो पहचान का मोहताज होने के बावजूद साहित्य के प्रति समर्पित हो...................
जो स्थापित लोगों की रचनाओं को सम्मान देना जनता हो............
जो नयी पौध को भी उत्साहित करने में विश्वास रखता हो.......
जो दिल पे चोट करने वाली ग़ज़ल लिखे............
जिसकी हिन्दी पर अच्छी पकड़ हो.................
जिसने कुछ नयी विधा का प्रादुर्भाव किया हो.................


आदि आदि आदि...............


और भी बहुत कुछ| क्या ये सभी लक्षण होने चाहिए एक साहित्यकार में? या इन में से कुछ? या इनके अलावा भी.....
वो!
वो!!
वो!!!
वो!!!!

क्या कहते हैं आप? हम किसे समझें साहित्यकार? क्या परिभाषा होनी चाहिए साहित्यकार की? क्या आप सभी बुद्धिजीवी अपने कीमती वक्त में से कुछ पल निकाल कर इस विषय पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणी देना चाहेंगे? इस विद्यार्थी को आप सभी के उत्तरों की प्रतीक्षा रहेगी|

आपका अपना ही
नवीन सी चतुर्वेदी

नवरात्रि का त्यौहार, मानव मात्र का त्यौहार है

मस्ती भरे आबाल बच्चे, नाचते अरु झूमते।
पावस अनंतर तरु सघन, जैसे धरा को चूमते।।

हर ओर सुख समृद्धि के ही, दृश्य दिखते हैं घने।
जैसे कि हलधर, देख अपनी - फसल, खुशियों से तने।१।


कर्मठ मनुज, करते दिखें, बस - कर्म की आराधना।
वाणी-हृदय- व्यवहार से, बस - शक्ति की ही साधना।।

जिसने इसे अपना लिया, उस - का सफ़ीना पार है।
नवरात्रि का त्यौहार, मानव - मात्र का त्यौहार है।२। 

हरिगीतिका छंद

किस का हम करें यक़ीं, सारे एक थैली के चट्टे-बट्टे - नवीन

क़रीब 10-15 साल पहले संझा जनसत्ता में प्रकाशित


किस का हम करें यक़ीं, सारे एक थैली के चट्टे-बट्टे
खाने को नहीं मिले तो फ़रमाया, अंगूर हैं खट्टे

जनता के तारनहार बड़े मासूम, बड़े दरिया दिल हैं
तर जाएँगी सातौं पीढ़ी, लिख डाले हैं इतने पट्टे

मज़हब हो या फिर राजनीति ठेकेदारों को पहिचानो
धन से बोझल, मन से कोमल तन  से होंगे हट्टे-कट्टे

जनता की ख़ातिर, जनता के अरमानों पर, जनता से ही -
जनता के हाथों जनसेवक सब खेल रहे खुल कर सट्टे 

दिवाली गीत - दीपावली दीपावली दीपावली - नवीन

हर साल मेरी रूह को,
कर डालती है बावली। 
दीपावली दीपावली दीपावली॥ 

इक वजह है ये मुस्कुराने की। 
फलक से,
आँख उट्ठा कर मिलाने की। 
घरों को, 
रोशनी से जगमगाने की। 
गले मिलने मिलाने की। 
वो हो मोहन,
कि मेथ्यू,
या कि हो ग़ुरबत अली। 
दीपावली दीपावली दीपावली॥ 

हृदय-मिरदंग बजती है,
तिनक धिन धिन। 
छनकती है ख़ुशी-पायल,
छनक छन छन। 
गली में फूटते हैं बम-पटाखे भी,
धना धन धन। 
अजब सैलाब उमड़ता है घरों से ,
हो मगन, बन ठन। 
लगे है स्वर्ग के जैसी,
शहर की हर गली। 

दीपावली दीपावली दीपावली॥ 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

धोनी की तकदीर चली, भाई बल्ले बल्ले

वी वी. एस. उड़ा दिए, न्यूजिलेंड के होश|
भज्जी में भी आ गया, उन्हें देख के जोश||
उन्हें देख के जोश, रोशनी ऐसी छाई|
कीवी ने दुम दुपका कर के जान बचाई|
फ़ील्डर-बौलर पस्त, पड़े ना कुछ भी पल्ले|
धोनी की तकदीर चली, भाई बल्ले बल्ले||